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सत्यनारायण पटेल हमारे समय के चर्चित कथाकार हैं जो गहरी नज़र से युगीन विडंबनाओं की पड़ताल करते हुए पाठक से समय में हस्तक्षेप करने की अपील करते हैं। प्रेमचंद-रेणु की परंपरा के सुयोग्य उत्तराधिकारी के रूप में वे ग्रामांचल के दुख-दर्द, सपनों और महत्वाकांक्षाओं के रग-रेशे को भलीभांति पहचानते हैं। भूमंडलीकरण की लहर पर सवार समय ने मूल्यों और प्राथमिकताओं में भरपूर परिवर्तन करते हुए व्यक्ति को जिस अनुपात में स्वार्थांध और असंवेदनशील बनाया है, उसी अनुपात में सत्यनारायण पटेल कथा-ज़मीन पर अधिक से अधिक जुझारु और संघर्षशील होते गए हैं। कहने को 'गांव भीतर गांव' उनका पहला उपन्यास है, लेकिन दलित महिला झब्बू के जरिए जिस गंभीरता और निरासक्त आवेग के साथ उन्होंने व्यक्ति और समाज के पतन और उत्थान की क्रमिक कथा कही है, वह एक साथ राजनीति और व्यवस्था के विघटनशील चरित्र को कठघरे में खींच लाते हैं। : रोहिणी अग्रवाल

16 फ़रवरी, 2018

ममता सिंह की कहानी:  राग मारवा



                                                      ममता सिंह                                                                           


जिंदगी किसी मुफलिस की कबा तो नहीं  
कि जिसमें हर घड़ी दर्द के पैबंद लगे जाते हैं 
                                    ..... फैज़ 




पारुल की खुशी छलक-छलक पड़ रही है। उसका मन आसमान में उड़ा जा रहा है। रूई के फाहों सरीखे बादल उसके ऊपर से उड़ रहे हैं। बादलों का ठंडा स्‍पर्श मन में पुलक पैदा कर रहा है। इतने सालों तक किराए के घर में मकान मालिक के बनाए नियमों के मुताबिक़ रहना पड़ता था। फटी दरी जिसमें पैबंद लगे थे, सीलन से कमरे में ख़ास किस्‍म की गंध पसरी होती थी, जिसे पारुल आज इस खुशी के मौक़े पर याद नहीं करना चाहती। लेकिन अभावों और परेशानियों में जिया हुआ इतना लंबा समय भला कोई कैसे भूल सकता है। फटी दरी की जगह कालीन बिछ गया है। अब जाकर अपना घर हुआ। खस के पर्दे की जगह ब्‍लाइंड्स लग गये हैं। सजावट से घर की खुशहाली नज़र आ रही है। आज वो ‘अपने’ घर में है। अब उसे बार बार किराए का घर नहीं बदलना होगा।

मेहमानों का आना शुरू हो गया है। पारुल के पांव ज़मीन पर नहीं पड़ रहे हैं। वह पंख लगाकर आसमान में उड़ रही है। इस कमरे से उस कमरे तक जाती है, बरामदे में नए सजाए गमले को घुमाकर ठीक कर देती है, उसे होश नहीं है। ख़ुशी के मारे अपनी सुध-बुध खो बैठी है।
'मुबारक हो पारुल, कितनी नसीब वाली हो। कितना आलीशान घर मिला है तुम्‍हें। देर आयद- दुरूस्‍त आयद' --फूलों का गुलदस्ता थमाती हुई रज्‍जो बोली। शुक्‍लाइन चाची ने भी सुर मिलाया। 'भई सास हो तो पारुल की सास जैसी, नहीं तो ना हो। इस बुढ़ापे में भी अपने बहू-बेटे का लालन-पालन कितनी कुशलता से कर रही है बेचारी। -- सचमुच बड़े दिल वाली और जांगर वाली है तुम्‍हारी कुसुम जिज्जी। अपने शौहर के दम पर तो कभी नहीं ख़रीद सकती थी इतना आलीशान घर-- अस्‍फुट स्‍वर में बोलती है--नंबर एक का शराबी...... बेचारी कुसुम जिज्जी इस बुढ़ापे में भी कितना खटती है इन लोगों के लिए। ऐसा करमजला बेटा किसी को ना मिले,  फुसफुसाते हुए रज्‍जो बोली। बहू कम से कम कुसुम जिज्जी के साथ तो लगी रहती है।

कोई प्‍यार में नहीं लगी रहती-- स्‍वार्थ से....कुसुम जिज्जी के गाने का प्रोग्राम वही सेट करती है- 'कुसुम जिज्जी गायेंगी तो झोला भर के पैसा आयेगा घर में और इनकी रोज़ी रोटी चलेगी। इस उम्र में गाना उनके लिए कितना तकलीफदेह होता होगा। इस बुढ़ापे में जब आराम की जरूरत है तो बुढ़िया सबका पेट पाल रही है।’ --शुक्‍लाइन चाची बोलीं।

पारुल के कानों में ये अस्‍फुट बातें जा रही थीं। ये तल्‍ख़ अलफ़ाज़ पारुल पर कटार जैसे वार कर रहे थे। मन का कसैलापन चेहरे पर ना झलके,  इस प्रयास में दोनों होठों को आपस में रगड़कर वो लिपस्टिक ठीक करने की कोशिश कर रही है। ज़बर्दस्‍ती मुस्‍कुराती हुई साड़ी के पल्‍लू को आगे कर कमर में खोंसने लगी और दूसरे मेहमानों से मुखातिब हो गयी। लेकिन शुक्‍लाइन चाची कहां मानने वाली थीं। रस लेकर बताने लगीं--'पता है रज्‍जो,  इस घर को पाने के लिए इसकी बुढ़िया सास ने ऐड़ी-चोटी का पसीना बहाया है। समाज-सेवियों के चक्‍कर काटे। नेताओं से सिफ़ारिश की। फिल्मी कलाकारों की चिरौरी की। गिड़गिड़ायी कि मैं इतनी बड़ी गायिका हूं। इतने सारे कंसर्ट किए,  मैंने बड़ी-बड़ी महफिलों में गाया, लेकिन हमारे पास घर नहीं है, वग़ैरह वग़ैरह। किसी नेता ने जोड़ तोड़ करके मुफ़्त में दिलवाया ये घर। शुक्‍लाइन चाची की बातें ललाइन चाची अपने मुंह को रूमाल से ढंके ऐसे आश्‍चर्य से सुन रही थीं मानो दुनिया का आठवां आश्‍चर्य बयां किया जा रहा हो सचमुच ये औरतें बातों में इतनी माहिर हैं कि गुड़ रस मलाई बन जाए और रसगुल्ला करेले के रस में बदल जाए। कुसुम जिज्जी के बारे में इस तरह विमर्श हो रहा था, जैसे उन्‍होंने कोई बुरा काम किया हो।

कुसुम जिज्जी खुश हैं कि नये घर में अब एक कमरा उनका होगा जिसमें वो तितली की तरह उड़ेंगी, सपने बुनेंगी। संगीत के सागर में तैरेंगी। हारमोनियम, तबला, तानपुरा सब उनके आसपास रहेगा। जब चाहे छेड़ेंगी कोई सुर...उन सुरों में फिर उगेंगे ख्‍वाबों के अंकुर। उन सुरों में पकेगी-घुलेगी फिर से वो चाशनी,  जिसका जमाना कभी कायल हुआ करता था। ख्‍वाबों के कई अंकुर अभी भी फूटने बाक़ी हैं। बहुत-सी मुरादें कभी पूरी नहीं होतीं। ख्‍वाबों के वो अंकुर अब यादों के सिक्‍कों में तब्‍दील हो गए हैं। कुछ ख्‍वाब स्‍टील के बक्‍से में आज भी बंद हैं, जिसमें पुरानी तस्‍वीरें, अख़बारों की कतरनें, कई एल.पी. रिकॉर्ड और सीडीज़ हैं।







