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सत्यनारायण पटेल हमारे समय के चर्चित कथाकार हैं जो गहरी नज़र से युगीन विडंबनाओं की पड़ताल करते हुए पाठक से समय में हस्तक्षेप करने की अपील करते हैं। प्रेमचंद-रेणु की परंपरा के सुयोग्य उत्तराधिकारी के रूप में वे ग्रामांचल के दुख-दर्द, सपनों और महत्वाकांक्षाओं के रग-रेशे को भलीभांति पहचानते हैं। भूमंडलीकरण की लहर पर सवार समय ने मूल्यों और प्राथमिकताओं में भरपूर परिवर्तन करते हुए व्यक्ति को जिस अनुपात में स्वार्थांध और असंवेदनशील बनाया है, उसी अनुपात में सत्यनारायण पटेल कथा-ज़मीन पर अधिक से अधिक जुझारु और संघर्षशील होते गए हैं। कहने को 'गांव भीतर गांव' उनका पहला उपन्यास है, लेकिन दलित महिला झब्बू के जरिए जिस गंभीरता और निरासक्त आवेग के साथ उन्होंने व्यक्ति और समाज के पतन और उत्थान की क्रमिक कथा कही है, वह एक साथ राजनीति और व्यवस्था के विघटनशील चरित्र को कठघरे में खींच लाते हैं। : रोहिणी अग्रवाल

मंटो द्वारा अमेरिका के राष्ट्रपति को लिखा ख़त

मंटो द्वारा अमेरिका के राष्ट्रपति को लिखा ख़त। जो उन्होंने 1951 में लिखा था।

॥चचाजान, अस्‍सलामुअलैकुम! ॥

यह खत आपके पाकिस्‍तानी भतीजे की तरफ से है, जिसे आप नहीं जानते - जिसे आपकी सात आजादियों की सल्तनत में शा
यद कोई भी नहीं जानता। मेरा देश हिंदुस्‍तान से कटकर क्‍यों बना? कैसे आजाद हुआ? यह तो आपको अच्‍छी तरह मालूम है। यही वजह है कि मैं खत लिखने की हिम्‍मत कर रहा हूँ, क्‍योंकि जिस तरह मेरा देश कट कर आजाद हुआ उसी तरह मैं कट कर आजाद हुआ और चचाजान, यह बात तो आप जैसे सब कुछ जानने वाले से छुपी हुई नहीं होनी चाहिए कि जिस पक्षी को पर काटकर आजाद किया जाएगा, उसकी आजादी कैसी होगी! खैर इस किस्‍से को छोड़िए।

मेरा नाम सआदत हसन मंटो है और मैं एक ऐसी जगह पैदा हुआ था, जो अब हिंदुस्‍तान में है - मेरी माँ वहाँ दफन है, मेरा बाप वहाँ दफन है, और मेरा पहला बच्‍चा उस जमीन में सो रहा है लेकिन वह अब मेरा वतन नहीं - मेरा वतन अब पाकिस्‍तान है, जो मैंने अंग्रेजों के गुलाम होने की हैसियत में पाँच-छ: बार देखा था।

मैं पहले सारे हिंदुस्‍तान का एक बड़ा कहानीकार था, अब पाकिस्‍तान का एक बड़ा कहानीकार हूँ। मेरी कहानियों के कई संकलन छप चुके हैं। लोग मुझे इज्जत की निगाहों से देखते हैं। साबुत हिंदुस्‍तान में मुझ पर तीन मुकदमे चले थे और यहाँ पाकिस्‍तान में एक, लेकिन इसे बने अभी बरस ही कितने हुए हैं। अंग्रेजों की हुकूमत भी मुझे अश्‍लील लेखक समझती थी, मेरी अपनी हुकूमत का भी मेरे बारे में यही खयाल है। अंग्रेजों की हुकूमत ने मुझे छोड़ दिया था, लेकिन मेरी अपनी हुकूमत मुझे छोड़ती नजर नहीं आती - निचली अदालतों ने मुझे तीन माह कैद बामशक्कत और तीन सौ रुपए जुर्माने की सजा दी थी। सेशन में अपील करने पर मैं बरी हो गया, मगर मेरी हुकूमत समझती है कि उसके साथ नाइंसाफी हुई है। इसलिए अब उसने हाई कोर्ट में अपील की है कि वह सेशन के फैसले पर दुबारा गौर करे और मुझे सही और माकूल सजा दे - देखिए, हाईकोर्ट क्‍या फैसला देती है।

