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सत्यनारायण पटेल हमारे समय के चर्चित कथाकार हैं जो गहरी नज़र से युगीन विडंबनाओं की पड़ताल करते हुए पाठक से समय में हस्तक्षेप करने की अपील करते हैं। प्रेमचंद-रेणु की परंपरा के सुयोग्य उत्तराधिकारी के रूप में वे ग्रामांचल के दुख-दर्द, सपनों और महत्वाकांक्षाओं के रग-रेशे को भलीभांति पहचानते हैं। भूमंडलीकरण की लहर पर सवार समय ने मूल्यों और प्राथमिकताओं में भरपूर परिवर्तन करते हुए व्यक्ति को जिस अनुपात में स्वार्थांध और असंवेदनशील बनाया है, उसी अनुपात में सत्यनारायण पटेल कथा-ज़मीन पर अधिक से अधिक जुझारु और संघर्षशील होते गए हैं। कहने को 'गांव भीतर गांव' उनका पहला उपन्यास है, लेकिन दलित महिला झब्बू के जरिए जिस गंभीरता और निरासक्त आवेग के साथ उन्होंने व्यक्ति और समाज के पतन और उत्थान की क्रमिक कथा कही है, वह एक साथ राजनीति और व्यवस्था के विघटनशील चरित्र को कठघरे में खींच लाते हैं। : रोहिणी अग्रवाल

ग़ज़ल : मुजाहिरनामा : मुनव्वर राना

विभाजन के समय जो लोग हिंदोस्तान से पाकिस्तान चले गए, उनको वहाँ 'मुहाजिर'(शरणार्थी) कहा गया।
मुहाजिरों पर लखनऊ के सुविख्यात शायर मुनव्वर राना साहब ने लगभग साढ़े चार सौ अशआर पर आधारित एक लंबी ग़ज़ल 'मुहाजिरनामा' कही।
हालाँकि ये ग़ज़ल ख़ासतौर पर भारत-पाकिस्तान के बँटवारे से जुड़े मुहाजिरों के लिए लिखी गयी है, लेकिन दुनिया के दूसरे मुहाजिरों के लिए भी ये उतनी ही प्रासंगिक है।
इस ग़ज़ल के कुछ चुनिंदा अशआर देखें और अपनी बहुमूल्य टिप्पणियाँ दें।

मुहाजिर हैं, मगर हम एक दुनिया छोड़ आए हैं
तुम्हारे पास जितना है, हम उतना छोड़ आए हैं
(मुहाजिर - शरणार्थी)

कहानी का ये हिस्सा आज तक सब से छुपाया है
कि हम मिट्टी की ख़ातिर अपना सोना छोड़ आए हैं

कई दर्जन कबूतर तो हमारे पास ऐसे थे
जिन्हें पहना के हम चांदी का छल्ला छोड़ आए हैं

वो टीपू जिसकी क़ुर्बानी ने हमको सुर्ख़-रू रक्खा
उसी टीपू के बच्चों को अकेला छोड़ आए हैं
(टीपू - टीपू सुल्तान; सुर्ख़-रू - कामयाब/अच्छी हालत में)

नई दुनिया बसा लेने की इक कमज़ोर चाहत में
पुराने घर की दहलीज़ों को सूना छोड़ आए हैं

अभी तक हमको मजनूँ कहके कुछ साथी बुलाते हैं
अभी तक याद है हमको कि लैला छोड़ आए हैं

'मियाँ' कह कर हमारा गाँव हमसे बात करता था
ज़रा सोचो तो हम भी कैसा ओहदा छोड़ आए हैं

वो इंजन के धुएँ से पेड़ का उतरा हुआ चेहरा
वो डिब्बे से लिपट कर सबको रोता छोड़ आए हैं

