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सत्यनारायण पटेल हमारे समय के चर्चित कथाकार हैं जो गहरी नज़र से युगीन विडंबनाओं की पड़ताल करते हुए पाठक से समय में हस्तक्षेप करने की अपील करते हैं। प्रेमचंद-रेणु की परंपरा के सुयोग्य उत्तराधिकारी के रूप में वे ग्रामांचल के दुख-दर्द, सपनों और महत्वाकांक्षाओं के रग-रेशे को भलीभांति पहचानते हैं। भूमंडलीकरण की लहर पर सवार समय ने मूल्यों और प्राथमिकताओं में भरपूर परिवर्तन करते हुए व्यक्ति को जिस अनुपात में स्वार्थांध और असंवेदनशील बनाया है, उसी अनुपात में सत्यनारायण पटेल कथा-ज़मीन पर अधिक से अधिक जुझारु और संघर्षशील होते गए हैं। कहने को 'गांव भीतर गांव' उनका पहला उपन्यास है, लेकिन दलित महिला झब्बू के जरिए जिस गंभीरता और निरासक्त आवेग के साथ उन्होंने व्यक्ति और समाज के पतन और उत्थान की क्रमिक कथा कही है, वह एक साथ राजनीति और व्यवस्था के विघटनशील चरित्र को कठघरे में खींच लाते हैं। : रोहिणी अग्रवाल

08 नवंबर, 2018


मैं क्यों लिखता हूं



लो आज गुल्लक तोड़ता हूँ

राकेश कुमार सिंह


एक प्रश्न जो प्रायः कलमदवातिया लोग से पूछा जाता रहा है, वह यह कि  ‘‘ आप लिखते क्यों हैं ? ’’ मुझसे भी ।
उत्तर लिखने से पूर्व एक आत्म स्वीकार …।

राकेश सिंह


आज मेरे पाठकों को यह सच विचित्र या अविश्वसनीय लग सकता है, पर यह सच है कि चौबीस वर्ष पूर्व जब मैंने अपनी पहली रचना तैयार की थी तो पांडुलिपि के माथे पर बाएँ कोने में लिखा था… ‘ कहानि ’ और याद आता है कि मैंने ‘ व्यंग्य ’ को ‘ व्यंग ’ लिखा था । ऎसा था मेरा हिन्दी ग्यान ।

वह तो आदरणीय अग्रज मिथिलेश्वर जी रहे, जिन्होंने मेरी हिन्दी को पाला, परवान चढ़ाया। शुद्ध हिन्दी को बरतना सिखाया। मेरी प्रारम्भिक दस कहानियों की हिन्दी सुधारी और जब मेरी पांडुलिपियों के लिए ‘ लाल कलम ’ का प्रयोग बंद कर मेरी पीठ थपथपायी तो इतराते बच्चे की भांति फूला न समाया था।

मैं लिखता क्यों हूँ ? अपने उपन्यास ‘ महअरण्य में गिद्ध’ की भूमिका में मैंने लिखा है ‘ इस प्रश्न का दो-चार वाक्यों में कोई सजता-सा उत्तर मैं कभी तैयार ही नहीं कर पाया। कई उत्तर मस्तिष्क में उभरने-उतराने लगते हैं । कई –कई वैकल्पिक उत्तरों में सर्वाधिक जरूरी उत्तर यही है कि मैं अपनी जन्मभूमि पलामू ( झारखंड ) के पठार को अधिकाधिक बार साहित्य में उपस्थित करना चाहता हूँ ।

न भुलाने योग्य चेहरे या कुछ स्मृतियाँ जो मेरे मन-मस्तिष्क में खोई गुफाओं के प्राचीन  भित्तिचित्रों की भाँति आज भी ताजा हैं, ‘ उन्हें अधिकाधिक लोग तक पहुँचाना-दिखाना चाहता हूँ ।’


