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सत्यनारायण पटेल हमारे समय के चर्चित कथाकार हैं जो गहरी नज़र से युगीन विडंबनाओं की पड़ताल करते हुए पाठक से समय में हस्तक्षेप करने की अपील करते हैं। प्रेमचंद-रेणु की परंपरा के सुयोग्य उत्तराधिकारी के रूप में वे ग्रामांचल के दुख-दर्द, सपनों और महत्वाकांक्षाओं के रग-रेशे को भलीभांति पहचानते हैं। भूमंडलीकरण की लहर पर सवार समय ने मूल्यों और प्राथमिकताओं में भरपूर परिवर्तन करते हुए व्यक्ति को जिस अनुपात में स्वार्थांध और असंवेदनशील बनाया है, उसी अनुपात में सत्यनारायण पटेल कथा-ज़मीन पर अधिक से अधिक जुझारु और संघर्षशील होते गए हैं। कहने को 'गांव भीतर गांव' उनका पहला उपन्यास है, लेकिन दलित महिला झब्बू के जरिए जिस गंभीरता और निरासक्त आवेग के साथ उन्होंने व्यक्ति और समाज के पतन और उत्थान की क्रमिक कथा कही है, वह एक साथ राजनीति और व्यवस्था के विघटनशील चरित्र को कठघरे में खींच लाते हैं। : रोहिणी अग्रवाल

कविता : अफजल अहमद सैय्यद

जवाहरात की नुमाइश में शायर

जवाहरात की नुमाइश खुले आसमान के नीचे नहीं होती
शहर की सबसे खूबसूरत लड़की वहां नहीं आएगी
(वह फूलों की नुमाइश में गई है)

लोग उन कीमती पत्थरों और नुमाइश करने वाली लड़कियों को देखने आए हैं
जिन्हें शाहज़ादी कट लगा है
(शाहज़ादी कट  :  हीरे को तराशने का एक प्रचलित तरीका)

एक बड़े ज़मर्रुद को तीन लड़कियां
(जिन्हें शहर के रास्तों का पता नहीं)
माहिराना अंदाज़ से देख रही हैं
(ज़मर्रुद  :  पन्ना, Emerald  )

जो ओरिएंटल रूबी मुझे पसंद आया है
(तसव्वुर में उसे
बग़ैर आस्तीनों के स्याह लिबास वाली लड़की को पेश करने वाला हूँ)
उससे मुत्तसिल एक छोटी सी
"फ़रोख्त हो चुका है" की तख्ती पड़ी है
(मुत्तसिल  :  लगी हुई,  फ़रोख्त  :  बेचा हुआ, बिक चुका )

"पांच कैरेट के पत्थर को अट्ठारह पहलुओं में तराशना
ओपन हार्ट सर्जरी से ज़्यादा नाज़ुक है"
एक शख्स ग़ैर ज़रूरी तौर पर मुझे बताता हुआ गुज़र जाता है

सबसे अदना मोती के एवज
मैं हिसाब लगाता हूँ
आठ सौ बत्तीस आशरिया तीन तीन रोटियाँ मिल सकती हैं
(आशरिया  :  दशमलव )

नुमाइश के वस्त में
एक फ़रोशकार लड़की की मुस्कराहट मुझे रोक लेती है
( वस्त  :  बीच, मध्य , फ़रोशकार लड़की  :  सेल्सगर्ल)

"एक डायमण्ड हमेशा के लिए है"
उसने दोहराया
जैसे मेरी शायरी मिट जाने वाली चीज़ थी

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हम किसी से पूछे बग़ैर ज़िंदा रहते हैं

खंजर के फल पर
एक तरफ़ तुम्हारा नाम लिखा है
और दूसरी तरफ़ मेरा

जिन्हें पढ़ना आता है
हमें बताते हैं
हमें क़त्ल कर दिया जाएगा

जो दरख़्त उगाता है
हमें एक सेब दे देता है
हम खंजर से सेब को
दो टुकड़े कर देते हैं

हम किसी से पूछे बग़ैर ज़िंदा रहते हैं
और किसी को बताए बग़ैर
मोहब्बत करते हैं
मैंने गिनती सीखी
और याद रखा
तुम तक पहुँचने के लिए मुझे
कितनी सीढ़ियाँ तय करनी पड़ती हैं

