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सत्यनारायण पटेल हमारे समय के चर्चित कथाकार हैं जो गहरी नज़र से युगीन विडंबनाओं की पड़ताल करते हुए पाठक से समय में हस्तक्षेप करने की अपील करते हैं। प्रेमचंद-रेणु की परंपरा के सुयोग्य उत्तराधिकारी के रूप में वे ग्रामांचल के दुख-दर्द, सपनों और महत्वाकांक्षाओं के रग-रेशे को भलीभांति पहचानते हैं। भूमंडलीकरण की लहर पर सवार समय ने मूल्यों और प्राथमिकताओं में भरपूर परिवर्तन करते हुए व्यक्ति को जिस अनुपात में स्वार्थांध और असंवेदनशील बनाया है, उसी अनुपात में सत्यनारायण पटेल कथा-ज़मीन पर अधिक से अधिक जुझारु और संघर्षशील होते गए हैं। कहने को 'गांव भीतर गांव' उनका पहला उपन्यास है, लेकिन दलित महिला झब्बू के जरिए जिस गंभीरता और निरासक्त आवेग के साथ उन्होंने व्यक्ति और समाज के पतन और उत्थान की क्रमिक कथा कही है, वह एक साथ राजनीति और व्यवस्था के विघटनशील चरित्र को कठघरे में खींच लाते हैं। : रोहिणी अग्रवाल

वैचारिक बहस

आज किसी वैचारिक मुद्दे पर बहस का दिन है .

एक समाचार के अनुसार ----
"राजस्थान सरकार ने राज्य शिक्षा बोर्ड के पाठ्यक्रम में कुछ बदलाव करने की ठानी है। वो ये कि पहले पाठ्यपुस्तकों में अकबर और महाराणा प्रताप दोनों को ही 'महान' की उपाधि दी जाती थी; लेकिन चूँकि दोनों एक दूसरे के प्रतिद्वंदी थे, सो दोनों में से कोई एक ही 'महान' हो सकता है, इसलिए आज के बाद महाराणा प्रताप को ही पाठ्यपुस्तकों में 'महान' बताया जायेगा।" (सौजन्य से: NDTV India) 

अपना राजनैतिक हित साधने के लिए शासकों को  धार्मिक /सांप्रदायिक आधार पर एक शत्रु की सतत आवश्यकता होती है जिसके आधार पर समाज को हिन्दू और गैर-हिन्दू खेमे में बांटा जा सके। राजस्थान सरकार के द्वारा  अकबर और महाराणा प्रताप दोनों को महान न मान कर सिर्फ महाराणा प्रताप को महान मानने का दुराग्रह इसी राजनीति की एक चिर परिचित साजिश है और इसे इसी परिप्रेक्ष्य में  समझा जाना चाहिए।साम्प्रदायिकता की जड़े आधुनिक राजनीती की उस मज़बूरी में है जिसमे जनता को लामबंद करने की जरुरत पड़ती है।क्या समाज मे फिरकापरस्ती इतने भीतर तक घुस चुकी है कि  भारतीय समाज एक सांप्रदायिक समाज में बदल चुका है ? आखिर साम्प्रदायिकता क्या है ? और सबसे महत्त्व की बात की इसे कैसे खत्म या कम किया जा सकता है ? क्या यह सिर्फ राजनीतिक मसला है या इसको जड़ें समाज में भी गहरें तक फैली हुई हैं ? आखिर क्या वजह है कि राजनीतिक दल इन मुद्दों पर चुनाव लड़ते हैं और जीतते भी हैं ? हमारी रोजमर्रा की सामान्य जिंदगी में साम्प्रदायिकता हम पर कहीं भी हावी होती दिखाई देती है  क्या ?