कई-कई वैकल्पिक उत्तर में से सबसे जरूरी उत्तर यही है, पर अन्य वैकल्पिक उत्तर भी हैं । उपन्यास की भूमिका में स्थान की सीमा होती है अतः अन्य उत्तर तब स्थगित रहे । यहाँ उचित अवसर है जहाँ मैं उत्तर का अपना गुल्लक तोड़ सकता हूँ  और अपने लिखने के कारण को पूरेपन में व्यक्त कर सकता हूँ ।

स्कूल के हिन्दी पाठ्यक्रम का रट्टा लगाते हुए जिस एक हिन्दी कथाकार ने मुझे सर्वाधिक प्रभावित किया, वे रहे फणीश्वर नाथ रेणु । इन्हें मैंने रट्टा नहीं मारा। बार-बार पढ़ा। मुग्ध। ‘ रसप्रिया ’ का हीरामन, आसमान में चक्कर काटती चील की टिहकारी, टिं…ई… किर्रर्रर्र..। चाँदनी रात के आकाश में बावली टिटहरी की आर्त टेर, टिहिंक-टिहिं… टिहिंक ! उफ़, वह रेणु का जादू ! मैं कभी इस तिलिस्म से निकल ही नहीं पाया। लयाना हुआ तो मैला आँचल !’ मेरीगंज !

महाविद्यालय तक पहुँचते-पहुँचते मन में ललक या हुड़क अँकुराने लगी थी कि काश मैं भी अपने गाँव के बुचानी, तरेगनी, जोगिया, बूटन भुवनेश्वर गोसाईं, ददुआ प्रधान, भीम सिंह आदि-आदि लोगों को उतने ही राग ले अपनी कहानियों में चित्रित कर सकता जिस राग ले रेणु ने अपने चरित्रों को रचा ( लिखा नहीं ) है। अपने पलामू को भी रंग, गँध, रूप स्वाद के साथ साहित्य में टांक देता, पर तब न भाषा की तमीज थी, न क़िस्से रसाने का ढ़ब ! मेरे पास जिन्दा चरित्र थे, पर उन्हें कथा में ढालने की युक्ति नहीं थी । यह एक अबूझ पहेली थी तब, कि कहानी लेखक के मानस में आती कैसे है। कैसे लेती है कथा अपना रूपाकार !


मैंने वर्ष 1995 में लिखना शुरू किया । क्यों और कैसे , यह एक अलग क़िस्सा है । एक दिलचस्प क़िस्सा जिसे मैं ‘ निकट ’ (जुलाई-सितम्बर, 2013 ) के विशेषांक और ‘ नवनीत ’ ( अप्रैल, 2011) के अंक में लिख चुका हूँ ।

बहरहाल, लिखने लगा तो मैंने उपरोक्त जनों को अपनी कहानियों क्रमशः ‘ हाँका’ , ‘ मांत्रिक ’ ,  ‘ पालनहार ’ , ‘ वाह रे सिरजौाहार ! ’ ‘क़िस्सा निरबंसिया ताल’ , ‘ ओह पलामू ’ , ‘ संभवामि युगे युगे’ , शीर्षक कहानियों में चित्रित किया । सिर्फ़ लिखा या रच सका, यह मेरे पाठक जानें, पर जब लिकने की साथ जगी थी, तब मेरे लिए कहानी लिखना मात्र खयाली पुलाव पकाना था, जिसे वर्ष 1995 तक मन ही मन पकाता रहा था।

मैं स्वीकार करता हूँ कि मैंने अपनी शुरुआती पाँच –सात कहानियाँ रेणु जी जैसे कथा-वट की छाया में बैठ कर लिखी हैं। हर रचनाकार की प्रारम्भिक रचनाओं में उसके आदर्श परवर्ती रचनाकार की छाया अवश्य होती है। मेरी रचनाओं ‘ प्रेम न हाट बिकाय’ , ‘जीवाश्म’ , ‘मांत्रिक’ , ‘मदारी’, ‘ रैन भई चहुं देश’ , या पहले उपन्यास ‘ जहाँ खिले है रक्तपलाश’ पर रेणु जी की परछाइयाँ हैं.. मानता हूँ ।

