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सत्यनारायण पटेल हमारे समय के चर्चित कथाकार हैं जो गहरी नज़र से युगीन विडंबनाओं की पड़ताल करते हुए पाठक से समय में हस्तक्षेप करने की अपील करते हैं। प्रेमचंद-रेणु की परंपरा के सुयोग्य उत्तराधिकारी के रूप में वे ग्रामांचल के दुख-दर्द, सपनों और महत्वाकांक्षाओं के रग-रेशे को भलीभांति पहचानते हैं। भूमंडलीकरण की लहर पर सवार समय ने मूल्यों और प्राथमिकताओं में भरपूर परिवर्तन करते हुए व्यक्ति को जिस अनुपात में स्वार्थांध और असंवेदनशील बनाया है, उसी अनुपात में सत्यनारायण पटेल कथा-ज़मीन पर अधिक से अधिक जुझारु और संघर्षशील होते गए हैं। कहने को 'गांव भीतर गांव' उनका पहला उपन्यास है, लेकिन दलित महिला झब्बू के जरिए जिस गंभीरता और निरासक्त आवेग के साथ उन्होंने व्यक्ति और समाज के पतन और उत्थान की क्रमिक कथा कही है, वह एक साथ राजनीति और व्यवस्था के विघटनशील चरित्र को कठघरे में खींच लाते हैं। : रोहिणी अग्रवाल

विनीत तिवारी की कविताएँ

|| हमें पता है ||

देखिए, हमको न बताइए
कि एक हरी पत्ती बच गई
तो जीवन बचा है अब भी
जीवन के सबूत के लिए कई चीखें,
आँसू, सिसकियाँ, घाव, खून, गालियाँ वगैरह
काफ़ी चीज़ें हैं हमारे इर्द-गिर्द

जीवन का ही सबूत है
तानाशाह के होठों पर उभरी यह मुस्कान
जो सुबह बगीचे में खिलखिलाते फूलों और
सुंदर हरियाली दूब को देख आई है
अगर कविता से प्रेम अतिरिक्त सबूत है जीवन का
तो काफ़ी है सौम्यता में लिपटा
फूलों, पत्तियों, चित्रों, नृत्यों और कविताओं से
खासकर आपकी हरी पत्तीवाली कविता से
तानाशाह का प्रेम

हमें सुनाना बंद कीजिए आप
तितलियों, फूलों, रस, पराग
और जीवन की सुंदरता के लिए इनके मायने
कलियों को खिलता देख जो सम्मोहित हैं भद्रजन
पिछली क्यारी का पानी अभी तक लाल है
उनके हाथ धोने के बाद से
नाक पर रूमाल रखकर बतियाने वाले
इन लोगों की शक्लें हू-ब-हू वही हैं
जो कल रात ईराक में देखे गए थे
और उसके बाद सिर्फ़ मलबा और बारूद की गंध थी
परसों तो वे दिन में ही अफगानिस्तान में थे
जहाँ उन्होंने पिस्ता खाते हुए बयान दिया
कि हमें गुलमोहर, पलाश और बोगनबेलिया के साथ
लोकतंत्र भी बहुत पसंद है
हरी पत्तियो और खुशरंग फूलों के बीच
तरोताज़ा सांस लेकर
अपने भीतर भरकर कुछ बेहतरीन सिंफनियाँ
निकलना है उन्हें फिलिस्तीन, नेपाल
सीरिया, कोरिया, ईरान और कई और ठिकानों पर

ऐसे में आप हमे बता रहे हैं कि
कविता ही बचाएगी दुनिया को
या बची रहेगी कविता तो बचा रहेगा जीवन
या प्रेम,या वग़ैरह-वग़ैरह
तो मुझे शक होता है
कि या तो आपकी मति मारी गई है
जिसे आप चाहें तो कोशिश करके दुरुस्त कर सकते हैं
या फिर आप उनकी तरफ़ के जासूस हैं
और एक दिन इन सब फूल, पत्तियों, तितलियों इत्यादि के बीच
आप न भी चाहें तो भी
पहचान लिए जाएँगे.
* * *

|| फिलिस्तीनी डायरी -2014 ||

एक स्थिति के बाद लाशों की गिनती के
कोई मायने नहीं रह जाते।
एक स्थिति के बाद मरने वालों की अलग-अलग
पहचान बताने के भी कोई मायने नहीं रह जाते।

