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सत्यनारायण पटेल हमारे समय के चर्चित कथाकार हैं जो गहरी नज़र से युगीन विडंबनाओं की पड़ताल करते हुए पाठक से समय में हस्तक्षेप करने की अपील करते हैं। प्रेमचंद-रेणु की परंपरा के सुयोग्य उत्तराधिकारी के रूप में वे ग्रामांचल के दुख-दर्द, सपनों और महत्वाकांक्षाओं के रग-रेशे को भलीभांति पहचानते हैं। भूमंडलीकरण की लहर पर सवार समय ने मूल्यों और प्राथमिकताओं में भरपूर परिवर्तन करते हुए व्यक्ति को जिस अनुपात में स्वार्थांध और असंवेदनशील बनाया है, उसी अनुपात में सत्यनारायण पटेल कथा-ज़मीन पर अधिक से अधिक जुझारु और संघर्षशील होते गए हैं। कहने को 'गांव भीतर गांव' उनका पहला उपन्यास है, लेकिन दलित महिला झब्बू के जरिए जिस गंभीरता और निरासक्त आवेग के साथ उन्होंने व्यक्ति और समाज के पतन और उत्थान की क्रमिक कथा कही है, वह एक साथ राजनीति और व्यवस्था के विघटनशील चरित्र को कठघरे में खींच लाते हैं। : रोहिणी अग्रवाल

