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सत्यनारायण पटेल हमारे समय के चर्चित कथाकार हैं जो गहरी नज़र से युगीन विडंबनाओं की पड़ताल करते हुए पाठक से समय में हस्तक्षेप करने की अपील करते हैं। प्रेमचंद-रेणु की परंपरा के सुयोग्य उत्तराधिकारी के रूप में वे ग्रामांचल के दुख-दर्द, सपनों और महत्वाकांक्षाओं के रग-रेशे को भलीभांति पहचानते हैं। भूमंडलीकरण की लहर पर सवार समय ने मूल्यों और प्राथमिकताओं में भरपूर परिवर्तन करते हुए व्यक्ति को जिस अनुपात में स्वार्थांध और असंवेदनशील बनाया है, उसी अनुपात में सत्यनारायण पटेल कथा-ज़मीन पर अधिक से अधिक जुझारु और संघर्षशील होते गए हैं। कहने को 'गांव भीतर गांव' उनका पहला उपन्यास है, लेकिन दलित महिला झब्बू के जरिए जिस गंभीरता और निरासक्त आवेग के साथ उन्होंने व्यक्ति और समाज के पतन और उत्थान की क्रमिक कथा कही है, वह एक साथ राजनीति और व्यवस्था के विघटनशील चरित्र को कठघरे में खींच लाते हैं। : रोहिणी अग्रवाल

31 मार्च, 2018

बुरांस के सानिध्य में महादेवी वर्मा जयंती पर गोष्ठी


पंखुरी सिन्हा

महान कवयित्री महादेवी वर्मा की एक सौ ग्यारहवीं जयंती पर, २६ मार्च २०१८ को, महादेवी सृजन पीठ रामगढ में एक भव्य दिव्य काव्य गोष्ठी का आयोजन किया गया. इस अवसर पर छठा महादेवी वर्मा स्मृति व्याख्यान देते हुए लब्ध प्रतिष्ठित लेखिका मृदुला गर्ग ने महादेवी की काव्य चेतना में आधुनिक नारीवादी तत्वों को रेखांकित किया।


इसके बाद वर्तमान स्त्री और लेखन के विषय पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए, उन्होंने स्त्री के आगे की कई चुनौतियों का विश्लेषण किया। लेकिन, उन्होंने कहा कि एक विकसित समाज में स्त्री किसी भी दृष्टि से पुरुष से कम नहीं, उसकी संवेदनाएं उतनी ही सूक्ष्म होंगी जितनी कि एक पुरुष की होंगी। कई उपन्यासों और कहानियों की पटकथाओं  की चर्चा करते हुए उन्होंने स्त्री की राह में बाधक कई विरोधाभासों का ज़िक्र किया। यहाँ स्त्री के भावनात्मक शोषण का उन्होंने विशेष उल्लेख किया, और उदहारण के तौर पर, अल्पना मिश्र की कहानी 'स्याही में सुर्खाब के पंख' को पेश किया। साथ ही, क्षमा शर्मा और गीतांजलि श्री के उपन्यास की भी चर्चा हुई, अन्य कई कृतियों के साथ.
इसी सत्र में विख्यात और वरिष्ठ कवि, मंगलेश डबराल ने अपना स्त्री और लेखन सम्बन्धी व्याख्यान देते हुए, स्त्री की बराबरी, आज़ादी और उसके श्रम की महिमा को रेखांकित किया। ईसिस सिलसिले में उन्होंने गीतांजलि श्री के उपन्यास की विस्तृत चर्चा की. साथ ही, उन्होंने कई दलित महिलाओं की आत्म कथाओं का उल्लेख किया, जिसमें स्त्री की लम्बी विकास यात्रा के कुछ संघर्षशील पदचिन्ह देखे जा सकते हैं। कन्नड़ लेखिका वैदेही की बातों को उद्धृत करने के साथ-साथ, उन्होंने कई विभिन्न भाषा भाषी लेखिकाओं की बातों से श्रोताओं का ज्ञान एवं उत्साह वर्धन किया। इस सत्र की अध्यक्षता कर रहे, वरिष्ठ लेखक सतीश जायसवाल जी ने बाज़ारवाद के प्रति आगाह करते हुए कई गंभीर बातें कहीं और साहित्य की गंभीरता को अक्षुण्ण रखने का आग्रह किया।


