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सत्यनारायण पटेल हमारे समय के चर्चित कथाकार हैं जो गहरी नज़र से युगीन विडंबनाओं की पड़ताल करते हुए पाठक से समय में हस्तक्षेप करने की अपील करते हैं। प्रेमचंद-रेणु की परंपरा के सुयोग्य उत्तराधिकारी के रूप में वे ग्रामांचल के दुख-दर्द, सपनों और महत्वाकांक्षाओं के रग-रेशे को भलीभांति पहचानते हैं। भूमंडलीकरण की लहर पर सवार समय ने मूल्यों और प्राथमिकताओं में भरपूर परिवर्तन करते हुए व्यक्ति को जिस अनुपात में स्वार्थांध और असंवेदनशील बनाया है, उसी अनुपात में सत्यनारायण पटेल कथा-ज़मीन पर अधिक से अधिक जुझारु और संघर्षशील होते गए हैं। कहने को 'गांव भीतर गांव' उनका पहला उपन्यास है, लेकिन दलित महिला झब्बू के जरिए जिस गंभीरता और निरासक्त आवेग के साथ उन्होंने व्यक्ति और समाज के पतन और उत्थान की क्रमिक कथा कही है, वह एक साथ राजनीति और व्यवस्था के विघटनशील चरित्र को कठघरे में खींच लाते हैं। : रोहिणी अग्रवाल

ग़ज़ल : तीन मशहूर शायर

इस महीने की शुरुआत में तीन मशहूर शायरों के इन्तेक़ाल की ख़बरें मिलीं। इन तीनों ही के जाने से उर्दू शायरी जगत को बड़ा नुक़्सान हुआ। आज इन तीनों शायरों की ग़ज़लें(पूर्ण/आंशिक) साझा की जा रही हैं।

⭕इस्लाम सालिक फ़ैज़ाबादी(1947-2015)

(मुशायरों के कामयाब शायर; अपनी ख़ास तरन्नुम के लिए मशहूर)

1.
कहीं पे ख़ुशी को दबाना पड़ा है
कहीं ग़म में भी मुस्कुराना पड़ा है

कम-अस-कम तुम्हीं मत पड़ो मेरे पीछे
मेरे पीछे सारा ज़माना पड़ा है

डरो मत अंधेरों से अहल-ए-गुलिस्तां
अभी तो मेरा आशियाना पड़ा है
(अहल-ए-गुलिस्ताँ - बाग़ में रहने वाले; आशियाना - घर)
   
ज़माने को देखा जब उसकी नज़र से
हमें अपना ग़म भूल जाना पड़ा है

बताएँ किसे, कितनी मजबूरियों में
तुम्हें छोड़ कर दूर जाना पड़ा है

2.
कौन किसका होता है आज के ज़माने में
हाँ मगर भलाई है सच ये भूल जाने में

तेरी-मेरी चाहत में पुख़्तगी ख़ुदा रक्खे
लोग तो परेशाँ हैं दूरियाँ बढ़ाने में  
(पुख़्तगी - मज़बूती)

बात होती होठों तक तो इसे मैं सी लेता
अश्क-ए-ग़म भी शामिल हैं दास्ताँ सुनाने में
(अश्क-ए-ग़म - ग़म के आँसू)

दाग़-ए-दामन-ए-दिल पर तो नज़र नहीं जाती
देर कुछ नहीं लगती उंगलियाँ उठाने में
(दाग़-ए-दामन-ए-दिल - दिल के दामन पर लगा ज़ख़्म)
           
आप मेरे घर आए, आपकी इनायत है
वरना कौन आता है इस ग़रीब-ख़ाने में
(इनायत - कृपा; ग़रीब-ख़ाना - ग़रीब का घर)

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⭕सरदार अंजुम(1941-2015)

(पंजाब के विख्यात शायर; पदमभूषण, पदमश्री, पंजाब रत्न आदि अवार्डों से सम्मानित)

1.
जब कभी तेरा नाम लेते हैं
दिल से हम इन्तेक़ाम लेते हैं
(इन्तेक़ाम - बदला)

मेरी बर्बादियों के अफ़साने
मेरे यारों का नाम लेते हैं
(अफ़साना - कहानी)

