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सत्यनारायण पटेल हमारे समय के चर्चित कथाकार हैं जो गहरी नज़र से युगीन विडंबनाओं की पड़ताल करते हुए पाठक से समय में हस्तक्षेप करने की अपील करते हैं। प्रेमचंद-रेणु की परंपरा के सुयोग्य उत्तराधिकारी के रूप में वे ग्रामांचल के दुख-दर्द, सपनों और महत्वाकांक्षाओं के रग-रेशे को भलीभांति पहचानते हैं। भूमंडलीकरण की लहर पर सवार समय ने मूल्यों और प्राथमिकताओं में भरपूर परिवर्तन करते हुए व्यक्ति को जिस अनुपात में स्वार्थांध और असंवेदनशील बनाया है, उसी अनुपात में सत्यनारायण पटेल कथा-ज़मीन पर अधिक से अधिक जुझारु और संघर्षशील होते गए हैं। कहने को 'गांव भीतर गांव' उनका पहला उपन्यास है, लेकिन दलित महिला झब्बू के जरिए जिस गंभीरता और निरासक्त आवेग के साथ उन्होंने व्यक्ति और समाज के पतन और उत्थान की क्रमिक कथा कही है, वह एक साथ राजनीति और व्यवस्था के विघटनशील चरित्र को कठघरे में खींच लाते हैं। : रोहिणी अग्रवाल

निकारगुआ के चर्चित कवि अर्नेस्टो कार्दिनल की दो कविता

इन कविताओं के अनुवाद के साथ ही अंग्रेजी की मूल कविता भी दी गयी हैं। साथियों ने इन कविताओं के मूल भाव कथन शिल्प और अनुवाद पर विस्तृत चर्चा की है।

अंग्रेजी से अनुवाद : मणि मोहन
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मर्लिन मुनरो के लिए एक प्रार्थना
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प्रभु
स्वीकार करो इस खूबसूरत स्त्री को दुनियाँ जिसे मर्लिन मुनरो के नाम से जानती थी
हांलाकि यह उसका वास्तविक नाम नहीं था
( परन्तु आप उसका असली नाम जानते हैं , एक अनाथ , छः वर्ष की उम्र में जिसके साथ बलात्कार हुआ ; दुकान पर काम करने वाली वह लड़की जिसने सोलह की उम्र में आत्महत्या की कोशिश की ) ।

अब वह आपके सामने है बिना किसी मेकअप के
बिना अपने प्रेस एजेंट
बिना छायाकारों
और आटोग्राफ के लिए पागल भीड़ के बिना
एक अंतरिक्ष यात्री की तरह
अंतरिक्ष की रात्रि का सामना करती
एक तन्हा लड़की ।

जब वह छोटी थी तो उसने एक सपना देखा था
कि वह चर्च में नग्न खड़ी थी
( टाइम अकाउंट के अनुसार )
सज़दे में झुकी भीड़ के सामने , उनके सिर फर्श पर टिके थे
और इस वजह से उसे पंजों के बल चलना पड़ा था ।
आप एक मनोचिकित्सक से बेहतर जानते हो सपनो को ।
चर्च , घर , गुफा सब के सब कोख की सुरक्षा की ओर संकेत करते हैं
परन्तु इसके अतिरिक्त भी...
जो सिर हैं वे उसके चाहने वाले हैं , यह स्पष्ट है
( अन्धकार में प्रकाश की किरण के नीचे अनगिनित सिर )
परन्तु यह पवित्र जगह ट्वेंटीथ सेंचुरी फॉक्स का स्टूडियो नहीं है ।

संगमरमर और स्वर्ण से बनी यह इबादतगाह उसकी देह है
जिसमे मनुष्य का पुत्र हाथ में चाबुक लिए खड़ा है
ट्वेंटीथ सेंचुरी फॉक्स स्टूडियो के मालिकों को खदेड़ता हुआ
जिन्होंने तुम्हारे प्रार्थना घर को चोरों की गुफा में बदल दिया है ।