साथियों इन मुद्दों पर आपके विचार सुस्पष्ट तो हो पर किसी को आहत करनेवाले या कटुता फैलानेवाले न हों, किसी भी बात को वैयक्तिक न लें और बिना किसी सार्थकता के बहस को लम्बा खींचने की कोशिश भी न करें .यदि किसी सदस्य को किसी साथी से विशेष चर्चा करनी हों तो कृपया निजी तौर पर करें।

प्रस्तुति:-अलकनंदा साने
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चर्चा:-

प्रज्ञा :-
बर्ट्रेंड रसल की किताब याद आती है पेट्रियोटिस्म इन एजुकेशन। इतिहास सम्बन्धी पाठ्यक्रमों में सत्ता द्वारा प्रस्तावित बदलवों के सन्दर्भ में रसल ने अंधराष्ट्रवाद की चर्चा की है। ये कार्यवाही भी उसी तर्ज़ पर है अंतर इतना है रसल पडोसी देशों की लकीर को पाठ्यक्रम के आधार पर नीची किये जाने की बात करते हैं यहाँ अपने ही देश के निवासियों को धार्मिक पूर्वाग्रहों के चलते गैर माना जा रहा है। बात सिर्फ एक अकबर की क्यों कीजिये अगली कड़ी में इकबाल, मीर, ग़ालिब, चित्रकार हुसैन,कितने लेखक,पत्रकार,इतिहासकार,कलाकार सब खारिज किये जाएंगे तो इस देश की धरोहर और उसकी गरिमा क्या रह जायेगी?
और न जाने कितने इसी साम्प्रदायिकता के शिकार होंगे। शैक्षिक हलकों में पाठ्यक्रम में बदलाव का यह एकांगी नज़रिया पूर्वाग्रहों के बीज बोकर बचपन से ही फसल तैयार करता है। सामाजिक धार्मिक अनुकूलन जन्म से सीख देता है कि धर्म जाति लिंग भाषा आदि के आधार पर हमें किनका विरोध करना है। इसिलये धर्मनिरपेक्षता जैसे सिद्धांत सिर्फ पूजा अर्चना की छूट तक रह जाते हैं बाकी का हश्र हम सब जानते हैं।
ज़रूरी है इनके निहितार्थों को समझना और साम्प्रदायिकता के विरोध में अपना पक्ष रखना। उन राजनीतिक सामाजिक शक्तियों को बताना कि वो कल भी गलत थे आज भी हैं। हम कल भी उंसेवअलग थे उनसे आज भी हैं।

बी एस कानूनगो:-
किसी ऐतिहासिक चरित्रों की महानता की डिग्री कम ज्यादा करने से देश की बुनियादी समस्याओं को कम नहीं किया जा सकता।बल्कि आम लोगों का मूल मुद्दों से ध्यान बताने के लिए ऐसी बातों को सामने लाया जाता है।

प्रज्ञा :-
बात सिर्फ ऐतिहासिक चरित्रों की मान्यता की ही नहीं है मनमाफिक इतिहास की है। थ्री हंड्रेड रामायना के मुद्दे को लीजिये। ए के रामानुजन का शोध परम्परा का खण्डन लगे तो उसे बाहर कीजिये। ये कैसी इतिहास दृष्टि है।

बी एस कानूनगो:-
इतिहास को अपने रंग में रंग देने के प्रयास पर्याप्त गंभीर बहस का मुद्दा है।एक पूरी भविष्य की पीढ़ी को बचपन से मनमाफिक ढाल लेने की कूटनीति भी इसे कहा जाए तो गलत नहीं होगा।

