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सत्यनारायण पटेल हमारे समय के चर्चित कथाकार हैं जो गहरी नज़र से युगीन विडंबनाओं की पड़ताल करते हुए पाठक से समय में हस्तक्षेप करने की अपील करते हैं। प्रेमचंद-रेणु की परंपरा के सुयोग्य उत्तराधिकारी के रूप में वे ग्रामांचल के दुख-दर्द, सपनों और महत्वाकांक्षाओं के रग-रेशे को भलीभांति पहचानते हैं। भूमंडलीकरण की लहर पर सवार समय ने मूल्यों और प्राथमिकताओं में भरपूर परिवर्तन करते हुए व्यक्ति को जिस अनुपात में स्वार्थांध और असंवेदनशील बनाया है, उसी अनुपात में सत्यनारायण पटेल कथा-ज़मीन पर अधिक से अधिक जुझारु और संघर्षशील होते गए हैं। कहने को 'गांव भीतर गांव' उनका पहला उपन्यास है, लेकिन दलित महिला झब्बू के जरिए जिस गंभीरता और निरासक्त आवेग के साथ उन्होंने व्यक्ति और समाज के पतन और उत्थान की क्रमिक कथा कही है, वह एक साथ राजनीति और व्यवस्था के विघटनशील चरित्र को कठघरे में खींच लाते हैं। : रोहिणी अग्रवाल

विजय शर्मा का लेख "क्या खा रहे हैं हम"

