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सत्यनारायण पटेल हमारे समय के चर्चित कथाकार हैं जो गहरी नज़र से युगीन विडंबनाओं की पड़ताल करते हुए पाठक से समय में हस्तक्षेप करने की अपील करते हैं। प्रेमचंद-रेणु की परंपरा के सुयोग्य उत्तराधिकारी के रूप में वे ग्रामांचल के दुख-दर्द, सपनों और महत्वाकांक्षाओं के रग-रेशे को भलीभांति पहचानते हैं। भूमंडलीकरण की लहर पर सवार समय ने मूल्यों और प्राथमिकताओं में भरपूर परिवर्तन करते हुए व्यक्ति को जिस अनुपात में स्वार्थांध और असंवेदनशील बनाया है, उसी अनुपात में सत्यनारायण पटेल कथा-ज़मीन पर अधिक से अधिक जुझारु और संघर्षशील होते गए हैं। कहने को 'गांव भीतर गांव' उनका पहला उपन्यास है, लेकिन दलित महिला झब्बू के जरिए जिस गंभीरता और निरासक्त आवेग के साथ उन्होंने व्यक्ति और समाज के पतन और उत्थान की क्रमिक कथा कही है, वह एक साथ राजनीति और व्यवस्था के विघटनशील चरित्र को कठघरे में खींच लाते हैं। : रोहिणी अग्रवाल

प्रेमचंद जी के साथ बिताए अन्तिम क्षणों का चित्रण:-जैनेन्द्र

प्रस्तुत संस्मरण में प्रेमचंद जी के साथ बिताए अन्तिम क्षणों का चित्रण है। जिसे लिखा है जैनेन्द्र जी ने। बहुत ही मार्मिक व संवेदना से परिपूर्ण।

मुझे एक अफसोस है, वह अफसोस यह है कि मैं उन्हें पूरे अर्थों में शहीद क्यों नहीं कह पाता हूँ, मरते सभी हैं, यहां बचना किसको है! आगे-पीछे सबको जाना है, पर मौत शहीद की ही सार्थक है, क्योंकि वह जीवन की विजय को घोषित करती है।

आज यही ग्लानि मन में घुट-घुटकर रह जाती है कि प्रेमचन्द शहादत से क्यों वंचित रह गये? मैं मानता हूँ कि प्रेमचंद शहीद होने योग्य थे, उन्हें शहीद ही बनना था।और यदि नहीं बन पाए हैं वह शहीद तो मेरा मन तो इसका दोष हिंदी संसार को भी देता है।

मरने से एक सवा महीने पहले की बात है, प्रेमचंद खाट पर पड़े थे। रोग बढ़ गया था, उठ-चल न सकते थे। देह पीली, पेट फूला, पर चेहरे पर शांति थी।मैं तब उनकी खाट के पास बराबर काफी-काफी देर तक बैठा रहा हूँ। उनके मन के भीतर कोई खीझ, कोई कड़वाहट, कोई मैल उस समय करकराता मैने नहीं देखा, देखके तो उस समय वह अपने समस्त अतीत जीवन पर पीछे की ओर भी होंगे और आगे अज्ञात में कुछ तो कल्पना बढ़ाकर देखते ही रहे होंगे लेकिन दोनों को देखते हुए वह संपूर्ण शांत भाव से खाट पर चुपचाप पड़े थे। शारीरिक व्यथा थी, पर मन निर्वीकार था।ऐसी अवस्था में भी (बल्कि ही) उन्होंने कहा- जैनेन्द्र! लोग ऐसे समय याद किया करते हैं ईश्वर। मुझे भी याद दिलाई जाती है। पर अभी तक मुझे ईश्वर को कष्ट देने की जरूरत नहीं मालूम हुई है।शब्द हौले-हौले थिरता से कहे गए थे और मैं अत्यंत शांत नास्तिक संत की शक्ति पर विस्मित था।