वो गरमी की सुस्‍त दोपहर थी। सीलन भरे कमरे को पुराने फर्नीचर से नए सलीक़े से सजा रखा था। पुराना बड़ा-सा टेबल, जिसके पाए दीमक के खाने से खोखले हो रहे थे...उसी के एक कोने पर ग्रामोफ़ोन रखा रहता था, जो उनके उत्‍कृष्‍ट गायन पर किसी क़द्रदान ने उपहार-स्‍वरूप दिया था। गरमी की वो ऐसी उमस भरी, अलसाई दोपहर थी, जब धूप भी छांव का इंतज़ार कर रही हो। कुसुम जिज्जी चटाई को पानी से बार-बार भिगो रही थीं, ताकि कमरे में सुकून और ठंडक कायम रहे। वैसे उन्‍हें हर तरह से सुकून तब मिलता है जब वो अपनी पसंद का संगीत सुनती हैं। उस्‍ताद बड़े गुलाम अली ख़ां उनके पसंदीदा गायक हैं और उनके लिए तालीम की तरह हैं। ग्रामोफ़ोन पर बड़े गुलाम अली ख़ां की ठुमरी मांड बज रही है....

याद पिया की आए...
ये दुख सहा ना जाए......
बाली उमरिया सूनी सेजरिया,
जीवन बीतो जाए हाय राम………….

ये बंदिश उस्‍ताद जी ने अपनी पत्‍नी के गुज़र जाने के बाद बनायी थी। किस क़दर दर्द रचा-बसा है उनकी आवाज़ में। कुसुम जिज्जी का मन सुरों के झरने से भीग रहा है। उसी के साथ वे ताल दे रही थीं, मंद मंद मुस्‍कुरा रही थीं। एक ताल और चार ताल में उन्‍हें बड़ा संशय होता था। स्‍कूल के ज़माने में ‘धिन धिन, धागे तिरकिट, तूना कत्‍ता’ की जगह पर वो ‘धा धिन, धिन धा, किट धा, धिन धा’ कर देती थीं और टीचर की डांट मिलती थी लेकिन बाद में उनका यही एक ताल और चार ताल एकदम पक्‍का हो गया था। क्‍लास की टेबल या चौके के बर्तनों पर भी वो एक ताल को दुगुन, तिगुन, चौगुन में बजाया करती थीं। बहरहाल.. उस्‍ताद गुलाम अली ख़ां को सुनते हुए कुसुम जिज्जी किसी और ही दुनिया में पहुंच गयी थीं, जहां संगीत की इबादत होती है…..तभी इस तपती भीषण गरमी में बिन मौसम बरसात आ गयी। बड़ी ज़ोर से बादल गरजे। गड़गड़ाहट से कुसुम जिज्जी के कान झनझना गये। ग्रामोफ़ोन की सुई खट से रिकॉर्ड से हटा दी गयी थी। चलता रिकॉर्ड दीवार पर फेंक दिया गया था। 78 आर पी एम का रिकॉर्ड दीवार से टकराकर तड़ाक से टूट गया था और कुसुम जिज्जी का दिल चकनाचूर हो गया था।

....ये लो एक नई सौग़ात, तुम्‍हारे उस आशिक का नया पैग़ाम।
....ओह, गुरूजी ने भेजा.........?
....गुरू-शिष्‍य परंपरा को तुम जैसी दो कौड़ी की गायिकाओं ने बदनाम किया है। मत कहो गुरूजी।
..........
....तुम जैसी गायिकाओं को वो स्टेज पर नहीं ले जायेंगे तो समाज को क्‍या जवाब देंगे कि बरसों अपने आग़ोश में बिठाकर क्‍या सिखाया। इसी बहाने वो अपना नाम भी तो रोशन कर लेते हैं।
...उफ़...
....उस्ताद रहमत ख़ां, उस्ताद सलामत ख़ां... कितने उस्‍तादों का जी बहलाओगी।
.......
नीले रंग के गिफ्ट रैपर में से छोटा-सा ट्रांज़िस्टर झांक रहा था...जिसे देखकर दर्द के इस अंधेरे में भी कुसुम जिज्जी के लिए जैसे चिराग़ जल उठा। कुसुम जिज्जी ने आंसुओं से भीगी आंखों को कस के झपकाया, मिचमिचाया, पलकों में बंद दो-तीन बूंदें गालों पर ढुलक गयीं। इसी रेडियो ने कुसुम जिज्जी को सुरों की पालकी पर बैठाया था। रेडियो ने ही सुरों के पंख लगाकर उन्‍हें उड़ना सिखाया था। स्‍कूल कॉलेज के उन्‍हीं दिनों में विविध भारती से जब संगीत-सरिता कार्यक्रम प्रसारित होता था तो कुसुम जिज्जी अपनी कॉपी और कलम लेकर बैठ जातीं। रागों के गायन का समय, वादी-संवादी, शुद्ध और कोमल स्‍वर…सब कुछ बाक़ायदा नोट करतीं और जो राग जिस प्रहर में गाया बजाया जाता है, उसका अभ्‍यास वो उसी प्रहर में करतीं। संगीत सरिता सुन सुनकर उन्‍होंने आकाशवाणी बनारस के शास्‍त्रीय-संगीत के ऑडीशन की तैयारी की। ऑडीशन पास किया तो अपनी सहेलियों को लड्डू खिलाया। बी ग्रेड और फिर टॉप ग्रेड आर्टिस्ट बनीं। उनकी गायकी के कई टेप तैयार हुए और वो एक प्रतिष्ठित गायिका बन गयीं। उनकी ‘सुर सरिता’ जब पहली बार विविध भारती के एक बड़े और लोकप्रिय कार्यक्रम ‘अनुरंजिनी’ में बही- तो कई दिन तक वो सुरों की बारिश में भीगती रहीं। इस तरह ट्रांज़िस्टर कुसुम जिज्जी के जिगर का टुकड़ा बन गया। जहां जातीं साथ में एक ट्रांज़िस्टर और उसकी बैटरी ज़रूर ले जातीं। रेडियो से ही उनकी शोहरत की शुरूआत हुई। ग़म और तन्‍हाई के पलों में उनका हमदम भी बना रेडियो। तन्हाई के लम्हों में ली गयी अपनी सिसकियों को कुसुम जिज्जी ने रेडियो और अपनी गायकी से ही तो बांटा। इस पल भी जब पूरे घर पर ग़म की बदली छायी है, उनका अपना ही जीवन-साथी जब उनका कलेजा छलनी बना रहा है... ये देखकर कुसुम जिज्जी एक बार फिर जिंदगी की सिलवटों को मिटाने के लिए बेतहाशा दौड़ पड़ीं। लेकिन वो ट्रांज़िस्टर उनके लिए उस दिन खुशी की सौगात नहीं बल्कि ऐसी आंधी लेकर आया था, जो कई महीनों तक शांत नहीं हुई। गानों के कई मौक़े हाथ से निकल गये। पंडित जसराज की प्रस्‍तुति के बाद उनकी प्रस्‍तुति का मौक़ा जाता रहा। मुंबई में फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की ग़ज़लें गानी थीं, वो मौक़ा छूटा। ऐसे कई सुनहरे मौक़े उन्‍हें अपने घरेलू विवादों के कारण छोड़ने पड़े।