बनिया मेरा मतलब व्यापारी का सारा ध्यान अपने लाभ पर रहता है। अधिकतर उसे उत्पाद्य की गुणवत्ता से कुछ लेना-देना नहीं होता है। कितना अदूरदर्शी होता है व्यापारी, कितना हृदयहीन। उसका ध्यान आज के फ़ायदे पर होता है, लॉन्ग टर्म गेन पर नहीं। अपने लाभ के लिए वह किसी हद तक गिर सकता है। आज के लाभ के लिए वह अपनी साख गिरने की परवाह नहीं करता है। प्रेय के चक्कर में श्रेय को भुला बैठता है। भारत में आज चारों ओर मैगी को ले कर बबाल हो रहा है। नेस्ले ने इसकी गुणवत्ता पर लगाए सवालों पर सफ़ाई दी है, क्या वह काफ़ी है? क्या वह हमारे गले उतरने योग्य है? मैगी एक उदाहरण है। असल में आज आए इस जाँच के नतीजे चौंकाने वाले नहीं होने चाहिए। हम सब जानते हैं इन फ़ास्टफ़ूड की असलियत मगर आदत से मजबूर हैं। इन्होंने हमें इसकी लत लगाई है और हम आदी हो गए हैं इन प्रॉड्क्ट्स के। बिना यह सोचे-विचारे कि इससे पीढ़ी-दर-पीढ़ी कितना नुकसान होगा। समस्त मानवता के लिए खतरा हैं ये फ़ास्टफ़ूड। इसके प्रयोग से भविष्य की पूरी मनुष्य जाति मंदबुद्धि हो सकती है।
कहावत है हम जो खाते हैं वही हो जाते हैं। जहाँ तक मुझे याद आ रहा है, चीजों में हानिकारक वस्तुओं की मिलावट पर बहुत पहले धर्मयुग में एक लेख आया था। उसमें लिपस्टिक, चेहरे की क्रीमों, खाने-पीने की चीजों के नाम ले कर किसमें कितनी मात्रा में हानिकारक द्रव्य हैं इसको बताया गया था। समय-समय पर कई बार ऐसे लेख प्रकाशित होते रहते हैं। मगर हमारे कानों पर जूँ नहीं रेंगती है। दुनिया भर में जो पदार्थ बैंड होंगे वो भारत में ठेले जाते हैं, इतना बड़ा बाजार और कहाँ मिलेगा। आज मैगी की जाँच के जो नतीजे आए हैं उनसे हमें सावधान होना है। बल्कि मैं सोचती हूँ कि एक पूरी पीढ़ी जो मैगी खा कर बड़ी हुई है उसे नेस्ले कम्पनी पर अपने स्वास्थ्य से खिलवाड़ करने के लिए दावा ठोंकना चाहिए। मगर होगा क्या? क्या हुआ कोकाकोला की कम्पनी का? केरल में जब शिकायत हुई तो उन्होंने कुछ दिन हाइबरनेशन में जा फ़िर कॉरपोरेट सोशल रिस्पॉन्सबिलेटी के तहत दिखावे के लिए वाटर हार्वेस्टिंग की योजना प्रारंभ कर दी और कंपनी फ़िर से चालू हो कर पानी का ज्यों-का-त्यों दोहन करती रही।
क्या होता है फ़ास्टफ़ूड के सेवन का नतीजा यदि यह देखना हो तो डॉक्यूमेंट्री ‘सुपर साइज मी’ देखिए। नेट पर उपलब्ध यह वृतचित्र एक आदमी के जुनोन का नतीजा है जिसकी हानि उसे उठानी पड़ी। इस आदमी मोर्गन स्परलॉक ने अपनी जान जोखिम में डाल कर दूसरों की आँख खोलने के लिए काम किया। मगय क्या हमारी आँख खुली? हुआ यूँ कि प्रसिद्ध फ़ास्टफ़ूड कम्पनी मैक्डोनाल्ड्स ने अपने मेनू में एक नया आकर्षण जोड़ा, ‘सुपर साइज’ था। मोर्गान जानना चाहता था कि इन फ़ास्टफ़ूड का शरीर पर असल में क्या प्रभाव पड़ता है। प्रयोग के लिए उसने एक महीने तक मात्र फ़ास्टफ़ूड पर गुजारा किया, वह इसके अलावा कुछ और न खाता। एक महीने में होने वाले परिणामों पर उसने यह वृतचित्र बनाया। इस एक महीने केवल फ़ास्टफ़ूड का सेवन करने से मोर्गन का वेट २० पाउन्ड बढ़ गया। उनका लीवर बुरी तरह खराब हो गया और वे डिप्रेशन का शिकार हो गए। फ़ास्टफ़ूड मंदबुद्धि की समस्या को जन्म देता है।
मोर्गन स्परलॉक ने अपनी जान जोखिम में डाल कर एक अच्छी काम का बीड़ा उठाया था। उन्होंने अपनी फ़िल्म में इस कंपनी की पूरी चाल का भंडाफ़ोड़ किया। कैसे कंपनी विज्ञापन करती है, लोगों को अपने वाक्जाल में फ़ँसाती है, दृश्यात्मकता का उपयोग कर लोगों को लुभाती है और खराब पोषाहार को लुभावने तरीके से पौष्टिकता का जामा पहना कर प्रस्तुत करती है। पर मोर्गन एक बड़े शक्तिशाली व्यापारी कंपनी से भी टकरा रहे थे। मैक्क्डोनाल्ड्स कंपनी उसे छोड़ने वाली न थी। कंपनी ने बहुत कोशिश की कि फ़िल्म पर पाबंदी लगा दी जाए। मगर तब तक फ़िल्म जनता के बीच पहुँच चुकी थी अत: कंपनी की एक न चली। जनता के सामने कंपनी को झुकना पड़ा। ये व्यापारी कंपनियाँ बड़ी शातिर होती हैं। मैक्डोनाल्ड्स ने अपने मेनू से ‘सुपर साइज’ आइटम हटा लिया। लेकिन फ़ास्टफ़ूड बंद न हुआ। कंपनियाँ अपने लाभ के लिए जनता के स्वास्थ्य से खिलवाड करती हुई क्या-क्या करती हैं, इसे देखना हो तो जूलिया रॉबर्ट और डेन्जल वॉशिंगटन अभिनीत जॉन ग्रीसम के उपन्यास पर इसी नाम से बनी फ़िल्म ‘द पेलीकन ब्रीफ़’ देखनी चाहिए।

