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सत्यनारायण पटेल हमारे समय के चर्चित कथाकार हैं जो गहरी नज़र से युगीन विडंबनाओं की पड़ताल करते हुए पाठक से समय में हस्तक्षेप करने की अपील करते हैं। प्रेमचंद-रेणु की परंपरा के सुयोग्य उत्तराधिकारी के रूप में वे ग्रामांचल के दुख-दर्द, सपनों और महत्वाकांक्षाओं के रग-रेशे को भलीभांति पहचानते हैं। भूमंडलीकरण की लहर पर सवार समय ने मूल्यों और प्राथमिकताओं में भरपूर परिवर्तन करते हुए व्यक्ति को जिस अनुपात में स्वार्थांध और असंवेदनशील बनाया है, उसी अनुपात में सत्यनारायण पटेल कथा-ज़मीन पर अधिक से अधिक जुझारु और संघर्षशील होते गए हैं। कहने को 'गांव भीतर गांव' उनका पहला उपन्यास है, लेकिन दलित महिला झब्बू के जरिए जिस गंभीरता और निरासक्त आवेग के साथ उन्होंने व्यक्ति और समाज के पतन और उत्थान की क्रमिक कथा कही है, वह एक साथ राजनीति और व्यवस्था के विघटनशील चरित्र को कठघरे में खींच लाते हैं। : रोहिणी अग्रवाल

कविता : उदय प्रकाश

आज प्रस्तुत हैं उदय प्रकाश जी की कविताएं। आप पढ़े और अपनी प्रतिक्रिया अवश्य दें।

बस में पिता

मैंने बिल्कुल साफ-साफ देखा
उस बस पर बैठे
कहीं जा रहे थे पिता

उनके सफेद गाल, तंबाकू भरा उनका मुँह
किसी को न पहचानती उनकी आँखें

उस बस को रोको
जो अदृश्य हो जाएगी अभी

उस बस तक
क्या
पहुँच सकती है
मेरी आवाज ?

उस बस पर बैठ कर
इस तरह क्यों चले गए पिता ?

मैं जीना चाहता हूँ

कविता में हार कर
विचारों में विजेता मैं नहीं होना चाहता

कविता में जीत कर
विचारों में हारना नहीं चाहता

जीवन से हार कर
मृत्यु के सामने नहीं करना चाहता
आत्मसमर्पण

मृत्यु से डर कर
जीवन की दासता
नहीं करनी मुझे

सिर्फ जीने के लिए
मृत्यु से हारूँगा नहीं

मुझे जीवन से प्यार है
मुत्यु से हारे बिना।

मैं लौट जाऊँगा

क्वाँर में जैसे बादल लौट जाते हैं
धूप जैसे लौट जाती है आषाढ़ में
ओस लौट जाती है जिस तरह अंतरिक्ष में चुपचाप

अँधेरा लौट जाता है किसी अज्ञातवास में अपने दुखते हुए शरीर को
कंबल में छुपाए
थोड़े-से सुख और चुटकी-भर सांत्वना के लोभ में सबसे छुपकर आई हुई
व्याभिचारिणी जैसे लौट जाती है वापस अपनी गुफा में भयभीत

पेड़ लौट जाते हैं बीज में वापस
अपने भांडे-बरतन, हथियारों, उपकरणों और कंकालों के साथ
तमाम विकसित सभ्यताएँ
जिस तरह लौट जाती हैं धरती के गर्भ में हर बार

इतिहास जिस तरह विलीन हो जाता है किसी समुदाय की मिथक-गाथा में
विज्ञान किसी ओझा के टोने में
तमाम औषधियाँ आदमी के असंख्य रोगों से हार कर अंत में जैसे लौट
जाती हैं
किसी आदिम-स्पर्श या मंत्र में

मैं लौट जाऊँगा जैसे समस्त महाकाव्य, समूचा संगीत, सभी भाषाएँ और
सारी कविताएँ लौट जाती हैं एक दिन ब्रह्मांड में वापस

मृत्यु जैसे जाती है जीवन की गठरी एक दिन सिर पर उठाए उदास
जैसे रक्त लौट जाता है पता नहीं कहाँ अपने बाद शिराओं में छोड़ कर
निर्जीव-निस्पंद जल

जैसे एक बहुत लंबी सजा काट कर लौटता है कोई निरपराध कैदी
कोई आदमी
अस्पताल में
बहुत लंबी बेहोशी के बाद
एक बार आँखें खोल कर लौट जाता है
अपने अंधकार में जिस तरह।

मसखरों की पहचान में कुछ पंक्तियाँ

एक

मसखरे
एक दूसरे के प्रति
बहुत गंभीर होते हैं

दो

मसखरे जो होते हैं
उन्हें लोग मसखरा ही कहते हैं
लेकिन मसखरों के नाम भी होते हैं
और वे आपस में उन्हीं का इस्तेमाल करते हैं

तीन

मसखरे ही कर सकते हैं
मसखरों का सही मूल्यांकन

चार

मसखरे
दूसरों के सामने कभी हँसते नहीं हैं
हँसना उनके पेशे के चीज है
जिसका उपयोग वे
किसी मकसद से करते हैं

पाँच

सच्चे मसखरे
कभी मान ही नहीं सकते
कि वे मसखरे हैं

छह

मसखरे भाषा का इस्तेमाल
किफायत के साथ करते हैं
वे अपनी हिफाजत का सबसे पहले ध्यान रखते हैं