मेरा देश आपका देश नहीं। इसका मुझे अफसोस है - अगर हाईकोर्ट मुझे सजा दे दे तो मेरे देश में ऐसा कोई अखबार नहीं जो मेरी तसवीर छाप सके, मेरे तमाम मुकदमों की कार्रवाई की तफसील छाप सके।

मेरा देश बहुत गरीब है। उसके पास आर्ट पेपर नहीं है, उसके पास अच्‍छे छापेखाने नहीं हैं - उसकी गरीबी का सबसे बड़ा सुबूत मैं हूँ। आपको यकीन नहीं आएगा चचाजान कि बाईस किताबों का लेखक होने के बाद भी मेरे पास रहने के लिए मकान नहीं। और यह सुनकर तो आप हैरत में डूब जाएँगे कि मेरे पास सवारी के लिए कोई पैकार्ड है न डॉज सैकिंडहैंड मोटर-कार भी नहीं।

मुझे कहीं जाना हो तो साइकिल किराए पर लेता हूँ। अखबार में अगर मेरा कोई लेख छप जाए और सात रुपए प्रति कॉलम के हिसाब से मुझे बीस-पच्‍चीस रुपए मिल जाएँ तो मैं ताँगे में बैठता हूँ और अपने यहाँ की बनाई हुई शराब भी पीता हूँ। यह ऐसी शराब है कि अगर आपके देश में बनाई जाए तो आप उस डिस्‍टलरी को एटम बम से उड़ा दें, क्‍योंकि एक बरस के अंदर-अंदर ही यह खानाखराब इंसान को बिल्‍कुल ही बर्बाद कर देती है।

मैं कहाँ-से-कहाँ पहुँच गया - असल में मुझे भाईजान अर्सकाइन काल्‍डवैल (Erskine coldwell) को आपके जरिए से सलाम भेजना था। उनको तो खैर आप जानते ही होंगे। उनके एक उपन्‍यास 'गाड्ज लिटिल एकर' (God's Little Acre) पर आप मुकदमा चला चुके हैं - जुर्म वही था जो अक्सर यहाँ मेरा होता है, यानी 'अश्‍लीलता'।

यकीन जानिए, चचाजान, मुझे बड़ी हैरत हुई थी, जब मैंने सुना था कि उनके उपन्‍यास पर सात आजादियों के मुल्‍क में अश्‍लीलता के इल्जाम में मुकदमा चला है - आपके यहाँ तो हर चीज नंगी है। आप तो हर चीज का छिलका उतारकर अल्‍मारियों में सजाकर रखते हैं, वह फल हो या औरत, मशीन हो या जानवर, किताब हो या कैलेंडर। आप तो नंगेपन के बादशाह हैं - मेरा खयाल था, आपके देश में पवित्रता का नाम अश्‍लीलता होगा मगर चचाजान, आपने यह क्‍या गजब किया कि भाईजान अर्सकाइन काल्‍डवैल पर मुकदमा चला दिया।

मैं इस गम से असरअंदाज होकर अपने देश की देसी शराब अधिक मात्रा में पीकर मर गया होता, अगर मैंने फौरन ही मुकदमे का फैसला न पढ़ लिया होता। यह मेरे देश की बदकिस्‍मती तो हुई कि एक इंसान खस-कम-जहाँ-पाकहोने से रह गया, लेकिन फिर मैं आपको यह खत कैसे लिखता। वैसे मैं बड़ा आज्ञाकारी हूँ। मुझे अपने देश से प्‍यार है। मैं, इन्‍शाअल्‍लाह थोड़े ही दिनों में मर जाऊँगा। अगर खुद नहीं मरूँगा तो खुद-ब-खुद मर जाऊँगा, क्‍योंकि जहाँ आटा रुपए का पौने तीन सेर मिलता हो, वहाँ बड़ा ही निर्लज्ज इंसान होगा जो जिंदगी के पारंपरिक चार दिन गुजार सके।

हाँ तो मैंने मुकदमे का फैसला पढ़ा और मैंने देसी शराब अधिक मात्रा में पीकर खुदकुशी का इरादा तर्क कर दिया - भाई, चचाजान, कुछ भी हो, आपके यहाँ हर चीज पर कलई चढ़ी है लेकिन वह जज, जिसने भाईजान अर्सकाइन काल्‍डवैल को अश्‍लीलता के जुर्म से बरी किया, उसके दिमाग पर यकीनन कलई का झोल नहीं था। अगर यह जज - (अफसोस है कि मैं उनका नाम नहीं जानता) - जिंदा हैं तो उनको मेरा अकीदत भरा सलाम जरूर पहुँचा दीजिए।