000 विजय शर्मा
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टिप्पणियाँ:-

फ़रहत अली खान:-
अच्छा लेख है। जब फ़ास्ट-फ़ूड से होने वाले नुक़्सानात का ज़िक्र बार-बात होता है तो ऐसे में हमारा फ़िक्रमंद होना भी वाजिब है। जब देश के टेलीकॉम मंत्री ने यहाँ तक कह दिया कि टावरों से उत्पन्न होने वाले विकिरण से कोई नुक़्सान नहीं होता और इसके ख़िलाफ़ मुहिम चलाना ग़लत है, तो फिर ये भूल जाना चाहिए कि सरकार मैगी जैसे विषयों को गंभीरता से लेगी। मैगी और उस जैसे दूसरे फ़ास्ट-फ़ूड्स को तो हम ख़ुद भी अवॉइड कर सकते हैं। सभी जानते हैं कि शराब सेहत के लिए नुक़्सानदेह है, फिर भी धड़ल्ले से बिकती है, पीने वाले ख़ूब पीते हैं और नहीं पीने वाले नहीं पीते।
मैगी से ज़्यादा नुक़्सान हमें दूषित हवा-पानी पहुँचा रहे हैं। फ़ास्ट-फ़ूड खाये बिना तो हम रह सकते हैं, मगर हवा-पानी तो बुनियादी ज़रूरतें हैं। इसलिए सबसे ज़्यादा फ़िक्र आज इस बात की होनी चाहिए कि हमारा हवा-पानी और ज़्यादा दूषित होने से कैसे बचाया जाए। और इस बाबत हमें सरकार पर आवश्यक दबाव डालना चाहिए।
फिर भी छोटा मुद्दा सही मगर फ़ास्ट-फ़ूड वाला मुद्दा भी उठाने लायक़ तो है ही; सरकार नहीं तो कम से कम समाज तो जागेगा।

और एक बात, कहावत: 'हम जो खाते हैं, वही हो जाते हैं', बे-बुनियाद कहावत है। इसके बजाए लेख में ये कहा जाना चाहिए था कि हम जो खाते हैं उसका असर हम पर पड़ता है।

निधि जैन :-
असर का मतलब वही हुआ

बच्चों को रोज स्कूल में टिफ़िन में आलू कई सब्जी लाने पर बोला जाता है

जो खायेगा आलू बन जाएगा भालू

ये तो लेखक पर है लेख में कुछ रोचकता कुछ बचपन कुछ हंसी हो तो वो बोझिल नही होता

वैसे मैंने अभी लेख नही पढ़ा

ये टिप्पणी फरहत जी की टिप्पणी पर है

फ़रहत अली खान:-
असर का मतलब ये हुआ कि जो हम खा रहे हैं उसकी तासीर क्या है।
अगर हम गर्म चीज़ खा रहे हैं तो हमारे शरीर में गर्मी उत्पन्न होगी।
ठंडी चीज़ खाने पर शरीर को ठंडक मिलेगी।
इसीलिए गर्मियों में ठंडी चीज़ें और सर्दियों में गर्म चीज़ें खानी चाहिए।
इसी तरह फ़ास्ट-फ़ूड जैसा कच्चा माल खाने के अपने नुक़्सानात हैं।

ऐसा थोड़ी है कि जैसा हम खाते हैं वैसे ही बन जाते हैं।
सब्ज़ियाँ खाने वाले सब्ज़ी और मीट खाने वाले जानवर नहीं बन जाते।

अशोक जैन:-
लेख अच्छा है । इन सबसे बचना चाहिए। मित्रों ने और बहुत सारी बातें बताई हैं जिनसे बचना हमारे लिए मुश्किल है । जैसे हवा और पानी। जब तक कठोर इच्छा शक्ति से सरकार इन नियंत्रण नहीं लगाती है, यह हमारे साथ खिलवाड़ करते रहेंगे। घर के मुखिया का भी कर्तव्य है कि घर में ऐसा माहौल तैयार करें कि इन वस्तुओं का प्रवेश घर में न हो।

अशोक जैन:-
एक रोचक संस्मरण

आपने तो कुछ नहीं लिया । यहाँ
तो शाम के खाने के बाद तीन चार सौ ग्राम मीठा यूं ही खा जाते हैं।