वक्‍त कभी एक जैसा नहीं रहता। आंधियां चलती हैं, थमती भी हैं। कुसुम जिज्जी की जिंदगी में भी बहार आयी और पतझरों की दस्‍तक कम हो गयी। बनारस से मुंबई की सुखद यात्रा और बस कुसुम जिज्जी का सुर कोयल-सा कूकने लगा।

नेहरू सेन्‍टर का भव्‍य हॉल, स्‍टेज के किनारे किनारे फूलों के वंदनवार सजे थे। मौक़ा था विदूषी गिरिजा देवी और उस्‍ताद अमजद अली ख़ां की कजरी और सरोद की जुगलबंदी की प्रस्‍तुति का..
‘झिर झिर बरसे सावन,
रस बुंदिया की आई गइले ना
अब बहार की... आई गइले ना’।

राग मिश्र मांड में दादरा ताल में निबद्ध इस कजरी की जुगलबंदी पर दर्शक झूम रहे थे जैसे सावन की बयार हो। कुसुम जिज्जी का मन बादलों के बीच उड़ चला था। कजरी की तान पर खूब ऊंची ऊंची पींगेँ भर रही थीं। उनके मन का झूला आसमान में उड़ा जा रहा था। होंठ इस कजरी के साथ गुनगुना रहे थे। पंडित अच्‍छेलाल तबला संगत कर रहे थे। ‘धा धी ना, धा तू ना, धा धी ना, धा तू ना’ दादरा ताल के ठाह, दुगुन और त्रिगुन की ताली के साथ-साथ मन ही मन उनका सोलो गायन भी चलने लगा था। इसी कजरी के बाद तो कुसुम जिज्जी को भी ठुमरी गानी थी। पहली बार उन्‍हें इतना बड़ा मौक़ा मिला था। वो आहिस्‍ता आहिस्‍ता मंच सीढ़ियां चढ़ रही थीं, होठों से मुस्‍कान के मोती झर रहे थे, लाल चौड़े पाड़ वाली क्रीम कलर की साड़ी के पल्‍लू को सलीके से आगे सरकाती हुई मंच पर जब वो बैठीं, और लंबी नाक में चमचमाती हीरे की लौंग पर जैसे ही रोशनी पड़ी—मानो दिये जल उठे। बनारसी पान की ललाई उनके होठों पर ऐसे फब रही थी कि उसके सामने ब्रांडेड लिपस्टिक का रंग भी फीका लगे। आंखों में गहरा काजल, माथे पे लाल बिंदी उनकी खूबसूरती में चार चांद लगा रहे थे। तानपूरे और तबले के मिलान के बाद जब उन्‍होंने बोल-आलाप लिया तो दर्शक हवा में इठलाती टहनी की तरह झूमने लगे थे। उन्‍होंने जब बोल-बनाव की ठुमरी गायी, तो रसिकों के बीच से आवाज़ आई-‘वाह खटका और मुरकी का कैसा अदभुत समन्वय है’। उनकी गायकी से, राधा-कृष्‍ण के प्रेम और नोंक झोंक का दृश्‍य तिलस्म पैदा कर रहा था।

बारिश हो या कड़ी धूप, हर मौसम में कुसुम जिज्जी के गायन के कंसर्ट में हॉल खचाखच भरा रहता। हॉल में पिन-ड्रॉप-साइलेन्‍स बना रहता था शुरू से आखिर तक। कुसुम जिज्जी के पास स्‍मृतियों का विराट समुद्र है, जिसमें अकसर ही वो गोते लगाती हैं। कई बार तो वो ये भी चाहती हैं कि इन सुरीली यादों की बूंदों से उनके घर वाले भी भींगें। खासतौर पर वो पारुल को बहुत कुछ बताना चाहती हैं क्‍योंकि पारुल उनके साथ परछाईं की तरह रहती है। लेकिन पारुल के तो अपने ही जोड़-घटाव हैं। कुसुम जिज्जी के करीब बस उतना ही रहना चाहती है, जब तक उसे फायदा पहुंचता रहे। पारुल का बस चले तो कुसुम जिज्जी की यादों के सिक्‍कों को या तो बाज़ार में भुनाए या फिर ‘फिक्‍स डिपॉजिट’ करके दोगुना होने तक इंतज़ार करे। लेकिन स्‍मृतियां किसी तिजोरी में भला कहां कैद होती हैं, वो तो मन की वादी में हमेशा भटकती हैं तो कुछ स्‍मृतियां इंसान के जीने का मक़सद बन जाती हैं। आज जब भी पारुल कुसुम जिज्जी के कंसर्ट के लिए कोई सिटिंग रखती है, तो उनका दिल खुद से विद्रोह करता है...और व्रिदोह के पलों में उनका तनाव और दर्द बहने लगता है। दरअसल जब उम्र का सूरज ढलता है तो सपनों के रंग फीके पड़ जाते हैं। पूरी दुनिया बेनूर लगने लगती है। आवाज़ में कशिश तब आती है, दिल में खुशी की धूप खिली हो... लेकिन मेरी दुनिया में तो हमेशा ही बदली छायी रही, इतना गहन अंधेरा है कि किसी का चेहरा पहचान नहीं आता। बहू, बेटे, पोते सब अदृश्‍य हैं। उम्र के इस पड़ाव में इतनी अकेली हूं जैसे पहाडी किले में कोई मंदिर। कोई भूला-भटका आकर फूल चढ़ा जाता है। मेरे लिए समय जैसे अविरल बहाव है जिसमें ना कोई तारीख है, ना कोई समय, ना ही कोई पर्व है। फिर भी पारुल सिटिंग करती है, तारीख तय करती है और मैं गाने को तैयार हो जाती हूं..... अब और नहीं.... आखिर उम्र के इस ढलान में मैं क्‍यों गाऊं...किसके लिए गाऊं... गाकर क्‍यों इनका पेट पालूं, जबकि मेरे इस परिवार में मुझे सिर्फ कांटे ही कांटे दिये हैं। पिछली बार जब मैं बीमार होकर बिस्‍तर पर थी, झूठ-मूठ को भी कोई मेरे पास नहीं फटकता था, जैसे-तैसे बोझ की तरह पारुल दो वक्‍त खाना पटक जाती थी, वो खाना मैंने खाया या नहीं, ये देखती भी नहीं थी... और मैं अपना कांपता हाथ तकिये के नीचे ले जाकर टटोलती थी, दवा का पत्‍ता ढूंढती थी और दवा निग़ल लेती थी। पोते को मेरे क़रीब इसलिए नहीं आने दिया जाता था कि मेरी बीमारी से उसे इंफेक्‍शन ना हो जाए। मेरे कान तरस गये, इस वाक्‍य के लिए—‘मां बस करो, तुम अब आराम करो…तुम्‍हें कुछ चाहिए तो नहीं’। लेकिन कहां.... इस घर के लिए तो मैं सिर्फ ए.टी.एम मशीन हूं। पर क्‍या कहूं अपने मन को, ये भी बड़ा अजीब है। नहीं गाती हूं तो भी चैन नहीं मिलता। बचपन से आज तक गायकी जैसे रगों में घुली मिली है। बिना गाए तो मैं जी भी नहीं सकती। ये गाना ही तो है, जिसने मुझे जिंदगी की कड़ी धूप में ठंडी छांह दी है।

…..‘बाज़ूबंद खुल-खुल जाये सँवरिया रे
कैसा जादू डारा रे...
जादू की पुड़िया भर-भर मारी रे
क्‍या जाने बैद बिचारा रे’.....
 
राग भैरवी की ये बंदिश उन्‍हें बहुत पसंद है। अपनी तन्हाई में कुसुम जिज्जी गाने के तरह तरह के प्रयोग करती हैं। अभी वो दीपचंदी ताल की इस बंदिश को कहरवा ताल में बदलने की कोशिश कर रही हैं....धागे नाती नाक धिन...


