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सत्यनारायण पटेल हमारे समय के चर्चित कथाकार हैं जो गहरी नज़र से युगीन विडंबनाओं की पड़ताल करते हुए पाठक से समय में हस्तक्षेप करने की अपील करते हैं। प्रेमचंद-रेणु की परंपरा के सुयोग्य उत्तराधिकारी के रूप में वे ग्रामांचल के दुख-दर्द, सपनों और महत्वाकांक्षाओं के रग-रेशे को भलीभांति पहचानते हैं। भूमंडलीकरण की लहर पर सवार समय ने मूल्यों और प्राथमिकताओं में भरपूर परिवर्तन करते हुए व्यक्ति को जिस अनुपात में स्वार्थांध और असंवेदनशील बनाया है, उसी अनुपात में सत्यनारायण पटेल कथा-ज़मीन पर अधिक से अधिक जुझारु और संघर्षशील होते गए हैं। कहने को 'गांव भीतर गांव' उनका पहला उपन्यास है, लेकिन दलित महिला झब्बू के जरिए जिस गंभीरता और निरासक्त आवेग के साथ उन्होंने व्यक्ति और समाज के पतन और उत्थान की क्रमिक कथा कही है, वह एक साथ राजनीति और व्यवस्था के विघटनशील चरित्र को कठघरे में खींच लाते हैं। : रोहिणी अग्रवाल

कहानी : फूलो का कुर्ता : यशपाल

आज पढ़िए एक छोटी और बहुत बढ़िया कहानी और साथ ही इस पर अपने विचार भी रखें सभी साथी ।

पढ़िए कहानी फूलो का कुर्ता

कहानी

|| फूलो का कुर्ता ||

हमारे यहां गांव बहुत छोटे-छोटे हैं। कहीं-कहीं तो बहुत ही छोटे, दस-बीस घर से लेकर पांच-छह घर तक और बहुत पास-पास। एक गांव पहाड़ की तलछटी में है तो दूसरा उसकी ढलान पर।

बंकू साह की छप्पर से छायी दुकान गांव की सभी आवश्कताएं पूरी कर देती है। उनकी दुकान का बरामदा ही गांव की चौपाल या क्लब है। बरामदे के सामने दालान में पीपल के नीचे बच्चे खेलते हैं और ढोर बैठकर जुगाली भी करते रहते हैं।

सुबह से जारी बारिश थमकर कुछ धूप निकल आई थी। घर में दवाई के लिए कुछ अजवायन की जरूरत थी। घर से निकल पड़ा कि बंकू साह के यहां से ले आऊं।

बंकू साह की दुकान के बरामदे में पांच-सात भले आदमी बैठे थे। हुक्का चल रहा था। सामने गांव के बच्चे कीड़ा-कीड़ी का खेल खेल रहे थे। साह की पांच बरस की लड़की फूलो भी उन्हीं में थी।

पांच बरस की लड़की का पहनना और ओढ़ना क्या। एक कुर्ता कंधे से लटका था। फूलो की सगाई गांव से फर्लांग भर दूर चूला गांव में संतू से हो गई थी। संतू की उम्र रही होगी, यही सात बरस। सात बरस का लड़का क्या करेगा। घर में दो भैंसें, एक गाय और दो बैल थे। ढोर चरने जाते तो संतू छड़ी लेकर उन्हें देखता और खेलता भी रहता, ढोर काहे को किसी के खेत में जाएं। सांझ को उन्हें घर हांक लाता।

बारिश थमने पर संतू अपने ढोरों को ढलवान की हरियाली में हांक कर ले जा रहा था। बंकू साह की दुकान के सामने पीपल के नीचे बच्चों को खेलते देखा, तो उधर ही आ गया।

संतू को खेल में आया देखकर सुनार का छह बरस का लड़का हरिया चिल्ला उठा। आहा! फूलो का दूल्हा आया है। दूसरे बच्चे भी उसी तरह चिल्लाने लगे।