प्रभु
पाप और रेडियोधर्मिता से प्रदूषित इस दुनियाँ में
किसी दुकान में काम करने वाली लड़की पर
सारे इलज़ाम मत लगाओ
जिसने दुकान पर काम करने वाली किसी आम लड़की की तरह
स्टार बनने का सपना देखा था ।
उसका स्वप्न यथार्थ में बदल गया
( किसी फ़िल्मी यथार्थ की तरह )
हमारे अपने जीवन की कथा
और पटकथा असंगत थी ।
उसे क्षमा करें प्रभु
हमे भी क्षमा करें
हमारी बीसवी शताब्दी के लिए ।

इस कोलॉसल सुपर प्रोडक्शन के लिए जहां हम सब काम करते थे ।
वह प्रेम की भूखी थी और हमने उसे नींद की गोलियां दीं ।
चूँकि हम सन्त नहीं थे इसलिए अवसाद से बचने के लिए मनोचिकत्सा सुझाई गई थी ।

याद है , प्रभु ..कैमरे के प्रति उसका भय
और मेकअप के प्रति उसकी घृणा
हर सीन के लिए उसकी नए मेकअप के लिए ज़िद
और किस तरह पनप रहा था उसके भीतर भय
जिसकी वजह से वह स्टूडियो के लिए अक्सर लेट हो जाती थी ।

किसी आम सेल्सगर्ल की तरह
उसने स्टार बनने का सपना देखा था ।
और उसका जीवन मायावी था
किसी स्वप्न की तरह
मनोचिकित्सक जिसकी व्याख्या का रिकार्ड संधारित करते थे ।

उसकी रूमानियत बन्द आँखों के साथ किसी चुम्बन की तरह थी
और जब उसने उन्हें खोला
तो महसूस किया कि वह फ्लडलाइट के ठीक नीचे थी
( जैसे ही उन्होंने फ्लडलाइट बन्द की ! )

और उन्होंने उस कमरे की दोनों दीवारें हटा दीं ( वह एक फ़िल्मी सेट था )
निदेशक अपनी पटकथा के साथ चला गया
क्योंकि शॉट फिल्माया जा चुका था ।

या फिर एक नौका में समन्दर की कोई सैर , एक चुम्बन सिंगापूर में
रियो में विंडसर के ड्यूक और उसकी पत्नी के साथ एक नृत्य
एक सस्ते अपार्टमेंट की छोटी सी बैठक में देखा जा चुका सब कुछ ।

फ़िल्म खत्म हुई बिना अंतिम चुम्बन के ।
अपने बिस्तर पर वह मृत मिली थी
और उसका हाथ टेलीफ़ोन पर था ।
और गुप्तचर कभी नहीं जान पाये
कि वह किसे फोन करना चाहती थी ।
उसकी हालत
ठीक उस व्यक्ति की तरह थी जिसने अपने एकमात्र मित्र की आवाज़ सुनने के लिए फोन किया था
और सुनी थी एकमात्र आवाज़ रिकॉर्डिंग की - रॉन्ग नम्बर
या फिर
उस व्यक्ति की तरह जिसे गुंडों ने घायल कर दिया था
कटे हुए टेलीफोन तक पहुंचने से पहले ।

प्रभु
वह कोई भी रहा हो जिसे वह फोन करने वाली थी
और फोन नहीं किया
( और सम्भव है वह कोई भी नहीं था या फिर कोई था
जिसका नम्बर लॉस एन्जिल्स की फोनबुक में नहीं था )
आप उस फोन का जवाब जरूर दें !

तोते
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मेरा दोस्त मिशेल एक सैन्य अधिकारी है होंदुरेन सीमा पर , सोमाटो के निकट
और एक दिन उसने मुझे बताया
कि उसने प्रतिबंधित प्रजाति के तोतों को पकड़ा
जिन्हें तस्करी से अमेरिका भेजा जा रहा था
जहाँ वे अंग्रेजी बोलना सीखते ...

