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सत्यनारायण पटेल हमारे समय के चर्चित कथाकार हैं जो गहरी नज़र से युगीन विडंबनाओं की पड़ताल करते हुए पाठक से समय में हस्तक्षेप करने की अपील करते हैं। प्रेमचंद-रेणु की परंपरा के सुयोग्य उत्तराधिकारी के रूप में वे ग्रामांचल के दुख-दर्द, सपनों और महत्वाकांक्षाओं के रग-रेशे को भलीभांति पहचानते हैं। भूमंडलीकरण की लहर पर सवार समय ने मूल्यों और प्राथमिकताओं में भरपूर परिवर्तन करते हुए व्यक्ति को जिस अनुपात में स्वार्थांध और असंवेदनशील बनाया है, उसी अनुपात में सत्यनारायण पटेल कथा-ज़मीन पर अधिक से अधिक जुझारु और संघर्षशील होते गए हैं। कहने को 'गांव भीतर गांव' उनका पहला उपन्यास है, लेकिन दलित महिला झब्बू के जरिए जिस गंभीरता और निरासक्त आवेग के साथ उन्होंने व्यक्ति और समाज के पतन और उत्थान की क्रमिक कथा कही है, वह एक साथ राजनीति और व्यवस्था के विघटनशील चरित्र को कठघरे में खींच लाते हैं। : रोहिणी अग्रवाल

कविता : अर्जुन राठौर

"पहाड़"

पहाड़ सदियों से खड़े हैं 

अपनी जगह एक जैसे 

पहाड़ कभी भी रातों रात 

खड़े नहीं होते
पहाड़ों के पहाड़ 

बनने के पीछे एक लम्बा सिलसिला होता है 

जिस तरह से पहाड़ एकाएक नहीं बनते

ठीक इसी तरह पहाड़ों से लगी खाई भी एकाएक 

खाई नहीं बनती
पहाड़ और खाई एक दूसरे के

पूरक होते हैं
खाई के बिना किसी पहाड़ के बारे 

में सोचा भी नहीं जा सकता 

पहाड़ अपनी उंचाई पर गर्व करते हैं 

पहाड़ों का यह गर्व
पीढ़ी दर पीढ़ी 

कायम रहता है
पहाड़ अपनी ओर से 

कुछ नहीं बोलते
कुछ नहीं करते 

वे तो बस खड़े रहते हैं 

अविचल
अपनी जगह
एक जैसे 

"एक अराजक दिन "

मेरे पास इस बात का कोई

जवाब नहीं है कि आज मैंने 

अखबार क्यों नहीं पढ़े ?

और क्यों नहीं देखा फेसबुक 

नहीं देखे एसएमएस 

या क्यों नहीं देखा डाक का डिब्बा 

जहां कोई डाक भूले भटके आ गई हो 

आज मैं पूरा दिन अराजकता में जीना चाहता हूं  

चाहता हूं कि जाउं गडरियों के बीच और उनसे सीखूं 

भेड़ों को चराने की कला
या फिर ग्वालों के बीच और 

उनसे पूछुुं वे कैसे दूहते हैं गाय और भैंस का दूध

आज वाकई 
दिन अराजक है

चाहता हुूं कुछ ऐसा करूं जो कभी न 

किया हो. 

"वे चाहते हैं"

वे चाहते हैं कि 

जब वे जायकेदार पकवान खा 
रहे हों 
तब लोग उनकी ओर 

भूखी और ललचायी निगाहों से न देखें 

वे चाहते हैं कि वे जब संसद में जा रहे 

हों तब लोग उनसे प्रश्न न पूछे
न पूछें 
उनसे उन सवालों के जवाब 

जो वे दे सकते नहीं 

भूख से सिकुड़े पेट और चेहरे को लेकर 

उनकी गरिमा और शालीनता को 

शर्मिंदा न करें
वे यह भी चाहते हैं 

कि लोग रास्तों पर कतारबद्ध खड़े रहें 

और उनके गुजरने तक केवल 

मौसम पर ही चर्चा करें 

वे चाहते हैं कि 

जब उनकी दाढ़ में दर्द हो रहा हो 

तब लोग इसे देशव्यापी संकट मानें 

और इस पर चर्चा करें । 

"नहीं मिलते लोग अब आसानी से"

