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सत्यनारायण पटेल हमारे समय के चर्चित कथाकार हैं जो गहरी नज़र से युगीन विडंबनाओं की पड़ताल करते हुए पाठक से समय में हस्तक्षेप करने की अपील करते हैं। प्रेमचंद-रेणु की परंपरा के सुयोग्य उत्तराधिकारी के रूप में वे ग्रामांचल के दुख-दर्द, सपनों और महत्वाकांक्षाओं के रग-रेशे को भलीभांति पहचानते हैं। भूमंडलीकरण की लहर पर सवार समय ने मूल्यों और प्राथमिकताओं में भरपूर परिवर्तन करते हुए व्यक्ति को जिस अनुपात में स्वार्थांध और असंवेदनशील बनाया है, उसी अनुपात में सत्यनारायण पटेल कथा-ज़मीन पर अधिक से अधिक जुझारु और संघर्षशील होते गए हैं। कहने को 'गांव भीतर गांव' उनका पहला उपन्यास है, लेकिन दलित महिला झब्बू के जरिए जिस गंभीरता और निरासक्त आवेग के साथ उन्होंने व्यक्ति और समाज के पतन और उत्थान की क्रमिक कथा कही है, वह एक साथ राजनीति और व्यवस्था के विघटनशील चरित्र को कठघरे में खींच लाते हैं। : रोहिणी अग्रवाल

चर्चा

हाल ही में जो घटना क्रम फिल्म अभिनेता सलमान खान से संबंधित हुआ, उस दौरान लगभग पूरा हफ्ता संचार के सारे साधन इसी एक घटना के इर्द गिर्द घूम रहे थे, यहाँ तक कि एक न्यूज चैनल तो कल रात भी वही सब फिर से दिखा रहा था. सलमान खान कितना लोकप्रिय हैं या उस प्रकरण की गंभीरता क्या थी इन सवालों में उलझे बिना इस एक उदाहरण से यह समझा जा सकता है कि कोई भी घटना हो उसका आघात चौबीसों घंटे हमारे आँख,कान और मस्तिष्क पर होता रहता है.चाहे वह प्रधानमंत्री की विदेश यात्रा हो, राहुल गांधी का अज्ञातवास हो, नेपाल का भूकम्प हो या छत्तीसगढ़ में नक्सली वारदात.हम बहुत पीछे न जाय, दस-पंद्रह साल पहले तक, दुनिया में कुछ भी घटित होता था टीवी के मात्र एक चैनल से या रेडियो के समाचार बुलेटिन से या अख़बार से पता पड़ता  था , इस मालूम पड़ने में एक निश्चित अंतराल रहता था,जिसकी वजह से हम लगातार मानसिक आघात झेलने को विवश नहीं होते थे. अब हम चौबीसों घंटे तकनीक की वजह से आक्रांत रहते हैं, न सिर्फ अच्छे-बुरे समाचार, बल्कि अनेक दूसरे विषय भी हम पर हावी रहते हैं.जैसे कल मातृ दिवस था तो सारे अख़बार,सारी सोशल साइट्स,सारे समूह इसी एक विषय में डूबे हुए थे और मातृत्व जैसा कोमल,तरल भाव देर रात तक एक तरह की चिढ में बदल गया था .

साथियों , आप इस बारे में क्या सोचते हैं ?
क्या आपको लगता है कि चाहे न्यूज चैनल हों,फेसबुक जैसी साइट हो, व्हाट्स एप जैसी सुविधा हो या ''बिजूका''जैसे तमाम समूह हों,  एक दूसरे से आगे निकलने की होड़ इसकी वजह है ?
क्या आप इससे सहमत हैं ?
और यदि आपकी भी राय यही है तो इसका उपाय क्या है ?