इसके बाद दूसरे सत्र में चर्चित कवयित्री सुमन केशरी समेत अनेक विद्वानों ने स्त्री और लेखन के बेहद संवेदनशील, ज्वलंत और ज़रूरी मुद्दे पर अपने विचार और तर्क रखे. सुमन केशरी जी ने कहा कि आज की औरत खुद अपना वजूद ढूढ़ना चाहती है, न वह पहले की आदर्श नारी की गढ़ी हुई परिभाषा में समाना चाहती है, न मर्दों की नकल करना चाहती है. ओसाका यूनिवर्सिटी जापान में एक लम्बे समय तक अध्यापन कर चुकी, महादेवी की प्रिय और करीबी शिष्या डॉ यास्मीन सुल्ताना नक़वी जी ने महादेवी जी के संस्मरणों का सुंदर पाठ कर समूची महफ़िल को भाव विभोर कर दिया। उन्होंने महादेवी की एक करीबी झलक ही नहीं दिखाई बल्कि, उनके अनुशासन, और व्यक्तित्व के कुछ अनूठे पक्षों का दर्शन करवाया। साथ ही, दूधनाथ जी के निर्देशन में महादेवी जी पर ही अपने शोध प्रयास प्रसंग को लेकर उन्होंने समूचे विश्व विद्यालय और साहित्यिक परिवेश और समय को जीवंत बना दिया।
भोजनो परान्त तीसरे सत्र में, एक बार फिर स्त्री और लेखन के मुद्दे पर ज़ोरदार बहस हुई. इस सत्र में सहभागिता करने वालों में मुकेश नौटिआल, शशांक शुक्ल, रिया शर्मा और पंखुरी सिन्हा थे, सञ्चालन सिद्धेश्वर सिंह ने किया। शशांक शुक्ल ने स्त्री लेखन के विभन्न जटिल पक्षों की बढ़िया और बारीक विवेचना करते हुए कहा कि स्त्री जैसा बोलती है, वैसा ही लिखती है, अर्थात उसके पास एक विचार सम्पृक्त आवाज़ भी है, दृष्टि भी, दर्शन भी. आलोचना के सम्बन्ध में, शशंक जी ने एक बड़ा ही अहम सवाल उठाया कि अगर मुक्ति बोध के मैं का आसानी से समष्टि में विलय हो जाता है तो अमृता प्रीतम, न हन्यते की मैत्रेयि देवी अथवा अन्य स्त्री रचनाकारों का क्यों नहीं हो पाता? अपने भाषण के अंत में उन्होंने मृदुला गर्ग की बात को पुनः याद किया कि "मैं सर्जक हूँ, मर्द नहीं होना चाहती।"
इन्हीं बातों को आगे बढ़ाते हुए, पंखुरी सिन्हा ने कहा कि स्त्री पुरुष की संवेदनाएं भले एक हों, उनकी परिस्थितियां एक नहीं हो पायी हैं. काम के क्षेत्र में भी उनकी अलग ज़रूरतें भी होती हैं, जिनका बाकायदा सम्मान ज़रूरी है, जैसे की अँधेरे के बाद स्त्री किसी भी सड़क पर सुरक्षित नहीं। स्त्री और पुरुष की बायोलॉजिकल क्लॉक्स का अंतर् भी बड़ा है और बतौर विदेशी, बतौर इमिग्रेंट उनकी ज़िंदगिओं को अलग ढंग से प्रभावित करता है. महादेवी वर्मा की कविताओं पर अपना पेपर प्रस्तुत करते हुए, युवा लेखिका पंखुरी सिन्हा ने महादेवी की लोकप्रियता पर ज़ोर दिया और उनकी कविताओं के छायावादी सौंदर्य को उद्धृत किया।
इसी सत्र में सुनील भट्ट ने साहिर लुध्यानवी के गीतों और उनके जीवन पर एक शान दार परचा प्रस्तुत किया, जिसमें उनके छात्र कालिक प्रेम का भी ज़िक्र किया, जो अमृता प्रीतम से इतर किसी अन्य सिख लड़की के साथ था.


इन तीन विचार गोष्ठियों के सत्र के बाद, तीन उम्दा कविता सत्र भी हुए जिनमें अल्मोड़ा, और आस पास के क्षेत्रों से आये विभन्न कविओं के साथ, बाहर से आये कई कवियों ने हिस्सा लिया। इनमें साहित्य अकादेमी से सम्मानित मंगलेश डबराल, वनमाली तथा अन्य सम्मानों से सम्मानित सतीश जायसवाल , कुंवर रविंद्र, नन्द किशोर नौटियाल , गीता गैरोला , सिद्धेश्वर सिंह , शैलेय असम्भव , आशा शैली , मृदुला शुक्ल , नीलिमा शर्मा,  नूतन डिमरी गैरोला, पंखुरी सिन्हा, कविता कृष्ण पल्लवी, अर्चिता पंत, उमेश पंत, अनिल कार्की, सुनील भट्ट, राकेश सकलानी, सुभाष तराण, संदीप तिवारी,  डॉ ललित जोशी, डॉ तेजपाल सिंह, डॉ ममता एवं डॉ रचना अग्रवाल समेत अनेक कवियों ने भागीदारी की. सृजन पीठ से जुड़े हुए प्रोफेसर पोखरियाल और मोहन रावत जी ने कई सत्रों का सञ्चालन तो किया ही, उनके सक्रीय मार्गदर्शन ने कार्यक्रम को अधिक गरिमा प्रदान की. खिले हुए बुरांस के मौसम में, महादेवी साहित्य चर्चा के साथ-साथ, हिंदी साहित्य के अतीत, वर्तमान, भविष्य पर एक सार्थक बैठक मुकम्मल हुई.

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2 टिप्‍पणियां:

  1. पंखुरी जी ने बेहद इत्मीनान के साथ ...संजीदगी के साथ रिपोर्ट लिखी है। उन्हें साधुवाद ।

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  2. पंखुरी जी ने बेहद इत्मीनान के साथ ...संजीदगी के साथ रिपोर्ट लिखी है। उन्हें साधुवाद ।

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