नहीं मिलते लोग अब आसानी से

उन ठियों पर जहां पहले मिल जाया करते थे 

दुर्लभ ही होते जा रहे हैं कुछ लोग तो खरमौर की तरह 

जाने किस दड़बे में छुपे रहते हैं  इनसे मिलना बेहद कठिन है

फेसबुक, श्मशानघाट और लोगों के उठावने नए ठिए हैं 

अब दूसरों से मिलने के लिए  अगर किसी से आपकी लंबे

समय से मुलाकात नहीं हुई तो समझ लीजिए
कोई मरा नहीं है सब जिंदा हैं मगर सुरक्षित हैं अपने अपने घरों में. 

लेखक हो या शायर सबको चाहिए फेसबुक 

अपनी अभिव्यक्ति के लिए  जिंदा इंसानों से ज्यादा अच्छा है 

वचुअ‍र्ल जगत / यहां न तो किसी को झेलना पड़ता है और 

ना ही पिलाना पड़ती है चाय / यहां किसी दूसरे के लिए 

संवेदना की भी जरूरत नहीं / बस अपनी हांकी और चल दिए. 

इंसानी रिश्तों से बढ़कर हो गए आंकड़ों के जाल

जिंदा दोस्तों की जिन्हें खबर नहीं वे खोज रहे हैं देशभर में

फेसबुक फ्रेंड / सच ही तो है आने वाले दिनों में फेसबुक 

पर ही हो जाएंगी शोक सभाएं और यहीं पर दे दी जाएगी 
सच्ची श्रद्धांजलि अपनों को. 

000 अर्जुन राठौर
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टिप्पणियाँ:-

संजीव:-: पहाड और एक अराजक दिन दोनों ही कविताएँ कुछ अलग बयान करती हैं। पहाड एक विराट व्यक्तित्व के बनने और उसकी गंभीरता को उकेरती है। बनावटी महानता वाचाल होती है पर स्वभाविक नहीं । पहाड प्रकृति का वह हिस्सा है जो विचलित नहीं होता जब तक कि उसके  गर्भ में हलचल न हो। इसका अर्थ है कि उसे बाहर के झंझावात हिला नहीं पाते। समय और जीवन के बीच एक आभासी दुनिया के हस्तक्षेप ने दोनों की संगति लय ताल के तानेबाने को बिखेर दिया है। यह सच है कि इस बिखराव को अराजकता ही कुछ कम सकती। अराजकता का जो अर्थ सत्ता और व्यवस्था लगाती है यहाँ उस अर्थ में बिल्कुल नहीं पढा जाना चाहिए। अराजक होने का अर्थ जीवन विरोधी होना है व्यवस्था विरोधी होना है और जीवन को नए सिरे से रचना है। कविता जीवन के इस बिखराव और उसके फिर से रचे जाने की गहन वैचारिक ऊर्जा से भरी हुई है। आज मानवता पर जो संकट है वह आभासी दुनिया और वास्तविक दुनिया के बीच जीवन के चुनाव के विकल्प का संकट है।हमें यह बताया जा रहा है कि इस आभासी दुनिया का कोई विकल्प नहीं है। हमें इसमें जीने की आदत डाल लेनी चाहिए। आज की तारीख का तथाकथित पैकेज्ड मध्य वर्ग इसे जीवन का सत्य मान कर चल रहा है। यह वर्ग यह नहीं समझ पा रहा है कि उसे किस तरह की अमानवीय और बर्बरता की स्थितियों की ओर धकेला जा रहा है। यह कविता हमें एक मानवीय जीवन को रचने की ओर ले जाने का विकल्प देती है।

