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सत्यनारायण पटेल हमारे समय के चर्चित कथाकार हैं जो गहरी नज़र से युगीन विडंबनाओं की पड़ताल करते हुए पाठक से समय में हस्तक्षेप करने की अपील करते हैं। प्रेमचंद-रेणु की परंपरा के सुयोग्य उत्तराधिकारी के रूप में वे ग्रामांचल के दुख-दर्द, सपनों और महत्वाकांक्षाओं के रग-रेशे को भलीभांति पहचानते हैं। भूमंडलीकरण की लहर पर सवार समय ने मूल्यों और प्राथमिकताओं में भरपूर परिवर्तन करते हुए व्यक्ति को जिस अनुपात में स्वार्थांध और असंवेदनशील बनाया है, उसी अनुपात में सत्यनारायण पटेल कथा-ज़मीन पर अधिक से अधिक जुझारु और संघर्षशील होते गए हैं। कहने को 'गांव भीतर गांव' उनका पहला उपन्यास है, लेकिन दलित महिला झब्बू के जरिए जिस गंभीरता और निरासक्त आवेग के साथ उन्होंने व्यक्ति और समाज के पतन और उत्थान की क्रमिक कथा कही है, वह एक साथ राजनीति और व्यवस्था के विघटनशील चरित्र को कठघरे में खींच लाते हैं। : रोहिणी अग्रवाल

कविता : कीर्ति राणा

आज समूह के साथी की रचनाऐ दे रहें हैं। पढ़कर अवश्य बताएं कैसी लगी आपको। कवि का नाम शाम को घोषित करेंगे।

(७अप्रैल २०१०)
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ढलान वाले रास्तों से
उतरते वक्त
कितना उत्साह रहता है
लोगों में।
सीधी सीढ़ियों रुकते-हांपते
आदमी ऐसा असहाय
नजर आता है
जैसे जिंदगी की लड़ाई में
सब कुछ
हार कर
लौट चला है ।

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अकेलापन (१६ मई २०१०)
भैंस की तरह
जुगाली करते न्यूज चैनल,
रेडियो पर गूंजते गीत-गजल
कोई कितना रिमोट बदले
कितने एफएम सुने ।
मन भी क्या है
अकेलेपन में
चाहता है सब को,
सब के बीच
तलाशता रहता है
अकेला होना। 
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बारिश (शिमला ९ जून २०१०)
बहुत दिनों से
नहाए नहीं थे
काले ढुस्स पहाड़।
अब कितने
तरोताजा लग रहे हैं
नंगधड़ंग
मासूम बच्चे की तरह
जी करता है
इन्हें बांहों में भर लूं।

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चर्च की मीनार पर
रात भर
अटका रहा
चांद
बच्चे के हाथ से छूट
पेड़ की डगाल पर अटकी
पतंग की तरह।

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ठंड वाली रात (शिमला १२ जून २०१०)
पहाड़ों को
फिर लगने लगी है ठंड
सेल पुराने हो गए हैं सूरज के।
बदमाश चांद
छुपा बैठा है कोने में
इंतजार कर रहा है शाम होने का। 
रात जब आएगी गेट लगाने
पीछे से दबोच लेगा
अपनी बांहों में।

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शिमला में बर्फबारी (३१ दिसंबर २०१०)
अपने रथों में
चांदी की सिल्लियां लेकर
बीती रात चुपके से
जा रहे थे इंद्र देव। 
बादलों के झुंड ने लूट लिया
सिल्लियों के टुकड़े टुकड़े
बांट  दिए लोगों में।
पहाड़ों से झाड़ों तक
छतों पर, रास्तों पर
सब जगह
बिखरी है चांदी। 

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इंदर बाबू ने
उतार फेंकी
पुरानी रजाई।
चल पड़े हैं
रूई का गट्ठर लादे
पिंजारे की दुकान पर। 
रास्ते भर
गिरती जा रही है
गट्ठर से हवा में
बिखरती-उड़ती रूई।  (१ जनवरी २०११)

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बीती रात
बारिश से भीगी
थर थर कांपती
हिल्स क्वीन को
चुपचाप
सफेद कंबल ओढ़ाकर
नए साल की गिफ्ट
दे गए सांता क्लॉज।  (१ जनवरी ११)