जब अग्रज मिथिलेश्वरजी ने मेरी रचनाओं पर ‘ लाल कलम’ का प्रयोग करना बंद कर दिया, तभी यह सबक भी दिया कि अब मुझे रेणु जी की छाया से बाहर निकलना चाहिए, निकलना ही होगा । मुझे अपने कहने की अपनी भाषा-शैली विकसित करनी होगी। वरिष्ठ आलोचक आदरणीय प्रभाकर श्रोत्रिय जी ने भी सीख दी कि हर लेखक को, यदि साहित्य में लम्बा जीवन पाना हो तो उसे अपना निजी भाषा-विन्यास ( डिक्शन ) विकसित करना होता है।

 मैं लेखक चाहे जैसा भी होऊँ, पाठक अच्छा हूँ और विद्यार्थी बहुत अच्छा रहा हूँ। मैंने सीख-सबक की गाँठ बाँधी। कोशिश की। ख़ूब लिखा-फाड़ा। आखिरकार मेरी कोशिशें कामयाब हुई। ‘ त्रिपुर सुंदरी ’ और ‘सम्भवामि युगे युगे’ कहानियों और दूसरे उपन्यास ‘ पठार पर कोहरा’ तक पहुँच कर कामयाब हुईं। यह मैं नहीं कहता, अग्रज मिथिलेश्वर ने कहा, प्रभाकर श्रोत्रिय जी ने भी। मेरी रचनाओं के रसिक स्वर्गीय विजयदान देथा जी ने भी आश्वस्त किया कि मुझे मेरी अपनी भाषा मिल गयी थी और मुझे लगातार इसे माँझते रहना है, जबकि मुझे लगता है मेरी कोई निजी भाषा है ही नहीं । मेरी भाषा देश, काल और पात्र तय करते हैं। मैं कतई नहीं। उत्साह और ऊर्जा से भर गया था मन! मेरी कहानियाँ पढ़ी जाने लगी थीं। ‘ पठार पर कोहरा ’ के बाद मेरी छोटी-मोटी पहचान बनने लगी थी। मेरे पास अब आत्मविश्वास था। अपना मनचाहा लिखने की योजनाएँ थी कि तभी…!


वर्ष 2000 में कलकत्ते से उठा कथा-बवंडर दिल्ली तक फैल चुका था। साहित्य की इस नयी आँधी में सरोकार, परम्परा, सोद्देश्यता, प्रतिबद्धा, श्लील-अश्लील.. तमाम पहचानें धुँधलाने लगीं। उल्कापात की भाँति दहकती कहानियों की बारिश होने लगी। एक से एक चमकदार, परम्परा, जलती, दहकती, गोटे-फुँदने लगी कहानियाँ..।

मुझे चमक-दमक वाला शिल्प गढ़ना आता ही नहीं था। विदेशी लेखकों के उद्धारण टाँक-टाँक कर कहानियाँ तराशने की कीमियागरी के प्रति कोई रुचि नहीं थी। मुझे शब्दों की फुटबाल खेलना गँवारा नहीं था। मैं दिल से लिखता हूँ, दिमाग़ से नहीं । 

साहित्य के नये तूफान से निपटने की मुझे एक ही तरकीब सुझी। नाम-दाम-यश की दौड़ में, औरों की प्रतियोगिता में ओरों जैसा लिखने की बजाय अपनी जमीन को मज़बूती से पकड़ लेना, जकड़े रहना। मैंने अपने पंजे अपनी झारखंडी जमीन में गाड़ रखे।

अब, जब उल्कापात शान्त हो चुका है,  धूल-गर्द बैठ चुकी है, वातावरण थिरा चुका है, सही चीज़ें जगह पर निथरी-सुथरी-स्थापित दिखने लगी हैं, मुझे लगता है कि किसी लेखक का अपनी जमीन से जुड़े रहना ही उसके जिन्दा रहने की जमानत है। अपनी मिट्टी, अपना लोक ही लेखक की प्राथमिकता होनी चाहिए, प्रतिबद्धता भी। यदि लेखक अपने लेखकीय जीवन में अपनी जमीन को साहित्य में उपस्थित नहीं कर सका तो वह ऎसा अंधा मछेरा है, जो आजीवन उस ताल में जाल फेंकता रहा, जहाँ मछलियाँ तो क्या, पानी ही नहीं था। मुझे यह देखकर अच्छा लग रहा है कि कई युवा कथाकारों ने इस मर्म को समझ लिया है और ये वे लोग हैं, जो तूफानों की उपलब्धि हैं।