मौत से पहली रात को मैं उनकी खटिया के बराबर बैठा था। सबेरे सात बजे उन्हें इस दुनिया पर आँख मीच लेनी थीं। उसी सबेरे तीन बजे मुझसे बातें होती थीं। चारो तरफ सन्नाटा था। कमरा छोटा और अँधेरा था। सब सोए पड़े थे। शब्द उनके मुंह से फुसपुसाहट में निकलकर खो जाते थे। उन्हें कान से अधिक मन से सुनना पड़ा था।तभी उन्होंने अपना दाहिना हाथ मेरे सामने कर दिया, बोले-दाब दो।हाथ पीला क्या सफेद था और पूला हुआ था, मैं दाबने लगा।वह बोले नहीं, आँख मींचे पड़े रहे। रात के बारह बजे ' हंस' की बात हो चुकी थी। अपनी आशाएँ, अपनी अभिलाषाएँ, कुछ शब्दों से और अधिक आँखों से वह मुझपर प्रगट कर चुके थे। ' हंस' की और साहित्य की चिंता उन्हें तब भी दबाए थी। अपने बच्चों का भविष्य भी उनकी चेतना पर दबाब डाले हुए था। मुझसे उन्हें कुछ ढारस था।अब तीन बजे उनके फूले हाथ को अपने हाथ में लिए मैं सोच रहा था कि क्या मुझ पर उनका ढारस ठीक है। रात के बारह बजे मैने उनसे कुछ तर्क करने की धृष्टता भी की थी। वह चुभन मुझे चुभ रही थी। मैं क्या करूँ? मैं क्या करूँ?इतने में प्रेमचन्द जी बोले, जैनेन्द्र! बोलकर, चुप मुझे देखते रहे। मैने उनके हाथ को अपने दोनों हाथों से दबाया। उनको देखते हुए कहा, आप कुछ फिकर न कीजिए बाबूजी। आप अब अच्छे हुए और काम के लिए हम सब लोग हैं ही।अब मुझे देखते, फिर बोले-आदर्श से काम नहीं चलेगा। मैने कहना चाहा...आदर्श, बोले-बहस न करो। कहकर करवट लेकर आँखें मींच लीं।

उस समय मेरे मन पर व्यथा का पत्थर ही मानो रख गया। अनेकों प्रकार की चिंता-दुश्चिंता उस समय प्रेमचन्द जी के प्राणों पर बोझ बनकर बैठी हुयी थी। मैं या कोई उसको उस समय किसी तरह नहीं बटा सकता था। चिंता का केन्द्र यही था कि 'हंस' कैसे चलेगा? नहीं चलेगा तो क्या होगा? 'हंस' के लिए तब भी जीने की चाह उनके मन मं थी और ' हंस' न जियेगा, यह कल्पना उन्हें असह्य थी, पर हिन्दी-संसार का अनुभव उन्हें आश्वस्त न करता। 'हंस' के लिए न जाने उस समय वह कितना झुककर गिरने को तैयार थे।मुझे यह योग्य जान पड़ा कि कहूं ...' हंस' मरेगा नहीं, लेकिन वह बिना झुके भी क्यों न जिये? वह आपका अखबार है, तब वह बिना झुके ही जियेगा। लेकिन मैं कुछ भी न कह सका और कोई आश्वासन उस साहित्य-सम्राट को आश्वस्थ न कर सका।थोड़ी देर में बोले -गरमी बहुत है, पंखा करो। मैं पंखा करने लगा। उन्हें नींद न आती थी, तकलीफ बेहद थी। पर कराहते न थे, चुपचाप आंख खोलकर पड़े थे।दस पंद्रह मिनट बाद बोले-जैनेन्द्र, जाओ, सोओ।क्या पता था अब घड़ियां गिनती की शेष हैं, मैं जा सोया। और सबेरा होते-होते ऐसी मूर्छा उन्हें आयी कि फिर उनसे जगना न हुआ।

हिंदी संसार उन्हें तब आश्वस्त कर सकता था, और तब नहीं तो अभी भी आश्वस्त कर सकता है। मुझे प्रतीत होता है, प्रेमचन्द जी का इतना ऋण है कि हिन्दी संसार सोचे, कैसे वह आश्वासन उस स्वर्गीय आत्मा तक पहुंचाया जाये।
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टिप्पणियाँ:-

गीतिका द्विवेदी:-
कई बार टिप्पणी करने के लिए शब्द साथ नहीं देते।इस संस्मरण को पढ़ने के बाद आज भी मेरे साथ यही हो रहा है। बेहतरीन संस्मरण है।कुछ पंक्तियाँ लाजवाब है -शांत नास्तिक संत की शक्ति पर --             शारीरिक व्यथा थी,पर मन निर्वीकार था ------               मैं बहुत प्रभावित हुई                                                                                            शारीरिक व्यथा थी,पर मन निर्विकार था