आज चर्चा का दिन है ....अपनी राय खुलकर दें और अनुरोध है कि इस बीच कुछ अन्य सामग्री साझा न करें

प्रस्तुति:- अलकनंदा साने
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चर्चा:-

प्रज्ञा:- सबसे पहले तो एक जायज़ मुद्दा उठाने के लिये बधाई आपको। लम्बे अर्से से यही गौर कर रही हूँ फेसबुक व्हाट्सअप जैसे अनेक माध्यमों ने पत्रकारिता का काम संभाल लिया है। संचार का विकल्प खड़ा कर दिया गया है मानो। हर पल घटित घटनाओं की सूचना देने से सूचनाओं के अम्बार से कोफ़्त होती है। हां उन सूचनाओं के विश्लेषण के लिये ये बेहतर मंच हैं। पर सूचनाएं एक कदम आगे बढ़कर अफवाहों का ज़रिया भी बन रही हैं। दिलीप साहब की मृत्यु की खबर कितनी बार झुठलाई गयी और भूकंप के दौरान भी।
सबसे पहले कौन बाज़ी मारेगा यही प्रमुख है। मुझे लगता है सूचना और ज्ञान के फर्क को लोग भूल गए हैं। सूचना के तन्त्र में ऐसे गिरफ्त हैं हम सब कि जो निगला उसे उलटने की होड़ है जबकि उसे पचाने और सत्व निकालने की परवाह न्यून हो चली है। दोषी हम सब हैं।
मेरा मानना है ये भी एक उपभोक्तावादी दौड़ है जल्दी इस्तेमाल और जल्द त्याग। इसमें ग्रहणशीलता के अंश की किसी को परवाह नहीं। ये पूँजी के तन्त्र का एक और जुगुप्सा भरा चेहरा है। ये हमें ठहरकर सोचने की बजाय दौड़ में शामिल होने को उकसाता है और हम भी 1 2 3 होने से पहले दौड़ने लगते हैं। सब निर्देशित और प्रायोजित सा है और हम उसका आसान शिकार। जवाबदेही वैयक्तिक है सामाजिक भी।

बी एस कानूनगो:-
अंततः व्यक्ति की समझ और विवेक सर्वोपरि होता है।हर दौर में नई आमद के साथ उसकी अति  होने लगती है जो धीरे धीरे उबाऊ होकर विरक्ति की ओर ले जाती है।
असली आनंद और संतोष प्रकृति और प्रकृति प्रदत्त क्रियाओं और अनुभूतोयों से ही मिलता है।यही स्थायी भी है।
8 दिन टीवी बंद रहा ।कुछ भी तो नहीं बदला बल्कि अनावश्यक भावनात्मक और वैचारिक खीज और चीड़ चिड़ाहट से राहत महसूस हुई। मगर लगातार 2 दिन पसन्दीदा समाचार पत्र की जैकेट पर पूरे पेज के अश्लील और तंत्र मन्त्र के विज्ञापनों से अखबार के लाभ कमाने के लिए हुए पतन से मन दुःख और क्लेश से भर गया।अब क्या करें।

बी एस कानूनगो:-
अन्य व्हाट्स एप समूहों में बस लोग बिना अपना दिमाग लगाए चित्र और मेसेज भेजने फारवर्ड करने में लगे रहते हैं।बहुत दुरूपयोग हो रहा है।यह संक्रमन काल है जल्दी ही कहीं जाकर संतुलित होगा। नादान और नव शौकिया अपना अधिकतम समय इस नए शगल पर जाया करते हैं।बहरहाल ।जैसा मैंने पूर्व में कहा विवेक और समझ ही इसका संतुलन करने में सफल होंगे।

मनीषाजैन:-
यह सच है कि यह समय बाजारवाद,  पूँजी सत्ता और मीडिया व एक दूसरे को पछाड़ने का है ऐसे कठिन समय में मीडिया की एक बड़ी जिम्मेवारी है जो वह नही निभा रही है। एक ही खबर को बार बार दिखा कर मीडिया हमें वही सोचने को मजबूर करती है । लेकिन यदि हम मानव अपने विवेक से सोचे कि हमे क्या देखना है क्या नही? हम अपने समय को व्यवस्थित भी कर सकते है। हमारी मर्जी हम देखे या नहीं। पश्चिम के देशो में बच्चों को टेलीविजन नहीं देखने दिया जाता उसके साथ साथ पैरेन्टस भी नही देखते। इसी तरह हमें अपने समय को मैनेज करना होगा। ये तो सही है कि चैनल एक दूसरे से आगे निकलने की होड़ में एक से एक खबर को रोचक सनसनी खेज बना कर दिखाते हैं। हम इस सोशल साइटस का सकारात्मक प्रयोग करे।