सात

अखबार
पाठ्य-पुस्तकें
सरकार
यहाँ तक की इतिहास में
मसखरों का उल्लेख गंभीरता से होता है।

आठ

मसखरे जिसका विरोध करते हैं
उसके विरोध को फिर असंभव बना देते हैं
इसीलिए मसखरे हमेशा
अनिवार्य होते हैं

नौ

मसखरे
अमूमन दंभी और ताकतवर होते हैं
उन्हें आटे का लोंदा
या माटी का माधो न समझना

दस

मसखरे
'अन' पर समाप्त होने वाली
कई क्रियाओं के कर्ता होते हैं
उदाहरण के लिए
शासन, उद्घाटन, लेखन,
विमोचन, उत्पादन, प्रजनन चिंतन आदि

ग्यारह

मसखरे ही जानते हैं
अपनी कला की बारीकियाँ
और कोई नहीं जानता

बारह

ऐसा भी होता है एक दिन
जब हम देखते हैं
मसखरों के हाथ में अमरूद की तरह अपनी दुनिया
मसखरे
दिखाते हैं अमरूद का करतब
हमें हँसाने के लिए
और हम डरना शुरू करते हैं

तेरह

यह तो नहीं कहीं
कि हम एक विराट मसखरा साम्राज्य के
प्रजाजन हैं।

  कवि का  परिचय

जन्म : 1 जनवरी 1952, सीतापुर, शहडोल, मध्य प्रदेश

भाषा : हिंदी
विधाएँ :
कहानी, कविता, निबंध, पटकथा
   मुख्य कृतियाँ

   कविता संग्रह
सुनो कारीगर, अबूतर-कबूतर, रात में हारमोनियम, एक भाषा हुआ करती है, कवि ने कहा
  कहानी संग्रह
दरियायी घोड़ा, तिरिछ, और अंत में प्रार्थना, पॉल गोमरा का स्कूटर, पीली छतरी वाली लड़की, मेंगोसिल, दिल्ली की दीवार, अरेबा परेबा, दत्तात्रेय के दुःख, मोहनदास

         निबंध
ईश्वर की आँख, नई सदी का पंचतंत्र

अनुवाद :

इंदिरा गांधी की आखिरी लड़ाई, कला अनुभव, लाल घास पर नीले घोड़े, रोम्यां रोलां का भारत, इतालो काल्विनो, नेरूदा, येहुदा अमिचाई, फर्नांदो पसोवा, कवाफ़ी, लोर्का, ताद्युश रोज़ेविच, ज़ेग्जेव्येस्की, अलेक्सांद्र ब्लाक आदि अनेक रचनाकारों के अनुवाद

सम्मान

भारतभूषण अग्रवाल पुरस्कार, ओमप्रकाश सम्मान, श्रीकांत वर्मा पुरस्कार, मुक्तिबोध सम्मान, वनमाली पुरस्कार, साहित्य अकादमी पुरस्कार,  साहित्यकार सम्मान, द्विजदेव सम्मान, पहल सम्मान,  अंतरराष्ट्रीय पुश्किन सम्मान, SAARC Writers Award, PEN grant for translation of The Girl with the Golden Parasol  (Trans. Jason Grunebaum), कृष्ण बलदेव वैद सम्मान, महाराष्ट्र फाउंडेशन पुरस्कार, ('तिरिछ अणि इतर कथा' अनु. जयप्रकाश सावंत)
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हिन्दी समय से साभार
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टिप्पणियाँ:-

अल्का सिगतिया:-
एक ओर  जहाँ। बस में पिता  मैं लौट आऊंगा में अवसाद और विषाद दिल में दर्द पैदा करती हैं तो मस्खरों की  पहचान का व्यंग्य  गुदगुदाता। है

मनचंदा पानी:-
ऐसा भी होता है एक दिन
जब हम देखते हैं
मसखरों के हाथ में अमरूद की तरह अपनी दुनिया
मसखरे
दिखाते हैं अमरूद का करतब
हमें हँसाने के लिए
और हम डरना शुरू करते है"

बहुत सूंदर।

आभा :-
पिता बहुत पसंद आयी। दर्द की एक गहरी टीस उठी। मसखरे व्यंग्य सटीक। वैसे तो उदय प्रकाश जी हैं इसलिए क्या ही कह सकते हैं लेकिन कविता में व्याभिचारिणी वाली पंक्तियों का प्रयोजन समझ में नहीं आया। बाकी कविता शानदार है।

किसलय पांचोली:-
' मैं लौट जाऊँगा' कविता में बादल, धूप, ओस, अँधेरा, पेड़, रक्त , सभ्यताएँ और इतिहास के लौटने  की पक्तियों के साथ मैँ लोट जाऊँगा वाले दार्शनिक अंत की पक्तियाँ अच्छी लगी। यह कविता और अच्छी लगती यदि इसमें व्यभिचारिणी और  कैदी सम्बंधित पंक्तियाँ नहीं होतीं ये पंक्तियाँ मुझे कविता के गाम्भीर्य को कम करती लगी। या यह मेरी काव्य समझ में कमी के कारण हुआ  मैँ नहीं जानती ।

आशीष मेहता:-
सत्य भाई, बहुत कोशिश की। पर, "मैं  जीना चाहता हूँ" के अलावा सब बाउँसर्स् रहीं, खास तौर पर "बस" एवं "मसखरा"। Wonder, whether special children should be allowed to a regular school.  

प्रदीप मिश्र:-
आशीष से सहमत । बस एक कविता "मैं  जीना चाहता हूँ" ।

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