सुरेन्द्र सिंह पूनिया:-
अब तक जो इतिहास पढाया जाता रहा है उसमें एक सोची समझी छद्म तुष्टीकरण की गंध आती है। वो इस कदर रूढ हो चुका है कि नयी या वास्तविक स्थिति से हमें अपच होने लगता है। धर्मनिरपेक्ष शब्द ने ऐसा भ्रम रचा है कि बडे बडे बुद्धिजीवी इसके चक्कर में पडे हैं।
मुख्य तथ्यों को तो हमसे छुपाकर ही रखा गया।
महाराणा प्रताप इस देश के बच्चे बच्चे के नायक हैं। मैं जमीन की बात कर रहा हूँ। आप बाहर निकलिये और विश्लेषण कीजिए, वास्तविक उत्तर तब मिलेगा।
हमारे देश में जैन-बौद्ध जैसे अनीश्वरवादी मतों को खूब प्रश्रय मिला। कभी किसी प्रकार के धार्मिक उन्माद से प्रेरित युद्ध किवदंतियों में भी नहीं सुने गए।
आस्था की इस धर्मभूमि पर और तो छोडिए 'चार्वाक' जैसे भोगवादी दर्शन का भी विरोध नहीं हुआ।
अभिव्यक्ति की जैसी पावन स्वतंत्रता के लिए भारतभूमि हमेशा उपजाऊ बनी रही।
आज हम अपना वास्तविक इतिहास पढना और जानना चाहते हैं तो इसमें किसी को पीडा क्यों?
क्या इतना भर काफी नहीं है कि अकबर विदेशी था, और उसके पिता ने यहां रक्तोत्पात मचाया था?
किसलय पांचोली:-
राजस्थान में 'महान' विशेषण को  पुनर परिभाषित करने का काम कोई नई बात नहीं है।  भिन्न भिन्न राजनैतिक विचारधाराओं की सरकारें बनने पर  हमेशा से ऐसा होता आया है।
सामान्य जन को इसे बहुत महत्व न देते हुए अपना ज्ञानार्जन बढ़ाते रहना चाहिए। और अपने स्वविवेक को सदैव जाग्रत रखना चाहिए।

आभा :-
मेरा मानना ऐसा है कि जब जब समाज  में असुरक्षा बढ़ती है चाहे वो आर्थिक हो  या किसी और तरह की तब तब इस तरह की समस्याएं पैदा होती हैं अगर भरपेट खाने और नौकरी का इंतेज़ाम हो तो कोई इस झगडे में नहीं पड़ेगा। जहां तक इतिहास की किताबें बदलने की बात है तो वो हमेशा से नेता करते रहे हैं और करते रहेंगे।

कविता वर्मा:-
हमारे देश में इतिहास हमेशा से सत्ता के हाथो गुलाम रहा है । वचाहे वह राजा महराजाओं के समय हो अंग्रेजों का राज चाहे लोकतंत्र ।धर्म के नाम पर लोगों को बॉंटना इनकी मजबूरी रही है या दुश्चेष्टा ।शिक्षा को हमेशा हथियार बनाया गया है ।सांप्रदायिकता के बीज कोमल दिमागों मे बोने की ये घिनौनी साजिश है जो हमेशा से होती आई है ।ये दुर्भाग्य है पाॅंच साल किसी राज्य में रहने पर उस राज्य का निवासी मान लिया जाता है पर हम अभी भी आक्रमणकारी बाहरी मानते रहे है । दो व्यक्ति एक दूसरे के विरोधी हो कर भी महान क्यों नहीं हो सकते ये समझ से परे है ।महानता का पैमाना उनके कार्य उनके विचार होने चाहिये । अफसोस होता है कि शिक्षा के लिये अब तक एक निरपेक्ष कमेटी नही बनाई जा सकी है ।ये सांप्रदायिकता हमारे समाज में दबे छुपे रूप मे अभी तक इसीलिये विद्यमान है ।