बहरहाल, ‘ मैं लिखता क्यों हूँ ’… के अन्य वैकल्पिक उत्तर ! मुख्यतः तीन हैं । पहला, परिप्रेक्ष्य को ( अपनी समझ से ) सही कोण से प्रस्तुत करने की सनक ! दूसरा, खोई हुई कड़ियों की तलाश का जुनून ! तीसरा, हिन्दी कहानी में वैविध्य की ज़रूरत के सदके कहानी के नये इलाकों में उतरने की कोशिश !

मैंने जब आदिवासी जनजीवन की कुछ ऎसी रचनाएँ पढ़ीं, जो ‘संताल आंदोलन’ की पृष्ठभूमि में लिखित थीं, मुझे ये रचनाएँ उन पवन के झकोरों जैसी लगीं, तो ‘ संताल क्रान्ति’ को बस स्पर्श करते गये थे। एक महान संघर्ष का कुछ पृष्ठों की कहानी में पर्यवसित होना मुझे सालने लगा, साथ ही एक उपन्यास के बीज भी दे गया। मैं इतिहास पढ़ने लगा। एक-डेढ़ वर्ष तक इतिहास में भटकता रहा।

मुझे अनुभव होने लगा कि ‘ संताल हुल’ वस्तुतः सन 1857 के स्वाधीनता आन्दोलन की भूमिका था। मैं एक उपन्यास की रूपरेखा बनाने लगा। इस पुस्तक को सम्पूर्णता ( परफेक्शन ) तक पहुँचाने की खब्त में मैंने कवयित्री निर्मला पुतुल और एक्टिविस्ट अशोक सिंह की नींदे हराम कर दीं । उन्हें गाहे-बगाहे परेशान किया। मैं कृतग्य हूँ कि उन्होंने मेरी झिड़कियों, तानों, उलहानों को भुला दिया। मुझे बहुत झेला। अंततः मेरा एक सपना पूरा हुआ.. ‘जो इतिहास में नहीं है।’ इस किताब ने हम तीनों के परिश्रम को जाया नहीं होने दिया। निर्मला और अशोक मुझे बधाई देनेवालों में पहले-दूसरे रहे। तीसरे थे भारतीय ग्यानपीठ के प्रबंध-न्यासी साहू अखिलेश जैन जी !
यह पुस्तक परिप्रेक्ष्य को सही कोण से प्रस्तुत करने की मेरी सनक का नतीजा है। कतिपय आलोचक मेरे सोच को मेरी ‘प्रिय कल्पना या आदर्श’ करार देते हैं, परन्तु मेरे लिए कार्ल मॉर्क्स का कथन और अपने झारखंड के प्रसिद्ध संताल विद्वान शिशिर टुडू के निष्कर्ष अधिक मायने रखते हैं, जिनके अनुसार सन 1855-56 की  ‘संताल क्रान्ति ’ अँग्रेज़ों को भारत से भगाने की प्रथम जन क्रान्ति थी और यही सन 1857 के स्वाधीनता संग्राम की पूर्व पीठिका थी।