जैसा मीठा गला, वैसा ही ठसकदार कुसुम जिज्जी के गाने का अंदाज़। ग़रीब परिवार में पली-बढ़ी कुसुम जिज्जी अपनी दम पर कामयाब हुईं। पिता ने उन्‍हें इस डर से नहीं पढ़ाया कि वो पढ़–लिखकर कर भाग जायेंगी। घर में उनके गाने का जमकर विरोध हुआ। लेकिन कुसुम जिज्जी कहां मानने वाली थीं। गायकी उनकी रग-रग में, सांसों में बसी थी। जब वो छोटी थीं, तो गाना सीखने के लिए उन्‍होंने जिद ठान ली, -‘गाना सिखाओ वरना कुंए में कूदकर जान दे दूंगी’। घर वाले उनकी जिद के आगे लाचार हुए और उस्ताद रहमत ख़ां से गंडा बंधवा दिया और उन्‍हें गाने की तालीम दिलवाई गयी। इस तरह शुरू हुआ था, उनके गाने का सफर। उन्‍हें गाने और तारीफ बटोरने का इतना शौक़ था कि शुरूआती दौर में जब वो मंच पर गातीं, तो सहेलियों और रिश्‍तेदारों से कह देतीं, कि मैं रहूँगी मंच पर,  तुम लोग तालियां बजाने आना। धीरे-धीरे सिलसिला बढ़ता गया और गायिका के रूप में वो मशहूर होने लगीं।
गायकी तो जैसे उनके लिए कुदरत की एक अनमोल नेमत थी।  दर्शकों में बैठे वो लोग, जो पेशे से व्‍यापारी थे- लेकिन थे संगीत के क़द्रदान, कुसुम जिज्जी के शो के बाद उन्‍हें दंडवत प्रणाम करते और उपहार स्‍वरूप सोने चांदी के गहने और रूपए देते थे। गायकी के इन्‍हीं पैसों और उपहारों से कुसुम जिज्जी के भाई-बहनों की परवरिश हुई। कुसुम जिज्जी बड़ी सरल मिज़ाज की थीं। जिन्‍होंने कभी अपने लिए जीना नहीं सीखा। हर कोई उनसे बेपनाह मोहब्बत करता। जब जिसे जरूरत पड़ती वो उनसे पैसे वसूल ले जाता था। आज के ज़माने में ऐसी मदर टेरेसा कहां मिलेंगी भला। ठसकदार रोबीले व्‍यक्‍तित्‍व को लोग आज भी नमन करते हैं। मजाल है कि उम्र में छोटे लोग उनसे नज़र मिलाकर बात करें। बावजूद इसके कुसुम जिज्जी अपनी सरलता और मासूमियत से वो पेशेवर ऊंचाई नहीं छू पायीं जिसकी वो हक़दार थीं। अपनी काबलियत से उन्‍हें शोहरत तो खूब मिली, पर दौलत नहीं मिल पायी, जो उनके ठाट-बाट को रौनक कर सके। लेकिन हां, अपनी गायकी के दम पर उन्‍होंने अपने बेटी-बेटे को अच्‍छी परवरिश दी। बेटी तो ब्‍याहकर चली गयी ससुराल, लेकिन बेटा हो गया नालायक। जब तक पति साथ थे,  गाने में अड़चनें ही पैदा करते थे। उस ज़माने में औरतों का स्‍टेज पर गाना निचले दर्जे का माना जाता था। उनके पति को कतई गवारा नहीं था कि उनकी धर्म-पत्‍नी उस ज़माने की मशहूर गायिकाओं की तरह कुसुम-बाई के नाम से विख्यात हों। बहरहाल, कुसुम जिज्जी की जिंदगी में परेशानियों की धुंध भी छायी, कामयाबी की रोशनी भी हुई। अंधेरे और उजाले के इस संघर्ष में धीरे-धीरे कुसुम जिज्जी के पास कामयाबी के तमग़े आते चले गये। लेकिन उनकी निजी जिंदगी में अंधेरा गहराने लगा। एकाकीपन बढ़ता गया। लेकिन वो थकी नहीं, उम्र की इस दहलीज़ पर ना आराम है, ना दिली सुकून, ना ही अब वो शोहरत रही। किसी आयोजक का एक फोन आता है, तो पारुल दसियों फोन करती है- और जुगाड़ करके एक स्‍टेज प्रोग्राम फिक्‍स करवा ही लेती है। और उसके बाद कुसुम जिज्जी की सिफारिश शुरू कर देती है। फिर तो उनकी सेवा में कोई कमी नहीं रहती। कुसुम जिज्जी को मिश्री डालकर गरम पानी देती है। तुलसी और काली मिर्च का काढ़ा बनाकर देती है। इस डर से कि कहीं उनका गला ना ख़राब हो जाए। पारुल की इस एहतियात से कुसुम जिज्जी का गला बिलकुल दुरुस्‍त रहता है। भले ही शरीर उनका जर्जर हो, लेकिन उनका मन और गला कभी नहीं बिगड़ता।




........’दादी दादी, आपकी फोटो फट गयी.......ये अख़बार’
…‘अरे ये तो मेरे सम्‍मान की तस्‍वीर है रे’।
...लेकिन दादी इस अखबार में भेल वाला भेल बेच रहा था। मैंने देखा तो उससे माँगकर ले आया। मैंने उससे कहा, इस अख़बार में मेरी दादी की तस्‍वीर है, दे दो ना’
...कुसुम जिज्जी अवाक रह गयीं। लगा मानो अखबार के टुकड़ों की तरह कुसुम जिज्जी का दिल भी कई टुकड़े हो गया है। दर्द जैसे छाले में बदल गया......तन्‍हा मन उदासी के उस जंगल में चला गया, जहां कोई ऐसा पौधा नहीं जिसमें हरापन हो... शुष्‍क बेजान....ठूँठ पेड़ों में मैं खोज रही हूं रिश्‍तों की बीर बहूटी। जब यहां मिट्टी ही नहीं है, सिर्फ कंकड़-पत्‍थर वाली बंजर धरती है, तो बीज कैसे रोपे जाएंगे.... कहां से जड़ पकड़ेगी... ये घर तो दूर तक फैला निर्जन मरूस्‍थल है जिसमें सिर्फ रेत के टीले हैं, जो भरभराकर कब के गिर चुके हैं। मुझे ये पता है, फिर भी मैं झूठी उम्‍मीद पर जी रही हूं। इस घर में मेरी अहमियत सिर्फ एक ग्रामोफ़ोन जितनी है, जब चाहा बजा लिया, फिर एक कोने में सजा दिया। लेकिन अब मैं इनकी ज़रूरत नहीं पूरी करूंगी। अब मैं कोई वस्‍तु बनकर नहीं रहूंगी। पारुल के कहने पर किसी तरह का कंसर्ट या स्‍टेज प्रोग्राम नहीं करूंगी...लेकिन क्‍या करूंगी, बार बार मजबूर करती है पारुल मुझे गाने को.....।

....दुल्‍हन तुमने ये क्‍या किया?
....जिज्जी वो रखने की जगह नहीं थी ना। अब नये घर में ये कूड़ा-कबाड़ कहां रखा जाए। इसलिए मैंने रद्दी वाले को दे दिया। हां एक कॉपी रख ली है। बस इतना काफी है ना।
दुल्‍हन, तुम्‍हें याद है। इससे भी छोटा घर था, जब रौनक पैदा हुआ था। उसका एक-एक खिलौना, एक एक कपड़ा मैंने संभाल कर रखा था जिसे झाड़-पोंछकर तुम अब भी इस्‍तेमाल करती हो।