आलोक बाजपेयी:-: कविताएं और संजीव जी की टिप्पणी ने सोचने को मजबूर किया।प्रश्न गंभीर है और गहराई में उतरने की मांग करता है।गांधी जी की अन्तर्दृष्टियो के आधार पर कुछ कहने की कोशिश करता । संकछिप्त ही लिख पाउगा अभी।
पूंजीवाद अपनी तमाम विफलताओं के बावजूद कर्म संबंधी मुख्य संचालक बना हुआ है तो इसके बाकी जो भी कारण हो पर बहुत महत्त्वपूर्ण करक यह भी रहा है की यह गतिशील रहा है और खुद को विस्तारमूलक एवम् वैश्वीकीय रूप से जुड़ाव वादी बनाये रखा है।
इस हेतु इसने 'समय'की अवधारणा को अपने प्रभुत्त्व में रखा है।समय को regulate करने और अपने वैश्विक चरित्र को बनाये रखने के लिए विज्ञान को पदच्युत कर तकनिकी को ही केंद्र में स्थापित कर दिया गया।जबकि तकनिकी मात्र साध्य है साधन नहीं।
यह कविताएं इन अर्थो में पूँजीवाद की इस विद्रूपता को आसान तरह से व्यक्त करती है।
पूँजीवाद का बहुत गंभीर प्रभाव मानवीय संवेदनाओ और संबंधो पर पड़ा है।हम औपचारिकताओं के दौर में जी रहे है जहा profit की अघोषित सीमा रेखाएं खिची हुई है।
आभासी दुनिया हमें एक तरह की मृग मरीचिका में ले जाती है जहा  पूँजीवादी connectivity का एक छलावा है और जब यह हमारी मानसिक सोच का अभिन्न तत्व बन जाता है तब हम  उसी पूँजीवादी दिवा स्वप्नों से घिरते चले जाते है ।
निश्चित ही तस्वीर का अन्य पहलु भी है पर मेरा मानना है कि समाज सुधार के छेत्र में extreme ideas का अपना महत्व् है।

अलकनंदा साने:-: पहली कविता पहाड़ और खाई शुरू में ऐसे लगती है , मानो किसी असमानता का वर्णन कर रही है, लेकिन बाद में वह पहाड़ का बखान करती नजर आती है . कवि (कविताओं से लग रहा है कि कवि ही है,कवयित्री नहीं) इस कविता में क्या कहना चाहता है, स्पष्ट नहीं हो पाता. यदि सिर्फ पहाड़ की विशेषता बतानी थी तो पहले खाई के वर्णन  की क्या आवश्यकता थी ? ''एक अराजक दिन'' पढ़ते हुए  मराठी फिल्म "एक उनाड दिवस''(एक आवारा दिन) याद आ गई. उस फिल्म का नायक अनुशासन प्रिय उच्चाधिकारी होता है और एक दिन अनायास विपरीत परिस्थितियों की वजह से उसे अपने अनुशासन को तोडना पड़ता है.पहले उसे झल्लाहट होती है, फिर वह उन स्थितियों का आनंद लेने लगता है. कवि की मंशा भी मुझे ऐसी ही लगती है, शीर्षक में अराजक शब्द कविता के प्रति दृष्टिकोण बदल देता है , पर  कवि वास्तव में अपनी सामान्य दिनचर्या से हटकर कुछ करना चाहता है और इसीलिए कहता है कि ''चाहता हूँ कि कुछ ऐसा करूँ जो कभी न किया हो'' यह हर व्यक्ति की इच्छा होती है. तीसरी कविता ''वे चाहते हैं''  कुछ अधूरी लगती है और जो घट रहा है उसका वर्णन मात्र है.इस कविता पर काफी काम किया जा सकता है .चौथी और अंतिम कविता भी वर्णनात्मक ही है.अब सोशल साइट्स को कितना भी भला बुरा कहे, उनसे बचना तभी तक असंभव है, जब तक हमने उनका प्रयोग नहीं किया है. एक बार शुरू करने पर उस पर सक्रिय बने रहना इन दिनों एक तरह से सामाजिक दायित्व भी हो गया है. दूसरे वह काफी सुविधाजनक भी है. सवाल सिर्फ इतना है कि हम उसका उपयोग किस तरह करते हैं. आलोक जी की इस बात पर विचार किया जाना चाहिए कि तकनीक एक साधन है, साध्य नहीं. हर चीज के दो पहलू होते हैं सकारात्मक और नकारात्मक. हम क्या स्वीकार करते हैं, अंत में यह प्रत्येक का निजी दृष्टिकोण है. कविताएँ सपाट बयान मात्र है, उनमें काव्य नहीं है. कई बार मुक्त छंद से छंद शब्द हटा दिया जाता है और कविता को मात्र मुक्त समझा जाता है,लेकिन मुक्त छंद कविता में भी एक लय होनी चाहिए, गीतात्मकता होनी चाहिए, तभी वह कविता होती है अन्यथा कविता और गद्य में क्या फर्क रह जाता है ?