हमारा पालतू कुत्ता हमें पहुँचाने आया था
वो बैठा रो रहा था, उसको रोता छोड़ आए हैं

बिछड़ते वक़्त था दुश्वार उसका सामना करना
सो उसके नाम हम अपना संदेशा छोड़ आए हैं

बुरे लगते हैं शायद इसलिए ये सुरमई बादल
किसी की ज़ुल्फ़ को शानों पे बिखरा छोड़ आए हैं
(शाना - कन्धा)

कई होठों पे ख़ामोशी की पपड़ी जम गयी होगी
कई आँखों में हम अश्कों का पर्दा छोड़ आए हैं

बसी थी जिसमें ख़ुश्बू मेरी अम्मी की जवानी की
वो चादर छोड़ आए हैं, वो तकिया छोड़ आए हैं

किसी की आरज़ू के पाँवों में ज़ंजीर डाली थी
किसी की ऊन की तीली में फंदा छोड़ आए हैं

पकाकर रोटियाँ रखती थी माँ जिसमें सलीक़े से
निकलते वक़्त वो रोटी की डलिया छोड़ आए हैं

जो इक पतली सड़क उन्नाव से मोहान जाती है
वहीं हसरत के ख़्वाबों को भटकता छोड़ आए हैं
(उन्नाव - यूपी का एक ज़िला, मोहान - एक क़स्बा)
(नोट: यहाँ 'हसरत' शब्द महान उर्दू शायर, पत्रकार और स्वतंत्रता संग्राम सेनानी 'हसरत मोहानी' के लिए इस्तेमाल किया गया है।)

यक़ीं आता नहीं, लगता है कच्ची नींद में शायद
हम अपना घर-गली, अपना मोहल्ला छोड़ आए हैं

हमारे लौट आने की दुआएँ करता रहता है
हम अपनी छत पे जो चिड़ियों का जत्था छोड़ आए हैं

गले मिलती हुई नदियाँ, गले मिलते हुए मज़हब
इलाहाबाद में कैसा नज़ारा छोड़ आए हैं

वज़ू करने को जब भी बैठते हैं, याद आता है
कि हम जल्दी में जमना का किनारा छोड़ आए हैं
(वज़ू - नमाज़ पढ़ने से पहले मुँह-हाथ-पैर धोने की एक निश्चित और अनिवार्य प्रक्रिया; जमना - यमुना)

हम अपने साथ तस्वीरें तो ले आए हैं शादी की
किसी शायर ने लिक्खा था जो सेहरा, छोड़ आए हैं
(सेहरा - शादी के मौक़े पर दूल्हा और उसके घरवालों के बारे में नज़्म या ग़ज़ल के रूप में लिखा गया कलाम)

कई आँखें अभी तक ये शिकायत करती रहती हैं
कि हम बहते हुए काजल का दरिया छोड़ आए हैं

शकर इस जिस्म से खिलवाड़ करना कैसे छोड़ेगी
कि हम जामुन के पेड़ों को अकेला छोड़ आए हैं 

वो बरगद जिसके पेड़ों से महक आती थी फूलों की
उसी बरगद में एक हरियल का जोड़ा छोड़ आए हैं

अभी तक बारिशों में भीगते ही याद आता है
कि हम छप्पर के नीचे अपना छाता छोड़ आए हैं

भतीजी अब सलीक़े से दुपट्टा ओढ़ती होगी
वही झूले में हम जिसको हुमड़ता छोड़ आए हैं

ये हिजरत तो नहीं थी बुज़दिली शायद हमारी थी
कि हम बिस्तर में एक हड्डी का ढाँचा छोड़ आए हैं
(हिजरत - एक जगह से दूसरी जगह रहने के लिए जाना)

हमारी अहलिया तो आ गयी, माँ छुट गई आख़िर
कि हम पीतल उठा लाये हैं, सोना छोड़ आए हैं
(अहलिया - पत्नी)

महीनों तक तो अम्मी ख़्वाब में भी बुदबुदाती थीं
सुखाने के लिए छत पर पुदीना छोड़ आए हैं

