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सत्यनारायण पटेल हमारे समय के चर्चित कथाकार हैं जो गहरी नज़र से युगीन विडंबनाओं की पड़ताल करते हुए पाठक से समय में हस्तक्षेप करने की अपील करते हैं। प्रेमचंद-रेणु की परंपरा के सुयोग्य उत्तराधिकारी के रूप में वे ग्रामांचल के दुख-दर्द, सपनों और महत्वाकांक्षाओं के रग-रेशे को भलीभांति पहचानते हैं। भूमंडलीकरण की लहर पर सवार समय ने मूल्यों और प्राथमिकताओं में भरपूर परिवर्तन करते हुए व्यक्ति को जिस अनुपात में स्वार्थांध और असंवेदनशील बनाया है, उसी अनुपात में सत्यनारायण पटेल कथा-ज़मीन पर अधिक से अधिक जुझारु और संघर्षशील होते गए हैं। कहने को 'गांव भीतर गांव' उनका पहला उपन्यास है, लेकिन दलित महिला झब्बू के जरिए जिस गंभीरता और निरासक्त आवेग के साथ उन्होंने व्यक्ति और समाज के पतन और उत्थान की क्रमिक कथा कही है, वह एक साथ राजनीति और व्यवस्था के विघटनशील चरित्र को कठघरे में खींच लाते हैं। : रोहिणी अग्रवाल

मनचन्दा पानी की कहानी 'प्रसाद को मना नहीं करते'


लंबी-लंबी कतारों में खड़े लोग आगे और पीछे वालों के धक्के झेल रहे थे, साथ ही अपनी भी जुबान खराब कर रहे थे। जो कतार में लगना अपनी इज़्ज़त के िखलाफ मानते थे तखत के पास भीड़ लगाकर अपने उतावलेपन को जाहिर कर रहे थे। हाथों को आगे बढ़ाने का जैसे मुकाबला हो रहा था। चढ़ा-चढ़ी ने माहौल कुछ और ही बना दिया था। सारे बखेड़े की जड़ थी पचास ग्राम आलू की तरकारी और दो पूड़ी। लोग इस कदर उमड़ रहे थे मानो उम्र भर के लिए राशन भत्ते का खाता खुल रहा हो!
''भाग जा साले...! तेरी...माँ...की...! बहन...चो...! सुबह से खा रहे हो, पेट है या कुछ और जो भरता ही नहीं है। थैलियाँ भरोगे, इकट्ठा करोगे। तसल्ली तो है ही नहीं! नंगे जो हो! साले कंगाल। ससुरे भुखमरे कहीं के।’‘ बाँटने वाला बड़बड़ा रहा था।
जमनादास किसी काम से चला जा रहा था तभी उसे सड़क पर यह ड्रामा दिखाई पड़ा। जमनादास अट्ठाइस साल का लंबा तगड़ा आदमी है, अच्छा खाने-पीने का शौकीन है और पहनने- ओढऩे का भी। भंडारे देखकर उसे मुँह में पानी तो क्या थूक तक नहीं आता। वह बासी भंडारा या प्रसाद नहीं खाता। उसे बाकी किसी ने पूजा आदि करते भी नहीं देखा-सुना अक्सर कहा करता था, ''भगवान अगर कहीं हैं तो वह ज़रूर जानता होगा किसकी क्या ज़रूरत है, कौन क्या चाहता है? और अगर भगवान है ही नहीं तो धूप सुलगाने का क्या मतलब?’‘
जमनादास अपनी जिम्मेदारियाँ निभाने में किसी से उन्नीस नहीं था पर किसी की चापलूसी करना भी उसके बस का नहीं था। चाहे सामने वाला भगवान हो या शैतान।
''भाई साहब प्रसाद ले लो।’‘ पेड़ की छाँव में खड़े जमनादास को दोनों तरफ से घेरते हुए दो लौंडों ने नम्रता से कहा।
''मैं भंडारे का नहीं खाता।’‘ जमनादास ने लड़कों की तरफ देखे बिना ही कह दिया।
''प्रसाद को मना नहीं करते भाई साहब।’‘
''पता है, पता है! यह बात जाकर उसको बताओ जो बाँट रहा है, वह...जो प्रसाद को मना कर रहा है। वह...जो गाली बक रहा है।’‘
''भगवान का भंडारा है भाई साहब। यहाँ बाँटने वाला कोई नहीं है। सब खाने वाले हैं! आप नहीं लोगे तो प्रसाद का अपमान होगा।’‘ एक जो देखने में ही होशियार लग रहा था, बोला।
जमनादास तजुर्बेकार आदमी है, जानता था इस तरह खुशामद करने की वजह। मंदिर के पंडों को अगले भंडारे के नाम पर हज़ार-दो-हज़ार पक्के होने की उम्मीद थी। इसलिए उनके भेजे दो लौंडे चाटुकारी में जुटे थे। वरना इन्हें क्या पड़ी किसी को बुलाकर या मनाकर प्रसाद खिलाने की। जो पहले से हाथ पसारे खड़े हैं उन्हें ही दे दो। वहाँ खड़े लोगों को तो घुड़का रहे हैं और यहाँ देखो इनको...!