बस यही एक जुर्म है अपना
हम मुहब्बत से काम लेते हैं

हर क़दम पर गिरे, मगर सीखा
कैसे गिरतों को थाम लेते हैं

हम भटककर जुनूँ की राहों में
अक़्ल से इन्तेक़ाम लेते हैं
(जुनूँ - जुनून/पागलपन)

2.
जानबूझकर धोखा खाना तेरे बस की बात नहीं
ये तो है अपना अफ़साना तेरे बस की बात नहीं
(अफ़साना - कहानी)

महक चुरा के गुलदानों से तू गुलशन कहलाती है
काँटों से दामन उलझाना तेरे बस की बात नहीं
(गुलदान - गुलदस्ता; गुलशन - बाग़)

अपनी ख़ुशी पे मिटने वाले छेड़ न दिल के ज़ख्मों को
रोते हुओं का जी बहलाना तेरे बस की बात नहीं

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⭕बशर नवाज़(1935-2015)

(औरंगाबाद में जन्मे प्रमुख प्रगतिशील शायर; कई फ़िल्मी गीत और नाटक भी लिखे)

1.
घटती बढ़ती रोशनियों ने मुझे समझा नहीं
मैं किसी पत्थर किसी दीवार का साया नहीं

जाने किन रिश्तों ने मुझको बाँध रक्खा है कि मैं
मुद्दतों से आँधियों की ज़द में हूँ बिखरा नहीं
(ज़द - पहुँच/रेंज)

ज़िन्दगी बिफ़रे हुए दरिया की कोई मौज है
इक दफ़ा देखा जो मंज़र फिर कभी देखा नहीं
(मौज - लहर)

हर तरफ बिखरी हुई हैं आईने की किर्चियाँ
रेज़ा-रेज़ा अक्स है, सालिम कोई चेहरा नहीं
(रेज़ा - कण, अक्स - प्रतिबिम्ब; सालिम - पूरा)

कहते कहते कुछ बदल देता है क्यूँ बातों का रुख़
क्यूँ ख़ुद अपने आप के भी साथ वो सच्चा नहीं

2.
फिर दीये जलने लगे, आने लगे फिर याद लोग
फ़ासले रख-रख के फिर करने लगे बे-दाद लोग
(बे-दाद - बे-कार/मायूस) 

और दिल में था ही क्या वीरानी-ए-दिल के सिवा
इस ख़राबे में भी लेकिन हो गए आबाद लोग
(ख़राबा - बर्बाद जगह)

हम से क्या दामन छुड़ाना, हम से क्या नाराज़गी
हैं तुम्हारे शहर की रौनक़ हमीं बर्बाद लोग

रब्त बढ़ता भी तो कैसे, साथ निभता भी तो क्यूँ
क़ैद हम अपने भँवर में और तुम आज़ाद लोग
(रब्त - सम्बन्ध/तअल्लुक़)

प्रस्तुति- फ़रहत खान
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टिप्पणियाँ

वसुंधरा काशीकर:-
हम से क्या दामन छुड़ाना, हम से क्या नाराज़गी। है तुम्हारे शहर की रौनक़ हमी बर्बाद लोग। हासिलें ग़ज़ल शेर। सरदार अंजुमजी की लिखी हुई ग़ज़ल जगजीत सिंग साहब के आवाज़ में सुनी है। बहुत ही मकबुल ग़ज़ल। हर क़दम पर गिरे मगर सिखा कैसै गिरतो को थाम लेते है। हासिलें ग़ज़ल शेर। सालिम कोई चेहरा नहीं। क्यूँ ख़ुद अपने आप के भी साथ वो सच्चा नहीं । बेहतरीन शेर!

मनीषा जैन :-
हर तरफ बिखरी हुई हैं आईने की किर्चियाँ
रेज़ा-रेज़ा अक्स है, सालिम कोई चेहरा नहीं।
बहुत यथार्थ है। सबसे बढ़िया शेर। आज के इंसान की नियति पेश करता शेर। धन्यवाद फरहत साहब।

कविता वर्मा:-
बशर नवाज़ साहब की गजल बहुत बढ़िया लगी एक एक अशरार दिल को छूने वाला ।
हर तरफ बिखरी हुई हैं आइने की किर्चियॉ
रेज़ा रेज़ा अक्स है सालिम कोई चेहरा नही ।
हासिले गजल ।
सरदार अंजुम जी की दूसरी गज़ल ज्यादा अच्छी लगी ।
इस्लाम सालिक साहब की भी दूसरी गज़ल अच्छी लगी तीसरा और चौथा शेर बराबरी से अच्छा लगा । फरहत जी आभार ।