एक दिन तुम यह सारी सीढ़ियाँ
नज़्मों की किताब पर रखकर
मुझे दे दोगी

एक दिन मैं तुम्हें बताउंगा
"समंदर वहां से शुरू होता है
जहां से खुश्की नज़र आनी ख़त्म हो जाए"
फिर हम जब चाहेंगे
नज़्मों की किताब से
एक वरक़ फाड़कर कश्ती बना लेंगे
और
दूसरा वरक़ फाड़कर
समंदर 
(वरक़  :  पृष्ठ, पन्ना,)

फिर हम जब चाहेंगे
ज़मीन की गर्दिश रोककर
रक़्स करने लगेंगे
(गर्दिश  :  चक्कर ,रक़्स  :  नृत्य)
नाचते हुए आदमी के दिल का निशाना
मुश्किल से लिया जा सकता है

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हमें भूल जाना चाहिए

उस ईंट को भूल जाना चाहिए
जिसके नीचे हमारे घर की चाभी है
जो एक ख़्वाब में टूट गया
हमें भूल जाना चाहिए
उस बोसे को
जो मछली के कांटे की तरह हमारे गले में फंस गया
और नहीं निकलता

उस ज़र्द रंग को भूल जाना चाहिए
जो सूरजमुखी से अलहदा कर दिया गया
जब हम अपनी दोपहर का बयान कर रहे थे
(ज़र्द  :  पीला )

हमें भूल जाना चाहिए
उस आदमी को
जो अपने फ़ाक़े पर
लोहे की चादरें बिछाता है

उस लड़की को भूल जाना चाहिए
जो वक़्त को
दवाओं की शीशियों में बंद करती है

हमें भूल जाना चाहिए
उस मलवे से
जिसका नाम दिल है
किसी को ज़िंदा निकाला जा सकता है

हमें कुछ लफ़्जों को बिल्कुल भूल जाना चाहिए
मसलन
बनीनौए इंसान

(बनीनौए इंसान  :  मानव जाति)

अफ़ज़ाल अहमद सैयद की कविताएँ
(लिप्यंतरण : मनोज पटेल)

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टिप्पणियाँ

मनोज पटेल:-
अफ़ज़ाल अहमद सैयद उर्दू के जाने माने कवि हैं. जन्म 1946 गाजीपुर (उत्तर प्रदेश) में हुआ. पेशे से कीटविज्ञानी अफ़ज़ाल 1976 से कराची में रह रहे हैं. ढेरों अनुवाद किए हैं. तीन कविता संग्रह छीनी हुई तारीख (1984), दो ज़ुबानों में सजाये मौत (1990) तथा रोकोको और दूसरी दुनियाएँ (2000) प्रकाशित. ग़ज़लों का एक संग्रह खेमा-ए-स्याह (1988). कुछ चुनिंदा कविताओं का अंग्रेजी अनुवाद Rococo and Other Worlds: Selected Poetry of Afzal Ahmed Syed नाम से प्रकाशित.

फ़रहत अली खान:-
सैयद साहब को आज पहली बार पढ़ा; और जब पढ़ा तो सोच में पड़ गया कि अभी तक इनको पढ़ा क्यों नहीं।
कितनी उम्दा नज़्में हैं कि दिल की तह तक जा पहुँचीं।
पहली वाली ने सबसे ज़्यादा प्रभावित किया।
"हमें भूल जाना चाहिए
उस मलबे से
जिसका नाम दिल है
किसी को ज़िंदा निकाला जा सकता है" वाह क्या बात कही।

और

"सबसे अदना मोती के एवज़
मैं हिसाब लगाता हूँ
आठ सौ बत्तीस अशारिया तीन तीन रोटियाँ मिल सकती हैं"
इस बात ने तो अंदर से झकझोर दिया।

धन्यवाद मनोज जी और कविता जी।

वसुंधरा काशीकर:-
निदाजींका हाथ और पैर फ्रॅक्चर हुआ है। उनको दो- तीन दिन में डिस्चार्ज मिल जायेगा।बाक़ी सेहत अच्छी है। उनके बेटी से फोनपर ये जानकारी मिली।