कभी संयोग नहीं हुआ, मैं स्वर्गीय महाश्वेता देवी से मिल नहीं सका, पर मैं भी मानता हूँ कि उन्होंने साहित्य जगत में वह राह बनाई है, जो जंगल की ओर जाती है। आज यदि आदिवासी साहित्य स्वतंत्र रूप से पल्लवित-पुष्पित हो रहा है तो इसके पीछे महाश्वेता देवी के साहित्य की भी बड़ी भूमिका है।
अपने अगले उपन्यास का बीज भी मुझे महाश्वेता देवी के साहित्य ने ही दिया.. ‘ शालगिरह की पुकार पर ।’ मुझे इस पुस्तक में इतिहास की कुछ कड़ियाँ अनुपस्थित लगीं। मेरे पास प्रश्न थे। तिलका के नाम में माँझी का क्या अर्थ है ? ‘ संताल ’ या गाँव का मुखिया.. प्रधान ? तिलका मांझी ने अपनी लम्बी लड़ाई हेतु संसाधन कहाँ से जुटाए ? कौन लोग थे जो संघर्षरत तिलका के लिए रसद और हथियारों की अबाध आपूर्ति सुनिश्चित करते रहे ? इस महासमर में स्त्रियाँ कहाँ थीं और सर्वोपरि कौन थी रानी सर्वेश्वरी ?



मैंने तिलका मांझी की, उसके पूरेपन में तलाश शुरू की तो एक भ्रामक मुहावरे का सच सामने आया… ‘इंटरनेट पर हर जानकारी उपलब्ध है ।’ नहीं, मेरी समझ से यह मुहावरा एक अर्धसत्य है ।

इंटरनेट पर मुझे तीन वाक्य मिले.. ‘टिल्का मांझी वाज अ सांटाल रेबेलियोन । ही किल्ड आगस्टस क्वीवलैण्ड, द ब्रिटिश कलक्टर आॉफ़ भागालपोर । ही हैंग्ड ऎट भागालपोर आॉन जुलाई 1785 ।’ जबकि मेरे शोध के निष्कर्ष जुदा थे। वह यह कि तिलका माँझी संताल नहीं, पहाड़िया थे। वे विद्रोही नहीं वरन लक्ष्य हेतु समर्पित संघर्षरत योद्धा थे।

मेरी इस खोज-यात्रा में मुझे भागलपुर के लेखक-पत्रकार श्री राजेन्द्र सिंह का भरपूर संग-सहयोग मिला। इस बार मैंने दुमका के पत्रकार-लेखक और पहाड़िया मामलों के विशेषग्य जानकार पंडित अनूप कुमार वाजपेयी की नींद हराम की। एक वर्ष के शोध और दो वर्षों के लेखन के बाद उपन्यास ‘हुल पहाड़िया ’ सम्भव हुआ। भाई राजेन्द्र जी और बंधु अनूप ‘ हुल पहाड़िया’ से सन्तुष्ट हुए तो मैंने आश्वस्ति की साँस ली कि मेरा जुनून जाया नहीं गया था।

अब इंटरनेट पर भी ‘हुल पहाड़िया’ के हवाले से कुछ प्रविष्टियाँ देखी जा सकती हैं। अब मेरा यह विश्वास ख़ूब गाढ़ा हो चुका है कि लेखन हो तो सोद्देश्य हो अन्यथा न लिखना बेहतर ?

अपने उपन्यासों के सदके मोटे तौर पर मुझे आदिवासी लेखन से जोड़ दिया जाता है, जबकि मेरी कहानियों में आदिवासी की बहुलता नहीं है। सच यह है कि मेरे लेखक की गर्भ-नाल पलामू के वर्षावंचित पठार से जुड़ी है। मेरी प्रतिबद्धता झारखंड के हलवाहों, चजवाहों, सँपेरों, बहेलियों, माँझियों, बहुरूपियों, नटुओं और बेशक पड़ोस में बसे आदिवासी समाज से भी..गहरे तक जुड़ी है। इनके सुख, इनकी पीड़ा, मोद-रुदन, संघर्ष और अमर्ष ही मेरी रचनाशीलता के उत्स हैं। मैं यथार्थवादी रहा हूँ। मैं इतिहास, मिथक, संस्कृति, लोक, वर्तमान समाज आदि-आदि के ताने-बाने से अपनी रचनाएँ बुनता हूँ। कोरे काल्पनिक या अकादमिक लेखन में मेरी कतई रुचि नहीं है।


