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सत्यनारायण पटेल हमारे समय के चर्चित कथाकार हैं जो गहरी नज़र से युगीन विडंबनाओं की पड़ताल करते हुए पाठक से समय में हस्तक्षेप करने की अपील करते हैं। प्रेमचंद-रेणु की परंपरा के सुयोग्य उत्तराधिकारी के रूप में वे ग्रामांचल के दुख-दर्द, सपनों और महत्वाकांक्षाओं के रग-रेशे को भलीभांति पहचानते हैं। भूमंडलीकरण की लहर पर सवार समय ने मूल्यों और प्राथमिकताओं में भरपूर परिवर्तन करते हुए व्यक्ति को जिस अनुपात में स्वार्थांध और असंवेदनशील बनाया है, उसी अनुपात में सत्यनारायण पटेल कथा-ज़मीन पर अधिक से अधिक जुझारु और संघर्षशील होते गए हैं। कहने को 'गांव भीतर गांव' उनका पहला उपन्यास है, लेकिन दलित महिला झब्बू के जरिए जिस गंभीरता और निरासक्त आवेग के साथ उन्होंने व्यक्ति और समाज के पतन और उत्थान की क्रमिक कथा कही है, वह एक साथ राजनीति और व्यवस्था के विघटनशील चरित्र को कठघरे में खींच लाते हैं। : रोहिणी अग्रवाल

28 अप्रैल, 2019

जयराम जय के नवगीत


जयराम जय 


परिवर्तन चुपचाप हो गया
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कानो-कान खबर ना आई
ऐसा क्रिया-कलाप हो गया
अनायास ही मौसम बदला
परिवर्तन चुपचाप हो गया

केवल बातें रहे बनाते
समझ रहे थे मूर्ख सभी को
खुद को धुला दूध का बोलें
और बतायें धूर्त सभी को
जाति -धर्म का भेद बताना
ही जैसे अभिशाप हो गया

वादे किये,किये ना पूरे
रहे उडा़ते सिर्फ बबूले
प्रजातन्त्र को घायल करके
सारी मर्यादायें भूले
देख हाल ऐसा ईश्वर के
मन में भी संताप हो गया

उड़ते रहे हवा में हरदम
धरी रह गयीं मन की बातें
काम न आईं जो समझायीं
चालें,शकुनी वाली घाते
नाज़ायज,ज़ायज बतलाया
शायद यह भी पाप हो गया

बडे़-बडे़ सपने देखे थे
लेकिन पल में चूर हो गये
ऐसी चली विरोधी आँधी
जनमत से मज़बूर हो गये
जिसे इन्होंने व्यर्थ बताया
वो ही इनका बाप हो गया

कानो-कान खबर ना आई
ऐसा क्रिया-कलाप हो गया
अनायास ही मौसम बदला
परिवर्तन चुपचाप हो गया




 समझदारी चाहिये
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पादरी, मुल्ला
न पुजारी चाहिये
आदमी से आदमी की यारी चाहिये

शिकवा -शिकायत से
न बात बनेगी
मित्र भावनायें सिर्फ प्यारी चाहिये

एकता का सूत्र
क्यों काट रहे हो
दगाबाज़ दंगों की न आरी चाहिये

लड़ना- झगड़ना
न  कोई  धर्म  है
बिगडी़ बनाने की तैय्यारी चाहिये

नफरत की आग को
बुझाने के लिये
दिल वाली दमकल की गाडी़ चाहिये

सिरफिरे इशारों पर
क्यों लडें-भिडें
आपस में थोडी़ समझदारी चाहिये

कपट के काँटों की
उगायें न फसल
हँसती मुस्काती हुई क्यारी  चाहिये

तोड़ने - फोड़ने की
बात व्यर्थ है
देश में अखण्डता जयकारी चाहिये








परिवर्तन चुपचाप हो गया
--------------------------------
कानो-कान खबर ना आई
ऐसा क्रिया-कलाप हो गया
अनायास ही मौसम बदला
परिवर्तन चुपचाप हो गया

केवल बातें रहे बनाते
समझ रहे थे मूर्ख सभी को
खुद को धुला दूध का बोलें
और बतायें धूर्त सभी को
जाति -धर्म का भेद बताना
ही जैसे अभिशाप हो गया

वादे किये,किये ना पूरे
रहे उडा़ते सिर्फ बबूले
प्रजातन्त्र को घायल करके
सारी मर्यादायें भूले
देख हाल ऐसा ईश्वर के
मन में भी संताप हो गया

उड़ते रहे हवा में हरदम
धरी रह गयीं मन की बातें
काम न आईं जो समझायीं
चालें,शकुनी वाली घाते
नाज़ायज,ज़ायज बतलाया
शायद यह भी पाप हो गया

बडे़-बडे़ सपने देखे थे
लेकिन पल में चूर हो गये
ऐसी चली विरोधी आँधी
जनमत से मज़बूर हो गये
जिसे इन्होंने व्यर्थ बताया
वो ही इनका बाप हो गया

कानो-कान खबर ना आई
ऐसा क्रिया-कलाप हो गया
अनायास ही मौसम बदला
परिवर्तन चुपचाप हो गया





मंच पर छाने लगे
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मंच पर छाने
लगे हैं चुटकुले
कौन तोडे़गा ये पथरीले किले ??