बीकानेर में पोस्टिंग के दौरान वहाँ के खाने के प्रेमियों का एक दिलचस्प वाकया है।

बैंक का एक ग्राहक मिठाई की दुकान वाला था। सपत्नी जाते थे । आव भगत करता था। पर हम तो 100 ग्राम मीठे में ही संतुष्ट हो जाते थे। ग्राहक बताता था कि बीकानेर वासी शाम को घर से खाना खाकर घूमने निकलते है और मिठाई की दुकान पर आकर तीन चार तरह की मिठाई सौ सौ ग्राम मिठाई खाने के बाद फिर मांग करते थे कि कोई स्पेशल आइटम खिलाओ।

वहाँ शादी ब्याह या आयोजन में हमेशा मीठा पहले परोसते थे और भरपूर मीठे के बाद पूड़ी सब्जी।

एक और प्रथा थी कि भोज में बड़े बड़े थाल रहते थे और एक थाल में तीन चार एक साथ खाना खाने बैठ जाते थे। मैं कभी नहीं बैठ पाया।

संध्या:-
ये पूरी एक पीड़ी की समस्या है ।विजय जी ने खूब लिखा है ।अपने परिप्रेक्ष्य में यदि कहूँ तो नोकरी में रहने के बावजूद हमने घर के खाने को ही महत्त्व दिया ।बिटिया पुणे गईं पढ़ने फिर काम को  शुरू में पिज़्ज़ा बर्गर बूडल्स कगूब खाये फिर उसकी कीमत और स्वास्थ्य पर पड़ते प्रभाव(आये दिन पेट ख़राब)को देखते हुए खुद ही खाना बनाना शुरू किया लेकिन एक पीड़ी जो यह नही समझ पा रही है ।उसे समझाना ज़रूरी और वातावरण में बाज़ारवाद हावी है ।बस रिमोट अपने हाथ में रखने का आत्मबल ज़रूरी है।
' The Pelican breef'  john greshm  की पढी है सिनेमा नहीं देखा ।अच्छी किताब  ।
विजय जी का शुक्रिया सामयिक चिंता ।

अलकनंदा साने:-
हमने दर असल फास्ट फूड को संकुचित कर दिया, असली समस्या यहाँ है । जो आकर्षक पैकेट में उपलब्ध है और जो विज्ञापित हो रहा है वह फास्ट है यह मान लिया गया है । हमारे यहाँ कितनी ही पारंपरिक चीजें उपलब्ध हैं , जिसमें सत्तू को सबसे ऊपर रखा जा सकता है । सत्तू घोलने में मैगी से भी कम समय लगता है । सत्तू न सिर्फ घोलकर बल्कि अनेक तरीकों से खाया जा सकता है । जरा सा तेल, नमक मिर्च और नींबू का अचार मिलाकर इसे चटपटा भी बना सकते है । इसके अलावा लाई, परमल, पोहा सब फास्ट फूड हैं और इनको भी अलग अलग स्वादों में बना सकते हैं। सबसे महत्वपूर्ण यह भी कि ये सारी चीजें पौष्टिक भी हैं । जरूरत हमारा नजरिया बदलने की है और अपनी कल्पनाशीलता से इन्हें कुछ आधुनिक स्वरूप देने की है ।
हर काम सरकार के भरोसे छोडकर नहीं होता ।