कूड़ा कबाड़.... अपने आप से ही कुसुम जिज्जी कहती हैं......... ये रद्दी, ये कूड़ा-कबाड़ ही मेरे जीवन का आसरा है। इसी ने मेरे भीतर सुरों की सरिता प्रवाहित की है। फांस की तरह चुभ गया ये शब्‍द कुसुम जिज्जी के भीतर। कुसुम जिज्जी का मन पीड़ा से आर्द्र हो गया है। ये काग़ज़ के टुकड़े, ये तस्‍वीरों, संगीत की नोट-बुक, बंदिशों की स्‍वर-लिपियां, पुरानी डायरी… इन सबमें दर्ज हैं यादों के दस्‍तावेज़....तन्‍हाईयों का सफ़र....नोटबुक के पन्‍नों में मुरझाए फूल मेरे आंसुओं से मुस्‍कुराने की फरियाद करते हैं। डायरी के पन्‍नों में कुछ शब्‍द हैं, कुछ भाव हैं, अंजुरी भर सरगम है जिसके सहारे मैं जीती हूं, वरना इतनी सारी बीमारियों को ओढ़कर मैं कब की मर चुकी होती। मैं अपने ही कोखजने बेटे और बहू पर बोझ बन गयी हूं। ये मेरी लाचारी का फायदा उठाते हैं। मेरे दुख, मेरी पीड़ा उन्‍हें दिखायी नहीं देती। इन लोगों को मुझसे सिर्फ पैसों का सरोकार है। शायद मैं जिस दिन पैसों का जरिया ना रहूं, उस दिन ये लोग मुझे निकाल फेंकेंगे घर से। इस घर में मेरी रोज़मर्रा की ज़रूरतें तक नहीं पूरी की जातीं। चश्‍मे की डंडी टूटी है। कई दिनों से एक हाथ से डंडी पकड़कर काम चला रही हूं। मैं इनके लिए भला क्‍यों गाऊं। अब मैं नहीं गाऊंगी। मैं क्‍यों इतना कष्‍ट सहूं इनके लिए। अब तो कुर्सी पर बैठते भी नहीं बनता... कमर और घुटनों में असह्य पीड़ा होती है। लेकिन करूं क्‍या... दुल्‍हन फिर रोना रोएगी... आप गाएंगी नहीं तो आपके पोते की पढ़ाई का ख़र्च कहां से आएगा, हमारे लिए ना सही, उसके लिए तो गाइये। मैं इनके दिए दुखों से रोज़ तार-तार होती हूं फिर भी पारुल की एक चिरौरी पर गाने को तैयार हो जाती हूं.....

......पारूल मेरे तानपूरे का तार टूटा है। कितनी दफ़े कहा, ठीक करवा दो। गाने की सिटिंग से पहले करवा ही देना ज़रा.....तुमने मेरे ब्‍लाउज़ की तुरपाई भी नहीं की ना...लोग क्‍या कहेंगे कि मैं इतनी बड़ी गायिका, उधड़ा ब्‍लाउज़ पहने हूं। हर प्रोग्राम के बाद जब पैसे मिलते हैं तो सोचती हूं अपने लिए दो-चार साड़ी-ब्‍लाउज़ खरीद लूंगी, लेकिन उससे पहले ही तुम्‍हारी ज़रूरत की चीज़ों की लंबी लिस्‍ट तैयार हो जाती है। कराहती हुई धीरे-धीरे वो अपने शरीर के बोझ को उठाने की कोशिश करती हैं.... सुई में धागा डालने की कोशिश करती हैं...सुई के चुभन से रिसती खून की बूंद को देख रही हैं।
नए घर के हॉल में लोगों की भीड़ जमा है। कुसुम जिज्जी के पिछले कंसर्ट के पैसों से आया नया म्‍यूजिक सिस्टम तेज़ तेज़ बज रहा है और इन आवाज़ों से कमरा गूँज रहा है। म्‍यूजिक बंद होने पर लोगों की हंसी और क़हक़हे छन छनकर भीतर वाले कमरे तक चले आते हैं। जहां बैठी हैं कुसुम जिज्जी। चारों ओर संगीत का शोर है। चहल-पहल है। लेकिन कुसुम जिज्जी के भीतर एक खोह है,  जहां सिर्फ ख़ालीपन है,  वीरानी है और है इक दश्त। उनकी घुटनों की तकलीफ़ बढ़कर ऑस्टियोपोरोसिस में बदल गयी है। बिना सहारे के वे उठ नहीं सकतीं वो। पारुल हाथ में उपहारों का बंडल लिए कमरे में दाखिल हुई, जल्‍दी-जल्‍दी आलमारी में रखकर बाहर निकल ही रही थी कि कुसुम जिज्जी की आवाज़ आयी,  दुल्‍हन-दुल्‍हन, भूख लग आयी है। खाना ले आ।
- अं.. हां जिज्जी।
-गोली खाने का वक्‍त हो गया है दुल्‍हन।
-आई जिज्जी, कहती हुई पारुल कमरे से जो बाहर गयी तो पलटकर नहीं आयी।
जब किसी कंसर्ट की तारीख़ तय होती है तो दुल्‍हन कैसे दौड़-दौड़कर मेरी सेवा करती है। कुसुम जिज्जी मन ही मन बुदबुदाईं..... उसे तो मिल गया है नया घर। अब फिलहाल मेरी जरूरत नहीं है। प्रोग्राम ख़त्‍म तो कुसुम जिज्जी की देखभाल भी ख़त्‍म। रद्दी की टोकरी में पड़े बेकार सामान की तरह मैं घर के एक कोने में पड़ी रहती हूं.......वॉश-रूम जाना है। सालों से डायबिटीज़ की पीड़ा से जूझ रही हैं। बिना सहारे के वॉश-रूम नहीं जा सकती हूं... पारुल को ये बात अच्‍छी तरह पता है... लेकिन वो अपनी खुशियों में मस्त है, उसे तमाशे और नाच के सिवा कुछ नहीं दिखायी दे रहा। मस्त रहें मस्‍ती में, आग लगे बस्‍ती में। 

बेटे को जब पैसों की ज़रूरत होती है, तब उसे अपनी मां यानी कुसुम जिज्जी याद आती हैं।  शाम से अब रात हो चली है। पार्टी का शोर मद्धम होता चला जा रहा है और कुसुम जिज्जी के भीतर का अकेलापन भी गहराता जा रहा है। ठसकदार शख्सियत, एक मशहूर गायिका घर के एक कोने में बैठी खाने का इंतज़ार कर रही है। उसकी भूख शांत हो, तो वो दवा खाए। कोई आए, उन्‍हें सहारा तो वो वॉश-रूम जाएं। अब तो उनकी साड़ी भी गीली हो चुकी है।  ऑस्टियोपोरोसिस की तकलीफ इन दिनों इतनी बढ़ गयी है कि डॉक्‍टर की दवा भी कभी-कभी काम नहीं करती है। एक की बजाय कई बार दर्द की दो गोलियां लेनी पड़ती हैं। थोड़ी राहत और फिर तकलीफ़ शुरू। कमाल की बात तो ये है कि कुसुम जिज्जी का शरीर तो जर्जर हो गया है लेकिन आवाज़ आज भी ताज़ा है, गला उनका आज भी जवान है। आवाज़ में पहले जैसी बुलंदी, लोच और कशिश बरक़रार है। शरीर की तकलीफ़ मन को भी बेचैन करती है। एक कलाकार बेहद बेचैनी के पलों में अपनी कला से इश्क़ फ़रमाता है। जहां सारे दर्द, दर्द की सीमा से ऊपर हो जाते हैं। इश्‍क़ में दर्द का अहसास मीठा लगता है। अकसर कुसुम जिज्जी के साथ भी ऐसा ही होता है। जब वो कराहने लगती हैं - तो अपने साज़ उठाती हैं। छेड़ती हैं कोई राग,  सुरीले आलाप और तान के बाद......गाती हैं विलंबित और द्रुत ख्‍याल की बंदिश। और फिर अपनी इस प्रिय ठुमरी में डूब जाती हैं—
‘भर भरी आयीं मोरी अंखियां पिया बिन.....
घिर घिर आयी कारी बदरिया....
धड़कन लागी मोरी छतियां।’

