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सत्यनारायण पटेल हमारे समय के चर्चित कथाकार हैं जो गहरी नज़र से युगीन विडंबनाओं की पड़ताल करते हुए पाठक से समय में हस्तक्षेप करने की अपील करते हैं। प्रेमचंद-रेणु की परंपरा के सुयोग्य उत्तराधिकारी के रूप में वे ग्रामांचल के दुख-दर्द, सपनों और महत्वाकांक्षाओं के रग-रेशे को भलीभांति पहचानते हैं। भूमंडलीकरण की लहर पर सवार समय ने मूल्यों और प्राथमिकताओं में भरपूर परिवर्तन करते हुए व्यक्ति को जिस अनुपात में स्वार्थांध और असंवेदनशील बनाया है, उसी अनुपात में सत्यनारायण पटेल कथा-ज़मीन पर अधिक से अधिक जुझारु और संघर्षशील होते गए हैं। कहने को 'गांव भीतर गांव' उनका पहला उपन्यास है, लेकिन दलित महिला झब्बू के जरिए जिस गंभीरता और निरासक्त आवेग के साथ उन्होंने व्यक्ति और समाज के पतन और उत्थान की क्रमिक कथा कही है, वह एक साथ राजनीति और व्यवस्था के विघटनशील चरित्र को कठघरे में खींच लाते हैं। : रोहिणी अग्रवाल

कविता : गौने के बाद : संजना तिवारी

1 गौने के बाद

मुड़ते मुड़ते टोह रही थी उसकी नजर गली का कोना - कोना
गौने के दो साल बाद आकर जाती बिटिया मायके का हर कण छाती में धंसा लेना चाहती है
जाने अब कब मिले
माँ के हाथ से फिसल कर अमृत हुआ वो रोटियों का कौर
पिता की गाड़ी कमाई से आई पिघलती मैंगो आइसक्रीम कोला
जिसका एक हिस्सा भाई ने दुलार से चख लिया था और गले लिपट कर  चीख कर कहा था - ' रे पगलिया ,
अब भी नहीं सुधरी तू  कितनी देर तक खाएगी एक बर्फ का गोला'
दोनों की जिद्दा - जिद्दी में निहाल होती माँ और उसके गले से उतरती आइसक्रीम की ठंडक बन गयी थी पिता की आँखों का सुकून
ये एक महीना कैसे चेतक बन दौड़ गया था
उसे बिन बिठाए
अब कौन स्नान करती गुड़िया के लंबे केशो को
जबरदस्ती लाड से धूलाकर झाड़ने आएगा
जिस्म पर सहलाएगा मच्छरों के काटे निशान
कटोरी भर तेल की सिर में धूंस कर
संवार देगा बालों का रेशा रेशा
मांग भर सिंदूर - हाथ भर चूड़ियाँ
भावों और मनोभावों के बीच नहीं खनकती हैं बबुनी
ये सीख कौन रटाएगा दिन में चार बार

शाम को आने वाला चाट का ठेले वाला
अब देखेगा उसकी राह
मुन्नी की पसंद का गोल गप्पा उसके बिना
कौन दूसरा संसार में बना पाएगा
वो दर्जन काकी ,जो उसकी फ्रिल वाली फ्राक सीते सीते
आज डीप गले का ब्लाउज सी रही है
और ब्लाउज की डोरी में कस रही है
दूल्हा को रिझाने के नुस्खे और रोमांस की दो चार बात
कितने अंदर तक जुडी है वो मौहल्ले की काकी - चाचियों से
बतला जाती है उसे हर याद आती बात

पहली से बारहवीं तक साथ पढ़ी उसकी आयशा बानो
जो उससे पहले बन गयी थी दो बच्चों की अम्मी
और समझ गयी थी ससुराल के सब छद्म
एक महीने में केवल दो बार आ पाई थी
पीछे की कोठरी में चुपके से पहली रात से
अब तक पिया मिलन की हर बात
चटकारों और डकारों के साथ उसने चबाई थी
सारे गुप्त खेलों का सार और इतिहास
पुरुषों के अहम और जूत - लात की सौगात
नन्ही सखी को समझाई थी
उसकी नजर में दो साल में भी उसकी सखी
छहत्तर का एक गुण भी नहीं सीख पाई थी

ससुराल जाने से तीन दिन पहले उसकी मामी
उसकी पसन्द की लिपस्टिक , मस्कारा और
छुपा कर अधनंगी नाइट के दो सैट लाई थी
एक पिंक है ,एक डार्क ब्लू हौले से कहकर मुस्कुराई थी
शायद माँ आज भी लाडो को विहस्पर की तरह
ये सब देने में भीतर ही भीतर लजाई थी
दो अनदेखे सूटकेस जो जाते समय पिता ने रखे थे कार में
वो समझती थी उसमें क्या है ?
एक में ससुरालियों के लिए गिनती से रखे तोहफे और लिफाफे
जो कद और पद के अनुसार रुपल्ली संभाले है
एक में जिस पर ऊपर ही कोमल सा लिखा है
" अंजू के लिए मम्मी का प्यार "
उसकी मन लगी किताबों ,कलमों और
काजू , बादाम ,देसी घी से लदा है
उसकी पसन्द का गुलाबी बिछौना भी साथ ही धरा है