नंदकिशोर बर्वे :-
एक ज्वलंत सामयिक और चिढ़ से भरे विषय को चर्चा का विषय बना कर आपने एक अच्छा और साहस भरा काम किया है। चैनलों, फेस बुकों , और व्हाट्एपो्ं को - मेरी विनम्र राय में - अपनी निजी जिंदगी में कम से कम दखल देने की इजाज़त दी जानी चाहिए। इसमें अपने समूह जैसे समूहों को अपवाद मान लें तो अधिकांश सामग्री में आदमी एक्सचेंज हाउस की तरह काम करता है। जिसमें दिन का एक बड़ा हिस्सा गुजर जाता है। सीनियर तो फिर भी ठीक हैं लेकिन युवा पीढ़ी को इन्होंने बुरी तरह गिरफ्त में ले लिया है। जिसमें उनका बहुमूल्य समय जाया हो रहा है जो कभी भी वापस आने वाला नहीं है। यह हर घर की कहानी हो गई है। बच्चों को जरा सा टोक भर देने से वे बेतरह उग्र हो जाते हैं। सार संक्षेप में बस ये  कि- सोचता हूँ कि अंजाम ए सफर क्या होगा। लोग भी काँच के हैं राह भी पथरीली हैं।

नयना (आरती) :-
आज बहूत ही वैचारिक मुद्दा उठाया गया है समुह पर.। विगत कई वर्षो से ये  ज्वलंत समस्या का रुप ले रहा है। समाचार या मनोरंजन वाहिनियाँ अपना टी.आर.पी.बढाने के लिये तरह-तरह के नुस्खे अपना रहा हैं।
    समाचारो मे एक ही बात को बार-बार दोहराकर समस्या या मुल समाचार के प्रति गम्भीरता का ढोंग हमारे मानस पर अनैतिक अत्याचार की तरह है और ना चाहते हुए भी गलत दिशा मे सोचने पर मजबुर करता है। जब एक ही बात बार-बार दोहराई जाए तो वह सही लगने लगती हैं।  
      मुझे याद आते है  अपने बचपन के वे मेरे दिन जब रात को ८ बजे (और संभव हुआ तो सुबह भी) समाचार सुनना अनिवार्य था एक दैनिक कार्य की तरह। --- ये आकाशवाणी है अब आप-- देवकीनंदन पांडे या रामानुज प्रसाद सिंग से समाचार सुनिये के साथ ,स्पष्ट शुद्ध भाषा के साथ प्रवाहमय समाचारो का वाचन फिर अंत मे मुख्य समाचारो पर जोर होता था। वे हमे सामान्य ज्ञान के साथ-साथ सम-सामयिक विषयो पर सोचने एंव चर्चा करने पर मजबुर करते थे।
   लेकिन दृश्य-श्राव्य की इस विधा ने हम पर गहरा असर डाल दिया है।श्राव्य विधा सोचने को मजबुर करती थी,वही दृश्य विधा गहरे पैठकर कभी-कभी हमे असंतुलित भी कर देती हैं।श्राव्य विधा हम अपनी अन्य कामो की जिम्मेदारियों के साथ निभा ले जाते थे,लेकिन दृश्य विधा ने हमे एक स्थान पर चिपके रहने को मजबुर कर दिया है.
      आपने बिल्कुल सही बात उठाई मातृत्व कोई प्रदर्शन की  वस्तु नही ,यह एक एहसास है जो किसी एक दिन का मोहताज नही हैं फिर हम नई पिढी को क्यों ये परोसना चाहते है कि ये एक विशिष्ठ दिन किसी एक का है क्या सब दिन माँ के,पिता के,प्यार के नही हो सकते। जिनका सम्मान हम कर्म से करे प्रदर्शन से नहीं।
    कई वाहिनीयों पर आने वाले धारावाहिक भी रिश्तो की अहमियत को दरकिनार कर अपनी टी.आर.पी. के पिछे नई पिढी को रिश्तों की गंभिरता से वंचित कर रहे हैं। "तलाक" शब्द मुझे नही याद कभी मैने अपने बचपन मे सुना हो आज सरेआम इसका उपयोग भौंडे मजाक के साथ धारावाहिकों,फ़ेसबुक,व्हाट्सएप पर प्रचारित होता रहता हैं। जहाँ स्त्री की गरिमा के साथ-साथ रिश्तों का भी मजाक बनाया जाता हैं।
      तंत्र ज्ञान की प्रगति से कई मायनो मे हम समृद्ध भी हुए है.जैसे "गुगल-गुरु" एक संकेत शब्द से हमे कई जगह की सैर करा लाता है और ज्ञान के अथाह सागर मे हम डुबकी भी लगा आते है।
"बिजूका" के माध्यम से अपनी बात सबके सामने रख पाते है।
     अब वाकई संतुलन साधने की आवश्यकता आन पडी है मेरे हिसाब जवाबदेही वैयक्तिक  है।घर-घर से शुरुआत हो नई पिढी को इसके भला-बुरा सिखाने की.
विषय गंभिर हैं किंतु आज बस इतना ही अच्छे दिनों की आस के साथ