आशीष मेहता:-: मेरे विचार से आलोकजी, "पूंजीवाद के द्वारा विज्ञान को पदच्युत कर, तकनीक को केंद्र में लाने" पर बहुत सटीक हैं । बाजार (पूंजीवाद) 'तकनीक' को "साधन" बना कर ही बेचता है। बकायदा जनमानस के मन में 'तकनीक' / साधन की भूख जगाई जाती है (मानसिक अनुकूलन?) । उचित हद एवं नैतिकता के दायरे में यह 'विकास प्रक्रिया ' होती है। इस तरह से पूंजीवाद के लिए 'तकनीक' "साध्य" बन जाती है। विज्ञान को वर्चस्व के लिए उपयोग करना एक महत्वपूर्ण औजार है पूंजीवाद का।... 'कविता पर केंद्रित होने की सलाह ' के नतमस्तक, यह पोस्ट अपनी बात को पूरी करने के लिए कर रहा हूँ। क्षमा करें।

मनीषा जैन :-: पहली कविता में पहाड़ के लिए कोई खास बात नहीं लगी मुझे। वे तो खड़े ही है अविचल।
दूसरी कविता में अराजकता भरे दिनों में कुछ अच्छा करना चाहता है कवि।
किसी ने कहा भी है कि चलो कुछ यों किया जाए, किसी रोते हुए बच्चे को हंसाया जाए।
तीसरी कविता सत्ता पक्ष के विपक्ष की कविता है। फासीवाद की आहट है।
चौथी बेहद समसमायिक। आज जो हो रहा है उसकी झलक। आज यदि किसी साहित्यकार की मृत्यु होती है तब सोशल साइट पर बहुत संवेदना संदेश होते हैं लेकिन उसको शमशान तक पंहुचाने के लिए चार कंधे एकत्र नहीं हो पाते।
कविताऐ समकालीन अराजकता विडम्बना को चित्रित करती है। पहली ज्यादा मुत्तासिर नहीं करती। फिर भी औरों पर बात की जा सकती है।

मणि मोहन:-: सामयिक है कविताएँ पर प्रभाव नहीं छोड़ पा रही ...अपने समय की धड़कन को किस भाषा , संगीत और लय के साथ कवि अपनी बात कह रहा है यह महत्वपूर्ण होता है वरना तो यह सच एक आमजन भी अपनी तरह से व्यक्त करता ही रहता है ।कवित में सम्प्रेषणीयता भी अपनी काव्यगत शर्तों को पूरी करने के बाद आनी चाहिए वरना सपाट बयानी का खतरा बना ही रहता है ।कविता पर बात करना और कविता के बहाने किन्हीं मुद्दों पर बात करना दो अलग बातें है ।मैं और साथियों की इस बात से सहमत हूँ कि ये कविताएँ थोड़ी सपाट हैं ।