गरिमा श्रीवास्तव:-
प्रेमचंद के अंतिम क्षण साझा करने के लिए आभार कविताजी।जितनी बार पढ़ो उतनी बार नए प्रेमचंद दीखते हैं।अपने छोटे-2 दुखों ,पीड़ाओं को हम बृहत् बनाकर देखते _दिखाते हैं और अपने से परे सोच नहीं पाते।प्रेमचंद उस अंतिम घड़ी में भी मनुष्य को सुसंस्कृत करने की इच्छा से परिचालित' हैं'-हैं इसलिए कि वे साहित्य में अब भी जीवित हैं,हम सबको यह याद दिलाते हुए कि बृहत्तर मनुष्यता का हित ही हमें मनुष्य के रूप में जीवित रख पायेगा,वर्ना तो चौपाया जानवर...सिर्फ अपना पेट भरने की चिंता से आप्लावित।एक अफ़सोस -सा तारी हो जाता है जब भी जैनेन्द्र का यह टुकड़ा पढ़ती हूँ...इतना प्रतिभाशाली साहित्यकार अच्छा इलाज ,पौष्टिक भोजन न पा सका।संग्रहिणी रोग असाध्य नहीं आज ,पर प्रेमचंद का पीछाआर्थिक अभाव ने कभी छोड़ा ही नहीं।कभी मन करता है  2015 को पीछे खींचकर 1936 तक ले जाऊं और पूरी ताकत लगाकर कफ़न और मन्त्र और गोदान और महाजनी सभ्यता और ....और कई लेख ,उपन्यास,300से अधिक कहानियों के रचयिता को खूब भरपेट खाना खिलाऊँ,लिखने को स्टडी रूम दूं,देखभाल के लिए चिकित्सकों का इंतज़ाम करूँ...वे लिखें ...खूब लिखें....हमारे वर्तमान का यथार्थ,पुरस्कारों की राजनीति,छद्म साहित्य के छल,चोरी ,झूठ का पर्दाफाश और  विभेद का चरित्र,अवसरवादी राजनीति और समाज का बदलता चरित्र...क्योंकि उन्होंने ही तो कहा था 'अब आदर्श से काम नहीं चलेगा'...उनका छोड़ा काम हमें पूरा करना है देखना है कि फिर कोई प्रेमचंद जैसा साहित्यकार दवा-इलाज़ को न तरसे,पत्रिका चलाने को घर बंधक न रखे...ज़िन्दगी के अभाव उसकी रचनात्मकता में बाधक न बनें।हम रचनाकार न बन सकें कम से कम रचनाकारों को पहचानें ...उन्हें पाथेय तो
तो दें।उसकी असाधारणता को साधारणता में बदलने वाली प्रतिगामी शक्तियों को कम अज़ कम पहचानें तो सही।आमीन।

कविता वर्मा:-
डॉ गरिमा जी बिलकुल सही कहा आपने । हमारे इन महान साहित्यकारों ने इतनी परेशानियां उठा कर साहित्य की जो सेवा की है और हमारे लिये ऐसी विरासत छोड़ी है जिससे पीढ़ी दर पीढ़ी हम मार्गदर्शन पायेंगे । सच मन व्याकुल हो जाता है कि हम इनके लिये आवश्यक सुविधा तक ना दे सके ।  आभार आपका ( प्रस्तुति मनीषा जैन )

अशोक जैन:-
" लोग ऐसे समय याद करते हैं ईश्वर। मुझे भी याद दिलाई जाती है। पर अभी तक मुझे ईश्वर को कष्ट देने की जरूरत नहीं मालूम हुई है"

अन्तिम समय में यह भाव एक चिंतक साधु ही रख सकता है। बिल्कुल सम्यक भाव। अंतिम क्षणों में शरीर की वेदना नहीं हंस और साहित्य की चिंता।

प्रेमचंद को बचपन में पढ़ा, जवानी में पढ़ा और अभी भी पढ़ रहे हैं। मतलब हर उम्र के लिए साहित्य। स्मरण कीजिये अंग्रेजों के राज्य में इतनी वीरता और निडरता से लिखना। और दलित समाज और महिलाओं के अधिकारों के प्रति उस जमाने में जागरूकता ! महिलाओं की स्वतंत्रता , जो प्रेमचंद की सोच है, शायद आज के पढ़े लिखे आधुनिक समाज में नहीं है।

जैनेंद्र जी ने प्रेमचंद के अंतिम क्षणों की पीड़ा को शब्दों में समेटने का प्रयास किया है पर उनके अन्तर्मन की वेदना वे ही जाने।

निश्चित ही वे विपन्नता में जिये पर हमें एक अमूल्य साहित्यिक धरोहर छोड़ गये।

इस संस्मरण को ग्रुप में साझा करने के लिए आभार।

गणेश जोशी:-
बहुत ही मार्मिक। जैनेन्द्र जी की महान साहित्यकार से अंतिम मुलाकात के संस्मरण को साझा करने के लिए शुक्रिया।

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