वर्तमान से जब जी घबराने लगे, हर पल इंसान छटपटाता रहे... अपनी तकलीफ़ों से लाचार होने लगे, तो उसका अतीत में विचरना आदत-सी बन जाती है। अतीत के सबसे ऊंचे पहाड़ पर चढ़ रही हैं कुसुम जिज्जी। यादों की मीठी बारिश से आज फिर भीगना चाहती हैं वो। कामयाबी के भूले-बिसरे चित्रों को देखना चाहती हैं, मन के आइने में......।


कुसुम जिज्जी बैठे-बैठे ही अपना घुटना मोड़कर घिसट कर थोड़ा आगे तक सरकीं तो तिपाई तक हाथ पहुंच गया। तानपूरे का ऊपरी सिरा हाथ आया, उसे अपनी ओर खींचा। बूढ़े-झुर्रीदार हाथों में इतनी ताक़त नहीं बची कि तानपूरे को सही पो़ज़ीशन में लाकर अपने सामने खड़ा कर सकें। तानपूरा आधा लेटा कर उसका कवर हटाया, साड़ी के पल्‍लू से उस पर जमी धूल साफ की। और फिर धीरे-धीरे खुलता गया, उनके मन का भीतरी परदा। यादों के साज़ पर पड़ी गर्द भी साफ़ होती गयी। उस पार ठहरा अतीत, आंखों के सामने झिलमिलाने लगा। अपने गाने पर हॉल में बज रही तालियों की गूंज, उनकी गायकी की लहरों से सराबोर होते दर्शक-श्रोता, ग्रामोफ़ोन कंपनियों के लिए गाना, एल-पी रिकॉर्ड्स का रिलीज़ होना, दुनिया भर में मशहूर होना, अपना दमकता हुआ जवान चेहरा, रिकॉर्ड के कवर पर छपा अपना श्‍वेत श्याम चित्र, रिलीज के बाद की पार्टी और रेडियो-पत्र-पत्रिकाओं में इंटरव्‍यू---चलचित्र की तरह आंखों के सामने घूमने लगे। सरपट भागती ट्रेन की तरह गुज़र गये वो दिन। और बचा रह गया पटरियों का धड़कना। कुसुम जिज्जी इस वक्‍त सवार हैं यादों की ट्रेन पर। अनगिनत स्‍टेशन आ रहे हैं यादों के। वर्षा-चौमासा के चार दिनों का बहुत बड़ा आयोजन था, जिसमें कजरी, चैती, टप्‍पा, ठुमरी गाकर खूब शोहरत पायीं और पहली बार उन्‍होंने आयोजकों के सामने पैसों के लिए ज़बान खोली थी। उन्‍हें मुंह-मांगी रकम मिली भी थी। उन्‍हीं पैसों से बेटे के लिए गाड़ी ख़रीदी। किराए पर चलवाई। लेकिन 'पूत सपूत तो का धन संचय, पूत कपूत तो का धन संचय'। यादों के समंदर में ग़ोते लगाती कुसुम जिज्जी ने जब तानपूरे के तार को छेड़ा, तो अहसास हुआ कि तार तो कब के ढीले पड़ गये....तानपूरा अब बेसुरा हो गया है, लेकिन एक कलाकार की जिद के सामने साज़ को अपनी जिद छोड़नी पड़ती है। आखिरकार तानपूरा मिलाया और कुसुम जिज्जी को अहसास ही नहीं हुआ कि उनके कंठ से ठुमरी के ये बोल फूटने लगे हैं......

'घिर आयी कारी बदरिया,
राधे बिन लागे ना मोरा जियरा.....
बदरा बरसे, नैना बरसे,
घन और श्याम की लागी है होड़वा,
राधे बिन लगो ना मोरा जियरा’।







इस ठुमरी के साथ, बोल-आलाप और बोल-तान कुसुम जिज्जी गा रही हैं। कहीं भी उनका सुर भटक नहीं रहा है। बाक़ायदा खटका-मुरकी, गमक और मीड़ का वैसा ही प्रयोग जैसा वो मंच पर पहले करती थीं। कुसुम जिज्जी के गाने का वही ठसकदार अंदाज़ आज भी कायम है। जब मंच पर वो गाती थीं,  तो हॉल में तालियों की गूंज होती थी। हालांकि अब कुसुम जिज्जी सिर्फ दौलत के लिए मजबूरी में गाती हैं,  बेटे-बहू की ज़रूरतों के लिए। पोते को MBA कराना है इसलिए गाती हैं। बेटे को दुकान ख़रीदनी है। दुल्‍हन को हर महीने ब्‍यूटी पार्लर जाने के लिए पैसे चाहिए। सब्जियों, फलों और अनाज के दाम आसमान छू रहे हैं। जिनके घर में हर सदस्‍य कमाता है, वहां भी किल्‍लत मची है। यहां तो ढंग से कमाने वाला कोई है भी नहीं। गाती हूं मैं, गाने के पैसे लेती है पारुल, उन्‍हीं पैसों से आता है घरेलू सामान और पकती है रोटी। यही रोटी रोज़ मुझे सबके खाने के बाद मिलती है। जब सब खा लेते हैं, तब बचा-खुचा खाना मेरे हिस्‍से में आता है। आज भी जबकि गृहप्रवेश की पार्टी मेरी बदौलत है, फिर भी मुझे ही सबसे अंत में खाना नसीब होगा....कलझ रही हूं मैं भूख से, लेकिन पारुल खुशी के नशे में चूर है। उसे तो होश तब आएगा, जब अगला कोई आयोजक मिलेगा प्रोग्राम के लिए।

'कुसुम जिज्जी, कुसुम जिज्जी, सुनिए तो, ग़ज़ब हो गया, अपने तो भाग खुल गये'...ये पारुल थी, जिसकी आवाज़ सुनकर कुसुम जिज्जी की ठुमरी का स्‍वर वहीं रूक गया।
-हुआ क्‍या दुल्‍हन, तुम्‍हें कब से आवाज़ दे रही हूं। भूख से मेरा कलेजा मुंह को आ रहा है। कमर-घुटने ऐसे अकड़ गये हैं कि बैठे नहीं जा रहा है। कमर दर्द सहा नहीं जा रहा है। गाना शुरू किया तो दर्द ज़रा कम हुआ। पारुल ने तानपूरा जिज्जी के हाथों से लगभग छीनते हुए जल्‍दी जल्‍दी उसे प्रणाम किया, जैसे तानपूरा ही उसकी सास हो। उसे तिपाई पर खड़ा कर दिया।
-‘क्‍या कर रही हो दुल्‍हन, मेरा तानपूरा कहां हटा रही हो। बड़ी मुश्किल से मैंने इसके तार ठीक किये हैं।
अब कुसुम जिज्‍जी का मन जैसे दर्द के दरिया में डूबने लगा है। मन ही मन वो कहती हैं—हुंह पारुल को अब सुधि आई है मेरी। लगता है फिर कोई कार्यक्रम जुगाड़ कर आयी है... उसका चेहरा देखकर ही मैं भांप लेती हूं कि इस बार मुझसे उसे कितना फ़ायदा पहुंचने वाला है। पारुल तानपूरे के एक-एक तार को बेचेगी और एक-एक तार के नोट वसूल करेगी।