प्रज्ञा :-
फरहत जी हार्दिक शुक्रिया आपने मेरी इच्छा को न सिर्फ याद रखा बल्कि बशर साहब की इतनी उम्दा शायरी आप अपने ख़ज़ाने से लाये आपका आभार। शायरी के मामले में आपके रूप में हमे सौगात मिली है एक से एक चुने शेर पेश करने का। दूसरा बशर जी के फ़िल्मी गीतों से भिन्न शेर पेश करने का और तीसरा समूह में रवानगी ले आने का।

सुवर्णा :-
सरदार अंजुम जी की ग़ज़लें बहुत अच्छी लगीं।
हम भटककर जुनूँ की राहों में
अक्ल से इंतेकाम लेते हैं।
बशर नवाज़ जी को साझा करने के लिए भी शुक्रिया।
मुद्दतों से आँधियों की.....
हर तरफ बिखरी हुई है...

मनीषा जैन :-
इस्काम सालिक साहब को पहली बार पड़ा..शायरी में कुछ कच्चापन लगा.

सरदार "अंजुम" भट्टी "साहिर" लुधियानवी के शागिर्द रहे हैं, और उन के कलाम पर "साहिर" का असर साफ़ नज़र आता है..अब एक बहुत ही कमाल की बात ये है की बा-कौल "अंजुम" साहब कि फ़िल्म "गुमराह" की नज़्म "चलो इक बार फिर से अजनबी बन जाएँ हम दोनों" "साहिर" की नहीं बल्कि "अंजुम" साहब की लिखी हुई है.

बशर नवाज़ साहब की तो क्या बात है
बलविन्दर जी की ग़ज़ल पर टिप्पणी है☝
फरहत जी देंखे।

फ़रहत अली खान:-
प्रख्यात शायर मीर अनीस का एक शेर याद आ रहा है:
ज़माना कभी एक तरह पर नहीं रहता
इसी को अहल-ए-जहाँ इंक़िलाब समझे हैं
(तरह - स्थिति; अहल-ए-जहाँ - दुनिया वाले; इंक़िलाब - बदलाव)

इंक़िलाब यानी बदलाव आना तो प्रकृति का नियम है। शायद इसी कारण से मानव मन में प्राकृतिक रूप से जीवन-पर्यन्त कुछ न कुछ जिज्ञासाएँ अवश्य रहती हैं। अब वो जिज्ञासाएँ कितनी शक्तिशाली होती हैं, ये अलग बात है; अलग-अलग व्यक्तियों में कुछ जानने-सीखने या नया करने का ज़ौक़-ओ-शौक़ अलग-अलग हो सकता है।
जड़त्व के नियमानुसार कोई भी वस्तु यथा-स्थिति बनाये रखना चाहती और उसमें बदलाव का विरोध करती है; और यही बात मानव की प्रकृति में भी है। और इसमें कोई अच्छाई-बुराई नहीं है। अच्छाई और बुराई तो इसमें है कि हम कौन सा काम होने देना चाहते हैं और कौन सा नहीं होने देना चाहते। लेख और दोनों टिप्पणियाँ सोचने पर मजबूर करते हैं। शायद मैंने अपनी बात पूरी तरह से आज के विषय के अनुरूप नहीं कही है बल्कि थोड़े वृहद स्वरूप में कह दी। लेकिन जैसा मन में आया वैसा ही कह गया।
शायर-ए-मशरिक़(the poet of the east) अल्लामा इक़बाल साहब के दो शेर कहकर अपनी बात ख़त्म करूँगा:

तेरी ख़ुदी में अगर इंक़िलाब हो पैदा
अजब नहीं है कि ये चार सू बदल जाए
तेरी ख़ुशी है कि हो तेरी आरज़ू पूरी
मेरी ख़ुशी है तेरी आरज़ू बदल जाए

(ख़ुदी - स्वयं/सेल्फ़; इंक़िलाब -बदलाव; चार-सू - चार दिशाओं का सिस्टम; आरज़ू - इच्छा)

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