बचपन का एक भंडारा जिसके बाद जमनादास ने भंडारा नहीं खाया, उसका दृश्य उसे याद आने लगा।
दस-बारह साल का दुबला-साँवला जमना मंदिरों की दहलीजों पर ही पलता चला आ रहा था। माँ-बाप बहन-भाई कहाँ चले गए वे ही जानें। जो मिला खा लिया, जहाँ मिला सो गया। नखरे करने के विकल्पों का होना ज़रूरी है, जो थे नहीं।
हनुमान जयंती की सुबह थी, मंगलवार का दिन था और यही बात जमना को खटक रही थी। आज या तो भंडारा छोडऩा पड़ेगा या भंडारे की तरकारी पूड़ी। रह-रहकर जामुन के दिमाग में यही बात आ रही थी। भगवान के दरवाज़े पर खड़ा अनाथ अपने अधिकार को पूरी तरह नहीं पा सकेगा।
कुछ मंदिरों के आसपास सुबह से ही तैयारियाँ होने लगीं थीं। गर्मी से पसीजे हलवाई चेलों पर गालियाँ झाड़ रहे थे। कोई आलू छील रहा था कोई आटा गूँथ रहा था। किसी का काम पूडिय़ाँ बेलने का था तो किसी का सूजी-चीनी तौलने का। चलते फिरते लोग सब कामों का पूरा ध्यान रख रहे थे। आिखर खाना तो इन्हीं को था। हलवाइयों के पास से आती क्षुधावर्धक सुगंध चारों ओर फैलकर लोगों को मोह रही थी, उनकी अधीरता बढ़ा रही थी। हलवे का ढक्कन हिला तो मुँह में पानी उतर आया। पूडिय़ाँ छन-छन कर तैयार होने लगीं। लाल-लाल, नरम-नरम, फूली-फूली पूडिय़ाँ लोगों को वहीं मँडराने पर मजबूर करने लगीं। तखत के पास की भीड़ बढऩे लगी। कड़ाही में से निकली पुडिय़ाँ टोकरी में इक_ïी होने लगीं। मँडराने वालों को इतनी संतुष्टी तो मिली कि उन्हें जायकेदार तरकारी पूड़ी मिलेंगी और कम भी नहीं।
जामुन और उसके जैसे कुछ और बच्चों ने सड़क से थैलियाँ उठाकर झाड़-पोंछकर रख ली। मौका लगे तो थैलियों से अच्छा फायदा होता है। भीड़ भी अब तक काफी बढ़ चुकी थी। ज़्यादातर सामान तखत पर लाया जा चुका था। हलवाई ने शुरू की घानी की पूडिय़ाँ तसल्ली से बनाई थी। भीड़ का विभाग पिनक रहा था। हलवे का सुनहरा रंग और घी की खुशबू बदहवासी को बढ़ावा दे रही थी।
पहला पत्ता मिला। सब्र का बाँध टूट गया। चढ़ाचढ़ी शुरू हुई। एक दूसरे को रौंदकर भी अगर पत्ता मिलता तो लेने वालों को कोई गम नहीं था। जामुन इसी भीड़ में हाथ ऊपर की तरफ उठाए भिंच रहा था। हड्डïल सा जामुन हाथ के ऊपर तक जाने न जाने के बारे में संदेह में था।
''अंकल मुझे...।’‘ ''भाई साहब...।’‘ पंडित जी...! हैलो...! यार...! सभी आवाज़ें मिलकर काफी शोर मचा रही थी। जामुन भी कुछ फुसफुसा रहा था। उसकी आवाज उसे खुद नहीं सुनाई पड़ रही थी।
एक कलसंड़ा पंडा जो भूखे-नंगे बच्चों को ज़्यादातर मंदिर के आसपास तक से खदेड़ता था, बाँटने पर खड़ा था। पंडा कंजरों को मंदिर के आस-पास भटकने तक नहीं देता था। वह समझता था कि कंजर मंदिर की शान को कम करते हैं। जामुन उसे अच्छी तरह जानता था। जानता क्या था, चिढ़ता था उससे।