एक एक कदम में उसने वामन से अधिक मायका नापा है
समेट लिया है झोली में - हिया में जिससे जैसा नाता है
काँपती नजरों , ढुलकते आंसुओं में एक नन्हा बोसा
बचपन की तरह माँ पिता और भाई को सौगात सा
हथेलियों से रिसते पसीने और भीतर के ताप के साथ
चुप्पी में कई शब्दों के हार में पहनाया है
"मैं फिर आऊँगी ", "जाने कब" , लेकिन आऊँगी
गहरे मौन में उसका मायके की गलियों से वादा है ....

2  अमर हूँ

धुँआ धुँआ उड़ती रही मैं
तेरे हर एक कश पर की फेफड़ों को संभाले रखना
मैं धीमा जहर हूँ 

नसों में बहता वो दलदल हूँ
जो धंसा रहा है तुझे-तुझमें आहिस्ता आहिस्ता

मुझे कोई नाम भी
ना देना की
मैं उपजी हूँ 
नाजायज कोख से

Don't try to teach me
and feed me because,  मैं जन्म से नवजात नहीं मंथरा हूँ 

मुझे मिटाने के सारे प्रयास, ध्यान , योगा , सदविचार
'जीरो' नंबर से फेल हैं 

रामायण को रचने वाली पोसने वाली
महाभारत को दुर्योधन की
फटी जंघा का  मांस मैं ही हूँ 

मैंने धत्ता बताया है हर कानून, गांधी के सत्य और अहिंसा को दो देशों के बीच की तलवार मैं ही हूँ


मैं तुम्हारी अपनी अजन्मी, पुष्ट, लालसी ईर्ष्या........
अजर और अमर

3  मासूम कविता

तुम रात में सोए हो
लपेट कर छुटके को बाहों में
और मैं बड़के की छाती पर
हाथ धरे बुदबुदा रही हूँ कुछ शब्द
मेरी भावनाओ से मनुहार करते
ये शब्द गुनने लगते हैं कुछ अनुभव
बिना संभोग और गर्भावस्था के
प्रसव पीड़ा से गुजरने लगती हैं मेरी पंक्तियाँ
और जन्म लेती है अबोध , मासूम कविता

अक्सर छुपा कर आँचल में उसे अशांत ,बेचैन
सी मैं सो जाती हूँ पौ फटने के काल में
डर रहता हैं मेरी शब्दिक बच्ची का लिंग भी तो जनाना ही है
कहीं रौंद ना डालो तुम या समाज
मेरी भावनाओ की कली को
आखिर संसार में स्त्री होना सबसे बड़ा गुनाह जो है

तुम्हारे दफ्तर जाने और आने के बीच मैं
जी भर और पेट भर करा देती हूँ उसे स्तनपान
मेरे बड़े होंते सपूतों के साथ एक हिस्सा उसका भी है
माँ की हर एक करवट और धरोहर पर
भले उसमें तुम्हारे शुक्राणुओं का एक अंश भी नहीं
लेकिन है तो वो हम दोनों की ही साझी
मेरे अतीत, वर्तमान , भविष्य की छवि

आज दौर बदलने लगा है , भारतेंदु नहीं है अब
प्रेमचंद और निराला भी नहीं
मीरा और महादेवी तो कतरा भर नहीं
मैं भी शुरुआत में तुमसे छुपाकर रख दूंगी
अपनी बच्ची को किसी दत्तक पिता की पत्रिका में
जब आधुनिक कविता की पहचान बन जाएगी
मेरी नन्ही परी , तब हौले से मिला दूंगी एक दिन
उसे उसके पिता और रोज रात जन्म लेती बहनों से

4  युवती

खुद को युवा होते देखना
भर देता है अंगूरी एहसास
हर युवती के हृदय में
प्युपा से रेशम बनने की
ये प्रक्रिया भर देती है
अनेकों कोमल ख्याल
हृदय तल में
शनैः शनैः होता काया
में परिवर्तन
मज़बूर करता रहता है
देखने को दर्पण
केशों का लहरना,
आँखों का झुक जाना
चुपके से देख तिरछे मुस्कुराना
बिना शिक्षा बिना अभ्यास
बन जाता है नियंत्रित व्यवहार
पर कहीं दबे हृदय तल में
डर की जड़ें उभर आती हैं
जिसे ना वो खुद को
ना दूजे को समझा पाती है
रोज़ आती भयानक खबरें
ख्वाबों में उत्पात मचाती हैं
किसे रखवाला कहें, किसे बलात्कारी
विचारों में फंस जाता है
कहीं कोई भाई था,
कोई पिता
कोई सहकर्मचारी
जैसे बन गया –
भेड़िया बलात्कारी !!!!!!
इन वासनाओं की समाज में कहाँ अब कोई सीमा है ?
बनना होगा रण चंडी
गर इज्जत से यहाँ जीना है
तो कर हे माँ ये प्रतिज्ञा खुद से
दे जन्म हर कन्या भ्रूण को गर्व से
पूरी क्यारी को अब कलियों से भरना है
वो भी लड़ेगी हर राम सिंग से
तुझे भी हर दुर्योधन से लड़ना है