जब हवा से हिलती पत्तियों से लेकर
हर हरकत करने वाली चीज़ –

कुत्ता हो या इंसान,
जानदार हो या बेजान,
भूनी जा रही हो तो
ये बताने के क्या मायने हैं।
कि देखो, ये तो बेकसूर था,
या ये कि ये तो औरत थी,
हामला थी, या देखो,
ये तो बच्चा था, ये बुजुर्ग
और ये, ये तो मुर्दा ही था,
जिसे तुमने मार दिया।

सब कुछ को मार सकने की
ताक़त तुम्हारे पास है,
उस ताक़त पर तुम्हें भरोसा है,
फिर भी तुम डरते हो,
तुम डरते हो क्योंकि
तुम जानते हो,
बारूद से शहर उड़ाये
जा सकते हैं,
बदला जा सकता है
इंसानों को लाशों में
लेकिन तुम हमारी
आज़ादी की ख़्वाहिश और
हमारे वजूद की पहचान
हमारे हौसले को नहीं मार पाते।

तुम डरते हो क्योंकि
तुम जानते हो कि
फिलिस्तीन में
मुर्दा जिस्मों के भीतर भी
हौसले ज़िंदा बने रहते हैं
बेहिस आँखों के भीतर भी
सपने बड़े होते रहते हैं।

तुम डरते हो
और तुम सही डरते हो।

000 विनीत तिवारी
प्रस्तुति : अमिताभ मिश्र
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टिप्पणियाँ:-

राजेश्वर वशिष्ट:-: विनीत तिवारी की कविताएँ बहुत अच्छी हैं। अगर इन्होंने बोकोहराम और इस्लामी आतंकवाद के खिलाफ भी कुछ लिखा हो तो ज़रूर पढ़ना चाहेंगे।

संदीप कुमार:-: अद्भुत कवितायेँ. विनीत भाई के मुंह से सुनने का अवसर मिल चुका है. खूब पाठ करते हैं. रही बोको हराम और इस्लामिक आतंकवाद पर लिखने की बात तो यह तो कवि का विशेषाधिकार है कि वह क्या लिखना चाहता है. अन्य साथी लिखें इन विषयों पर. मैं भी पढना चाहूँगा.

अरुण यादव:-: विनीत जी की कविताओं की धार बहुत पैनी है, जो झूठ के तिलिस्म को तार-तार करने की क्षमता से लैस है। पर यहाँ राजेश्वर वशिष्ठ द्वारा पूछे गए प्रश्न को अनसुना नहीं किया जाना चाहिए। में विनीत भाई से राजेश्वर वशिष्ठ के सवाल के तार्किक जवाब की अपेक्षा रखता हूँ।

मनीषा जैन:-
विनीत जी की कविताएं पहली बार पढ़ी। बहुत ही धारदार कविताएं। उम्मीद है और भी पढने को मिलेंगी। कवि को बधाई। अमिताभ जी का धन्यवाद।

अज्ञात टिप्पणीकार:-
विनीत की कविताएँ दरअसल हमारी राजनीतिक समझ को भी दुरुस्त करती हैं। यह सच है की राजनीति की सही समझ के बिना अपने समय को ठीक से पहचानना और उस पर सही टिप्पणी करती कविताएँ लिखना मुश्किल होता है। मित्रो, विनीत की 'जब हम चिड़िया की बात करते हीन' कविता भी ज़रूर पढ़ना चाहिए।

बसंत त्रिपाठी:-
दोनों ही कविताएं विचार की ऊर्जा से भरी ज़रूरी और प्रभावी कलिताएं....पहली कविता तो निष्क्रिय सौंदर्यवादियों के खिलाफ जैसे एक बयान है. बधाई..

अज्ञात टिप्पणीकार:-
अमिताभ जी विनीत तिवारी की इन कविताओं को पढ़वाने के लिए शुक्रिया। 'हमें पता है' अधिक नज़दीक लगी। इनकी और रचनाएँ पढना चाहूंगी। इन कविताओं ने मेरे नियम को तोड़ने पर मज़बूर किया।

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