फरहात अली खान :-
दरअसल हमारे देश में कुछ सांप्रदायिक लोग राष्ट्रभक्ति का नक़ली चोला ओढ़ कर देश को नुक़सान पहुँचा रहे हैं। यही लोग हमारे देश की अखण्डता, एकता और सांप्रदायिक सौहार्द के लिए सबसे बड़ा ख़तरा हैं। ये 'अपने मुँह मियाँ मिट्ठू' होते हैं और समझते हैं कि देश के गौरवशाली इतिहास में केवल इन्हीं का योगदान है। हालाँकि सच तो ये है कि ऐसी सांप्रदायिक ताक़तों का मुल्क की आज़ादी में ज़रा भी योगदान नहीं रहा, बल्कि ये तो हमेशा समाज को तोड़ने में ही लगे रहे।
सोऽहं जी की अकबर और ख़ासतौर पर अल्लामा इक़बाल साहब के बारे में की गयी टिप्पणियाँ और उनसे सम्बंधित भाषा अमर्यादित, असभ्य और ग्रुप की गरिमाओं के ख़िलाफ़ हैं।
अल्लामा इक़बाल उर्दू के सबसे बेहतरीन शायर थे; वो इंकिलाबी शायर थे, उन्होंने हमेशा समाज को जगाने वाली शायरी की। किसी को भी ऐसी अज़ीम शख़्सियत को देशद्रोही कहने से पहले ख़ुद को सच्चा 'देशभक्त' साबित करना चाहिए। जब अल्लामा इक़बाल साहब का ज़िक्र आया है तो इनका बेदार कर देने वाला एक शेर भी यहाँ शामिल करना चाहूँगा:
"अपने मन में डूब कर पा जा सुराग़-ए-ज़िन्दगी...
तू अगर मेरा नहीं बनता, न बन, अपना तो बन..."
(सुराग़-ए-ज़िन्दगी - ज़िन्दगी का अर्थ)
यही सांप्रदायिक मानसिकता राजस्थान सरकार की भी नज़र आती है जब वो इतिहास में ऐसे दुस्साहसिक बदलाव करने का काम करती है।
'साम्प्रदायिकता' नामक वो बुराई जिसका मैं बार बार ज़िक्र कर रहा हूँ, का मतलब होता है- 'दूसरे धर्म के लोगों के ख़िलाफ़ ज़हर उगलना और उनके विरुद्ध किसी को उकसाना'
अपने धर्म के मानने वालों का हौसला बढ़ाना 'साम्प्रदायिकता' होती है क्या?
आपने अल्लामा इक़बाल साहब की जो रचना पोस्ट की है वो 'सारे जहाँ से अच्छा' नहीं है। पहले इक़बाल साहब ने 1904 के आसपास 'सारे जहाँ से अच्छा' लिखा जिसे 'तराना-ए-हिंदी'(Anthem of the people of hindustan) कहते हैं। फिर 1910 में उन्होंने 'तराना-ए-मिल्ली'(Anthem of the religious community) लिखा।
आपने जो पोस्ट किया है वो 'तराना-ए-मिल्ली' है जो उन्होंने मुसलमान क़ौम के बच्चों का हौसला बढ़ाने के लिए लिखा था।
लेकिन सोऽहं जी आपको इसकी किस पंक्ति पर ऐतराज़ है और क्यूँ है, ये बताइये। 
इसका पहला शेर सीधे सीधे 'वसुधैव कुटुम्बकम्' वाली बात कहता है और चूँकि 'तराना-ए-मिल्ली' ख़ासतौर पर मुसलामानों को संबोधित करते हुए लिखा है, सो ये बात उन्होंने मुसलामानों को बोली है। बाक़ी के सारे शेर लगभग 1400 साल पहले के मुसलमानों पर बीते हालातों पर आधारित है। अगर आप कहें तो एक एक शेर को मैं तफ़सील के साथ बयाँ कर सकता हूँ। इस पूरे तराने में किसी भी धर्म विशेष के बारे में ज़रा भी बुरा नहीं कहा गया तो फिर इस पर ऐतराज़ क्यों?  
अब रही बात इक़बाल साहब के पाकिस्तान समर्थित बयानों की तो यहाँ सबसे पहले मैं ये बताना चाहूँगा कि इनका जन्म 1877 को और इंतकाल 1938 को हुआ था। उनके जीवनकाल में हिंदुस्तान छोटी छोटी रियासतों में बँटा हुआ था और हर रियासत के लोगों के अपने अपने मफ़ाद हुआ करते थे। उस समय देशभक्ति की भावना का सीधा सीधा अर्थ अंग्रेज़ों से छुटकारा पाना था। उस समय क्रन्तिकारी, कांग्रेसियों को देशद्रोही बताते थे; कांग्रेसी, क्रांतिकारियों को सख़्त नापसंद करते थे। उस समय कोई सांप्रदायिक सौहार्द का माहौल हिंदुस्तान में नहीं था। ऐसे में इक़बाल साहब का ये कहना था कि जिस तरह इंडिया में बहुत से राज्य हैं वैसे ही मुसलमानों की अधिकता वाले राज्यों का एक स्वतंत्र फेडरेशन होना चाहिए। उस समय जब हिंदुस्तान में लोकतन्त्र नाम की कोई चीज़ न थी, ये मांग उतनी अस्वाभाविक नहीं थी जितनी कि आज प्रतीत होती है। हालाँकि उनके इंतेक़ाल के क़रीब दस साल बाद पाकिस्तान बनने से कुल मिलाकर किसी को नफ़ा नहीं है।

