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सत्यनारायण पटेल हमारे समय के चर्चित कथाकार हैं जो गहरी नज़र से युगीन विडंबनाओं की पड़ताल करते हुए पाठक से समय में हस्तक्षेप करने की अपील करते हैं। प्रेमचंद-रेणु की परंपरा के सुयोग्य उत्तराधिकारी के रूप में वे ग्रामांचल के दुख-दर्द, सपनों और महत्वाकांक्षाओं के रग-रेशे को भलीभांति पहचानते हैं। भूमंडलीकरण की लहर पर सवार समय ने मूल्यों और प्राथमिकताओं में भरपूर परिवर्तन करते हुए व्यक्ति को जिस अनुपात में स्वार्थांध और असंवेदनशील बनाया है, उसी अनुपात में सत्यनारायण पटेल कथा-ज़मीन पर अधिक से अधिक जुझारु और संघर्षशील होते गए हैं। कहने को 'गांव भीतर गांव' उनका पहला उपन्यास है, लेकिन दलित महिला झब्बू के जरिए जिस गंभीरता और निरासक्त आवेग के साथ उन्होंने व्यक्ति और समाज के पतन और उत्थान की क्रमिक कथा कही है, वह एक साथ राजनीति और व्यवस्था के विघटनशील चरित्र को कठघरे में खींच लाते हैं। : रोहिणी अग्रवाल

ग़ज़ल : कैफ़ भोपाली

लखनऊ में जन्मे और भोपाल में रहे प्रख्यात शायर और गीतकार कैफ़ भोपाली(1917-1991) अपने ज़माने के मुशायरों का बड़ा आकर्षण हुआ करते थे। अलग ही अंदाज़ के शायर थे; छोटे-छोटे मिसरों(पंक्तियों) में दो अलग-अलग बातें कह देना, केवल भिन्न-भिन्न अर्थ वाले शब्दों के इस्तेमाल से ही मिसरे कह जाना आदि इनकी विषेशताएँ थीं।
इनकी ग़ज़लों और गीतों को बड़े-बड़े गायकों ने अपनी आवाज़ दी। आज इनकी तीन ग़ज़लें(पूर्ण/आंशिक) देखें और टिप्पणियाँ दें:

1.
दाग़ दुनिया ने दिए, ज़ख़्म ज़माने से मिले
हमको तोहफ़े ये तुम्हें दोस्त बनाने से मिले

हम तरसते ही तरसते ही तरसते ही रहे
वो फ़लाने से फ़लाने से फ़लाने से मिले

ख़ुद से मिल जाते तो चाहत का भरम रह जाता
क्या मिले आप जो लोगों के मिलाने से मिले

माँ की आग़ोश में कल, मौत की आग़ोश में आज
हमको दुनिया में ये दो वक़्त सुहाने से मिले

कभी लिखवाने गए ख़त, कभी पढ़वाने गए
हम हसीनों से इसी हीले-बहाने से मिले
(हीला - बहाना)

इक नया ज़ख़्म मिला, एक नई उम्र मिली
जब किसी शहर में कुछ यार पुराने से मिले

एक हम ही नहीं फिरते हैं लिए क़िस्सा-ए-ग़म
उन के ख़ामोश लबों पर भी फ़साने से मिले
(क़िस्सा-ए-ग़म - ग़म का क़िस्सा; फ़साना - कहानी)

कैसे मानें कि उन्हें भूल गया तू ऐ 'कैफ़'
उन के ख़त आज हमें तेरे सिरहाने से मिले

2.
कौन आएगा यहाँ, कोई न आया होगा
मेरा दरवाज़ा हवाओं ने हिलाया होगा

दिल-ए-नादाँ न धड़क, ऐ दिल-ए-नादाँ न धड़क
कोई ख़त लेके पड़ोसी के घर आया होगा
(दिल-ए-नादाँ - नादान दिल)

इस गुलिस्ताँ की यही रीत है ऐ शाख़-ए-गुल
तूने जिस फूल को पाला वो पराया होगा
(गुलिस्ताँ - बग़िया; शाख़-ए-गुल - फूलों की डाली)

गुल से लिपटी हुई तितली को गिराकर देखो
आँधियों तुमने दरख़्तों को गिराया होगा
(दरख़्त - पेड़)

खेलने के लिए बच्चे निकल आए होंगे
चाँद अब उस की गली में उतर आया होगा

'कैफ़' परदेस में मत याद करो अपना मकाँ
अब के बारिश ने उसे तोड़ गिराया होगा

3.
दर-ओ-दीवार पे शक्लें सी बनाने आई
फिर ये बारिश मेरी तन्हाई चुराने आई
(दर-ओ-दीवार - दरवाज़ा और दीवार)

ज़िन्दगी बाप की मानिंद सज़ा देती है
रहम-दिल माँ की तरह मौत बचाने आई

आज कल फिर दिल-ए-बर्बाद की बातें हैं वही
हम तो समझे थे कि कुछ अक़्ल ठिकाने आई
(दिल-ए-बर्बाद - बर्बाद दिल)

दिल में आहट सी हुई, रूह में दस्तक गूँजी
किस की ख़ुश-बू ये मुझे, मेरे सिरहाने आई

तेरी मानिंद तेरी याद भी ज़ालिम निकली
जब भी आई है मेरा दिल ही दुखाने आई

प्रस्तुति-  फरहत अली खान
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टिप्पणियाँ:-

वसुंधरा काशीकर:-
क्या बात है। बहुत खूब! ज़िंदगी बाप की मानिंद सज़ा देती है।  गुल से लिपटी हुई तितली को गिराकर देखो। दाग दुनिया ने दिए, ज़ख़्म ज़माने से मिले। हम तरसते ही तरसते ही तरसते ही रहे। हासिलें ग़ज़ल शेर। बहुत बहुत शुक्रिया फ़रहतजी।

फ़रहत अली खान:-
सुवर्णा जी, अनुप्रिया जी, राजपूत जी, शुभ्रांशु जी, वसुंधरा जी, रेनुका जी, स्वाति जी, संजय जी, नाज़िया जी;
बहुत-बहुत शुक्रिया।

मीना शाह :-
वाह क्या खूब...कौन आया है यहाँ को जगजीत सिंह ने बहुत ही बढ़िया गाया   है

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