वज़ारत भी हमारे वास्ते कम-मर्तबा होगी
हम अपनी माँ के हाथों में निवाला छोड़ आए हैं
(वज़ारत - मंत्रालय का पद; कम-मर्तबा - छोटे दर्जे की)

यहाँ आते हुए हर क़ीमती सामान ले आए
मगर इक़बाल का लिक्खा तराना छोड़ आए हैं

कल एक अमरुद वाले से ये कहना पड़ गया हमको
जहाँ से आये हैं हम इसकी बग़िया छोड़ आए हैं

वो हैरत से हमें तकता रहा कुछ देर, फिर बोला
वो संगम का इलाक़ा छुट गया या छोड़ आए हैं?
(नोट: संगम यानी इलाहाबाद के मीठे अमरूद बहुत मशहूर हैं।)

अभी हम सोच में गुम थे कि उससे क्या कहा जाए
हमारे आँसुओं ने राज़ खोला, 'छोड़ आए हैं'

गुज़रते वक़्त बाज़ारों में अब भी याद आता है
किसी को उसके कमरे में सँवरता छोड़ आए हैं

हमारा रास्ता तकते हुए पथरा गयी होंगी
वो आँखे जिनको हम खिड़की पे रक्खा छोड़ आए हैं

तू हमसे चाँद इतनी बेरुख़ी से बात करता है
हम अपनी झील में एक चाँद उतरा छोड़ आए हैं

ये दो कमरों का घर और ये सुलगती ज़िंदगी अपनी
वहाँ इतना बड़ा नौकर का कमरा छोड़ आए हैं

हमें मरने से पहले सबको ये ताकीद करनी है 
किसी को मत बता देना कि क्या-क्या छोड़ आए हैं
(ताकीद - नसीहत)

ग़ज़ल ये ना-मुक़म्मल ही रहेगी उम्र भर 'राना'
कि हम सरहद से पीछे इसका मक़्ता छोड़ आये हैं
(ना-मुकम्मल - अधूरी; मक़्ता - ग़ज़ल का आख़िरी शेर जिसमें शायर का तख़ल्लुस यानी उपनाम भी आता है)   

प्रस्तुति फरहत अली खान
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टिप्पणियाँ:-

आशीष मेहता:-
फ़रहत भाई की एक और दमदार प्रस्तुती । "छूटना" तो किसी का भी नागवार ही  गुजरता है (सिवाय बला के), फिर भी 'अहलिया और माँ' की तुलना कुछ खटकी,... बावजूद मुनव्वर साहब के लिए सम्मान... और किसी भी महिला मुक्ति मंच से कोई नाता न होते हुए भी। बंटवारा, मेरे जैसे 'मुहाजिर परिवारों ' के लिए भावनाओं का ज्वार उठा ही देता है। बढ़िया प्रस्तुती ।

बलविंदर:-: "फ़रहत" साहब का इस कलाम के लिए बहुत बहुत शुक्रियः.
मेरे नज़रिये से इसे ग़ज़ल कहना मुनासिब न होगा, ये एक नज़्म का दर्जा रखती है. ग़ज़ल का हर शेर अपने जुदा मायने रखता है..और नज़्म एक ही उनवान (विषय) पर बांधी जाती है और ये कलाम भी एक ही विषय (मुहाजिर, अप्रवासी) पर आधारित है.

मनचन्दा पानी:-
ग़ज़ल के प्रकार
तुकांतता के आधार पर ग़ज़लें दो प्रकार की होती हैं-

मुअद्दस ग़जलें- जिन ग़ज़ल के अश'आरों में रदीफ़ और काफ़िया दोनों का ध्यान रखा जाता है।

मुकफ़्फ़ा ग़ज़लें- जिन ग़ज़ल के अश'आरों में केवल काफ़िया का ध्यान रखा जाता है।

भाव के आधार पर भी गज़लें दो प्रकार की होती हैं-

मुसल्सल गज़लें- जिनमें शेर का भावार्थ एक दूसरे से आद्यंत जुड़ा रहता है।

ग़ैर मुसल्सल गज़लें- जिनमें हरेक शेर का भाव स्वतंत्र होता है

राहुल वर्मा 'बेअदब':-
शुक्रिया मनचंदा जी
मेरे प्रश्न का मतलब ये था कि क्या 'मुहाजिरनामा' को एक मुसलसल ग़ज़ल कह सकते हैं/कहेंगे?