प्रज्ञा :-
सहमत। पहला शेर आपने बताया फरहत जी हिन्दू धर्म की मूल स्थापना पर आधारित है। और पहली ही पंक्ति में हिन्दुस्तान। शब्द।

फरहात अली खान :-
लेकिन इसके लिए उनको दोषी ठहराना क़तअन नाजायज़ होगा। ये आज़ादी के वक़्त के नेताओं की विफलता है।
ऐसा कोई आधार ही नहीं है जिससे कोई भी इन्हेँ देशद्रोही कह सके और जैसा कि मैंने पहले कहा कि ऐसा कहने से पहले उसे ख़ुद को देशभक्त साबित करना चाहिए। इतिहास को अधूरेपन और पूर्वाग्रह से पढ़ने के बजाये खुले दिल से पढ़ने की ज़रुरत है और सबसे ज़रूरी ये है कि इतिहास की अच्छी किताबें पढ़ी जाएँ, किसी विशेष संस्था द्वारा लिखी किताबें नहीं।  जी। प्रज्ञा जी। इस तराने को एक दबी-कुचली क़ौम को ऊपर उठाने के लिए किये गए एक प्रयास के तौर पर लिखा गया था। किसी दूसरे धर्म को बुरा भला कहने के लिए नहीं।

सुरेन्द्र सिंह पूनिया:-
प्रज्ञा जी हिन्दोस्तान शब्द का प्रयोग किस संदर्भ में हुआ है, यह भी मालूम किया आपने? खैर...
फरहत जी आवेश साक्ष्य नहीं होता। इस पूरे गीत में एक संप्रदायिक संबोधन है।
हमारा से तात्पर्य सभी धर्मों और संप्रदायों से नहीं बल्कि एक संप्रदाय विशेष से है। और यही क्या और जाने कितनी संप्रदायिक रचनाएँ भरी पडी हैं। भारत के चार टुकडों के पक्ष में थे इकबाल साहब...!!
भला हुआ समय रहते वो रहे नहीं वरना न मालूम हम किस टुकडे में पडे अपने भाग्य को रो रहे होते।
अकबर ने जो दो लाख निरीह हिंदुओं का कत्लेआम करवाया था उनका जीवन उस बादशाह की बपौती नहीं था।
बहरहाल वे कत्ल हुए लोग राजस्थान के थे। अब कोई इस तथ्य को भी अपने धर्मनिरपेक्षता के चोले में दबोच के बात करे तो क्या कहा जा सकता है?

प्रज्ञा :-
जी इसलिये मैंने ऊपर अपने वक्तव्य में यही लिखा था कि इन शक्तियों के अगले निशाने कौन होंगे। और फिर हमारी धरोहर का क्या होगा।

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