अलकनंदा साने:-
धन्यवाद प्रज्ञा जी , सुबह-सुबह आपकी प्रतिक्रिया पढ़कर अपने लिखे के प्रति एक अच्छा भाव मन में उपजा .लेकिन तुरंत ही अनुभव हुआ कि हम सभी एक ही नाव पर सवार हैं और लगभग असहाय हैं .

ब्रजेश जी, आपकी बात से सहमत हूँ कि अंततः व्यक्ति की समझ और विवेक सर्वोपरि होता है, लेकिन हम पर आघात तो हो ही रहा है और हमने जिनका  सुविधाओं के बतौर उपयोग शुरू किया था, वे हमारे दैनिक जीवन की नियामक बन गईं हैं.
  
मनीषा जी, यह एक सही कदम है कि हम इस सोशल साइटस का सकारात्मक प्रयोग करें, लेकिन दूसरे हमें क्या परोसेंगे इस पर हमारा जोर नहीं है.  हम कितना भी सोच-समझकर चलें,कहीं न कहीं निरुपाय और ठगा-सा महसूस करते हैं.

बर्वे जी, बिलकुल सही कि  लोग भी काँच के हैं राह भी पथरीली है और यही सबसे बड़ी चुनौती है .

नयना, नि:संदेह यह वैयक्तिक जिम्मेदारी है, फिर भी इससे बचना मुश्किल है. एक छोटा-सा उदाहरण देती हूँ . सन 2002 में जब यह प्रकरण सामने आया, मैंने अपने तईं यह प्रतिबन्ध लगाया कि मैं इस आरोपी की फ़िल्में नहीं देखूंगी, लेकिन मेरे लिए इससे बचना असंभव हो गया.यात्रा में, किसी के घर जाने पर,किसी मेहमान के घर आने पर अनेक बार मुझे इन तेरह साल में उसकी फ़िल्में, उसका चेहरा देखना पड़ा. हमारे परिवारों में, समाज में  कैसा माहौल होता है, सब जानते हैं.हम धार्मिक कारण आगे कर उपवास कर लें तब भी लोग उसे तुड़वाने पर जुटे रहते हैं और मेरा यह उपवास  तो अधिकांश लोगों ने सिरे से नकार दिया. 

पद्मा जी आभार, लेकिन आपके विचार पढ़ने को मिलते तो अच्छा लगता.

चर्चा अभी समाप्त नहीं हुई है, आज जारी रहेगी .....अभी भी जो साथी अपनी टिप्पणी देना चाहे, दे सकते हैं ...

नंदकिशोर बर्वे :-
आज के इस आपाधापी के युग में भी दूरदर्शन पर समाचार बुलेटिन सुनना अलग तरह का अनुभव है। आपको जानकर शायद आश्चर्य हो सकता है कि मैं आज भी यही बुलेटिन सुनता हूँ। इसके अलावा लोकसभा और राज्य सभा के चैनल।

