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सत्यनारायण पटेल हमारे समय के चर्चित कथाकार हैं जो गहरी नज़र से युगीन विडंबनाओं की पड़ताल करते हुए पाठक से समय में हस्तक्षेप करने की अपील करते हैं। प्रेमचंद-रेणु की परंपरा के सुयोग्य उत्तराधिकारी के रूप में वे ग्रामांचल के दुख-दर्द, सपनों और महत्वाकांक्षाओं के रग-रेशे को भलीभांति पहचानते हैं। भूमंडलीकरण की लहर पर सवार समय ने मूल्यों और प्राथमिकताओं में भरपूर परिवर्तन करते हुए व्यक्ति को जिस अनुपात में स्वार्थांध और असंवेदनशील बनाया है, उसी अनुपात में सत्यनारायण पटेल कथा-ज़मीन पर अधिक से अधिक जुझारु और संघर्षशील होते गए हैं। कहने को 'गांव भीतर गांव' उनका पहला उपन्यास है, लेकिन दलित महिला झब्बू के जरिए जिस गंभीरता और निरासक्त आवेग के साथ उन्होंने व्यक्ति और समाज के पतन और उत्थान की क्रमिक कथा कही है, वह एक साथ राजनीति और व्यवस्था के विघटनशील चरित्र को कठघरे में खींच लाते हैं। : रोहिणी अग्रवाल

रति सक्सेना की कविताएँ

"देहांतर "
 
सात मंजिल ऊपरी जमीन पर तलवे टिकाते ही
मैं उस ठंडक को उतार कर रख देती हूँ
जो गोबर से लिपे आँगन से
मेरे साथ साथ चली आई है
और स्वेटर की तरह, खिड़कियों, अलमारियों
और दीवारों से घिरे उस कमरे को पहन लेती हूँ
धीरे धीरे आसपास मेरी देह पर बेल की तरह चढ़ जाता है

एक घर से निकल कर दूसरे तक जाते हुए
पिछले घर के कुछ रेशे मेरी देह पर रह जाते हैं

मेरे दूसरे घर की दीवारें, धूप से बनी हैं
अँधेरे के साथ खो जाती हैं
इस घर को पहनना मेरे लिए
नींद सा सपनदार होता है
मैं सपने से हकीकत की और चलता शुरु करती हूँ

इस अंतिम घर में मेरा इंतजार करता है
एक तकिया, बिस्तरे का एक हिस्सा
और दक्षिण की ओर खुलने वाली खिड़की
दक्षिण मृत्यु का घर है
मैं इसे अपनी देह बना कर अपने तकिए पर ले जाती हूँ

अब दक्षिण दिशा को अपनाने के लिए
पूरी तरह से तैयार हूँ

"किसी किताब को पढ़ने से पहले "

पास आने से पहले किताबें
परख लेती हैं
उन हाथों को, जो
उन्हें थाम सकें

उन्हें पसंद नहीं है
बगल में दबाया जाना, या फिर
लंबे से झोले के एक कोने में
पटके जाना

वे परख लेती हैं
याददाश्त को
कानों का मरोड़ा जाना
उन्हें पसंद नहीं

वे तो ये भी नहीं
चाहतीं कि
उनके भीतर कुछ रखा जाये
फूल या फिर
कोई खत,
हालाँकि रख दिया जाए
तो वे पढ़ लेती हैं
चुपके से
और तब अब सरका देती हैं

किताबों को पढ़ने से पहले
उनकी खुशबू को पीना होता है
अपने मन को बरगद बनाना होता है
और फिर थोड़ा बहुत बतियाना होता है
इतनी आसानी से नहीं खोलती
किताबें अपने आप को

सिरहाने रख कर सोना, किताबों
को हरगिज पसंद नहीं
सपने उन्हें पसंद हैं
लेकिन सपनों को
बस वे खुद चुनना चाहती हैं

किताबों को पढ़ने के लिए
इंतजार करना होता है
एक बीज के खुल जाने का
जो किताब हाथ आते ही
हमारे भीतर बोया जाता है

"मिर्च का शहद "
इस वक्त
मैं बरसात में भीगती हुई
मिर्ची चुन रही हूँ, नन्ही लेकिन तड़ाकेदार मिर्च
मधुमक्खी की आँख की तरह सुर्ख
शहद की तरह चटाखे दार

शहद और उस लाल मिर्च में
बस अंतर इतना ही है कि
शहद जीभ पर आते ही घुल जाता है
फिर नसों में आराम से पसर कर सो जाता है
मधुमेह की शक्ल में