बलविंदर:-
ये ग़ज़ल_नुमा नज़्म को मुसल्सल ग़ज़ल कहने का चलन हालिया दौर में ही शुरू हुआ है वर्ना पहले ये नज़्म ही कहलती थीं...ऐसी बहुत सी मिसालें आप को "कैफ़ी" आज़मी, "फ़िराक़" "इक़बाल" और भी कई शायरों के यहाँ मिल जाएँगी जो लिखी तो ग़ज़ल की रिवायत में हैं लेकिन हैं वो नज़्में..."नज़ीर" अकबराबादी की तो ढेरों नज़्में ग़ज़ल_नुमा हैं.

मैं "मनचन्दा" साहब से पूछना चाहता हूँ कीे लफ्ज़ "मुअद्दस" से आप की क्या मुराद है.
मकफ़्फ़ा ग़ज़ल को ग़ैर_मुरद्दफ़ ग़ज़ल कहते हैं..मिसाल के तौर पर ये दो शेर देखिये...

ये सुबह-ओ-शाम की उलझनें ये रोज़-ओ-शब की याद
सुनाऊँ क्या तुम्हें अफ़साना-ए-दिल-ए-बर्बाद

जो आये याद तो दिल डूब डूब जाता है
जो उस को भूलना चाहूँ तो और आये याद
सरवर राज़ "सरवर"

राजेन्द्र श्रीवास्तव:-
मुनव्वर राना जी की पंक्तियाँ बार बार पढ़ी और हर बार आंख नम हुई
ये अतिरिक्त सुखद है कि बलविन्दर जी और समूह के अन्य साथियों के ज्ञान से मुझ जैसे लोग समृद्ध और संपन्न हो रहे हैं।  सभी संबंधितों को साधुवाद

राहुल वर्मा 'बेअदब':-
ग़ज़ल-रदीफ़,काफ़िया और बह्र में ही होगी

बिना रदीफ़ की ग़ज़ल हो सकती है जिसे गैर-मुदर्रफ ग़ज़ल कहते हैं पर बिना काफ़िया के कोई भी ग़ज़ल नहीं होती

नज़्म बह्र में भी हो सकती और बिना बह्र भी...बह्र वाली नज़्म में काफ़िया और रदीफ़ होना ज़रूरी नहीं है

ग़ज़ल का हर मिसरा याने कि हर पंक्ति एक particular arrangement में ही होगी,जिसे बह्र कहते हैं

ये particular arrangement किसी भी फॉर्म में हो सकती है,जिसे रुक्न/तख्ती कहते हैं

मसलन

आ प को दे ख कर दे ख ता रह ग या

212 212 212 212

यहाँ 212 रुक्न/तख्ती है और

पूरा structure याने

212 212 212 212 इसकी बह्र

अब ख़ास बात ये है कि इसके बाद का हर मिसरा/पंक्ति इसी तरह से होगी याने 212 के नीचे 212

देखिये

इसी ग़ज़ल के इस शे'र की अगली पंक्ति या अगला मिसरा ये है

क्या क हूँ औ र कह ने को क्या रह ग या

212 212 212 212

यहाँ पूरी पंक्ति को तोड़कर इसलिए लिखा है मैंने कि उक्त अक्षर/शब्द को बोलने में लगने वाले समय को आसानी से समझा जा सके