हो गयीं
दुर्योधनी हैं कामनायें
अनवरत धृतराष्ट्र
जैसी भावनायें
जिनको अपना
साथ देना चाहिये था
वह चले हैं गैर का
परचम उठाये
सूर्य के वंशज भी तम से जा मिले

रख दिया गाण्डीव
अर्जुन ने किनारे
यह मेरा परिवार
इसको कौन मारे
द्रोण के संग भीष्म भी
बैठे सभा में
सर झुकाये और
हठकर मौन धारे
चल रहे फूहड़ यहाँ जो सिलसिले

शारदा सुत आज
अर्थार्थी हुये
छन्द पिंगल
तोड़कर भर्ती हुये
तालियों के मोंह में
निज कर्म तज
जोकरों के वे भी
अनुवर्ती हुये
काव्य के श्रोता को ये शिकवे-गिले

मंच पर छाने
लगे हैं चुटकुले
कौन तोडे़गा ये पथरीले किले ??








झाड़ रहे हैं पल्ला
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बेंच रहे वे सपने कब से
मचा-मचाकर हल्ला
देखो कैसा खेल चल रहा
उनका खुल्लम-खुल्ला

आसमान के चाँद सितारे
धरती पर लायेंगे
बिजली की परवाह नहीं
सूरज नया उगायेंगे
चाहे कोई इनको कहता
फिरता रहे निठल्ला

उत्तरदायी गर्म मुट्ठियाँ
हमको भरमाती हैं
सिर्फ हवा में बातें करती
मन को बहलातीं हैं
बात-बात पर चउवे-छक्के
घुमा रहे हैं बल्ला

भटक रही दर-दर बेकारी
माथे पर बल डाले
हाँक रहे बस लम्बी चौड़ी
वादे करने वाले
जुर्म गरीबी बेकारी से
झाड़ रहे हैं पल्ला

पर्णकुटी की छाँव छोड़कर
पडे़ कहाँ हो भाई
ये मृगतृष्णा सिर्फ छलावा
खडे़ जहाँ हो भाई
कठिन समझ पाना है इसको
ये चालाक मुहल्ला

गहरी होती जाती निश-दिन
माथे की रेखायें
अब तो टूट रहीं हैं सबके
धीरज की सीमायें
कब तक सहन करोगे लल्ला
उनके बने पुछल्ला

बेंच रहे वे सपने कब से
मचा-मचाकर हल्ला
देखो कैसा खेल चल रहा
उनका खुल्लम-खुल्ला







कैसे हों दुख कम ?
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बनी मदारी आज व्यवस्था
और जमूरे हम
 बताओ कैसे हों दुख कम
बताओ कैसे हों दुख कम

बहुत दिनों  से सुनते ऊबे
चिकनी चुपडी़ बातें
किन्तु अभी तक बीत न पाईं
दारुण दुख की रातें
बहरे शासन और प्रशासन
रहती आँखें नम

पशु आवारा छोड़ दिये हैं
चरने को खेती
गलती से यदि डाँटा -हाँका
तो गरदन रेती
मौन साधना में रत रहिये
चाहे निकले दम

बोल-बोलकर झूंठ आज ये
हमें कहाँ ले आये
इतना बोले झूंठ कि झूंठे
बैठे शीश झुकाये
बूँद-बूँद सब खून पी गये
जैसे ह्विस्की रम

अभी तलक जो भी कर डाला
है उसकी बलिहारी
इससे ज्यादा और करेंगे
उसकी है तैय्यारी
कथनी-करनी ऐसी
लज्जित सारे धरम-करम

पिटी डुगडुगी अच्छे दिन की
ताक धिना धिन-धिन
लिये लबेदी नचा रहे हैं
हमको रातो-दिन
हाय बुरी होती निरीह की
बन फूटेगी बम

बनी मदारीआज व्यवस्था
और जमूरे हम
बताओ कैसे हों दुख कम
बताओ कैसे हों दुख कम
   





सूरज है नाराज
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होकरके नाराज सूर्य है
निकला आँखें खोले
लगा दिखाने तेवर अपने
फेंक रहा है शोले

अधर सुबह से सूख रहे हैं
माँगे दिवस तरालट
खिल जाते मन घड़े सुराही
फ्रिज की पाकर आहट
बहुत बोलने वाले चुप-छुप
बैठे हैं बड़बोले

घबराये सब जीव-जन्तु अब
तो तपती लपटों से
लगे छिपाने अपने-अपने
शीश सभी दुपटों से
आगत विपदा की शंका में
रह-रहकर मन डोले

डगर पसीनें से तर होकर
ढूँढ़ रही है छाया
बंद खिड़कियाँ दरवाजे कर
'ए सी फैन'चलाया
चौकीदार बनी दोपहरी
कौन किसी से बोले

सूखे ताल-तलइय्या नदिया
हाँफ रहे हैं कूप
हाथ जोड़कर खडे़ हुये हैं
जल्दी जाये धूप
तपती भुलभुल से कितनों के
पैरों पड़े फफोले




             ◆
~जयराम जय
'पर्णिका' बी-11/1,कृष्ण विहार,आवास विकास
कल्याणपुर कानपुर-208017(उ.प्र.)
मो.नं. 9415429104; 09369848238
E-mail:jairamjay2011@gmail.com

2 टिप्‍पणियां:

  1. आपके इन नवगीतों में माधुर्य,उपालम्भ और सहज साहचर्य कूटकूट कर भरा है..इतने सुंदर लयबद्ध नवगीतों हेतु आपका अभिनंदन..।

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  2. आपकी कविता पढ़कर मन को शांति मिलती है मन हल्का होता है

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