उनके फैसले की यह आखिरी पंक्तियाँ उनके दिमाग की ताकत और गहराई का पता देती हैं। मैं व्‍यक्तिगत तौर पर महसूस करता हूँ कि ऐसी किताबों को सख्ती से दबा देने से पढ़नेवालों में खामखाह जिज्ञासा और हैरत पैदा होती है जो उन्हें कामुकता की टोह लगाने की तरफ प्रोत्‍साहित कर देती है, हालाँकि असल किताब की यह मंशा नहीं है। मुझे पूरा विश्‍वास है कि इस किताब में रचानाकार ने सिर्फ वही चीज चुन कर ली है जिसे वह अमरीकी जिन्दगी के किसी विशेष वर्ग के संबंध में सच्‍चा समझता है। मेरी राय में सच्‍चाई को अदब के लिए हमेशा उचित और स्थिर रहना चाहिए।

मैंने निचली अदालतों को यही कहा था लेकिन उसने मुझे तीन माह कैदे-बामशक्कत और तीन सौ रुपए की सजा दी - उसकी राय यह थी कि सच्‍चाई को अदब से हमेशा दूर रखना चाहिए - अपनी-अपनी राय है।

मैं तीन माह कैदे-बामशक्कत काटने के लिए हमेशा तैयार हूँ लेकिन यह तीन सौ रुपए का जुर्माना मुझसे अदा न हो सकेगा - चचाजान, आप नहीं जानते, मैं बहुत गरीब हूँ। मेहनत का तो मैं आदी हूँ, लेकिन रुपयों का आदी नहीं। मेरी उम्र उंतालीस बरस के करीब है और यह सारा दौर मेहनतकशी में ही गुजरा है। आप जरा गौर तो फरमाइए कि इतना बड़ा लेखक होने पर भी मेरे पास कोई पैकार्ड नहीं।

मैं गरीब हूँ, इसलिए कि मेरा देश गरीब है। मुझे तो फिर दो वक्‍त की रोटी किसी-न-किसी हीले मिल जाती है, मगर मेरे कुछ भाई ऐसे भी हैं जिन्‍हें यह भी नसीब नहीं होती।

मेरा देश गरीब है, जाहिल है - क्‍यों, यह तो आपको पूरी तरह से पता है - यह आपके और आपके भाईजान बुल के साझे साज का ऐसा तार है जिसे मैं छेड़ना नहीं चाहता, इसलिए कि आपकी सुनने की शक्ति पर भारी पड़ेगा - मैं यह खत एक खुशनसीब बेटे की हैसियत से लिख रहा हूँ, इसलिए मुझे पहले और आखिर तक खुशनसीब बेटा ही रहना चाहिए।

आप जरूर पूछेंगे : "तुम्‍हारा देश गरीब क्‍योंकर है, ज‍बकि हमारे मुल्क से इतनी पैकार्डें, इतनी ब्‍युकें, मैक्‍स फैक्‍टर का इतना सामान वहाँ जाता है…"

यह सब ठीक है चचाजान, मगर मैं आपके इस सवाल का जवाब नहीं दूँगा। आप अपने सवाल का जवाब खुद अपने दिल से पूछ सकते हैं, अगर आपने अपने काबिल सर्जनों से कहकर उसे अपने पहलू से निकलवा न दिया हो।

मेरे मुल्क की वह आबादी, जौ पैकार्डों और ब्‍यूकों पर सवार होती है, मेरा मुल्‍क नहीं - मेरा मुल्‍क वह है, जिसमें मुझ ऐसे और मुझसे बदतर गरीब बसते हैं।

यह बड़ी कड़वी बातें हैं हमारे यहाँ शक्‍कर कम है, वर्ना मैं इन पर चढ़ाकर आपकी सेवा में पेश करता - इसको भी छोड़िए।

बात दरअसल यह है कि मैंने हाल ही में आपके मुल्‍क के एक साहित्‍यकार ऐवलिन वॉग (Evelyn Waugh) की एक रचना (The Loved Once) पढ़ी है। मैं इससे इतना प्रभावित हुआ कि आपको यह खत लिखने बैठ गया - आपके मुल्क की अनुपमता का मैं यूँ भी प्रशंसक था, मगर यह किताब पढ़कर तो मेरे मुँह से तुरंत निकला :

जो बात की, खुदा की कसम, लाजवाब की
    वाहवा, वाहवा, वाहवा, वाहवा
    चचाजान वल्‍लाह मजा आ गया। कैसे दिलवाले लोग आपके देश में बसते हैं!