लेकिन मिर्च जीभ पर रखते ही
बारूद सी धमक जाती है
फिर नसों से होती हुई
सीधे दिल में पहुँच
आदर्श गृहिणी सी
झाड़ू पटकन में लग जाती है

मैंने चुनी हुई नन्ही मिर्चों को
खाने की मेज के बिल्कुल बीचोंबीच रख दिया
अब मैं ऐसे विशेषज्ञ की तलाश में हूँ,
जो मेरी मिरच को शहद सा मीठा बताए

 

"पालतू समय" 

आज मैं, आराम से उठी
चाय के कप को अनदेखा कर
सीधे सीधे लिथूनिया के अनजाने
कवि को पढ़ने लगी
उसकी कविताओं का मुँह बरनी सा खुल गया
मेरे शब्द उसमें भरने लगे,

आज मैंने सिंक में पड़े बर्तनों की परवाह नहीं की
धुले कपड़ों को सहेजा नहीं
टीवी को खोल कर
चैनल बदल बदल कर
ढेर सी आवाजों को कमरे में भरने दिया

अक्षर मेरी उँगलियों के पोरों पर टिक गए
जिस वक्त मेरे कंप्यूटर पर एक नई
कविता जन्म ले रही थी
समय मेरे आसपास
पालतू कुत्ते सा मँडरा रहा था।

000 रति सक्सेना
प्रस्तुति:- कविता वर्मा
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टिप्पणियाँ:-

रूपा सिंह :-
निश्चित ही स्त्री स्वर।भारतीय नहीं।अस्मिता और अस्तित्व के संकटों से गुजरता स्त्रीत्व समूचे स्वर साधता है..काम के बोझ को मृत्यु सम कठिनाई से..बदलाव के लिए किसी और का इंतज़ार तक..लेकिन अंत में अपने थोपे रूटीन को दरकिनार कर अपने मन के गुलमोहर को खिला लेना उसकी जीत का नग्मा।किताब वाली कविता अलग है बनिस्पत साधारण भी।शुक्रिया।

किसलय पांचोली:-
कविताएँ अच्छी लगीं। 'देहान्तर 'का अंत निराशा पैदा करता है। यदि इसे बदला जा सके तो बेहतर होगा।

'किसी किताब.....'कविता द्वारा किताबों की चाहत का बखूबी   काव्यन्तर किया गया है तभी वह उम्दा बन पड़ी है।

मिर्च का शहद' कैसे बना? इस की केमिस्ट्री कम समझ आई। बहरहाल कविता को उठाया बहुत खूबसूरत अंदाज में है।

"पालतू समय" ने  एक तरफ समय की सत्ता को चुनोती दे डाली है तो दूसरी ओर प्राथमिकता का पाठ भी पढ़ा दिया है। कविता ने दिल और दिमाग दोनों को उद्वेलित किया है। लेखक/लेखिका? को बधाई!

ब्रजेश कानूनगो:-
समकालीन कविता के मुहावरे के साथ लिखी गई कविताएं।पहली कविता में गाँव से शहरों के घरों में काम करने वाली बाई का चित्र प्रभावी है।बधाई।

गरिमा श्रीवास्तव:
देहान्तर श्रेष्ठ कविता है।किसकी है यह अभी बताना उचित नहीं होगा शायद।स्त्रीवादी कविता की प्रमुख हस्ताक्षर की कवितायेँ काबिले तारीफ हैं।

प्रज्ञा:-
कविताएँ इतनी सशक्त हैं कि धीरे धीरे आपको जगाते हुए साथ ले चलती हैं। कवयित्री कविता में ऐसा अर्थ बुनने में सक्षम है जो दूर तक साथ रहे। खासतौर पर देहांतर
किसी किताब को पढ़ने से पहले
और
मिर्च का शहद
रोज़मर्रा के जीवन में स्त्री के सामाजिक सांस्कृतिक अनुकूलन से खुद को झटक कर अलग कर अपना समय और खुद को रचने वाली स्त्री साफ़ नज़र आती है।
बधाई।

मीना शाह :-
अच्छी कविताएँ..मिर्च और किताबें दोनों में बिम्ब का अच्छा समावेश...किताबों की जीवंतता ..मन को भा गई ...स्त्री विमर्श पर तो वैसे भी काफी कुछ लिखा जा रहा है ...इसलिए कुछ हटकर ये ज्यादा अच्छी हैं ...बधाई

नयना (आरती) :-
"देहांतर कविता अच्छी लगी इसे मैने"गाँव से शहरों के घरों में काम करने वाली बाई " से इतर बिम्ब रखकर पढा ---स्त्री का गाँव की  बेटी का अपने  पहले  जन्मदाता घर से शहर के दुसरे घर के प्रवेश तक पत्नी का बिम्ब  जो सपनो से अब उसे हकिकत की और ले जाता है फिए अंतिम घर का वृद्धावस्था के पडाव का दक्षिण छोर." इस रुप मे भी कविता मन को उद्वेलित कर गयी.
("ब्रजेश जी एक ही रचना को पढने वाले का नजरियाँ अलग तो हो सकता है ना?"क्षमा के साथ)

"किसी किताब को पढ़ने से पहले " थोडी हट के बात करती है,लेकिन जगह नही बना पा रही.