-कुसुम जिज्‍जी, इस बार तो आपके लिए नया तानपूरा ख़रीद लायेंगे, यही नहीं सितार, गिटार, ढोलक, मजीरा, हारमोनियम सब ख़रीद देंगे।  इस बार आप हमारा घर दौलत से भर देंगी। अब हम अपनी दुकान ख़रीद सकेंगे। एक बार जो दुकान चल पड़ेगी, तो फिर आपको हम मसनद पर बिठा कर रखेंगे। आप सिर्फ कंठी-माला लेकर राम नाम जपियेगा। बस एक आखिरी बार हमारे लिए गा दीजिए मंच पर’।
-- 'दुल्‍हन, आंखें थक गयीं इंतज़ार करते करते। भूख से अंतडियां अंदर घुस गयी हैं। होंठ सूखे जा रहे हैं। बार बार जीभ फेर रही हूं, ज़बान पर।’....कहते-कहते कुसुम जिज्जी की आंखों में अटके मोती गालों पर ढुलक आए।

एल.ई.डी. लाईट की तेज़ रोशनी में भी कुसुम जिज्जी के सामने स्‍याह अंधेरा छा गया। दिमाग़ चक्‍कर खाने लगा। जैसे अब वो गिर पड़ेंगी। हॉल से अभी भी शोर छनकर आ रहा है और कुसुम जिज्जी के कानों को चोट पहुंचा रहा है।---—‘कुंडी मत खटकाओ राजा, सीधा अंदर आओ राजा’- पारुल इन बेढब बोलों के साथ सुर मिलाती हुई, झूमती कुसुम जिज्जी के गले में हाथ डालकर झूल गयी। कुसुम जिज्जी का नथुना तेज दुर्गंध से भर जाता है। और वो झटके से अपना मुंह दूसरी तरफ फेर लेती हैं। उनका रूका हुआ बांध टूट जाता है। दर्द बेतरह फट पड़ता है। शरीर और मन ज़ार-ज़ार रोने लगते हैं। उन्‍हीं की कमाई से ये घर आबाद हुआ है। और वही घर के एक कोने में अपनी बदनसीबी पर रो रही हैं। उनकी साड़ी अभी और गीली हो गयी है। घर के दूसरे हिस्‍से में जश्‍न मनाया जा रहा है। गाना गूंज रहा है—‘ले ले रे सेल्‍फी ले ले रे’। इस गाने पर कुसुम जिज्जी का बेटा नाच तो सकता है लेकिन ‘बजरंगी भाईजान’ बनकर उन्‍हें अकेलेपन के महासागर से उबार नहीं सकता।

मेहमान जा चुके हैं'। पारुल कुसुम जिज्जी को बच्‍चों की तरह बहलाने की कोशिश करती है। उन्‍हें सहारे से उठाकर वॉशरूम ले जाती है। 'सरगम ग्रुप वाले एक बहुत बड़ा स्‍टेज प्रोग्राम कर रहे हैं। वो लोग आपसे मिलना चाहते हैं। चलिए जिज्जी आपको हाथ मुंह धुलाकर खाना खिला देती हूं। फिर ये नयी साड़ी पहन लीजिए। तैयार हो जाइये। वो लोग अभी आयेंगे और आपसे मिलेंगे। एडवांस पचास हज़ार का चेक देने का वादा कर गये हैं। लगता है हमारे भी अच्‍छे दिन आ गये हैं जिज्जी'। पारुल खुशी के समंदर में डुबकी लगा रही है। कुसुम जिज्जी उदासी से तार-तार झीनी हुई जा रही हैं,   पारुल हाथ में साड़ी लिए खड़ी है। कुसुम जिज्जी साड़ी की तह खोल कर उसमें पड़ी शल ठीक कर रही हैं। पारुल उन्‍हें हाथों से सहारा देती है। दोहरी हुई कमर के दर्द से कुसुम जिज्जी चीत्‍कार कर उठती हैं.......उफ़......घुटने तो सीधे ही नहीं हो रहे दुल्‍हन ..... यूं ही पहना दो ना साड़ी.....
उस रात भी पारुल मुझे इसी तरह साड़ी पहना रही थी। पड़ोसी आकर खड़े थे, डॉक्‍टर के यहां ले जाने के लिए ऑटो रिक्‍शा बुलाया गया था। बीमार हालत में मुझे अकेला छोड़ ये लोग सिनेमा देखने गये थे। पोते ने जिद की थी.......
--‘मैं दादी के साथ रहूंगा, बेचारी दादी कैसे उठकर पानी लेगी’
--‘तांबे वाला लोटा यहां भरकर रख देते हैं’- पारुल बोली थी।
--‘अगर बिजली गुल हो गयी तो’?
-- ‘मोमबत्‍ती और माचिस भी रखे दे रहे हैं ना, दादी कोई छोटी बच्‍ची नहीं हैं कि उन्‍हें अकेला नहीं छोड़ सकते’।
रौनक से दुल्‍हन से झुंझलाते हुए अस्‍फुट स्‍वर में कहा था—‘जिज्‍जी तो जी का जंजाल बन गयी हैं, अब इनकी वजह से हम सिनेमा में भी ना जाएं’।

ये सब मैं बीमारी की अशक्‍त अवस्‍था में में सुन रही थी...और सचमुच उस दिन बिजली गुल हो गयी थी। मुझे जोरों की प्यास लगी थी, मैं पानी लेने के लिए कोशिश करके उठी थी। और धड़ाम.....अपने ही गिरने की आवाज़ से मैं डर गयी थी। उसके बाद क्‍या हुआ...मुझे कुछ होश नहीं। जब मैं चेतन अवस्‍था में लौटी, तो अपने को अस्‍पताल के बेड पर पाया था। सलाइन लगा हुआ था… मैं असह्य वेदना से कराह रही थी। डॉक्‍टर के आने पर पारुल ने फुसफुसाकर पूछा, ‘कितना ख़र्चा लगेगा, कितने दिन यहां रखना होगा……हमें जितना जल्‍दी हो सके, प्‍लीज़ डिस्‍चार्ज दे दीजिए..... और हां डॉक्‍टर साहब ये बात आप अपने तक ही रखिएगा’।

....’मैं ज़रिया हूं कमाई का, लेकिन मेरे इलाज में पैसे ना ख़र्च हों...पारूल की इन बातों ने आज के इन हालात में मेरा कलेजा चीर दिया था। मेरे घाव पर मरहम की बजाय जैसे नमक घिस दिया गया हो, जैसे मीठी छुरी से मुझे मद्धम-मद्धम हलाल किया जा रहा हो। बूंद-बूंद बह रहा था दर्द का दरिया मेरी आंखों से....बहुत देर तक अस्‍पताल का सफेद झक तकिया गीला होकर मटमैला हो रहा था। सांत्‍वना और प्‍यार के हाथों के स्‍पर्श के लिए मन ज़ार-ज़ार रोकर तड़पा था उस दिन...उस दिन तो क्‍या जाने कितने बरस हो गए, स्‍नेह और अपनेपन की छांह मिले हुए....। जिंदगी की कड़ी धूप में जब-जब प्‍यार की प्‍यास की महसूस हुई, तब-तब कड़वा प्‍याला ही नसीब हुआ.... अब तो लगता है मेरे दुखों के सफर का अंत मेरी आखिरी सांस के विराम पर ही होगा।


कमरे में रखे रेडियो पर कोई FM चैनल बज रहा है....पुरानी चीज़ों को मत फेंकिए...olx पर बेचिए। कुसुम जिज्जी की कराह और ये विज्ञापन दोनों आपस में घुल-मिल गये हैं... और अब बज रही है ये शास्‍त्रीय बंदिश--

'सखी मोरी कोई ना जाने पीर
मोरे नैना बहाए नीर
सांवरिया मोरा दरस दियो ना
लागे हृदय में तीर.....'