किसी के पत्ते की गर्म तरकारी जामुन की नंगी कमर के बीचों-बीच गिरकर ऊपर से नीचे की तरफ एक लंबी लकीर बनाती हुई बह गई। तरकारी गर्म थी। चमड़ी जल गई। चेहरा रुआँसा हो गया, आँखें पनीयाला...तो भी उसने भीड़ से बाहर निकलकर तरकारी नहीं पोंछी। एक हाथ से जितना हो सका साफ किया और दूसरा हाथ ऊपर उठाए रखा। भीड़ में बहुत हाथ ऊपर उठे थे लेकिन तरकारी की जलन केवल जामुन की कमर पर ही थी। रोने का मन हुआ। मगर रोया नहीं। जानता जो था, बाकी के लोग उसे बच्चा कहकर भगा देंगे।
जामुन को भंडारे और प्रसाद लेने का काफी अनुभव था। आिखर इन्हीं पर तो पला बड़ा हुआ है। गालियाँ खाने की आदत थी, थोड़ी-बहुत मार भी। एक बार तो उसने चार-पाँच पत्ते जमा कर लिए थे। चलने ही वाला था कि एक अदना सा लड़का एक पूड़ी उठाकर भाग गया। जामुन उसके पीछे भागा तो उसने पूड़ी मुँह से काटकर जूठी कर दी। जामुन उसे सबक सिखाने ही वाला था कि लड़के ने पीछे देखने का इशारा किया। पीछे देखा तो बाकी पत्ते गायब थे। उनका स्वाद दूर खड़े जामुन के ही सहभागी ले रहे थे और उस पर हँस रहे थे। उस दिन के बाद किसी ने उसकी एकाध पूड़ी उठाई भी तो उसने देखा तक नहीं।
जामुन इतना छोटा था कि देने वाले को उसका पता तक नहीं था। जहाँ लंबे-चौड़े, हट्टïे-कट्टïे लोग उचक-उछल रहे थे, वहाँ उसका क्या पता चलता? काफी देर तक किचने-पिसने के बाद जब कमर की तरकारी भी लोगों की रगड़ लग-लग कर साफ हो गई, उसे लगा वह गलत जगह खड़ा है। शायद वह बाँटने वाले से ज़्यादा दूर है।
''जब हाथ ही नहीं पहुँचेगा तो कोई देगा कैसे! क्यों ना एक बार बाहर निकलकर देख लूँ...। जल्दी कहाँ से मिलेगा।’‘ सोचता हुआ वह कतार से बाहर निकल आया।
भंडारा काफी बड़ा था। लोग उमड़े पड़े थे। जिन्हें मिल गया था दूर खड़े खा रहे थे, उनकी मेहनत है। जामुन को उम्मीद हो गई आज खूब मिलेगा, इतना कि वह जमा भी कर सकेगा। नैके में दबी थैली को हाथ से तह कर उसे मुस्कुराहट महसूस हुई। मन और तीव्रता से ललचाने लगा। जमीन पर गिरे एक पत्ते में देखा हलवे में किशमिश और काजू भी थे। ''किशमिश वाला हलवा आिखरी बार कब मिला था?’‘ जामुन याद ही कर रहा था कि उसकी नंगी कमर पर एक पतली-सी छड़ सख्ती से पड़ी गई।
''भूतनी के, लाईन में लग! यहाँ कुछ नहीं मिलेगा। साले बार-बार आते हैं। कितना खाएँगे? पेट ही नहीं भरता कंजरों का।’‘ पंडों का एक चेला जो नया-नया पंडायी सीखने आया था, चिल्ला रहा था।
अब भीड़ बढ़ गई थी। कतार बनानी ज़रूरी थी। तभी लोगों को सँभाला जा सकता था। हलवाइयों पर दबाव ना बने इसलिए उन्होंने भी नए और ठलुए चेले लोगों को भगाने पर लगा दिए थे। कलसंडे की जुबान भी अब गंदी होती जा रही थी। दो चेले और सहायता के लिए लगा लिए। कभी आगे वाले लोगों पर खीजता और कभी पीछे से लाकर देने वाले लौंडों पर गुस्सा हुआ जाता था।
