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सत्यनारायण पटेल हमारे समय के चर्चित कथाकार हैं जो गहरी नज़र से युगीन विडंबनाओं की पड़ताल करते हुए पाठक से समय में हस्तक्षेप करने की अपील करते हैं। प्रेमचंद-रेणु की परंपरा के सुयोग्य उत्तराधिकारी के रूप में वे ग्रामांचल के दुख-दर्द, सपनों और महत्वाकांक्षाओं के रग-रेशे को भलीभांति पहचानते हैं। भूमंडलीकरण की लहर पर सवार समय ने मूल्यों और प्राथमिकताओं में भरपूर परिवर्तन करते हुए व्यक्ति को जिस अनुपात में स्वार्थांध और असंवेदनशील बनाया है, उसी अनुपात में सत्यनारायण पटेल कथा-ज़मीन पर अधिक से अधिक जुझारु और संघर्षशील होते गए हैं। कहने को 'गांव भीतर गांव' उनका पहला उपन्यास है, लेकिन दलित महिला झब्बू के जरिए जिस गंभीरता और निरासक्त आवेग के साथ उन्होंने व्यक्ति और समाज के पतन और उत्थान की क्रमिक कथा कही है, वह एक साथ राजनीति और व्यवस्था के विघटनशील चरित्र को कठघरे में खींच लाते हैं। : रोहिणी अग्रवाल

मणि मोहन की कविताएँ

दुःख
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इस तरह भी
आते हैं दुःख जीवन में
कभी - कभी
जैसे दाल - चावल खाते हुए
आ जाता है मुंह में कंकड़
या
रोटी के किसी निवाले के साथ
आ जाये मुँह में बाल
या फिर गिर जाये
दाल - सब्जी में मच्छर

अब इतनी सी बात पर
क्या उठाकर फेंक दें
अन्न से भरी थाली
क्या इतनी सी बात पर
देनें लगें
ज़िन्दगी को गाली ।

रूपान्तरण
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हरे पत्तों के बीच से
टूटकर बहुत ख़ामोशी के साथ
धरती पर गिरा है
एक पीला पत्ता
अभी - अभी एक दरख़्त से

रहेगा कुछ दिन और
यह रंग धरती की गोद में
सुकून के साथ
और फिर मिल जायेगा
धरती के ही रंग में

कितनी ख़ामोशी के साथ
हो रहा है प्रकृति में
रंगों का यह रूपान्तरण ।

पानी
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मीलों दूर से
किसी स्त्री के सिर पर बैठकर
घर आया
एक घड़ा पानी ....

प्रणाम
इस सफ़र को
इन पैरों को
इनकी थकन को

और अंत में
प्रणाम
इस अमृत को ।

बाज़ार
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पसीने की गंध मिटाने के लिए
जिसे वे दुर्गन्ध कहते हैं
कितनी चीजें बिक रहीं हैं
इस बाज़ार में -
तरह - तरह के खुशबूदार साबुन
स्प्रे , पॉवडर और डिओडरेंट्स

मनुष्य के पसीने के पीछे
पड़ा हुआ है
पूरा बाज़ार

कुछ न कुछ तो
खरीदना ही होगा भाई साहब -
इस तरह नहीं घूम सकते
आप इस धरती पर
पसीने से गन्धियाते हुए ।

रोशनी
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इस रोशनी में
थोड़ा - सा हिस्सा उसका भी है
जिसने चाक पर गीली मिट्टी रखकर
आकार दिया है इस दीपक को

इस रोशनी में
थोड़ा - सा हिस्सा उसका भी है
जिसने उगाया है कपास
तुम्हारी बाती के लिए
थोड़ा - सा हिस्सा उसका भी
जिसके पसीने से बना है तेल

इस रोशनी में
थोड़ा - सा हिस्सा
उस अंधेरे का भी है
जो दिये के नीचे
पसरा है चुपचाप ।

000मणि मोहन
प्रस्तुति:- तितिक्षा
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टिप्पणियाँ:-

परमेश्वर फुंकवाल:-
सुप्रभात मित्रों। मणि मोहन सरलता से गहरी बात कहते हैं। बहुत सुन्दर कविताएँ। पहले पढी थी,  पुनः पढवाने के लिए धन्यवाद तितिक्षा जी का।

सुरेन्द्र रघुवंशी:-
मणि भाई की ज़िन्दगी और उसकी उसकी  संस्कृति से जुड़ी बेहतरीन कविताएँ । वे किस तरह आम दृश्य का बिम्ब बनाकर हमारे बड़े सच को उद्घाटित करते हैं और कई बार साधारण सी लगने वाली बात में  वे बड़ा व्यंग्य कर देते हैं ।

व्यास अजमिल:-
मणि मोहन जी कविताएं बहुत अच्छी है। इतने समर्थ कवि से मित्रता करने का मन हो आया है। आप उनका पता उपलब्ध करवा दें तो मै दोस्ती के लिए आवेदन करूँ।'मणि मोहन'का स्नेह मुझे भी मिलना चाहिए। इन कविताओं ने दिल में जगह बना ली है।

गौतम चटर्जी:-
देखने का सुन्दर ढंग। कविता की ओर से देखना इसी को कहते हैं।  अंततः वह स्थिति कवि अर्जित कर लेता है जिसे कहते हैं कविता की ऊँचाई से देखना। मणि जी को स्नेह। चयन हेतु तितिक्षा जी आपको बधाई।

राजेश झरपुरे:
भाई मणिमोहन की बेहतरीन कवितायें । रूपान्तरण और पानी कविता ने विशेष रूप से प्रभावित किया । बेहतरीन कविता पोस्ट की तितिक्षाजी । बधाई । ।

1 टिप्पणी:

  1. इस रोशनी में
    थोड़ा - सा हिस्सा
    उस अंधेरे का भी है
    जो दिये के नीचे
    पसरा है चुपचाप ।

    मणि भाई ज़्यादातर छोटी छोटी कविताएँ आम जीवन की बडी बात करती है।

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