अब मेरे लिखने का तीसरा कारण ! हिन्दी कथा साहित्य में अनुपस्थिति को उपस्थित करने का प्रयास ! इसी कोशिश में उतरी हैं मेरी कुछ कहानियाँ । जहाजियों की कहानी (सीगल), विग्यान-कथा ( रक्तबीज ) अंतरिक्ष अभियान कथा ( आपरेशन हेली ), मुस्लिम साम्प्रदायिकता ( नया चेहरा )  रहस्य कथा ( रहस्य की एक रात ), अपराध कथा ( पाँच हज़ार का तोता ), फौजियों की मनस्थियाँ ( खत ) , खिलाड़ियों की विडम्बनाएँ ( मर्सी किलिंग ), मिथकीय चरित्रों का वर्तमान देशकाल में पुर्नसृजन ( एक और बेताल कथा ) आदि-आदि ! मैंने अपनी क्षमता भर कोशिश की है।
अच्छा या ख़राब.. मैंने जैसा भी लिखा, अपने पाठकों के हवाले कर दिया। मैंने कभी किसी आलोचक को विवश नहीं किया कि वह मुझे पढ़े। मैंने अपनी किताबें इस उद्देश्य से किसी पर नहीं थोपीं। हाँ, यदि सालिम अली जैसा कोई दृष्टिवान आलोचक जो नये-नये परिंदों की टोह में रहता है, एक सह्रदय पाठक जैसा मन रखता है, वक़्त काटने को ही सही; मेरी किताब उठाता-पढ़ लेता है, पुस्तक को लिखने योग्य समझता है, न भी लिख सका तो मात्र फ़ोन पर बातें कर लेता है तो मैं ऎसे आलोचक के सम्मान मेम अपना टोप उतार कर झुक सकता हूँ।

अपनी पुस्तक आलोचक के माथे मढ़ना और फिर फ़ोन कर-कर के उन्हें परेशान करते रहना मुझे गले पड़ने जैसा लगता है। दुःसाहस लगता है। अश्लील लगता है। यह काम मुझसे सम्भव नहीं।

मैं स्वीकार करता हूँ कि मेरी कहानियों का वर्तमान आलोचना ने अपेक्षित संग्यान नहीं लिया। शायद मेरी कहानियाँ ही इस योग्य नहीं रही होंगी, परन्तु मेरे उपन्यासों पर आदरणीय डॉ सुमन राजे, रोहिणी अग्रवाल जी, भाई दिनेश कुमार, अवनीश मिश्र, शम्भू गुप्त जी डॉ पुष्पपाल सिंह, कृपाशंकर, भारत भारद्वाज जी, शशिकला राय आदि-आदि ने दृष्टि डाली।
मैं आभारी हूँ।


.. तो ये थे वे कारण कि मैं क्यों लिखता हूँ या लिखता ही क्यों हूँ। कारण और भी हैं। अपनी भाषा-संस्कृति और लोक से मेरा लगाव, क़िस्से रसाने का व्यसन, क़िस्सा़गोई के सहारे पाठकीयता बढ़ाने और नये पाठक पाने की ललक..!
आखिर में यह कि ‘मेरी रचना प्रक्रिया’ या ‘मैं क्यों लिखता हूँ’ किस्म का लेखन या आत्म स्वीकार, चिरन्तन अधूरेपन हेतु अभिशप्त मामला है। ऎसे मामलों को उनके पूरेपन में अंतिम रूप से काग़ज़ पर दर्ज कर पाना लगभग असम्भव है। यह अमरलता की भाँति लगातार पसरते या लगातार फैलते ब्रह्माण्ड  की भाँति अनेक आयामों में निरन्तर विस्तारित होता रहता है। कोई रचनाकार दावा नहीं कर सकता कि वह उपरोक्त शीर्षकों के साथ फिलहाल जो कुछ लिख गया है, वह पूरा या अंतिम है। मैं भी नहीं। अस्तु , शेष फिर कभी कहीं ।
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राकेश कुमार सिंह
कंचन प्रभा
जयप्रकाश नगर ( कतीए )
आरा-802301
मोबाइल- 9431852844

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