तरकारी की जलन अभी तक मिटी नहीं थी और अब फिर एक पतली सी सिसकी लहर गई। चेहरा तमतमा उठा, रोए कौन? वैसे भी उसे इस तरह की मार खाने की आदत थी।
लंबी-लंबी दो कतारें बन चुकी थीं। रिक्शेवाले तो इतने थे जैसे बुलावा दिया गया हो। और साईकिल वाले...आधे भुखमरों की साइकिलों पर खाने के डिब्बे बंधे थे फिर भी...। स्कूटर-कार वाले...बड़े लोग बड़े बहाने, ''एक बार तो प्रसाद ज़रूर लेना चाहिए।... प्रसाद को मना नहीं करते।’‘
जामुन जाकर एक कतार में खड़ा हो गया। कुछ ही देर में इस बात से परेशान होने लगा कि कोई आगे क्यों नहीं सरकता। कोई-कोई तो उसके आगे ही घुस जाता, सो पीछे हटना पड़ता। दो बार पीछे वाले की बीड़ी ने जलाया। बच्चा था, क्या करता?ï
कतार में लगे-लगे उसका खूब भंडारा खाने और जमा करने का सपना फीका पड़ गया। अब नहीं लगता था भरपेट भी मिलेगा। एक पत्ता लेने के लिए यदि इतनी लंबी कतार में चलना पड़ा तो वह दो-तीन बार ही लेगा या कहीं और जाकर देखेगा। ''आज तो खूब सारे भंडारे बैठेंगे। कहीं तो पेट भर मिलेगा! और थैली भर भी...’‘ जामुन सोच रहा था। थैली की परवाह उसे अपने से ज़्यादा भले ना हो कम भी नहीं थी। ''हो सकता है दूसरी जगह इससे भी ज़्यादा अच्छा हलवा हो, काजू किशमिश ज़्यादा हों।’‘ सोचते हुए जामुन की राल बढऩे लगी। सबसे अच्छा हलवा कब और कहाँ मिला था?’‘ याद ही कर रहा था कि गाल पर एक सख्त थप्पड़ पड़ा। एक बड़े से लड़के ने कतार से खींचकर बाहर खड़ा कर दिया।
''कितनी बार लेगा? सालेे...इकट्ठा करेगा। तेरी माँ की...।’‘ ऐसा ही भंडारा कतार में लगे कई बच्चों को मिला। सब खड़े होकर उनका मुँह ताक रहे थे जो तरकारी-पूड़ी या हलवा पूरा स्वाद लेकर खा रहे थे।
जामुन फिर से कतार की तरफ बढ़ा तो दूसरा चेला चिल्लाया—
''भाग जा साले। इस बार आया तो गर्म हलवा तेरे सर पर डाल दूँगा। फिर पता चलेगा भंडारा कैसा लगता है।’‘
''मेरी पीठ पर पहले से ही तरकारी गिर चुकी है! मुझे पता है भंडारा कैसा लगता है।’‘ जामुन ने सोचा, कहा नहीं।
दूर खड़ा होकर सारा नज़ारा देखने लगा। कोई-कोई तो पत्ता लेकर खाते-खाते ही कतार में लग जाता और अगला पत्ता मिलने तक इत्मीनान से खाता। ऐसा करने से या तो उसका कतार में लगने का समय बच जाता या अलग खड़ा होकर खाने का।
जामुन का समय तो सारा लगा, मिला कुछ भी नहीं। मानो उसके हिस्से का पत्ता भी कोई रिक्शे-साइकिल वाला चाट गया। जामुन का ध्यान तखत के पीछे गया। कुछ लोग बाल्टियों और डोलचियों में तरकारी-हलवा भर रहे थे और थैलियों में पूड़ी। धड़ी-धड़ी भर हलवा लेकर बेहिचक बड़ी शान से जा रहे थे। जामुन के लिए यह कोई नई चीज़ नहीं थी। वह जानता था, इसीलिए भंडारा करवा रहे हैं। इन्हें नहीं मिला तो कैसे चलेगा? अन्नदाता को ही अन्न ना मिले, इतना कलयुग अभी आया कहाँ?