एवलिन वॉग (Evelyn Waugh) हमें बताता है कि आपके कैलिफोर्निया में मुर्दों, यानी बिछड़े हुए अजीजों पर भी कॉस्मेटिक कलई की जा सकती है और उसके लिए बड़ी-बड़ी कंपनियाँ मौजूद हैं - मरनेवाले अजीज की शक्‍ल भद्दी हो तो इनमें से किसी में भेज दीजिए - फार्म मौजूद है। उसमें अपनी इच्‍छाएँ दर्ज कर दीजिए। काम मनपसन्‍द होगा। यानी मुर्दे को आप जितना खूबसूरत बनवाना चाहें, दाम देकर बनवा सकते हैं। अच्‍छे-से-अच्‍छा माहिर मौजूद है जो मुर्दे के जबड़े का ऑपरेशन करके उस पर मीठी-से-मीठी मुस्‍कराहट बिठा सकता है। आँखों में रोशनी पैदा की जा सकती है, माथे पर जरूरत के हिसाब से नूर पैदा किया जा सकता है। और यह सब काम ऐसी कुशलता से होता है कि कब्र में यमदूत भी धोखा खा जाएँ।

भई खुदा की कसम चचाजान, आपके मुल्‍क का कोई जवाब पैदा नहीं हो सकता।

जिंदों पर ऑपरेशन सुना था - प्‍लास्टिक सर्जरी से जिंदा आदमियों की शक्‍ल सँवारी जा सकती है, इसके बारे में भी यहाँ कुछ चर्चे हुए थे, मगर यह नहीं सुना था कि आप मुर्दों तक की शक्‍ल सँवार देते हैं।

यहाँ आपके मुल्‍क का एक हब्‍शी आया था। कुछ दोस्‍तों ने मुझसे उनका परिचय कराया। उस वक्‍त मैं भाई ऐवलिन वॉग (Evelyn Waugh) की किताब पढ़ चुका था - मैंने उनसे उनके मुल्‍क की तारीफ की और ये शेर पढ़ा :

एक हम हैं कि लिया अपनी ही सूरत को बिगाड़
    एक वह हैं जिन्‍हें तसवीर बना आती है

काले साहब मेरा मतलब न समझे, मगर हकीकत यह है चचाजान कि हमने अपनी सूरत को बिगाड़ रखा है। इतना बिगाड़ रखा है कि अब वह पहचानी भी नहीं जाती, अपने आपसे भी नहीं - और एक आप हैं कि भद्दी सूरत मुर्दों तक की शक्‍ल सँवार देते हैं। सच तो यह है कि इस दुनिया के तख्‍ते पर एक सिर्फ आपकी कौम को ही जिंदा रहने का हक हासिल है बाखुदा बाकी सब झक मार रहे हैं।

हमारी जबान उर्दू का एक शाइर गालिब हुआ है। उसने आज से करीब-करीब एक सदी पहले कहा था :
    हुए मर के हम जो रुसवा, हुए क्‍यों न गर्के़-दरिया
    न कभी जनाजा उठता, न कहीं मजार होता

गरीब को जिंदगी में अपनी बदनामी का डर नहीं था, क्‍योंकि वह शुरू से आखिर तक दुनिया से उपेक्षित रहा उसको इस बात का डर था कि मरने के बाद भी बदनामी होगी। आदमी जिद्दी था। उसे डर नहीं, विश्‍वास था, इसलिए उसने अपने शव को दरिया में बहा देने की इच्‍छा जाहिर की कि न जनाजा उठे न मजार बने।

काश! वह आपके देश में पैदा हुआ होता। आप उसका बड़ी शानो-शैकत से जनाजा उठाते और उसका मजार स्‍काई स्‍क्रैपर की सूरत बनाते, और अगर उसकी इच्‍छा पर अमल करते तो शीशे का हौज तैयार करते, जिसमें दुनिया गर्क होने तक उसकी लाश रहती और चिड़ियाघर में लोग उसे जा-जाकर देखते।