ढलती रात के इस सन्‍नाटे में राग मारवा की ये बंदिश कुसुम जिज्‍जी के कलेजे में टीस पैदा कर रही है। कुसुम जिज्‍जी को लग रहा है.. ना तो इस रात का कोई अंत है, ना उनकी इस पीड़ा का।






परिचय- ममता सिंह
हंस, पाखी, रचना-समय, कथाक्रम, कादंबिनी, तथा अन्‍य पत्र-पत्रिकाओं में कहानियां प्रकाशित। विविध-भारती सेवा मुंबई की लोकप्रिय उद्घोषिका। ‘रेडियो-सखी’ के नाम से पहचानी जाती हैं। इलाहाबाद वि.वि. से संस्‍कृत में स्‍नातकोत्‍तर। शास्‍त्रीय संगीत में प्रभाकर। रूसी भाषा में डिप्‍लोमा। नवभारत टाइम्स (मुम्बई संस्करण) में शास्त्रीय संगीत के दिग्गज कलाकारों से बातचीत पर आधारित श्रृंखला का प्रकाशन । आकाशवाणी और विविध भारती से रूपकों, कहानियों का प्रसारण

1 टिप्पणी:

  1. "राग मारवा माधुर्य से परिपूर्ण राग है। इस राग में रिषभ और धैवत प्रमुख स्वर हैं। जिस पर बार बार ठहराव किया जाता है, जिससे राग मारवा स्पष्ट होता है। इस राग का विस्तार क्षेत्र सीमित है। राग पूरिया इसका सम प्राकृतिक राग है। इस राग का विस्तार मध्य सप्तक में ज्यादा किया जाता है। इस राग को गाने से वैराग्य भावना उत्पन्न होती है।"

    ममता सिंह की कहानी 'राग मारवा' पढ़ते हुए यह उपरोक्त बातें जो कहानी और राग मारवा पर समान रूप से लागू होती हैं । सबसे पहले तो इस कहानी के लिए ममता जी को बधाई और सत्या दा को पढ़वाने के लिए शुक्रिया । ममता सिंह की यह कहानी पढ़ते हुए इलाहाबाद के केशवचंद्र वर्मा की याद आती है और फिर पहल 106 में मनोज रूपड़ा की कहानी अनुभूति की याद भी । अनुभूति में राग सोहनी की छाया है और राग मारवा में तो राग मारवा है ही ।
    अब कहानी को लेकर कुछ बातें जो कुसुम जिज्जी का राग मारवा हो जाने की कथा है । यह एक ऐसी कथा है जिसमें संगीत के आस्वाद का प्रभाव है । दर्दों गम कितने जमा किया तो दीवान बना के तर्ज़ पर ही कुसुम जिज्जी का जीवन है, जहां अपने जीवन के सीमित विस्तार को जी रही हैं । ठीक राग मारवा की बंदिश की तरह, जहां एकताल विलंबित में हे करतार कर दो बेड़ा पार है तो वहीं एकताल द्रुत में बिसर गयी मधुबन में और अंत में त्रिताल में पिया मोरे आये न घरवा की व्याख्या है । यह कहानी कुसुम जिज्जी के माध्यम से एक मध्यवर्गीय संगीतकार की जीवन त्रासदी की कहानी भी है । जहाँ कुसुम जिज्जी का सारा संघर्ष परिवार को ढोने और पूत कपूत तो का धन संचय पूत सपूत तो का धन संचय के जद्दोजहद में ही खर्च हो रहा है । कुसुम जिज्जी के कलाकार पर उनकी बुजुर्गियत भारी है । इस कहानी को पढ़ते हुए मराठी सिनेमा नटसम्राट का गणपत बेलवलकर की याद आती है । ममता जी को बहुत बहुत बधाई । यह टिप्पणी बहुत ही फौरी ढंग से कहानी पढ़ते पढ़ते ही लिखी गयी है । आगे सम्भव हुआ तो इस कहानी पर मन से लिखूंगा ।

    और अंत में कहानी पर एक बढ़त की तरह मंगलेश डबराल की कविता 'राग मारवा'

    (अमीर खां और पन्नालाल घोष को सुनने की स्मृति)

    बहुत दूर किसी जीवन से निकल कर आती है 
    राग मारवा की आवाज़ 
    उसे अमीर खां गाते हैं अपने अकेलेपन में 
    या पन्नालाल घोष बजाते हैं
    किसी चरवाहे की-सी अपनी लम्बी पुरानी बांसुरी पर
    वह तुम्हारे आसपास एक-एक चीज़ को छूता हुआ बढ़ता है
    उसके भीतर जाता है उसी का रूप ले लेता है
    देर तक उठता एक आलाप धीरे-धीरे एकालाप बन जाता है
    एक भाषा अपने शब्द खोजने के लिए फड़फड़ाती है
    एक बांसुरी के छेद गिरते-पिघलते बहते जाते हैं
    उसमें मिठास है या अवसाद
    यह इस पर निर्भर है कि सुनते हुए तुम उसमें क्या खोजते हो

    मारवा संधि-प्रकाश का राग है 
    जब दिन जाता हुआ होता है और रात आती हुई होती है 
    जब दोनों मिलते हैं कुछ देर के लिए 
    वह अंत और आरम्भ के बीच का धुंधलका है 
    जन्म और मृत्यु के मिलने की जगह
    प्रकाश और अन्धकार के गडूड-मडूड चेहरे 
    देर तक काँपता एक विकल हाथ ओझल हो रहा है
    एक आँसू गिरते-गिरते रुक गया है
    कहते हैं मारवा को किसी आकार में समेटना कठिन है
    वह पिघलता रहता है दूसरे रागों में घुल जाता है
    उसमें उपज और विस्तार पैदा करना भी आसान नहीं
    उसके लिए भीतर वैसी ही कोई बेचैनी वैसा ही कोई विराग चाहिए
    तुम उसे पार्श्व-संगीत की तरह भी नहीं सुन सकते 
    क्योंकि तब वह सुस्त और बेस्वाद हो जाता है
    गायक-वादक सब जानते हैं 
    लोगों को अब यह राग ज़्यादा रास नहीं आता
    कोई व्यर्थ के दुःख में नहीं पड़ना चाहता
    इन दिनों लोग अपने ही सुख से लदे हुए मिलते हैं

    फ़िर भी भूले-भटके सुनाई दे जाता है 
    रेडियो या किसी घिसे हुए रेकॉर्ड से फूटता शाम के रंग का मारवा 
    अमीर खां की आवाज़ में फैलता हुआ
    या पन्नालाल घोष की बांसुरी पर उड़ता हुआ
    आकार पाने के लिए तड़पता हुआ एक अमूर्तन
    एक अलौकिकता जो मामूली चीज़ों में निवास करना चाहती है 
    पीछे छूटे हुए लोगों का एक गीत
    जो हमेशा पीछे से आता सुनाई देता है 
    और जब कोई उसे सुनता न हो और कोई उसे 
    गाता-बजाता न हो तब भी वह गूंजता रहता है
    अपने ही धीमे प्रकाश में कांपता हुआ मारवा.

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