''मंदिरों के धोरे रहकर भी जामुन कुछ ढकोसलों को नहीं समझ पाता था। सेठ लोग भंडारे के बहाने सड़क पर हलवा पूरी बनाकर खाते खुद ही हैं, ज़्यादा बने तो दोस्तों और रिश्तेदारों को बुला लेते हैं। वो नहीं आते तो उनके घर भिजवा देते हैं। सब कुछ खुद ही निपटाना है तो दूसरे लोगों को क्यों दिक्ï करते हैं? सारा नाटक अपने घर जाकर क्यों नहीं करते? शायद इसलिए कि धर्मात्मा दिखना चाहते हैं।
इसी तरह एक और बात जामुन की समझ में नहीं आ पाती थी!... कुछ लोग हनुमान को बाबा कहते हैं और कुछ लल्ला (बच्चा)। जामुन अक्सर हनुमान की उम्र का अंदाज़ा लगाता रहता था और सोचता वह खुद हनुमान को क्या कहेगा, ''वह हनुमान को वही कहेगा जो बाकी सबको कहता है। अंकल; और क्या?’‘
धूप बढऩे लगी थी और भूख भी। दूसरे मंदिरों पर जो प्रसाद आसानी से मिल जाता था उसे छोड़कर प्रसादी-पूड़ी और हलवे की होंस में यहाँ आने का पछतावा उसे होने लगा था। गुलदाना कितना भी कम मिलता पेट तो भर ही जाता। थैली का देखा जाता, भरती या नहीं। गुल्दाना बुरा नहीं होता, तरकारी पूड़ी से तो अच्छा ही होता है। बस तरकारी पूड़ी हर मंगल को नहीं मिलती। और इसी लालच में आज जामुन भूखा मर रहा था।
जामुन को लगा अब कतार कुछ छोटी है। कुछ लोग छक कर चले गए। रिक्शे कम नज़र आए। साईकिलें भी घटी हुई सी दिखाई दीं। ''क्यों ना एक बार फिर से कोशिश की जाए। कतार बिना भंडार और कहीं भी नहीं मिलेगा।’‘ सोचते हुए जामुन की लालसा बढऩे लगी। तरकारी-पूड़ी का स्वाद पानी बनकर उसके मुँह में बहने लगा। तरकारी के बड़े-बड़े फूटे हुए आलू और गाढ़ी तरी उसको अपने गालों के बीच महसूस होने लगी। उसे लगा कि किसी गर्म आलू ने उसके मुँह का ऊपरी भाग जला दिया।
जामुन लपका और एक कतार के पीछे जाकर खड़ा हो गया। कतार आगे बढ़े या ना बढ़े पीछे तो बढ़ती है। जामुन अगर और थोड़ी देर करता तो काफी पीछे लगना पड़ता। उसके पीछे एक रिक्शे वाला शराब पीकर खड़ा था। धुत्त इतना कि जामुन उसके खड़े रहने पर अचंभित था। उसे अब तक कई बार गिर जाना चाहिए था। जामुन ने सोचा कि पीछे जाकर लग जाए। मगर कतार आगे से ज़्यादा पीछे थी। डरता-डरता, सरकता-सरकता तखत तक पहुँच ही गया। उसके एक हाथ में तरकारी पूड़ी का पत्ता रख दिया गया और दूसरे में हलवे का। वह आज से पहले कभी भी भंडारा लेकर इतना खुश नहीं हुआ था।
अपनी छोटी सी सफलता की बड़ी खुशी मन में भरे हुए जामुन मुड़ा ही था कि पीछे वाले नसैड़ी का गर्म हलवे का पत्ता पलटकर उसके दाएँ कंधे पर आ गिरा। हलवे में घी काफी था। चमड़ी जल गई, सारा शरीर सिहर उठा। आँखों में लाली के साथ पानी ऊभर आया। शरीर तनकर धनुषाकार हो गया। हलकी-हलकी आवाज़ों के साथ तेज़-तेज़ साँसें चलने लगीं।
गर्म हलवा चमड़ी को जलाता जा रहा था और वह पत्ते रखने की जगह तलाश रहा था। कोशिश थी इतनी मशक्कत के बाद मिले पत्तों को संभाला जाए। लेकिन पत्ते हाथों से अपने आप ही गिर गए। बायाँ हाथ बिना पूछे ही कंधे के हलवे को साफ कर गया। जितनी जगह पर हलवा गिरा था उतनी ही खाल भी साथ ही साफ हो गई। हल्के लाल रंग का घाव देखकर आँखों का आकार और कंधे की जलन दोनों बढ़ गई। शांत खड़ा जामुन भीतर ही भीतर बिलबिला रहा था। मन तो हुआ मारे जलन के चीख पड़े। मगर ऐसा करता तो भंडारे वाले उसे भगा देते। एकाध छड़ और ऊपर से पड़ती। वैसे भी वह जानता था चीखने-चिल्लाने से दर्द पर कोई फर्क नहीं पड़ता और कम तो बिलकुल नहीं होता।