अब एक और ज़रूरी बात

बह्र वैसे तो सैकड़ों तरह की होती हैं पर लगभग 50 या 60 ही ज्यादा प्रचलन में हैं

यानि कि श्रोताओं/गायकों/ग़ज़ल कारों ने इन्हीं में ज्यादा लिखा/कहा/पढ़ा/गाया है इत्यादि

ग़ज़ल की इन बंदिशों से अक्सर हममें से कई confuse हो जाते हैं और हममें से कईयों को लगता है कि इनसे थोड़ा आज़ाद होना चाहिए

तो इसके लिए ये किया जा सकता है कि हम इन पारंपरिक बह्र्रों के अतिरिक्त अपनी ही बह्र में कुछ कहें/लिखें

पहला मिसरा अपनी ही बह्र में और बाद के तमाम मिसरे बिल्कुल उसी बह्र में

simple है न ?
mataraon को गिराकर पढ़ सकते हैं पर बढ़ाकर नहीं

उपरोक्त उदाहरण के दूसरे मिसरे में

क्या क हूँ औ र कह ने को क्या रह ग या

212 212 212 212

यहाँ "को' की 2 मात्राएँ हैं पर उसे 1 पढ़ा गया है

अगली बार जब भी आप ये ग़ज़ल सुनियेगा तो ध्यान दीजियेगा कि गायक ने इस 'को' को इस तरह से बोला है कि उसे बोलने में लगने वाला समय 2 न होकर 1 हो रहा है

Isn't it amazing ?
99 प्रतिशत गजलों में हर शे'र एक दूसरे से जुड़ा हुआ नहीं होता

दरअसल एक दूसरे से जुड़े हुए या एक दूसरे पर आश्रित एक ही ग़ज़ल के शे'र अच्छे नहीं माने जाते

एक ही घटना या द्रश्य के विवरण हेतु नज़्म कही/लिखी जाती है

नज़्म बह्र में भी हो सकती है

जैसे
तेरे खुशबू में बसे ख़त में जलाता कैसे

या फिर नज़्म बिना बह्र के भी हो सकती है

जैसे

जावेद अख्तर साहब की नज़्म 'भूख'

इसकी शुरुआती लाइन्स कुछ इस तरह से हैं

'आँख खुल गई मेरी
हो गया मैं फिर जिंदा
ज़हन की खलाओं से
पेट के धुंधलकों तक
रेंगता ख़याल आया
आज तीसरा दिन है,आज तीसरा दिन है'

अंतर समझना कितना सरल है न ?
ध्यान दीजिये कि नज़्म एक ही subject पर आधारित होती है

ग़ज़ल सामान्य तौर पर एक ही subject पर आधारित नहीं होती इसलिए इसका हर शे'र अलग-अलग विषय पर कहा/लिखा जाता है

पर कई बार ज़रुरत के हिसाब से या किसी और कारण से ग़ज़ल को या इसके हर शे'र को intentionally या जानबूझकर एक ही subject पर केन्द्रित किया जाता है

जैसे कि 1 वो ग़ज़ल है न

'चुपके-चुपके रात दिन आंसूं बहाना याद है'

इस तरह की ग़ज़ल को 'मुसलसल ग़ज़ल' कहते हैं

मुसलसल याने लगातार,continous

ग़ज़ल का पहला शे"र "मतला' कहलाता है

जहाँ दोनों मिसरों/पंक्तियों में सम तुकांत आता है

राहुल वर्मा 'बेअदब':-
As per my least knowledge

हासिल-ए-ग़ज़ल means ग़ज़ल का सबसे बेहतर शे'र...यानि जो particular शे'र किसी individual को सबसे उम्दा लगा हो