भाई ऐवलिन वॉग (Evelyn Waugh) बताता है कि वहाँ मुर्दा इंसानों ही के लिए नहीं, मुर्दा हैवानों के नयन-नक्‍श सँवारने वाली संस्‍थाएँ भी मौजूद हैं। हादिसे में अगर किसी कुत्ते की दुम कट जाती है तो दूसरी लगा दी जाती है। स्वर्ग सिधार जाने वाले की शक्‍लो-सूरत में उसकी जिंदगी में जितने ऐब थे, उसकी मौत के बाद कुशलता से ठीक कर देते हैं और उसे शानो-शौकत के साथ दफना दिया जाता है। उसकी क‍ब्र पर फूल चढ़ाने का इंतजाम भी कर दिया जाता है - और हर साल, जिस रोज किसी का पालतू मरा हो, उस संस्‍था की तरफ से एक कार्ड भेज दिया जाता है जिस पर कुछ इस प्रकार से लेख होता है : जन्‍नत में आपका टौमी या जिम्‍मी आपकी याद में अपनी दुम या कान हिला रहा है।

हमसे तो आपके देश के कुत्ते ही अच्‍छे - यहाँ आज मरे, कल दूसरा दिन-यहाँ किसी का कोई अजीज मरता है तो उस गरीब पर एक आफत टूट पड़ती है और वह दिल-ही-दिल में चिल्‍ला उठता है : 'कमबख्‍त यह क्‍यों मरा… मुझे ही मौत आ गई होती…'

सच तो यह है चचाजान, हमें मरने का सलीका आता है न जीने का।

आपके देश में एक साहब ने तो कमाल ही कर दिया - उनको यकीन नहीं था कि उनकी मौत के बाद उनका जनाजा सलीके और करीने से उठेगा, इसलिए उन्‍होंने अपनी जिंदगी ही में अपने कफन-दफन की बहार देख ली। यह उनका हक था। वह बड़ी शालीनता, नफासत और ऐशोराम, की जिंदगी बसर करते थे। हर चीज उनकी इच्‍छा के मुताबिक होती थी। हो सकता है, उनका जनाजा उठाने में किसी से कोई जाने-अंजाने में गलती हो जाती। बहुत अच्‍छा किया जो उन्‍होंने जिंदगी ही में अपनी मौत की सजावट और बनाव-सिंगार देख लिया - मरने के बाद होता रहे जो होता है।

ताजा 'लाइफ' - 5 नवंबर, 1951 : इंटरनेशनल एडिशन - देखा। वल्‍लाह, आप लोगों की जिंदगी का एक और अनुकरणीय पहलू आँखों के सामने रौशन हुआ। दो पूरे सफहों पर तसवीरों के साथ आपके देश के मशहूरों - मारुफ गैंगस्‍टर के जनाजे का पूरा वृत्तांत विस्‍तार से दिया हुआ था। दल्‍ली मोरीटी, खुदा उसे करवट-करवट जन्‍नत, नसीब करे, कि छवि देखी। उसका वह आलीशान घर देखा जो उसने हाल ही में पचपन हजार डालर में बेचा था। उसकी वह पाँच एकड़ की एस्‍टेट भी देखी जहाँ वह दुनिया के हंगामों से अलग होकर आराम और चैन की जिंदगी बसर करना चाहता था। दिवंगत का वह फोटो भी देखा जिसमें वह बिस्‍तर पर हमेशा के लिए आँखें बंद किए लेटा है। उसका पाँच हजार डालर का ताबूत और उसके जनाजे का जुलूस, जो फूलों से लदी-फँदी ग्‍यारह बड़ी-बड़ी मलोजीनों और पिचहत्तर कारों पर रखा है, देखकर, आँखों में आँसू आ गए, वह अल्‍लाह ही गवाह है।

मेरे मुँह में खाक, अगर आपका देहांत हो जाए तो खुदा आपको दल्‍ली मोरीटी से ज्यादा इज्जत और शान इनायत फरमाए - यह पाकिस्‍तान के एक गरीब लेखकी की दिली दुआ है, जिसके पास सवारी के लिए एक टूटी-फूटी साइकिल भी नहीं। वह आपसे एक निवेदन भी करता है कि क्‍यों न आप अपने देश के दूरदर्शी आदमी की तरह अपनी जिंदगी में ही अपना जनाजा उठता देख लें - आदमी आदमी ही है, हो सकता किसी से भूल-चूक हो जाए। हो सकता है, आपके चेहरे का कोई नयन-नक्‍श सँवरने से रह जाए और आपकी आत्‍मा को आघात पहुँचे।