वह लंबी-लंबी साँस छोड़ता हुआ कतार से दूर जाकर बैठ गया। बड़े-बड़े खयाल उसके अंतस में उभरने लगेे।
''लोग जिसे भगवान कहते हैं, वह भी उन्हीं की सुनता है जो उसका भंडारा करते हैं, प्रसाद चढ़ाते हैं। खा भले ही खुद जाते हों। हम भूखे-नंगे पैदा हुए, भूखे-नंगे जिएँगे और मरेंगे भी भूखे-नंगे ही।’‘
''अगर मुझे एक पत्ता भंडारे का मिल जाता तो क्या बिगड़ता उस भगवान का?’‘
''वो पत्ता जो मेरे हाथ में आ चुका था, वो पत्ता जो फिर से फेंकना पड़ा, वो पत्ता जो अब धूल में मिला पड़ा है क्या मुझे नहीं मिल सकता था? क्या मैं उसे नहीं खा सकता था? क्या भगवान यही चाहता था? क्या उससे किसी की भूख मिटी?’‘
''भगवान अगर ऐसा ही करता है तो नहीं चाहिए उसका सहारा। नहीं चाहिए उसका भरोसा, उसका प्रसाद-भंडारा। खाया करे भगवान और बाँटने वाले खुद इस प्रसाद को, भंडारे को। प्रसाद को देखूँगा तक नहीं, भंडारा भी नहीं, मंदिरों के सामने खड़ा तक नहीं होऊँगा।’‘ सोचता हुआ जामुन तेज़ी से चल पड़ा। उसके कंधे की जलन अब भी वैसी ही थी।
कुछ दूर गया तो लगा वह हारकर भाग रहा है, पिटकर जा रहा है, कायर बनकर। भगवान का विरोध करने चला और इंसानों से ही हार गया। मेरे जैसे कितने ही तो हैं। कई-कई पत्ते इसी भंडारे से खा चुके हैं। जमा भी किया है। मैं क्या उतना भी नहीं। ''आज खाकर ही जाऊँगा। मगर कभी दुबारा...।’‘ उसने ठाना।
लपककर कतार के बीच में जा लगा। ज़रा सी देर में तखत तक पहुँच गया। अगला पत्ता उसी को मिलना था। बाँटने वालों ने चमचे भगोने में डाले और भगोने तखत से नीचे उतार दिए।
''चलो भागो! भंडारा खत्म। जाओ भागो सब।’‘ कई पंडों ने एक साथ मिलकर कहा। हताश जामुन वहीं खड़ा सिर खुजा रहा था। एक छड़ फिर से कमर पर पड़ी। ''भूतनी के, सारा भंडारा सपडऩे के बाद भी तेरा पेट खाली है, साले कितना खाता है? है तो तू ज़रा सा। चल भाग यहाँ से।’‘
उस दिन का गया जामुन आज जमनादास बना खड़ा है। यहाँ तक आने के लिए उसने वह हर काम किया जो उसे सही लगा। समाज और धर्म क्या कहता है, क्या चाहता है कभी सोचा नहीं, सुना नहीं। ''किसी काम से यदि कोई गरीब परेशान ना हो तो वह काम जायज है।’‘ अक्सर अपने मन में कहता। सही-गलत, झूठ-सच, चोरी, इमानदारी उसे नहीं पता। उसने सारा ड्रामा याद कर लिया और दोनों लौंडे अब भी गीड़-गीड़ कर रहे थे। जाने क्या सोचकर जमनादास उनके साथ चल दिया। भंडारे की भीड़ से पहले ही उसके हाथ में खुशबूदार हलवे का पत्ता आ गया। सुनहरा हलवा जमना को घिनौना लगा, खुशबू भी बदबू-सी। हलवे से ध्यान हटाकर उसने कतार में खड़े एक अधनंगे बालक को पुकारा और पत्ता थमा दिया। एक बाँटने वाले ने रोकना चाहा तो जवाब मिला—
''प्रसाद को मना नहीं करते! आपका ही एक आदमी कह रहा था।’‘
''आदमी तो काम का है सीधा भी है। इससे तो कमाया जा सकता है। जो इससे भी नहीं कमाया तो मैं पंडित नहीं ढेड़ रहा।’‘ एक पंडा जो बच्चों को भगा रहा था सोचने लगा।
''सेठ जी आप लाइन से दूर ही रहते तो अच्छा रहता। प्रसाद तो मैं आपके लिए ला ही दूँगा। यहाँ आपके कपड़े गंदे हो जाएँगे। इन बागडिय़ों को तो देख ही रहे हो आप। आप कहो तो कुरसी गिरवा दूँ।’‘ पंडा नकली हँसी हँसता हुआ जमना के पास आ गया।