यहाँ कुल 186 तोते थे
जिनमे से 47 तोते अपने पिंजरों में दम तोड़ चुके थे
मेरा मित्र इन सभी तोतों को वापिस उस जगह ले गया जहाँ से उन्हें पकड़ा गया था
और जैसे ही लॉरी पहाड़ों के निकट
उस जगह पहुँची जहाँ तोतों का घर था
सभी तोते उत्तेजित हो जाये , अपने पंख फडफडाना शुरू कर दिए
टकराने लगे पिंजरों की दीवारों से .

और जब खोले गए पिंजरे
तो सब के सब बाहर निकले तीरों की बौछारों की तरह .

मैं सोचता हूँ
क्रांति ने ठीक यही किया था हमारे लिए भी
उसने मुक्त किया था पिंजरों से
जहाँ बंदी बनाया गया था हमे अंग्रेजी बोलने के लिए ,
उसने हमे वह मुल्क लौटाया
जहाँ से हम बेदखल हुए थे ,
हरे भरे पहाड़ लौटाए तोतों को
सुअपंखी साथियों ने ...
परन्तु वहां 47 थे जो मारे गए .
                                            

Lord
receive this young woman known around the world as Marilyn Monroe
although that wasn't her real name
(but You know her real name, the name of the orphan raped at the age of 6
and the shopgirl who at 16 had tried to kill herself)
who now comes before You without any makeup
without her Press Agent
without photographers and without autograph hounds,
alone like an astronaut facing night in space.
She dreamed when she was little that she was naked in a church
                              (according to the Time account)
before a prostrated crowd of people, their heads on the floor
and she had to walk on tiptoe so as not to step on their heads.
You know our dreams better than the psychiatrists.
Church, home, cave, all represent the security of the womb
but something else too …
The heads are her fans, that's clear
(the mass of heads in the dark under the beam of light).
But the temple isn't the studios of 20th Century-Fox.
The temple—of marble and gold—is the temple of her body
in which the Son of Man stands whip in hand
driving out the studio bosses of 20th Century-Fox
who made Your house of prayer a den of thieves.

Lord
in this world polluted with sin and radioactivity
You won't blame it all on a shopgirl
who, like any other shopgirl, dreamed of being a star.
Her dream just became a reality (but like Technicolor's reality).
She only acted according to the script we gave her
—the story of our own lives. And it was an absurd script.
Forgive her, Lord, and forgive us
for our 20th Century
for this Colossal Super-Production on which we all have worked.
She hungered for love and we offered her tranquilizers.
For her despair, because we're not saints
                                              psychoanalysis was recommended to her.
Remember, Lord, her growing fear of the camera
and her hatred of makeup—insisting on fresh makeup for each scene—
and how the terror kept building up in her
and making her late to the studios.

Like any other shopgirl
she dreamed of being a star.
And her life was unreal like a dream that a psychiatrist interprets and files.

Her romances were a kiss with closed eyes
and when she opened them
she realized she had been under floodlights
                                      as they killed the floodlights!
and they took down the two walls of the room (it was a movie set)
while the Director left with his scriptbook
                                                      because the scene had been shot.
Or like a cruise on a yacht, a kiss in Singapore, a dance in Rio
the reception at the mansion of the Duke and Duchess of Windsor
                    all viewed in a poor apartment's tiny living room.
The film ended without the final kiss.
She was found dead in her bed with her hand on the phone.
And the detectives never learned who she was going to call.
She was
like someone who had dialed the number of the only friendly voice
and only heard the voice of a recording that says: WRONG NUMBER.
Or like someone who had been wounded by gangsters
reaching for a disconnected phone.

Lord
whoever it might have been that she was going to call
and didn't call (and maybe it was no one
or Someone whose number isn't in the Los Angeles phonebook)  
You
answer that telephone!

The Parrots

My friend Michel is an army officer
in Somoto up near the Honduran border,
and he told me he had found some contraband parrots
waiting to be smuggled to the United States
to learn to speak English there.