बच्चे बड़े-बूढ़ों को देखकर बिना बताए-समझाए भी सब कुछ सीख और जान जाते हैं। फूलो पांच बरस की बच्ची थी तो क्या, वह जानती थी, दूल्हे से लज्जा करनी चाहिए। उसने अपनी मां को, गांव की सभी भली स्त्रियों को लज्जा से घूंघट और पर्दा करते देखा था। उसके संस्कारों ने उसे समझा दिया, लज्जा से मुंह ढक लेना उचित है। बच्चों के चिल्लाने से फूलो लजा गई थी, परंतु वह करती तो क्या। एक कुरता ही तो उसके कंधों से लटक रहा था। उसने दोनों हाथों से कुरते का आंचल उठाकर अपना मुख छिपा लिया।

छप्पर के सामने हुक्के को घेरकर बैठे प्रौढ़ आदमी फूलो की इस लज्जा को देखकर कहकहा लगाकर हंस पड़े। काका रामसिंह ने फूलो को प्यार से धमकाकर कुरता नीचे करने के लिए समझाया। शरारती लड़के मजाक समझकर हो-हो करने लगे।

बंकू साह के यहां दवाई के लिए थोड़ी अजवायन लेने आया था, परंतु फूलो की सरलता से मन चुटिया गया। यों ही लौट चला। बदली परिस्थिति में भी परंपरागत संस्कार से ही नैतिकता और लज्जा की रक्षा करने के प्रयत्न में क्या से क्या हो जाता है।

000 यशपाल
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टिप्पणियाँ:-

प्रज्ञा :-
साहित्य की एक बहुचर्चित कहानी। एक सशक्त कहानीकार के हाथों निखरी। एक प्रतीकधर्मी स्थिति से कहानीकार ने परम्परागत नैतिकता पर तंज किया है।
बदले हालात में नैतिकता भी पुनः परिभाषित होगी-- इसे कथाकार के पूरे साहित्य में देखा जा सकता है।
शुक्रिया मनीषा जी।

मनचन्दा पानी:-
बढ़िया कहानी। कम शब्दों में बड़ी बात। छोटी हथौड़ी से बड़ी चोट। सुन्दर।
अपने विवेकानुसार कुछ सुधार सुझाव दे रहा हूँ। वरिष्ठ साथी आगे मार्गदर्शन करेंगे तो अच्छा रहेगा।

पांच-छह घर से लेकर दस बी-बीस घर तक।

उसके ढलान पर
आवश्यकताएं= जरूरतें
बारिश के थमने के बाद
यही कोई सात बरस
ढोर काहे को किसी के खेत में जाएं" का अर्थ समझ नहीं आया।
योंही लौट चला' के बाद कुछ और कहने की आवश्यकता मेरे हिसाब से नहीं है।

किसलय पांचोली:-
कहानी अच्छी लगी ।

लेकिन उसके शुरुवाती वाक्य लेख जैसे लगे। उन्हें या तो हटा दिया जाए  या बंकू साह की दुकान के साथ जोड़ कर लिखा जाए तो प्रभाव बेहतर होगा। कहानी यहीं से शुरू हुई है।

' मन चुटिया जाना ' कदाचित लोक भाषिक व्यंजना है। इसके बाद एक/ आधा वाक्य शुद्ध हिंदी का लिख कर कहानी के तंज को और पैना बनाया जा सकता है।

फ़रहत अली खान:-
पहली बार पढ़ी ये कहानी।
बालक-मन की बातें और हरकतें कितनी भोली कितनी मासूमियत भरी होती हैं। यशपाल जी, जिनका नाम हिंदी कहानी के सबसे बड़े नामों में लिया जाता है, बेहद सहजता से काफ़ी गूढ़ बातें कह गए और साथ ही बिना पूछे ही कई सवाल भी खड़े कर गए।

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