आलोक बाजपेयी:-: मेरे लिए भाषा का मानक भवानी प्रसाद मिश्र जी है।सप्पतबयानी अपने आप में अच्छी या बुरी चीज़ नहीं।संभतः जिसे हम सपाटबयानी कह कर खारिज कर रहे हो वह भाषा की सरलता हो?
जैसे मैं बोलता हु वैसे तू लिख
उस के बाद भी मुझसे बड़ा तू दिख।।

संजना तिवारी:-: बढ़िया कवितायेँ , कुछ अलग , कुछ नयापन लिए,फेसबुक की रुपरेखा जिसके नकारात्मक प्रभाव को दिखाया गया है , उससे थोड़ी असहमति है क्योंकि fb आप जैसे यूज कर रहें हैं वैसा ही फल पा रहे हैं । हम से बहुत साथ हैं यहाँ केवल fb से ☺ बहुत कुछ दे भी रहा है fb ,खैर वो बात अलग है ।
कवि को बधाई।

आर्ची:-: सारी कविताएँ अच्छी हैं वर्तमान परिस्थितियों पर व्यंग्य करती हुई यथार्थ का चित्रण दे जाती हैं पहाड कविता में खूबसूरत तरीके से अहंकारी लोगों पर प्रहार किया गया है वे चाहते हैं नामक कविता का राजनेताओं पर किया गया तंज भी सटीक है नहीं मिलते.. कविता भी सोशल नेटवर्किंग से सोशल लाइफ किसतरह से बदल/बरबाद हो रही है इस बात पर उम्दा व्यंग्य किया गया है.. एक अराजक दिन सबसे अच्छी लगी सच है कभी कभी एक ही तरह के रूटीन मशीनी व्यस्तता और ओढे हुअ अनुशासन को निकाल फेंकने का मन करता है... साधूवाद

अशोक जैन:-: बहुत ही सुंदर कवितायें

पहाड़, निश्चित ही एक अहंकारी  से तुलना और पीढ़ी दर पीढ़ी यह अहंकार आज हम कई जगह देख रहे हैं।

एक अराजक दिन
सही बात है इन सब चीजों के इतने लती हो गये हैं कि कभी कभी इच्छा होती है कि ऐसी जगह पहुंच जायें जहाँ यह सब नहीं हों और एक मोहक प्राकृतिक वातावरण में जीवन बितायें।

वे चाहते हैं
वर्तमान राजनैतिक व्यक्तियों की वर्तमान स्थिति पर कटु और सदैव सामयिक व्यंग्य।

नहीं मिलते लोग अब आसानी से
पिछले कुछ वर्षों में संचार साधनों में हुई अभूतपूर्व क्रांति ने जहाँ जीवन सरल बनाया है वहीं दुनिया नजदीक आई है पर पड़ोसी और मित्र दूर हो गये हैं। बचपन का मित्र महिनों नहीं दिखेगा तो कोई बात नहीं पर सोशल मीडिया का मित्र , जो फर्जी भी हो सकता है, एक दिन आनलाइन नहीं दिखेगा तो बैचेन हो जायेंगे। सटीक व्यंग।

कविताओं को साझा करने के लिए आभार।

ब्रजेश कानूनगो:-: सभी कवितायेँ विषयवस्तु में सम्पन्न हैं।कलागत कुशलता की अपेक्षा रखती हैं।अभ्यास से वह भी निखर जाएगा। उस दिन को 'अराजक' की बजाये कुछ और कहा जाना चाहिए।