There were 186 parrots
with 47 already dead in their cages.
He drove them back where they'd been taken from
and as the lorry approached a place known as The Plains
near the mountains which were these parrots' home
(behind those plains the mountains stand up huge)
the parrots got excited, started beating their wings
and shoving against their cage-sides.

When the cages were let open
they all shot out like an arrow shower
straight for their mountains.

The Revolution did the same for us I think:
It freed us from the cages
where they trapped us to talk English,
it gave us back the country
from which we were uprooted,
their green mountains restored to the parrots
by parrot-green comrades.

But there were 47 that died.

# Ernesto Cardenal
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टिप्पणियाँ:-

संजना तिवारी:-
दोनों कविताओं के विषय बेहद रुचिकर हैं लेकिन दूसरी कविता का अनुवाद पहली से कुछ अधिक बेहतर है ।
मर्लिन मुनरो को कविता में पिरोना उतना ही कठिन जान पड़ता है जितना उनकी खूबसूरती का उल्लेख करना
मर्लिन का जीवन बेहद रहस्यमयी दुनिया सा रहा क्योंकि वो अपने भीतर बहुत कुछ एक साथ जीती रहीं इसलिए उनके जीवन को इस तरह कविता रूप में पाठक तक पहुंचाने के लिए कवि प्रशंसा का पात्र है ।
आज की कवितायें अच्छी हैं

मणि मोहन:-
इन अनूदित कविताओं के लिए सभी मित्रों का ह्रदय से आभार ।अर्नेस्टो कार्डिनल निकरगुआ के सुविख्यात कवि हैं ।मर्लिन मुनरो के जीवन पर लिखी उनकी इस कविता ने मुझे बहुत प्रभावित किया सो इसका अनुवाद मित्रों के लिए प्रस्तुत किया ।अनुवाद करते हुए मैं मूल रचना से ज्यादा छेड़छाड़ नहीं करता हूँ और मेरी कोशिश उस भाषा के संगीत और उसकी लय को बनते कोशिश अपनी भाषा में लाने की होती है ।और क्या कहूँ ..पुनः आप सब के प्रति आभार ।
अनुवाद साझा करने के लिए कविता जी और मनीषा जी का शुक्रिया ।

डॉ शशांक शुक्ल:-
बेहतरीन कवितायेँ।
पहली कविता दिल को छूने वाली ।दूसरी कविता दिमाग को ।स्वाभाविक रूप में दिल से दिमाग तक जाने वाली कविता यानी पहली कविता उत्कृष्ट है ।

भावना मिश्रा:-
कुछ महीनों पूर्व ही मर्लिन मनरो की आत्मकथा पढ़ रही थी, आज सहसा ये कविता पढ़कर वे पन्ने फिर मेरी निगाहों के सामने फड़फड़ाने लगे।

मणिमोहन जी का आभार इस सुन्दर अनुवाद के लिए

अज्ञात:-
मैं पहली कविता पर बात कर रहा हूं। बेहतरीन कविता। कई पंक्तियों पर कविता की हकीकत स्तब्ध कर देती है। सुंदर अनुवाद। मूल कविता अंग्रेजी में भी पढी। अनुवाद निश्चित ही अंग्रेजी से ही किया गया है। सुंदर अनुवाद उपलब्ध कराने के लिए अनुवादक और संबंधितों को साधुवाद। तथापि... कई स्थानों पर अनुवाद में शब्दार्थ की बजाय भावार्थ पर जोर दिया जाना बेहतर होता। "मनुष्य का पुत्र " के स्थान पर "आदमी की औलाद " जैसे शब्द मेरी दृष्टि में बेहतर होते। कुल मिलाकर उत्कृष्ट मामला।
डॉ राजेन्द्र श्रीवास्तव, पुणे।

मणि मोहन:-
बहुत शुक्रिया डॉ यामनी जी ,
डॉ शशांक जी ,भावना जी , मनीषा जी , राहुल वर्मा जी , गुर्जर जी , राजेन्द्र जी ,ताई ,प्रदीप कान्त जी और सभी आत्मीय मित्रो के प्रति आभार ।