आनंद पचौरी:-
मेक्डोनाल्ड को अमेरिका में अब कोई पूछता नहीं है।मगर हजार साल की गुलाम मानसिकता से हमारी कौम अभी उबरी नहीं है।सत्तू की बात कही गई उससे पौष्टिक और सुस्वादु कोई फास्ट फूड नहीं है।घी में भूँ ज कर रख लीजिए दो महिने तक खराब नहीं होगा़।मैं अमेरिका ले जाता हूँ दो माह के लिए़।शायद हम लोगों में बहुत ऐसे होंगे जो ठंड के पौष्टिक लड्डूों के स्वाद से परिचित होंगे जो तीन महिने तक चलते थे़ं।यदि गुणवत्ता के साथ ये चीजें फिर मिलने लगें तो पेप्सी के जहर में घुलती इस अंधी पीढी़ का बडा हित होगा।
आशीष मेहता:-
विजयजी का आलेख तथ्यपरक एवं सटीक है। पर सत्य भाई, इसके बाद ऊँचाई नहीं, सिर्फ "गहराई" ही मिल पाएगी। नेस्ले मैगी में, पड़ोसी हलवाई रबड़ी में, रैनबेक्सी दवाओं में, दूधवाला, फलवाला, कुछ न कुछ मिला ही रहे हैं। सभी क्षेत्र में नियामक होने के बाद भी। भ्रष्टाचार के एक से बढ़कर एक उदाहरण हैं, हिन्दुस्तान हो या अमेरिका। अनुशासन में रहना ही संभव नहीं हो रहा है। सामाजिक, पारिवारिक, व्यक्तिगत किसी भी स्तर पर, हम ज्यादा आजादी (बिना जिम्मेदारी के; उच्छंदता) , ज्यादा उपभोग ( परिणाम से बेपरवाह ) करना चाहते हैं और करते हैं। Inorganic खाद से ले कर Goldman Sachs तक सब बाज़ारवाद ने जकड़ रखा है। मैगी का विकल्प (सत्तू) तो सहज है। वो जो नकली डाक्टर (PMT घोटाला) घूम रहे हैं.... वो जो पिछले सप्ताह मोबाइल ने  "बेचैनी" दी... उसका क्या  ? सब कुछ गूँथा हुआ है। सवाल / चिन्ताऐ ढेर हैं, जवाब कहाँ हैं।

संदीप कुमार:-
विजया जी की बात से सहमति लेकिन बात इतनी सीधी भी नहीं है. मैगी को जिन आधारों पर बैन किया गया है उस आधार पर तो देश के सारे सब्जी बाज़ार और स्ट्रीट फ़ूड कार्नर बंद हो जायेंगे. दूसरा एक कांस्पीरेसी थ्योरी चल रही है की स्विस कम्पनी नेस्ले का उत्पाद बैन कर सरकार स्विस बैंक पर दबाव बना रही है. तीसरा क्या अमेरिकी कम्पनियों के मामले में भी यही तत्परता दिखाई जायेगी और आखिर में बाबा रामदेव भी मैगी ला रहे हैं.

अलकनंदा साने:-
कितने लोग जानते हैं नहीं पता पर हम महाराष्ट्रीय लोग गेहूं की कुरडई बनाते हैं । नूडल्स  जैसी होती है पर पौष्टिक और बिना किसी प्रिजर्वेटिव के । हमारे देश में तो सिवईंयां  भी बनती है ।

मैगी जब बिक रही थी तब भी बाजारवाद था और प्रतिबंधित है तब भी बाजार का दबाव है ।

बडे बूढे कह गए हैं दाल रोटी खाओ प्रभु के गुण गाओ वही परम सत्य है ।

अंजू शर्मा :-
हम लोग हमेशा से हाथ से मैदा की सेवइयां तोड़ते आये हैं जिन्हें जवे कहा जाता है। ये मीठे, दूध में और सब्जियां डालकर नमकीन बनाये जा सकते हैं। दसियों तरह के परांठे हमारे नाश्ते में शामिल हैं। पोहे, उपमा, भेल, दलिया, खिचड़ी, चीले, पुए,ये सूची अंतहीन है।

आशीष मेहता:-
मित्रों, एकता में बल है। बाज़ार (नकारात्मक) तब पनपते हैं, जब कुछ लालची एका कर लेते हैं, भ्रष्टता को गुणित कर लेते हैं। यह सांठगांठ कर हमें बेहतर शिक्षा, स्वास्थ्य, सुरक्षा, मनोरंजन, खाना, उपभोग वस्तुओं के लिए ललचाते हैं। जो दाल रोटी में खुश है, वो कहाँ बाज़ार की परवाह कर रहा है?  अच्छे भले मुहब्बत (जिगर सा अमर रहें) को जी रहे थे। फ़रहत भाई / बलविन्दर भाई जिन्दाबाद कर रहे थे। आप भी ना.. सत्य भाई, बाज़ारवाद (कोसे) बिना रह नहीं पाते हो।

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