फरहात अली खान :-
आज सभी ने इस गंभीर विषय पर अच्छी और गंभीर चर्चा की।

आगे निकलने की होड़ तो है ही; आख़िर कॉम्पिटिशन का ज़माना है, गलाकाट प्रतियोगिता चल रही है। सभी कुछ परोसा जा रहा है। अब ये हमारे ऊपर है कि हम क्या चीज़ पसंद करते हैं और क्या नहीं। मनीषा जी की बात से मैं सहमत हूँ कि हमें ही ख़ुद को मैनेज करके चलना है।
जिगर मुरादाबादी के बेहद क़रीबी दोस्त और मशहूर शायर असग़र गोंडवी साहब(1884-1936) के ज़माने में ये सब नहीं था लेकिन उनका कहा गया एक शेर आज भी कितना प्रासंगिक लगता है:

"चला जाता हूँ हँसता खेलता मौज-ए-हवादिस से...
अगर आसानियाँ हों ज़िन्दगी दुश्वार हो जाए..."
(मौज-ए-हवादिस = विपत्तियों का तूफ़ान)

यानी ज़िन्दगी में जितनी आसानियाँ बढ़ती जाएंगी, तो इसके साइड इफेक्ट्स भी हमें झेलने पड़ेंगे।
इसलिए ये हमारी ज़िम्मेदारी बनती है कि हम अपने बच्चों को उनके नैतिक कर्तव्यों से अवगत कराएँ; ताकि आगे चलकर जब वो इन प्लेटफॉर्म्स का इस्तेमाल करें तो लकीर के फ़क़ीर बनकर न रह जाएँ।
सही कहा गया है आज कि ज़िम्मेदारी समाज की तो है ही, लेकिन साथ ही साथ हमें खुद भी ज़िम्मेदार होना पड़ेगा।

नंदकिशोर बर्वे :-
चैनलों पर जो परिचर्चा होती है वह इस कांव कांव से बेहतर है। क्या देखें यह तो हमारे हाथ में है ही। क्या प्रसारित होगा यह हमारे हाथ में नहीं है। और अंततः बंद करने का विशेषाधिकार तो हमारे पास हमेशा है ही।

पदमा शर्मा :-
और बॉबी फिल्म । ये कहा गया कि ये हमारे लायक नही। पर आज तो उन फिल्मों से भी कहों आगे बढचढकर दृश्य दिखाए जा रहे हैं जो बच्चों के साथ बैठकर देखना पड़ता है। सबसे बड़ी बात ग्रहण करने की है। हमें स्वयं को मजबूत करना ही होगा। सब अपनी दूकान चलाने और अपना सामान बेचने की फ़िराक में हें। हम तय करें और ठोक बजाकर सामान लें।
मेरे विचार से सबसे अधिक ताकतवर हमारी ग्राह्य शक्ति होना चाहिए। सोशल साइट्स समाज में हो रही घटनाओं    को बिदृप्ता से प्रदर्शित करती हैं। यह भी सत्य है कि कोई भी दुर्घटना होती है तो सभी चैनल वही राग अलापने लग जाते हैं। प्रायः सभी धारावाहिक ऐसे चल रहे हैं जिनमे पारिवारिक रिश्तों में खटास  बड़े स्तर पर दिखाई जाती है। महिलाएं षड्यंत्र रचती दिखाई जाती हैं। कई धारावाहिक ऐसे भी हैं जिनमे वारदातें होती हैं। मुख्य रूप से अब ये हमारी जिम्मेदारी है कि उन बातों को हम किस तरह लेते हैं । उन्हें इस मायने में लिया जाए कि अपना बचाव किया जा सके। सोशल साइट्स ही क्या हमारे आसपास वही सब कई रूपों में विद्यमान है। इन्हें बंद करना या करवाना मुश्किल है। इन चीजों को एक सीख के रूप में ग्रहण किया जाए। हम पढ़ते थे उस समय सत्यम शिवम् सुन्दरम फिल्म  हमें देखने नही दी गयी थी

अलकनंदा साने:-
धन्यवाद पद्मा जी ..आपने बिलकुल सटीक वर्णन किया है ...हमारे समय में बंदिशें थीं और हम उनका पालन भी करते थे, दर असल सब कुछ सीमा में था ...आज हम इतना अंकुश रखने में असमर्थ हैं ...फिर भी कोशिश जारी रहें यह तो कर ही सकते हैं

इस महत्वपूर्ण विषय पर हमारी नियमित और युवा सदस्य  आभा,अर्चना,निधि ...आपकी भी राय अपेक्षित और जरुरी थी

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