डॉ शशांक शुक्ल:-
बेहतरीन कवितायेँ।
पहली कविता दिल को छूने वाली ।दूसरी कविता दिमाग को ।स्वाभाविक रूप में दिल से दिमाग तक जाने वाली कविता यानी पहली कविता उत्कृष्ट है ।

प्रज्ञा :-
मर्लिन मुनरो वाली कविता सशक्त है। कितने सवाल दर्ज हैं उसमें। विडंबनाएं और क्रूरताएं। इच्छाएं और अनूकुलन। ज़िन्दगी और मौत ।
तोते कविता ने बरबस टैगोर की कहानी तोता याद दिला दी। सन्दर्भ कुछ भिन्न होते हुए भी अर्थव्याप्ति एक है।

कविता वर्मा:-
मर्लिन मुनरो की समूची जीवन गाथा इस एक कविता में पिरोई गई है ।उसके जीवन के अकेलेपन और दुख को शब्द देती कविता ।पूरी कविता एक दस्तावेज की तरह है लेकिन अंतिम पैरा झिंझोड़ देता है ।अंतिम समय मे किसी अपने के साथ की आस मे हुई मौत उसके अकेलेपन को अंतस में उतार देती है ।                  दूसरी कविता तोता गुलामी और क्रांति की उपयोगिता को रेखांकित करती है ।कहा भी गया है अगर हम गुलाम नहीं होते तो हम वो नहीं होते जो आज हैं ।यह कविता आज भी प्रासंगिक है ।

ब्रजेश कानूनगो:-
बहुत अच्छी कवितायेँ।कोई कविता ऐसी ही किसी कवि ने मीनाकुमारी पर लिखी हो तो कृपया जरूर बताएं ।और शेयर भी करें।प्लीज!

ब्रजेश कानूनगो:-
उनका जीवन भी कुछ कविता के नजरिये से बहुत संवेदन शील रहा है।कहानी के साम्य की बात नहीं है।

निधि जैन :-
मुझे मर्लिन वाली कविता कुछ ख़ास नही लगी
कारण ये भी हो सकता है कि मैं मर्लिन के बारे में कुछ नही जानती
kislaya पंचोली जी ने कुछ पंक्तियाँ अंडरलाइन की हैं वे अच्छी लगी

तोते कविता अच्छी लगी

फ़रहत अली खान:-
दोनों की लेखन शैली में बहुत फ़र्क़ है। आप दोनों की शायरी पढ़कर देखें तो साफ़ फ़र्क़ नज़र आएगा।

ब्रजेश कानूनगो:-
उपरोक्त वार्तालाप आज की कविताओं के संदर्भ में ही आगे बढ़ने की इच्छा से किया गया है।मर्लिन मुनरो पर जब एनी भाषा में कवितायेँ लिखी जाकर चर्चित हो सकती हैं।तो हिंदी और भारतीय परिवेश में लिखी गयी कविताओं पर तुलनात्मक बातचीत भी असंगत नहीं कही जा सकती।

ब्रजेश कानूनगो:-
कविताओं के बहाने संगत विषयों पर बातचीत को नकारा नहीं जाना चाहिए।बहुत संभव हो मैं गलत हूँ।बस अपनी बात रखना चाहता था।थोड़ी व्यापकता जरूरी है।वैसे खेद व्यक्त करना भी जरूरी है।क्षमा।

मिनाक्षी स्वामी:-
ब्रजेश जी अच्छी व्यापक और संगत चर्चा चल रही है। कभी मुक्त दिवस पर शबाना आजमी पर देवताले जी की कविता पोस्ट कीजिए। हो सके तो

कविता वर्मा:-
आज की कविताओं के अनुवादक हमारे समूह के साथी श्री मणिमोहन जी हैं ।मणिमोहन जी अगर इस अनुवाद प्रक्रिया के बारे में कुछ कहना चाहें तो उनका स्वागत है ।

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