फ़रहत अली खान:-: आज की कविताओं के भाव बेहद मज़बूत हैं। कितनी सरलता से ये कविताएँ हमें कितनी ज़्यादा गहराई में ले जाती हैं, ये ग़ौर करने योग्य बात है।
दूसरी ओर मैं कानूनगो जी की बात से भी सहमत हूँ। कलागत कुशलता का कुछ अभाव नज़र आया।
मसलन:-
1. 'वे चाहते हैं' कविता में जब कवि ने कहा:
''भूख से सिकुड़े पेट और चेहरे को लेकर
उनकी गरिमा और शालीनता को
शर्मिंदा न करें"
तब पढ़कर ऐसा प्रतीत हुआ गोया 'भूख से सिकुड़े पेट और चेहरे' अहल-ए-संसद (यानी सांसदों) के ही हैं। अगर इस पंक्ति में कुछ बदलाव किया जाता या इस से पहले 'किसी के' लगा दिया जाता तो शायद ये भ्रम बाक़ी न रहता।

2. 'नहीं मिलते लोग अब आसानी से' कविता में ये देखें:
'आपकी लंबे

समय से मुलाक़ात नहीं हुई तो समझ लीजिये'

ये दो पंक्तियाँ हैं; यहाँ 'लंबे' को पहली पंक्ति में व 'समय' को दूसरी पंक्ति में रखा गया; जबकि इन दोनों शब्दों के सार्थक होने के लिए इनका दोनों में से किसी एक पंक्ति में एक साथ(अर्थात 'लंबे समय') आना ज़रूरी था।
दोनों शब्दों का अलग अलग होना 'ग़ज़ल' जैसी किसी नियम-बद्ध विधा में तो चल सकता है; लेकिन कविता या आज़ाद नज़्म जैसी विधा में जहाँ कोई नियम-बंदिश नहीं है, ऐसा होना कुछ दुरुस्त नहीं लगता।

प्रज्ञा :-: वे चाहते हैं बहुत अच्छी लगी। वे और तुम के बीच की विभाजक रेखा के साथ दो दुनियाएं अपने वजूद के साथ मौज़ूद दिखाई दीं।
नहीं मिलते लोग अब आसानी से कविता ने भी छुआ। फैज़ की नज़्म ताज़ा हुई
कुछ दिन पहले आँखों आगे क्या क्या न नज़ारा गुज़रे था
थे कितने अच्छे लोग कि जिनको अपने ग़म से फुर्सत थी
सब पूछते थे एहबार जो कोई दर्द का मारा गुज़रे था।
इस कविता के अंत में लम्बी पंक्तियाँ कुछ खटकी । कविता गद्य में रूपांतरित होती महसूस हो रही है।
अन्य कविताएँ भी अच्छी लगीं अपने समय को लिखती सी।
शुभकामनाएं।
शुक्रिया कविता जी। कल रेणुका जी निधि जी किसलय जी आभा जी स्वाति जी रूचि जी से बाद में परिचय हुआ। कल का दिन अब तक का सबसे तरंग भरा दिन था। सब के घर आँगन सबके लिये खुले। ताज़ी हवा सा दिन ।

मिनाक्षी स्वामी:-: कविताओं के भाव अच्छे हैं। शिल्प पर अभ्यास से स्वतः पकड बनेगी।
'वे चाहते हैं' सबसे अच्छी लगी। व्यंग बखूबी उभरकर आया है।
ब्रजेश जी से सहमत।अराजक की जगह दूसरा कोई शब्द होना था।
दरअसल रोज की बंधी बंधाई अनुशासित जिंदगी से ऊबकर संभवत:  व्यक्ति प्रकृति के सानिध्य में जाना चाहता है, खुलकर निर्बंध जीना चाहता है। अनुशासन से मुक्त होना चाहता है।
यही भाव प्रबल है।
कविताओं में वर्तमान परिदृश्य की विसंगतियों को लेकर चिंता है।
अच्छी कविताएं पढवाने के लिए आभार।

कविता वर्मा: आज की कविताऐं समूह के साथी अर्जुन राठौर जी की हैं ।सभी कविताऐं जीवन से बेहद जुड़ी हुई सहज सरल अभिव्यक्ति से सजी हैं जो हौले से दिमाग में उतर कर सोचने को मजबूर करती है । आज इन कविताओं पर अच्छी चर्चा हुई । चर्चा अभी भी जारी रहे ।

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