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सत्यनारायण पटेल हमारे समय के चर्चित कथाकार हैं जो गहरी नज़र से युगीन विडंबनाओं की पड़ताल करते हुए पाठक से समय में हस्तक्षेप करने की अपील करते हैं। प्रेमचंद-रेणु की परंपरा के सुयोग्य उत्तराधिकारी के रूप में वे ग्रामांचल के दुख-दर्द, सपनों और महत्वाकांक्षाओं के रग-रेशे को भलीभांति पहचानते हैं। भूमंडलीकरण की लहर पर सवार समय ने मूल्यों और प्राथमिकताओं में भरपूर परिवर्तन करते हुए व्यक्ति को जिस अनुपात में स्वार्थांध और असंवेदनशील बनाया है, उसी अनुपात में सत्यनारायण पटेल कथा-ज़मीन पर अधिक से अधिक जुझारु और संघर्षशील होते गए हैं। कहने को 'गांव भीतर गांव' उनका पहला उपन्यास है, लेकिन दलित महिला झब्बू के जरिए जिस गंभीरता और निरासक्त आवेग के साथ उन्होंने व्यक्ति और समाज के पतन और उत्थान की क्रमिक कथा कही है, वह एक साथ राजनीति और व्यवस्था के विघटनशील चरित्र को कठघरे में खींच लाते हैं। : रोहिणी अग्रवाल

11 मार्च, 2018

बालकथा:

                                     डुग्गु

                            रचना त्यागी

यह कहानी और इसके पात्र काल्पनिक हैं। यदि किसी के जीवन में घटी घटना से मेल खाती है। या फिर पात्र के नाम किसी के नाम से मिलते-जुलते हैं, तो यह महज़ इत्तेफाक ही होगा। 

      सत्या और सीमा डुग्गु को अपनी संतान की तरह प्यार करते थे। वे उसे गोद में लेकर उस से बातें करते, अपने हाथ से खाना खिलाते, घुमाने ले जाते, बीमार पड़ने पर डॉक्टर के पास ले जाकर उसका इलाज करवाते। डुग्गु भी उन्हें अपने मम्मी-पापा की तरह बहुत चाहती थी।  एक दिन के लिए भी सीमा या सत्या को कभी शहर से बाहर जाना पड़ता, तो डुग्गु उनके बिना बहुत उदास हो जाती , खाना-पीना छोड़ देती।  वे तीनों बहुत  प्यार से रहते थे। डुग्गु कभी किसी को काटती नहीं थी , इसलिए अड़ोस -पड़ोस के बच्चे भी उसे बहुत पसंद करते थे , उसके साथ खेलते थे।


रचना त्यागी


       एक बार की बात है।  सत्या और सीमा अपनी बाइक से कहीं जा रहे थे।  बरसात का मौसम था। सड़क गीली थी। सत्या बाइक चला रहे थे और पीछे की सीट पर बैठी सीमा से बात भी करते जा रहे थे।  सत्या और सीमा ने बात करने के कारण हैलमेट नहीं लगा रखा था। अचानक बाइक का पहिया फिसला और वे दोनों बाइक के साथ घिसटते हुए दूर तक चले गए। दोनों को बहुत चोटें आईं थीं। लोगों ने उन्हें उठाया और डॉक्टर से मरहम -पट्टी करवाकर उन्हें घर तक छोड़ा।

        डुग्गु उन दोनों की ऐसी हालत देखकर बहुत दुखी हुई।  वह कभी रोती थी , तो कभी उन्हें चाट -चाट कर अपना प्यार जताती थी। वैसे तो सत्या की माँ उन दोनों का ध्यान रख रही थीं , फिर भी यदि उन्हें  किसी चीज़ की ज़रूरत होती , डुग्गु तुरंत समझ जाती और भागकर उस चीज़ को मुँह में दबाकर ले आती। जब तक उन दोनों के ज़ख्म पूरी तरह ठीक नहीं हुए , डुग्गु ने उनका बहुत ध्यान रखा और उनकी सेवा में लगी रही।




       ठीक होने के बाद जब सत्या ऑफ़िस जा रहे थे, अचानक डुग्गु ने भौंकना शुरु कर दिया। वह कुछ कहना चाह रही थी। सत्या समझ नहीं पाए कि वह क्या कहना चाह रही थी।  उन्होंने नीचे बैठकर उस से प्यार से पूछा -'क्या कह रही है बेटा ?"



     जवाब में डुग्गु दौड़कर गयी और सत्या का हैलमेट उठा लाई। सीमा भी यह सब देख रही थी। सत्या और सीमा का मन भीग गया डुग्गु का स्नेह देखकर। उस दिन के बाद से जब भी सत्या घर से बाहर निकलने को होते , डुग्गु ही उन्हें हैलमेट लाकर देती।
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रचना त्यागी:
कवि, कथाकार और अनुवादक है।
दिल्ली में रहती है।

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