संभव है, आप यह खत पहुँचने से पहले ही अपना जनाजा अपनी इच्‍छानुसार विशाल धूमधाम से उठवा के देख चुके हों, इसलिए कि आप मुझसे कहीं ज्‍यादा महान विवेकशील हैं और मेरे चचा हैं।

भाईजान अर्सकाइन काल्‍डवैल को सलाम और जज साहब को भी, जिन्‍होंने उनको अश्‍लीलता के जुर्म से बरी किया था।

कोई गुस्‍ताखी हो गई तो माफ फरमाएँ।

दुआ सलाम के साथ।

आपका मुफ्लिस भतीजा

सआदत हसन मंटो

16 दिसंबर, 1951

31, लक्ष्‍मी मैन्‍शंज, हॉल रोड, लाहौर

��प्रस्तुति - मनीषा जैन
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टिप्पणियाँ:-

अर्जन राठौर:-
वाह क्या बेबाक बयानी हे मंटो का आज भी जवाब नही । अब तो  ऐसा    पढ़ने को नही मिलता जो हिलाकर रख दे । इस दोर के मंटो  की तलाश जारी हे.

कविता वर्मा:-
मंटो जी का व्यंग्य पढ़ा लेकिन इसमें वह पैनापन नही लगा जो होना चाहिये था बल्कि ऐसा लगा मानों किसी पड़ोसी की तरक्की से जलभुन कर उसकी हर बात को गलत या कमतर साबित करने की कवायद हो । पाकिस्तान बनने में अमेरिका का तो कोई हाथ नही था फिर अमेरिका की तरक्की वहॉं के नागरिकों की मेहनत अनुशासन और सरकार की दूरंदेशी से हुई फिर चाहे वे अपने कुत्तों को सुविधाऐं दें या मुर्दों का मेकअप करवाऐं । अश्लीलता के मुकदमें मंटो पर चले क्योंकि लाख उस भाषा की आड़ में उन्होने गंभीर और अर्थपूर्ण बात कही हो पर उनकी कई रचनाऐं यॅू ही पढ़ी और पढ़वाई नहीं जा सकती हैं उसके लिये अमेरिका सरकार पर कटाक्ष समझ से परे है । कई बातें कई कई बार कही गई हैं जो खीझ पैदा करती हैं और इसे उबाऊ बनाती हैं । हालांकि मंटो एक बड़ा नाम है पर उनका लिखा सब कुछ अच्छा ही है जरूरी तै नही । कुल मिला कर एक सामान्य लेख लगा ।

मीना शाह :-
विनोद भट्ट की मंटो एक बदनाम लेखक में काली शलवार कहानी है इसके आलावा धुंआ ...ठंडा गोश्त.. नंगी आवाजें...टोबा टेकसिंह...खोल दोऔर एक लंबी कहानी बेख़ौफ़ बेफ़िकरा इंसान भी हैं

फ़रहत अली खान:-
मंटो अक्सर अपनी दुस्साहसिक और कई बार बे-बाक बयानी के लिए मशहूर थे, हालाँकि इससे इतर मैं उनकी लेखन शैली और अंदाज़-ए-बयाँ का क़ायल हूँ।
आज मंटो की जिन कहानियों के बारे में चर्चा हुई, वो कहानियाँ जिन विषयों पर आधारित हैं, उन विषयों के ये उस्ताद माने गए हैं। विभाजन पर लिखी उनकी कहानियाँ वाक़ई असरदार हैं और पसंद भी की जाती हैं।
ये लेखक खुशवन्त सिंह के अच्छे दोस्त थे और उम्र में उनसे छोटे थे। कम-उमरी में ही चले गए। नसीब में नहीं था, वरना इनके कुछ और रंग भी देखने को मिलते।

राजेश्वर वशिष्ट:-
वाह। पढ़ना पड़ा बिना सांस लिए। अद्भुत। शुक्रिया मनीषा। अनुवाद किसका है? बहुत दमदार है। असली क्रेडिट तो उस शख्स को जाता है।

भागचंद गुर्जर:-
बहुत अच्छा खत...बिना रूके पूरा पढ गया। मंटो अपनी इसी बेबाकी के लिए जाने जाते है। मनीषा जी का धन्यवाद...

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