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सत्यनारायण पटेल हमारे समय के चर्चित कथाकार हैं जो गहरी नज़र से युगीन विडंबनाओं की पड़ताल करते हुए पाठक से समय में हस्तक्षेप करने की अपील करते हैं। प्रेमचंद-रेणु की परंपरा के सुयोग्य उत्तराधिकारी के रूप में वे ग्रामांचल के दुख-दर्द, सपनों और महत्वाकांक्षाओं के रग-रेशे को भलीभांति पहचानते हैं। भूमंडलीकरण की लहर पर सवार समय ने मूल्यों और प्राथमिकताओं में भरपूर परिवर्तन करते हुए व्यक्ति को जिस अनुपात में स्वार्थांध और असंवेदनशील बनाया है, उसी अनुपात में सत्यनारायण पटेल कथा-ज़मीन पर अधिक से अधिक जुझारु और संघर्षशील होते गए हैं। कहने को 'गांव भीतर गांव' उनका पहला उपन्यास है, लेकिन दलित महिला झब्बू के जरिए जिस गंभीरता और निरासक्त आवेग के साथ उन्होंने व्यक्ति और समाज के पतन और उत्थान की क्रमिक कथा कही है, वह एक साथ राजनीति और व्यवस्था के विघटनशील चरित्र को कठघरे में खींच लाते हैं। : रोहिणी अग्रवाल

विपिन चौधरी की कवितायेँ

आज प्रस्तुत हैं विपिन चौधरी की कविताएं।

1.

इन बची-खुची यादों को,
बारिश के लिए बचा कर रखो
बारिश में मन से धुँआ कुछ ज्यादा उठता है
बारिश में  छाते के साथ,
भीगने को मन करता है
बारिश में काई से अटी दीवारों पर  प्यार आने लगता है
बारिश का भरा-पूरा संसार
हमें अपने भीतर ले लेता है

2.
सूखे पौधे को निहारता हुआ
एक स्वस्थ फूल,
यूँ उदास है जैसे
उसने ही सूखे पौधे का जीवन चुराया हो
सच उदासी,
सब पर एक सी छाया डालती है

3.

ईमानदार माली,
नीचें तक जमीन को खोदता हुआ चला जाता है
ककड़, पत्थर और अवशेषों के बाहर
निकल आने के बाद
जमीन की सासें तेज़ी से चलने लगती  है
और फिर कुछ दिन बाद माली देखता है
पत्तियों में और अधिक हरापन
फूलों में और अधिक चमक

4.

तुम्हारे भीतर ही
कुछ चीज़ें बिना तुम्हारी इज़ाज़त के  भी  चली आती हैं
जैसे अभी तुम्ने कहा
'मैंने कभी मिट्टी नहीं चखी'
लेकिन उस वक़्त भी मिट्टी तुम्हारी ज़ुबान पर थी

5.

इस बार नए साल को
वसंत के भरोसे छोड़ दो
बहुत हुआ अब
पंडित, जन्मपत्री और हाथ की रेखाओं का लेखा-जोखा

6.

वह रोशनी के लिए नहीं
पेड़ों के लिए जंगल में आया था
रोशनी तो खुद उसके पीछे लगी हुयी थी
जैसे दुःख जीवन के पीछे लग जाता है
और फिर उसे अपना हमराही बना लेता है

7.  

जब पृथ्वी पर ऐसा कुछ भी नहीं था
थोड़ी नमी भी नहीं
तब भी
आकाश में एक पक्षी उड़ रहा था
जैसे देख रहा हो धरती का मरुस्थल
और सोच रहा हो कुछ
आगे की कहानी यहीं  से शुरू होती है
जब धरती पर उम्मीद नहीं थी
लेकिन आकाश तब भी उम्मीद का एक नाम था

साभार - स्त्रीकाल
प्रस्तुति - मनीषा जैन
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टिप्पणियाँ:-

प्रज्ञा :-
सार्थक प्रस्तुति के लिये शुक्रिया मनीषा जी। विपिन जी की कविताएँ गहन अर्थ छवियाँ रचती हैं। मिटटी से जुड़ी मिट्टी के इर्द गिर्द संसार से शब्द लिये । मुझे पहली चौथी पांचवी और अंतिम बेहद अच्छी लगीं। 
लघु और विराट बिम्बों के बीच कविता की निर्मिति जुबान में मिटटी , आसमान में उम्मीद और नए साल को बसन्त के हवाले कर देने की बात कितनी सादगी और ईमानदारी से करती हैं जैसे तीसरी कविता का ईमानदार माली।
बधाई।

आभा :-
पहली पांचवी चौथी कविता बहुत पसंद आयी। और वसंत पर छोड़ देने वाली बात भी शानदार है। उस वक़्त भी मिट्टी तुम्हारी ज़बान पर थी। वाह।

रूपा सिंह:-
सभी कवितायेँ व्यक्तिगत ईमानदार अहसास से गुजर कर कलात्मक सादगी लिए सार्वजनिक सत्यसे जुड़ जाती हैं,छोटी किन्तु सम्पूर्ण ये कवितायेँ हमें सघन विस्तार दे जाती हैं।धन्यवाद।

नंदकिशोर बर्वे :-
सुंदर बिम्ब , सुंदर प्रतीक, अद्भुत कल्पना शीलता से रची रचनाएँ। लेखक और प्रस्तुत कर्ता दोनों को बधाइयाँ।

अलकनंदा साने:-
चार और पांच कविता है और वह अच्छी हैं । बाकी सब बयानबाजी है --- ऐसा होता है, वैसा होता है  आदि ।

फ़रहत अली खान:-
बेहद सादी, सहज व सरल भाषा में कही गयी कविताएँ प्रभावित करती हैं।  इनमें से 2, 3, 4, 5 सबसे ज़्यादा प्रभावित करती हैं।
लेकिन तीसरी कविता की पाँचवीं पंक्ति  में साँसों का 'तेज़ी से चलना' कुछ अजीब सा लगता है; क्योंकि साँसों का तेज़ी से चलना तो साँसों के असामान्य होने का प्रतीक है। इसके बजाए साँसें 'सामान्य' हो जातीं तो यह बात ज़्यादा समझ में आती। 
विपिन चौधरी जी उम्दा कवि मालूम होते हैं।

गरिमा श्रीवास्तव:
विपिन की कवितायेँ उम्दा हैं।वे गद्य भी अच्छा लिखती है।उन्होंने माया एंजेलो पर  किताब भी लिखी है।एक बेहद संवेदनशील और संभावनापूर्ण कवयित्री।

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