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सत्यनारायण पटेल हमारे समय के चर्चित कथाकार हैं जो गहरी नज़र से युगीन विडंबनाओं की पड़ताल करते हुए पाठक से समय में हस्तक्षेप करने की अपील करते हैं। प्रेमचंद-रेणु की परंपरा के सुयोग्य उत्तराधिकारी के रूप में वे ग्रामांचल के दुख-दर्द, सपनों और महत्वाकांक्षाओं के रग-रेशे को भलीभांति पहचानते हैं। भूमंडलीकरण की लहर पर सवार समय ने मूल्यों और प्राथमिकताओं में भरपूर परिवर्तन करते हुए व्यक्ति को जिस अनुपात में स्वार्थांध और असंवेदनशील बनाया है, उसी अनुपात में सत्यनारायण पटेल कथा-ज़मीन पर अधिक से अधिक जुझारु और संघर्षशील होते गए हैं। कहने को 'गांव भीतर गांव' उनका पहला उपन्यास है, लेकिन दलित महिला झब्बू के जरिए जिस गंभीरता और निरासक्त आवेग के साथ उन्होंने व्यक्ति और समाज के पतन और उत्थान की क्रमिक कथा कही है, वह एक साथ राजनीति और व्यवस्था के विघटनशील चरित्र को कठघरे में खींच लाते हैं। : रोहिणी अग्रवाल

26 जनवरी, 2016

कविता : राजेश सक्सेना

आज तीन कविताएं समूह के साथी की। कविताओं में ताजगी की लहर है। आप भी पढ़े और अपनी प्रतिक्रिया अवश्य दें।

इस तरह पता चला प्रेम का

पानी पर लिखा
मैंने तुम्हारा नाम
और वह लहर में बदल गया
रेत पर लिखा
मैंने तुम्हारा  नाम
और उसे लहर बहा ले गई
पत्ती पर लिखा मैंने
तुम्हारा नाम
और उसे हवा उड़ा ले गई
इस तरह पूरी दुनिया को
पता चल गया हमारे प्रेम का

बारिश में धरती

धरती का ताप बादलों का
विरह गीत गाता है
हवाओं के चप्पु आसमानी
जहाज का लंगर डाल देते हैं
समुद्र के अथाह नीलेपन पर
बारिश की आँखें
धो रही हैं धरती की
खुश्क और गरम त्वचा

रचा जा रहा है  रत्न गर्भा की कोख में रिश्तों के बीज
का जीवन रसायन

सौदामिनी की तिजारत
चल रही है बादलों में और
मिलनयामिनी अपने काले
घने केशव खोले प्रतीक्षारत है

रश्मिरथी विलुप्त हैं कहीं
और प्रभात की सिपियाँ
हरी दूब पर मुक्त कर रही हैं
अपनी देह से मोतियों का प्रसव

शब्द भी करते है इंतज़ार

शब्द भी करते हैं इंतजार
कि कोई उन्हे निकाले और
ले जाये उनके पास
जिन्हें उनकी प्रतीक्षा है

प्रेम में डूबी उस अधीर 
लड़की को देखो
जो आधी रात तक सबसे छुपाकर
सिरहाने रखे मोबाईल में
अपने प्रेमी के शब्दों का
बेताबी से कर रही है
इंतजार
और शब्द भी गोया उस तक
पहुँचकर ही लेते है विश्राम

नई कविता के लिये बेचैन कवि
छानते ही रहते हैं शब्दों को
अपने मन की गहराइयों से
और छिपकर शब्दकोश में
बैठे शब्द
अपनी बारी की प्रतीक्षा करते शब्द  फडाफडाकर दौड़ते हैं बाहर
शब्दों की यही दिलचस्प यात्रा
उनके भीतर अंकुरित करती है
रिश्तों के नए बीज
जहाँ से निर्मित होता है
एक   नया   प्रति  संसार

शब्दों के इंतजार में रुका है
हर कोई
हाँ या ना के इंतजार में रुके हैं
कई अदालती फैसले

कई अधूरी कविताएं
सिसक रही हैं
अपने हिस्से के शब्दों का
इंतजार करते हुए

शब्दों के इंतजार में रुका है
समय भी 
जहाँ से  शुरु होगी
शब्दों की नई अर्थवता

000 राजेश सक्सेना
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टिप्पणियाँ:-

उदय अनुज:-
सचमुच अच्छी कविताएँ।भावों की कोमलता और शिल्प की ताजगी से कविताएँ दिल को छूती हैं।

सुषमा अवधूत :-
बहुत सुंदर कविताए ,कितनी सहज अभिव्यक्ति ,दिल को छुने वाली साधुवाद

चंद्र शेखर बिरथरे :-
बहुत सुन्दर कविताएँ । नए बिम्ब और नए विधान , भाव कवि को बहुत बहुत बधाइयां । चंद्रशेखर बिरथरे

मिनाक्षी स्वामी:-
सभी कविताएं भावभीनी हैं। सुंदर बिम्बों के साथ ह्रदय में उतरती हैं। कवि को साधुवाद

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