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मुंबई की लोकल ट्रेन
अलस्सुबह
फौजी मार्चपाास्ट करती हुईं
गुजरती हैं गाड़ियां
और
सुबह से शाम तक
लाती ले जाती हैं
आत्म समर्पणकारी
कैदियों को।
(बंबई ९ दिसं १९८२)

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गरमी
आजकल
बहुत जल्दी उठ जाते हैं
सूरज बाबू।
सुबह सेशाम तक
रटते रहते हैं
धूप का पहाड़ा।
गर्म हवाओं का
करते रहते हैं
गुणा भाग।
शाम को  कंधे पर
बस्ता लटकाए
लौट जाते हैं घर। 

000 कीर्ति राणा
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टिप्पणियाँ:-

प्रज्ञा :-
समूह के साथी की छोटे छोटे बिम्बों को साकार करने वाली कविताएँ। सबसे अच्छी बात ये कविताएँ डायरी और यात्रा वृत्तांतनुमा हैं और कहीं रोज़नामचा सी। जीवन के क्षणों को उनके अहसास को कविता की शक्ल मिली।  कुछ ज़रा और लम्बी होती तो बेहतर होता जैसे गर्मी कविता में  बस्ता वाले बच्चे की चन्द छवियाँ और होती सूरज के पहर दर पहर बाद। साथी को बधाई। शुक्रिया मनीषा जी

अल्का सिगतिया:-
होठों पर मुस्कान। खिल गई पढ़ते हुए ।रोज जो हम देखते हैं , चांद सूरज,रात,प्रकृति  का सुंदर मानवीकरण(personification) बरबस Keats Wordsworth याद आगये।मुझे  अच्छी। लगीं  प्यारी चुन्नु मुन्नू  सी कविताएँ।

आभा :-
अलका जी से सहमत।। और ऐसा भी लगा की कविताओं को विस्तार मिल सकता है।। दो तीन बिम्बों को जोड़कर एक नयी कविता भी बन सकती है। बहुत धन्यवाद प्यारी सी कवितायेँ पढ़वाने के लिए

अल्का सिगतिया:-
लेखक की। सफलता यही। है। ,जब पाठक उसे और आगे ले जाने की  गुंजाइश तलाश सके।जब लेखक कुछ अनुभूत करता है,वो उस पल की। उसकी। अनुभूति होती है।सब कुछ वह नहीं सोच सकता।एैसे तो फिर उन सीधी। मासूम सी कविताओं को दर्शन से गरिष्ठ  भी बनाया। जा सकता। था।बहरहाल हम सब अपने तई नये संदर्भ  तलाशेंगे ही।मेरे। मत से उतनी। भी। अच्छी। हैं।उससे ज़्यादा अच्छी। भि हो सकती थीं ,नहीं भी

संजय पटेल :-
रविवारी जनसत्ता में बिजूका कुनबे के दो साथियों का सहभाग।ब्रजेश दादा (कानूनगो) की कहानी और मनीषजी (जैन) के रेखांकन।साधुवाद।

मिनाक्षी स्वामी:-
बहुत अच्छी लगी कविताएं। छोटी छोटी सामान्य बातों को खास अंदाज में बहुत सटीक बिम्बों के साथ प्रस्तुत किया है।
'सेल पुराने हो गए हैं सूरज के' जैसे अनूठे बिम्बों से सजी कविताओं ने लुभा लिया।
कवि/ कवियित्री को बधाई।
बिजूका का आभार

नंदकिशोर बर्वे :-
उक्त सभी प्रशंसा से भरे विचारों से सहमत। एक अलग दृष्टि ही कवि को अकवियों से अलहदा मकाम पर ले जाती है। कलमकार को बधाइयाँ।

अंजनी शर्मा:-
सभी कविताएँ बहुत ही खूबसूरत बिम्ब लिए हुए ।
मुंबई की ट्रेन  और आत्म समर्पण कारी कैदी । दौडती भागती जिंदगी का चित्रण ।
'आत्म समर्पण कारी 'के स्थान पर 'आत्म समर्पित ' शब्द भाषा को कसावट प्रदान करता , मेरे विचार से ।
डगाल और झाड शब्दों का प्रयोग कविता को एक स्थानीय स्पर्श [local touch ] दे रहा है ।
कुल मिलाकर अच्छी कविताएँ ।
रचनाकार को बधाई ।
                    अंजनी शर्मा