''प्रसाद आप दोगे तो ले आइए। चार-छ: पत्ते लेते आना।’‘ जमना बोला। पंडे के इशारे भर से पाँच-सात पत्ते आ गए। जमना एक-एक करके सारे पत्ते उन बच्चों को थमा दिया जो जमना को अपने बचपन के हाल में खड़े दिखाई दिए। उसकी नज़र उनके कंधों और कमर पर भी गई, कहीं उनके ऊपर भी...।
आठ-दस पत्ते और आए, जमना ने फिर बाँट दिए। फिर आए, फिर बाँटने लगा।
''आदमी पागल तो नहीं है?’‘
''कम भी तो नहीं लगता।’‘
''मगर अब क्या किया जा सकता है?’‘
''देख नहीं रहे हो जब यह बाँटने का इतना शौकीन है तो कुछ देगा भी?’‘
''देना तो चाहिए भर्ई।’‘
''और तगड़ा ही देना चाहिए। आदमी तो आसामी लग रहा है। इसे मना मत करो, बाँटने दो। और अगली बार के भंडारे के नाम पर कुछ देने के लिए राजी करो। भंडारे का सारा पैसा तो ये लगाएगा और औरों से जो आएगा वो हमारा।’‘
''आप सही कह रहे हो स्वामी जी, बाँटने दो।’‘ पंडे आपस में बात कर रहे थे फिर भी औपचारिकता के लिए एक गया।
''आपको पता नहीं है सेठजी! ये साले खाते नहीं है, इकट्ठा करते हैं, घर भरते हैं, देखो कई के साथी वहाँ पिन्नी लिए खड़े हैं।’‘
''मुझे पता है।’‘ व्यस्त जमना ने लापरवाही से कहा।
पंडा फिर से पत्ते लाया, जमना ने फिर बाँट दिए। पंडा फिर लाया, फिर बाँट दिाए। फिर लाया, फिर लाया, लाता ही रहा। जमना ने फिर बाँटे, फिर बाँटे, बाँटता ही रहा।
दोपहरी सर से उतर गई। कोई पंडा पछता रहा था, कोई उम्मीद लगाए था कि आज तो अच्छा मिलेगा।
''आज भले फँसे।’‘
''भले नहीं, बढिय़ा फँसे! देखते रहो, कुछ तो देगा ही।’‘
बच्चे बेहिचक थैलियाँ भर रहे थे। जमना के चेहरे पर गहरी हँसी फैलती जा रही थी। हर पत्ते को देकर एक नया आनंद महसूस कर रहा था।
''मुर्गा तो तगड़ा है।’‘
''देखते रहो मुर्गा है या बकरा, अभी तो सब जा ही रहा है।’‘
''सेठ जी प्रसाद खतम हो गया।’‘ एक पंडे ने दबी आवाज़ में कहा।’‘
जो कतारों को बाँट रहे थे उन्होंने भी चिल्लाकर ऐसी ही घोषणा कर दी। भीड़ हलकी होने लगी। जमना जानता था भंडारा कब खत्म होता है। भगोने भर तरकारी और हलवा बाँटने वाले अपने दोस्तों और रिश्तेदारों के लिए बचाते हैं और चिल्ला देते हैं भंडारा खत्म। मगर आप अच्छा कमाने के लालच में पड़े, अपने लिए बचाना भूल गए!
सारे पंडों ने एक बात की कि सेठ ने अब तक कुछ नहीं खाया था सो एक पंडे ने एक पत्ता बचाकर रख लिया था। इस पत्ते से काफी उम्मीद थी।
''बहुत बड़े दानी हैं सेठजी आप। सारी दोपहरी सर के ऊपर से उतर गई, आप हिले तक नहीं।’‘
''हर प्यारे बालक को प्रसाद दिया आपने।’‘ एक पंडा बोला।
''हमारा तो भंडारा ही बालकों के लिए होता है।’‘ दूसरा पंडा बोला।
''हमारा क्या सेठ जी, सब आप जैसे  भले लोगों का भंडारा है।’‘ तीसरा पंडा बोला।
''हमारे पास तो अपने लायक कपड़े भी नहीं रहते?’‘ स्वामी भी आकर बोला।
''चंदे के पैसों से अपना पेट पालते हैं।’‘ चेला जो अभी नया था, बोला।
''हम भंडारा क्या करेंगे सेठ जी।’‘ वो दो लौंडे जो जमना को बुला कर लाए थे, बोले।
''अगला भंडारा गंगा-दशहरे का है।’‘ स्वामी बोला।
''आपसे कुछ उम्मीद करें सेठ जी?’‘ ही...ही करता हुआ पहला पंडा फिर बोला।
''यह भी कोई पूछने की बात है?’‘ स्वामी पहले को डाँटते हुए बोला।
''ऐसे क्या सेठ जी...।’‘ एक और पंडा जो अब तक चुप था, अब बोला।
थोड़ा और नकली हँसता हुआ स्वामी बोला—