000 संजना तिवारी
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टिप्पणियाँ

अंजू शर्मा :-
अच्छी कविताएँ विशेषकर गौने के बाद की मार्मिकता प्रभावित करती है। कवि को हार्दिक बधाई

संजना तिवारी:-
कवितायेँ लिखना मुझे भावनाओं को जीने जैसा अनुभव देता है । अभी तक मैंने खुद को कवियित्री या लेखिका नही माना है । हाँ , साहित्य की एक अदना सी पाठक भर हूँ । अपने विचारों को शब्दों में बाँधने का प्रयास करती हूँ और ईश्वर की कृपा से काफी प्रेम और सहयोग प्राप्त हुआ है ।
मैं अक्सर नारी मन में उठते स्वाभाविक भावों को लिखना पसन्द करती हूँ । उनके और अपने अनुभवों के रंगो को मिलाकर रंगोली बनाना मुझे बहुत आत्मीय अनुभूति देता है ।जैसा हम सभी जानते हैं की नारी मन से जितनी कोमल है उतनी ही समयानुसार वज्र भी ।अपनी कहानियों और कविताओं के माध्यम से मैं नारी मन को प्रस्तुत करने के प्रयास कर रही हूँ ।
एक बात और - अगर मित्र कविताओं के कमजोर पक्ष  सामने रखते तो मुझे बेहद ख़ुशी होती और बिजुका में अपनी रचनाओं की प्रस्तुति की सार्थकता का अहसास होता लेकिन फिर भी आज समूह पर मेरी कविताओं को स्थान देने के लिए शुक्रिया । जिन मित्रों ने अपने विचार मेरी कविताओं पर रखे हैं उनका भी सह्रदय आभार

वसंत सकरगे:-
वाकई बहुत अच्छी कविताएं हैं।इनका अपना अनूठा चित है।अपने अर्थ के भीतर कई कई अर्थ खोलती इन कविताओं की खूबी है कि लक्ष्यभ्रमित नहीं होती।अच्छी कविताएं पढ़कर तृप्ति मिली।संजना जी को हार्दिक बधाई।

प्रज्ञा :-
गौने के बाद अच्छी लगी। कबिताओं मेंउबलते क्रोध की अबिव्यक्ति की वैसी हो शब्दावली का प्रयोग। भाषा पर कुछ और काम किया जा सकता है। पर क्रोध अपनी सघनता में मौज़ूद। बधाई।

किसलय पांचोली:-
कविताएँ अच्छी लगी। भावप्रवण और विविध रंगी कविताएँ।
गौने के बाद मार्मिक कविता है। 'ये एक महीना कैसे चेतक बन दौड़ गया था'..... जैसी मर्मस्पर्शी पंक्ति के बाद 'उसे बिन बिठाए'.....के निहितार्थ मुझे समझ नहीं आए। कहीं यह 'उसे बिन बताए ' तो नही? वामन से अधिक मायका नापना...क्या इंगित करता है?
सही है जब तक मनुष्य है तब तक ईर्ष्या का स्थाई भाव भी है। किन्तु कविता में इस का गुणगान सा ध्वनित हो यह ठीक नहीं लगा।
मासूम कविता बहुत अच्छी कविता बन पड़ी है। 'डर लगता है मेरी शाब्दिक बच्ची का लिंग भी तो जनाना ही है.....'बहुत खूबसूरत और मारक पंक्ति है।कवि को बधाई और शुभकामनाएं।

कविता वर्मा:-
संजना जी आपकी कविताऐं सुबह ही पढ़ ली थी पर कुछ व्यस्तता रही ।सभी कविताऐं अच्छी लगीं गौने के बाद अच्छी कविता है बस सब कुछ समेटने के चक्कर में थोड़ी लंबी हो गई ।कभी कभी कुछ अनकहा कविता में उत्सुकता बनाये रखता है ।
शुक्रिया , आभार
उसे बिन बिठाए ही पंक्ति है - जहां मैं कहना चाहती हूँ की तेज समय का घोड़ा कुछ यूँ पलक झपकते बीत गया की जैसे वो वहां थी ही नही मतलब वक्त बीत गया और अभी तो उसका मन भी नही भरा - उसकी आत्मा तृप्त भी ना हुई
वामन ने जैसे सम्पूर्ण भ्रमाण्ड को तीन पग में मापा था , उसने भी ह्रदय तल में मायके को संजो लिया है , उसके लिए उसका मायका भ्रमाण्ड से भी विस्तृत और अनन्त है ।
बहुत बहुत शुक्रिया
मुझे अच्छा लगा
संजना

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