नयनतारा सहगल की नैतिका का दोहरा रूख : ब्रेजेश कुमार

देश के प्रथम प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू की भानजी नयनतारा सहगल ने साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटाने का फैसला किया है। दादरी की घटना से नयनतारा व्यथित हैं। इस मामले में प्रधानमंत्री की चुप्पी से भी वे परेशान हैं। उन्हें यह भी क्षोभ है कि भारत में विविधता की जो संस्कृति रही है, उस पर गहरा खतरा मंडरा रहा है।
नयनतारा सहगल को ये पुरस्कार वर्ष 1986 में तब मिला था, जब उनके भतीजे राजीव गांधी देश के प्रधानमंत्री थे। सवाल ये उठता है कि उन्हें उस वक्त ये पुरस्कार लेने में झिझक क्यों नहीं हुई, खासकर उस प्रधानमंत्री के रहते हुए, जिनकी मां और नयनतारा की ममेरी बहन इंदिरा गांधी की मौत के बाद संगठित तौर पर कांग्रेस नेताओं की अगुआई में हजारों सिखों को मारा गया। नरेंद्र मोदी दादरी की घटना पर चुप हैं, इसे लेकर नयनतारा परेशान हैं, लेकिन 1984 में तो उनके भतीजे और तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने सिखों की दंगे में हुई हत्या को सामान्य और न्यायोचित ठहराते हुए ये विवादास्पद बयान दिया था कि ''बड़ा पेड़ जब गिरता है तो कंपन तो होता ही है।"" सिख दंगों में मारे गए लोगों के परिवार आज भी न्याय के लिए भटक रहे हैं। लेकिन नयनतारा की अंतरात्मा को शायद इससे कोई परेशानी नहीं हुई थी।
नयनतारा की अंतरात्मा को तब भी कोई परेशानी नहीं हुई, जब राजीव गांधी ने मुस्लिम कट्टरपंथियों के आगे झुकते हुए शाहबानो मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले को संवैधानिक संशोधन के तहत उलट दिया था और एक मुस्लिम महिला को उसका वाजिब हक मिले, इसमें सबसे बड़ा अड़ंगा लगाया था। विधि का विधान तो ये था कि नयनतारा की मां विजयालक्ष्मी पंडित जब विधवा हुई थीं (14 जनवरी 1944 को पति रणजीत पंडित की मौत के बाद), तो ससुराल वालों ने पुश्तैनी संपत्ति में हक देने से मना कर दिया था और एक मामूली-सी रकम जीवन-बसर के लिए मंजूर की थी। विजयालक्ष्मी के लिए ये रकम डेढ़ सौ रुपए प्रतिमाह थी, जिसका जिक्र खुद नयनतारा ने अपनी पुस्तक 'जवाहरलाल नेहरू : सिविलाइजिंग अ सेवेज वर्ल्ड" में विस्तार से किया है।
बहन की ये पीड़ा भाई (नेहरू) पर इतनी भारी गुजरी थी कि देश को आजादी हासिल होते और सत्ता की कमान हाथ में आते ही उन्होंने तमाम विरोध और सहमति के अभाव के बावजूद हिंदू कोड बिल लाना मंजूर किया और इसके जरिए हिंदू परिवारों में महिलाओं को भी बराबरी का अधिकार मिले, ये सुनिश्चित किया। ये वही नेहरू थे, जो उस वक्त समान नागरिक संहिता लाने के लिए इसलिए तैयार नहीं हुए, क्योंकि उन्हें भय था कि मुस्लिम समुदाय इसे बर्दाश्त नहीं करेगा। अगर नेहरू ने उस वक्त हिम्मत का परिचय देते हुए समान नागरिक संहिता को लागू कर दिया होता, तो शायद इस देश में मुस्लिम तुष्टीकरण जैसा शब्द इस्तेमाल नहीं किया जाता।
साहित्य अकादमी पुरस्कार लेने के तीन दशक बाद उसे लौटाने की उनकी नैतिकता पर अब सवाल खड़े किए जा रहे हैं। साहित्य अकादमी के मौजूदा अध्यक्ष का कहना है कि अपनी किताब के तमाम भाषाओं में हुए अनुवाद और हर किस्म का फायदा उठाने के बाद अब इस पुरस्कार को लौटाने का क्या मतलब है। नयनतारा की नैतिकता पर सवाल और कारणों से भी उठेगा। 1986 में शाहबानो मामले में जब राजीव गांधी ने घुटने टेके, उस वक्त कैबिनेट मंत्री आरिफ मोहम्मद खान ने विरोध में इस्तीफा दे दिया था। एक तरफ आरिफ का नैतिकता के आधार पर इस्तीफा तो दूसरी तरफ नयनतारा का राजीव सरकार से साहित्य अकादमी पुरस्कार लेना, चर्चा तो इसकी होगी ही। राम जन्मभूमि का ताला खुलवाने का काम भी राजीव ने तब किया, जब उन्हें ये लगा कि शाहबानो मामले में मुस्लिम कट्टरपंथियों के आगे घुटने टेकने के कारण हिंदू समाज नाराज है और भाजपा इसका फायदा उठा सकती है। तब लोकसभा में भाजपा के महज दो सांसद थे, लेकिन राजीव ने राम जन्मभूमि का ताला क्या खुलवाया, भाजपा को जोर मिला और आज वो पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में बैठी है।
नयनतारा को आलोचक ये भी याद दिलाएंगे कि अभिव्यक्ति की आजादी को बाधित करने का काम भी उनके मामा के प्रधानमंत्री रहते ही शुरू हुआ था। नेहरू ने देश के संवैधानिक प्रमुख राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद के दो भाषणों को सरकारी संचार माध्यम के जरिए प्रसारित नहीं होने दिया था। विपक्षी पार्टियों की सरकारों को बर्खास्त करने का सिलसिला केरल की नंबूदरीपाद सरकार की बर्खास्तगी के साथ नेहरू के ही राज में शुरू हुआ था।
नयनतारा इमरजेंसी तो नहीं ही भूली होंगी, जो असहमति की स्वतंत्रता के दमन का सबसे बड़ा उदाहरण है इस देश में। संजय गांधी ने नसबंदी अभियान और तुर्कमान गेट कांड में मुस्लिम समुदाय को खूब परेशान किया था। राजीव गांधी ने प्रेस पर सेंसरशिप लाने की कवायद कर डाली थी और वीपी सिंह जैसे ईमानदार मंत्री को असहमति दिखाने के चक्कर में ही सरकार से बर्खास्त कर दिया था। जाहिर है, नयनतारा के विरोधी इन सवालों को खड़ा करेंगे और इसी बहाने उनकी नैतिकता भी कठघरे में खड़ी की जाती रहेगी।
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-लेखक टीवी मीडिया से जुड़े पत्रकार हैं |

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