"मिर्च का शहद "  कम समझ आयी  "शहद की तरह चटाखे दार" समझ नही पायी मेरे मन मे शहद सिर्फ़ और सिर्फ़ मिठास घोलता हैं उसका मिर्च के साथ तुलनात्मक लेखन अलग सा तो है पर शायद मेरी समझ कम पड रही है.
साथी लोग प्रज्ञाजी,साने ताई ,ब्रजेश जी,मनीषा जी,कविता जी आप लोग थोडा प्रकाश डाल पाये तो शायद ज्ञानभंडार मे वृद्धी हो
"पालतू समय"  नहीं पसंद आयी. समय का पालतू कुत्ते सा मंडराना रास नही आया.

ब्रजेश कानूनगो:-
आप ठीक कह रहीं हैं नयना जी।कविता के अनेक पाठ हो सकते है।एक पाठ बाहरी चित्र तक सीमित हो सकता है लेकिन जा पाठक कविता के भीतर उतरता है कई अद्भुत परतें खुलने लगती हैं।एक अनुभूति जब सबकी अनुभूतियों को साथ लेती है तब ही तो वह सफल कविता बनती है।

फ़रहत अली खान:-
बहुत अच्छी कविताएँ हैं। पढ़ने में मन लगा। पता चला कि कवि की कल्पनाओं की उड़ान का आसमान नज़र आया।
हालाँकि तकनीकी रूप से कुछ बातें खटकीं। मिसाल के तौर पर:
--'शहद का चाटाख़ेदार' होना।
--'समय' का 'पालतू कुत्ते' सा होना।
--  इसके अलावा
'सिरहाने रख कर सोना, किताबें
को हरगिज़ पसंद नहीं' जैसी पंक्तियाँ(मसअलन यहाँ 'किताबें' शब्द पहली पंक्ति में न आकर दूसरी पंक्ति में फिट किया जाना चाहिये था।)

इसके अलावा मुझे लगा कि 'मिर्च का शहद' का शीर्षक 'मिर्च और शहद' होता तो ज़्यादा ठीक मालूम होता।

ब्रजेश कानूनगो:-
पालतू समय पढ़ते हुए बिलकुल स्पष्ट हो जाता है कि आज का कवि बहुत अध्ययनशील पाठक भी है।अन्य भाषाओं की रचनाओं के अनुवादों का उन पर पर्याप्त प्रभाव दिखाई देता है।इस कविता में कुछ ऐसा ही होता दिखाई देता है।और बिम्ब सहज हो नहीं पा रहे आम पाठको के लिए।

कविता वर्मा:
देहान्तर कविता में बिम्बों का बेहतरीन उपयोग किया गया है जिसमे सात मंजिल ऊपरी जमीन जैसे शरीर के सात चक्र ,एक घर से दूसरे घर जाने का बिम्ब मायके से ससुराल से लेकर एक आश्रम से दूसरे आश्रम तक जाने के अर्थ में लिया जा सकता है। जिसमे अंतिम घर यानि वानप्रस्थ आश्रम तक का सफर दर्शाया गया है। ये गूढ़ार्थ समेटे एक बेहतरीन कविता है।
दूसरी कविता किसी किताब को पढ़ने से पहले , में पाठक के साथ किताबों के मन की बात को दर्शाते हुए उन्हें जीवंत बना दिया गया है। यह कविता अपने सहज भाव के लिए मुझे सबसे ज्यादा पसंद आई।
मिर्च का शहद जैसा ब्रजेश जी ने कहा सुख और दुःख उपमान लेते पढ़ा जाये तो बेहद सरल लगती है। यह कविता अनुवादित कविताओं के करीब लगती है।
पालतू समय। ऽअज स्त्री विमर्श में सर्वाधिक प्रचलित 'मी टाईम ' को दर्शाने वाली सुन्दर कविता लगी। सभी कविताओं में कवित्त भाव बेहतरीन लगा जिन्हे पढ़ कर आनद आया।

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