ब्रजेश कानूनगो:-
बहुत सुन्दर कवितायेँ।सुन्दर बिम्बों से परिपूर्ण।सहज संप्रेषणीय।सीधे दिल से निकलती स्वाभाविक कवितायेँ।जो सप्रयास कतई नहीं लिखीं गईं हैं।बधाई और कविताओं की अपेक्षा रहेगी।

1 टिप्पणी:

  1. ⭕️यह ऐसा ही अप्रत्याशित है कि किताब के पन्ने पलटते हुए अचानक हजार का नोट हाथ आ जाए,बिजूका के सभी मित्रों का आभार
    ♻️बिजूका और बिजूका के सभी साथियों की उत्साह बढ़ाने वाली टिप्पणियों का भी आभार
    ♻️दरअस्ल मैं तो करीब दो माह पहले ये कविताएं ताई को मेल कर के भूल गया था।
    ♻️ चार आठ दिन जब कविताएं बिजूका पर पोस्ट नहीं होती दिखी तो मान लिया कि अपनी कविताओं में दम नहीं है।
    ♻️ क्या संयोग है कि आज पूणे से स्वरांगी ने व्हाट्सएप पर मुझे वही सारी कविताएं पोस्ट की तो एक पल को तो दिमाग चकरघिन्नी हो गया कि ये कविताएं तो मैंने बिजूका के लिए भेजी थी, इनके पास से कैसे मुझे पोस्ट हुई।
    ♻️सुबह से धार गया था एक पारिवारिक मित्र के भाई के निधन के शोककर्म में।
    ♻️ अभी जब स्वरांगी के मैसेज से मिली कविताओं के संदर्भ में बिजूका पर सर्च किया तो खुशी का ठिकाना नहीं रहा।
    ♻️ यह बिल्कुल वैसी ही अप्रत्याशित सौगात है कि सेल्फ से कोई पुरानी किताब उठा कर खोलें और उसमें हजार का नोट रखा मिल जाए।
    ♻️ताई और मनीषा जी का आभार। मित्रों का यह सुझाव ठीक है कि कुछ कविताएं और बड़ी हो सकती थी लेकिन ऐसी कविताएं जिस लाइन पर खत्म हुई उसके बाद सूझा ही नहीं कि आगे क्या लिखूं। जैसे कविता की वह पंक्ति जज का फैसला लिखने के बाद नीब तोड़ देना जैसा हो गया।
    ♻️ सही पहचाना गया कि ये यात्रा वृतांत की तरह हैं। करंट के दौरान बंबई में रहते और दैनिक भास्कर में विभिन्न शहरों/राज्य में संपादक रहते, घर परिवार से दूर रहते लिखी गई हैं ये कविताएं।
    ♻️ मैंने यह पाया कि घर से दूर, टीवी से दूर, अकेले रहते खूब लेखन हो सकता है। लगता है तब सारे अपने शब्द बन कर तनहाई कम कर देते हैं।
    ♻️ ये जो सब लिखा, कविता लिखना है का संकल्प लेकर लिखा भी नहीं है। दादा भवानीप्रसाद मिश्र के शब्द याद आते हैं जैसा दिखता है वैसा लिख।
    ♻️बस, आप सब का आभार। बिजूका एकदम नया माध्यम हैं प्रिंट/इलेक्ट्रानिक/मंच/गोष्ठी से हट कर । इस माध्यम पर मेरे लेखन को स्थान मिलना, मेरे जैसे नौसिखिए के लिए तो बड़ी बात है।
    🙏आप सब का आभार। मुझ में जो एक कमी है वह यह कि मैं किसी कविता/गजल/कहानी/लेख पर लंबी प्रतिक्रिया/विचार व्यक्त कर पाने में असमर्थ हूं और अच्छी लगी,मन को छू गई, मार्मिक है,शानदार लेखन जैसे शब्द बिजूका पर अघोषित रूप से प्रतिबंधित हैं इसलिए मैं बाकी रचनाकर्मी दोस्तों के लेखन पर टिप्पणी भी नहीं कर पाता। इसका मन ही मन खेद रहता है मुझे।
    🙏-कीर्ति राणा

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