''अरे, सेठजी मैं आपको प्रसाद देना तो भूल ही गया। यह लो। आपके लिए एक दोना उठाकर रख लिया था। आपने तो खाया ही नहीं था। किसी ने सच ही कहा है कि आदमी दूर से ही पहचाने जाते हैं। मैं तो पहले ही समझ गया था कि आप अपने मुँह का निवाला भी औरों को देने वालों में से हो।’‘ स्वामी कहता जा रहा था। जमना को पंडे की बातें सुनाई नहीं दे रही थी। वह तो उस समय भी किसी ऐसे बच्चे की तलाश कर रहा था जिसको आिखरी पत्ता दिया जा सके। मगर सारे बच्चे या तो किसी और भंडारे की तलाश में चले गए थे या जमा किए भंडारे को ठिकाने लगाने लगे थे।
तरकारी और हलवे से जमना के सारे कपड़े सन चुके थे, हुलिया बदल चुका था फिर भी उसे अपने इस हाल पर गर्व हो रहा था। फिर से बचपन के दिन याद आने लगे। जब एक पत्ता भंडारे का खाने के लिए सारी दोपहरी धूप में खड़ा रहना पड़ता था और आज वही एक पत्ता भंडारे का ना खाने के लिए सारी दोपहरी शायद धूप में खड़ा रहना पड़े। अब उसे वो दिन भी याद आ रहे थे जब दो-दाने गुलदाने के लिए घंटों खड़े रहते थे। उसके बचपन के साथी जो एक-दूसरे की चीज़ चुराकर खा जाते थे, मु_ïी भर प्रसाद के लिए भीड़ में मिचना-पिसना रोज़ का काम था। वो जमाना आज प्यारा लग रहा था। इच्छा हुई कि आज भी किसी मंदिर के बाहर खड़े नंगे बच्चों में घुसकर प्रसाद के लिए हाथ फैलाए मगर...।
''मैं ई भंडारा लुई?’‘ एक पाँच-छ: साल की बच्ची की आवाज़ ने जमना का ध्यान खींचा। जमना ने ज़मीन की तरफ देखा। एक अपाहिज बच्ची जिसके दोनों पैर इस तरह से मरे हुए थे कि वह बैठकर ही चल सकती थी, धूल में बैठी थी। काली-कमज़ोर लड़की फटी फराक पहने ऐसे विश्वास से भंडारा माँग रही थी जैसे कि भंडारा उसका अधिकार हो। पंडे ने बच्ची को भगाना चाहा तो उसने ऐसे निर्भीक होकर चिढ़ाया जैसे वह किसी अपने के साथ हो जो उसकी हिमायत में आ जाएगा। जमना ने पंडे के हाथ से पत्ता लेकर बच्ची के हाथ पर रख दिया। पंडों को लगा, किसी ने उनका गला घोंट दिया।
''सेठ जी यह तो हमने आपके लिए...।’‘
''मैंने पहले ही कहा था, मैं प्रसाद नहीं खाता। तुम्हारे लड़कों ने कहा, 'प्रसाद को मना नहीं करते।Ó इसीलिए चला आया। अब चलता हूँ।’‘
सारे पंडों की साँस अटक गई। सारे चिल्लाए, ''सेठ जी अगली बार के लिए कुछ तो देते जाइए।’‘
''मैं भंडारे-भगवान को नहीं मानता।’‘
सारे पंडे चुपचाप खड़े पछताने लगे। मलाल तो इस बात का था कि इस पागल के चक्कर में आकर उन्होंने अपने लिए भी कुछ नहीं बचाया था। उनकी समझ में नहीं आ रहा था, वे लुट गए या ठग लिए गए।
धूप में बैठी बच्ची ने जब सुना दा ने अब तक भंडारा नहीं खाया तो दा का कुर्ता उसने पकड़ लिया।
''दा में छात खाओ, इछे खाओ।’‘ जिस पूड़ी के दो कौर बच्ची खा चुकी थी। उसे आगे बढ़ाते हुए बोली।
''तुम खाओ बेटी, तुम्हें भूख लगी है।’‘ जमना ने कुर्ता छुड़ाने की कोशिश करते कहा।
''पलछात को मना नई तलते दा।’‘ कुर्ते को कसकर पकड़ती हुई वह बोली।
जमना से जवाब नहीं बना। उसने जान लिया उसकी कसम आज उसे नहीं रोक सकती। बच्ची के सामने धूल में बैठकर उसकी जूठी पूड़ी को खाने लगा। जो थोड़े बहुत उसके कपड़े साफ बचे थे अब धूलमय हो गए। बच्ची धीरे से सरकी और जमना की गोद में बैठ गई।
पंडे अपना-अपना सिर खुजाते हुए जाने लगे। उनका दिमाग इतना खराब था कि आपस में भी बात नहीं कर रहे थे।
''ऐसा सिरफिरा फिर नहीं मिलेगा, देख लो इस पागल को।’‘ एक बड़बड़ा रहा था।

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