प्रज्ञा :-
अफज़ल जी को पढ़ना एक सार्थक अनूभूति है। बाज़ार के खेल में हीरा है सदा के लिये की चमक के पीछे श्रम की अनेक परतें समाज का विभाजन, चमक धमक और गति के साथ पसीना मेहनत और हाशिये में फैंका गया समाज। समाजिक आर्थिकअंतर्विरोधों की बारीक परत उघाड़ दी गयी है।
इसी तरह मानव जाति के कितने पक्ष सायास भुलाये जा रहे हैं जैसे कोई वजूद ही नहीं रखते वह भी इसी क्रम में है। इसमें कितने फाके मलबे और बीमारी से जुड़े असंख्य लोगों की सूरतें सामने आती हैं। वर्चस्व के इधर और उधर की दुनिया के चेहरे।और इसिलिय समन्दर दरकार है इंसानियत हक़ की खुश्क होकर पत्थर हो गयी चमड़ी के बरक्स।
आभारी हूँ मनोज जी की और कविता जी की।

किसलय पांचोली:-
पांच कैरेट के पत्थर को अट्ठारह पहलुओं में तराशना ओपन हार्ट सर्जरी से ज्यादा नाजुक है। क्या बात है।

राजेन्द्र गुप्ता:-
राजेंद्र श्रीवास्तव जी की कमाल की कहानी। धाराप्रवाह। वाह।द्रुत गति से शुरू हुई और समाप्त होकर झट से अंदर उतर गयी। देर तक रही।

प्रदीप मिश्र:-
छमा विलम्ब से टिपण्णी दे रहा हूँ। अभी सारे पोस्ट देखा। प्रेमचंद्र का संमरण संवेदना को झकझोरता है। खैर शहीद वाले तर्क़ से सहमत नहीं हो पा रहा हूँ।राजेंद्र जी की कहानी के लिए भाई वह। पाठक के अंतस तक पहुँचने में कहानी सफल है।आज की कविताओं के लिए शायर और मनोज भाई का आभार।

बलविंदर:-
बहुत उमदः नज़्में पेश की हैं "अफ़ज़ल" साहब की...उर्दू अदब में अफ़ज़ल साहब आधुनिक कविता के पैरोकार माने जाते हैं..ग़ज़ल के मुक़ाबले ये नज़्म के लिये ज़्यादा जाने जाते है.
तीसरी नज़्म का आख़िरी लफ्ज़ यूँ होना चाहिये
"बनि-नौ-ए-इंसाँ"
और इसका मतलब यहाँ "मानवता" से है.

बलविंदर:-
"मनोज" भाई का बहुत बहुत शुक्रिया इन नज़्मों नज़र-नवाज़ करने के लिये.

"अफ़ज़ल" साहब की एक ग़ज़ल से एक मतला और एक शेर हाज़िर है...

दुआ की राख़ पे मरमर का इत्र-दान उस का
ग़ज़ीदगी के लिये दस्त-ए-मेहरबाँ उस का

वो इक चराग़ है दीवार-ए-ख़स्तगी पे रुका
हवा हो तेज़ तो हर हाल में ज़ियाँ उस का

गज़ीदगी=भोजन
दीवार-इ-ख़स्तगी=कमज़ोर दीवार.

राजेन्द्र श्रीवास्तव:-
अफजाल अहमद सैयद साहब की बेहतरीन कविताएं। मजा आ गया। ये कलम की ताकत है कि कोई बात सीधे दिल तक पहुंच जाती है। शब्द चयन भी कमाल का है।
उम्दा रचना की प्रस्तुति के लिये आदरणीय सत्यनारायण जी पटेल और बिजूका के प्रति हार्दिक आभार
राजेन्द्र श्रीवास्तव,  पुणे

राहुल वर्मा 'बेअदब':-
balvindir जी
सादर प्रणाम
"मनोज" भाई का बहुत बहुत शुक्रिया इन नज़्मों नज़र-नवाज़ करने के लिये.

दुआ की राख़ पे मरमर का इत्र-दान उस का
ग़ज़ीदगी के लिये दस्त-ए-मेहरबाँ उस का

वो इक चराग़ है दीवार-ए-ख़स्तगी पे रुका
हवा हो तेज़ तो हर हाल में ज़ियाँ उस का

इत्रदान और मेहरबां का काफ़िया नहीं मिल रहा है अग्रज

टाइपिंग मिस्टेक ही है न ये ?

इसमें मतला कौन सा है ?

बलविंदर:-
"राहुल" साहब आपने सही कहा वो टाइपिंग की ही ग़लती है..मुझे पता लग गया था, लेकिन तब तक तीर कमान से निकल चूका था सही लफ्ज़ "इत्र-दाँ" ही है.
पहला शेर ही मतला है..लेकिन आप को मतला पहचान ने में मुश्किल क्यूँ आ गयी ?

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