बलविंदर:-
राहुल साहब बहुत खूब..लेकिन कुछ बातों पर कुछ कहना चाहूँगा कि उर्दू शायरी में ऐसा कोई भी कलाम नहीं है जो बिना बहर के हो, चाहे वो ग़ज़ल हो, नज़्म हो, हज़ल, हिज्व, मर्सिया, मसनवी, नात, रुबाई कुछ भी हो सब बहर में ही होती हैं..कुल 19 बहरें चलन में है जो इस तरह हैं....
1 बहर-ए-हज़ज
2 बहर-ए-रजज़
3बहर-ए-रमल
4बहर-ए-कामिल
5बहर-ए-वाफिर
6बहर-ए-मुतक़रीब
7बहर-ए-मुतदरिक
8बहर-ए-मुज़ारे
9बहर-ए-मुज्तस
10बहर-ए-मुंसरह
11बहर-ए-मुक्ताज़िब
12बहर-ए-सरी
13बहर-ए-ख़फ़ीफ़
14बहर-ए-क़रीब
15बहर-ए-जदीद
16बहर-ए-मुशअकिल
17बहर-ए-तवील
18बहर-ए-मदीद
19बहर-ए-बसीत

कविता वर्मा:-
बेहद खूबसूरत गजल फरहत जी एक एक शेर ज़ुदाई की कसक दिल में उतारता हुआ ।इस दर्द को हम लोग शायद कभी महसूस ही नही कर पायेंगे जो उस वक्त उन लोगों ने सहा ।मेरी एक कलीग थी कश्मीरी से विस्थापित जब भी अपनी जमीन अपनी मिट्टी की बात होती थी वह झार झार रोने लगती थीं ।इस गजल के एक एक शेर में उनके दर्द के कारण छुपे हैं ।

फ़रहत अली खान:-
जी। सही कहा आपने। जिस पर बीतती है वही जानता है।
मैंने भी एक तरह से हिजरत की; अपने पुराने घर जिसमें हम पैदा हुए, पले-बढ़े, पढ़े-लिखे, उसे बेचकर शहर में ही दूसरे इलाक़े में एक घर लिया। फिर जिन्होंने हमारा घर ख़रीदा था, उन्होंने उसे तोड़ कर अपने हिसाब से कुछ बनाया। वो घर तो नहीं रहा लेकिन अब भी कभी कभी ख़्वाब में ख़ुद को उसी घर में पाता हूँ। बहुत से यादें हैं, कभी साझा करूँगा।

मिनाक्षी स्वामी:-
मुहाजिरों के दर्द के हर पहलू को बहुत मार्मिक ह्रदय स्पर्शी रूप में बयान करती गजल। सच यह गजल आज भी प्रासंगिक है। और झकझोर कर रख देती है।

सुवर्णा :-
मुनव्वर जी कमाल के शायर हैं। बतियाता हुआ तरन्नुम जो ग़ज़ल की खूबसूरती है उनके यहाँ हमेशा सहजता से मिलता है। उतने ही बेहतरीन इंसान। मुहाजिरनामा वाकई बहुत शानदार है मुनव्वर जी से सुना था जब वे छिंदवाड़ा आए थे। सलाम आदरणीय मुनव्वर जी को और शुक्रिया बिजूका।

अशोक जैन:-
अपना घर, गांव, शहर , वतन छूटने की दर्द भरी त्रासदी। अपनों से बिछड़ना का दर्द। गजल विभाजन पर रची गई हैं पर आज भी मुल्कों के आपसी झगड़े और विकास के कारण लोगों को वतन छोड़ना पड़ रहा है। यह विषय आज भी प्रासंगिक है।

बेहतरीन गजलों को साझा करने के लिए आभार।

ब्रजेश कानूनगो:-
मुनव्वर राणा जी की खूबसूरत और मार्मिक पंक्तियाँ।हम खुद जब अपने बचपन के शहर और मुहल्ले में बरसों बाद लौटकर जाते हैं तो अपने आपको शरणार्थी की अनुभूतियों से बावस्ता महसूस करते हैं।और जब ऐसी गजलों को सस्वर शायर से सुनते हैं तो दिल और आँखें दोनों भर आतीं हैं।पढ़ते हुए मुन्नवर जी का चेहरा सामने दिखाई देने लगता है।आभार।एडमिन।

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