image

सत्यनारायण पटेल हमारे समय के चर्चित कथाकार हैं जो गहरी नज़र से युगीन विडंबनाओं की पड़ताल करते हुए पाठक से समय में हस्तक्षेप करने की अपील करते हैं। प्रेमचंद-रेणु की परंपरा के सुयोग्य उत्तराधिकारी के रूप में वे ग्रामांचल के दुख-दर्द, सपनों और महत्वाकांक्षाओं के रग-रेशे को भलीभांति पहचानते हैं। भूमंडलीकरण की लहर पर सवार समय ने मूल्यों और प्राथमिकताओं में भरपूर परिवर्तन करते हुए व्यक्ति को जिस अनुपात में स्वार्थांध और असंवेदनशील बनाया है, उसी अनुपात में सत्यनारायण पटेल कथा-ज़मीन पर अधिक से अधिक जुझारु और संघर्षशील होते गए हैं। कहने को 'गांव भीतर गांव' उनका पहला उपन्यास है, लेकिन दलित महिला झब्बू के जरिए जिस गंभीरता और निरासक्त आवेग के साथ उन्होंने व्यक्ति और समाज के पतन और उत्थान की क्रमिक कथा कही है, वह एक साथ राजनीति और व्यवस्था के विघटनशील चरित्र को कठघरे में खींच लाते हैं। : रोहिणी अग्रवाल

27 सितंबर, 2018

उमा की कविताएं



उमा


 सलाह, जिंदगी और सपने के बीच स्त्री




1..


छुईमुई जगाती है,
छूने की चाहत,
कितनी बार कहा है तुमसे,
कैक्टस बन कर रहा करो...

2...

लब सिले रखो,
पलकें झुकी रखो
एक तुम्हारे मुँह खोलने से
एक तुम्हारे नज़रें उठाने से
शर्म से झुकी गर्दनों को
गिनेगा कौन...!!

3...

संस्कारों की गठरी ने
बढऩे नहीं दिया
कद तुम्हारा
सच में छोटा है,
नापो तुम

जितनी जमीं से बाहर हो
उससे कहीं ज्यादा
अंदर हो तुम,

एक दिन जब
समा जाओगी पूरी की पूरी
जान सकोगी
वो तुम ही हो जो
जलजला बन फूटती है

चलो उतार दो गठरी
बचा लो इस धरा को
मनुष्य विहीन होने से...







4...

जिस तरह छंद में
बनती हैं रोटियाँ
वैसी कविताई
क्यूँ मुझसे होती नहीं

सोचती हूँ अक्सर
गर नमक ज्य़ादा हुआ सब्जी में
कौन खाएगा इसे
और कोई क्यूँ पढ़ेगा
मेरी कविता

राइट या लेफ्ट
गरियाती एफबी कौमें
कहाँ समझ पाएँगी
कि चाय में चीनी ज्यादा या कम होना
कर देता है
सुबह की खबरों को बेमजा

और कोई क्यों उठाएगा
इसके लिए आवाज
कि अचार पर भी
दिया जाए कोई अवॉर्ड

उन्हें पता ही नहीं
कितनी पारंगत हैं हम
अचार डालने में
नींबू, केरी और मिर्ची का
डालते हुए अचार
एक रोज सपनों को भी
भर दिया था बरनी में

सजी रहेंगी ये बरनियां
रसोई की टांड पर
रोज इनकी जरूरत नहीं
जब बिगड़ता है जायका
तब खुलते हैं बंद ढक्कन
एक-एक फांक
एक-एक सपने
निकलते हैं आहिस्ता आहिस्ता
और जी ले लेते हैं हम
अपने हिस्से की जिंदगी
पर इस जिंदगी पर
किताब लिखेगा कौन!


5...
पूरे चाँद की रात में
हर तमन्ना पूरी हो ये जरूरी नहीं
माँ ने दिलासा दिया होगा खुद को
जब लिया तुम्हारा पहला चुंबन
पर मीठा नहीं लगा उन्हें
अमावस सा चेहरा तुम्हारा

सुना है अब
कद बढ़ रहा है तुम्हारा
समझ भी
जानती ही हो
झुकती जा रही है पिता की कमर
और ज्यादा मेहनत करते करते
और ज्यादा दहेज जोड़ते जोड़ते

कभी कभार बाजार जाने वाली मां
अक्सर चल देती हैं शहर की ओर
और ढूँढ़ती हैं वही क्रीम और पाउडर
जो सोनम कपूर लगाती है
अब दूध-मलाई पर से यकीन उठ चुका है उनका

ये यकीन कभी भी उठ जाया करता है
तुम्हारा भी उठा था
जब उठ के चल दिया था वो चश्मे वाला लड़का
चार आँखों से भी वो कहाँ तुम्हारा मन देख पाया था
उस रात कितना रोई थी तुम
सुबह तकिये ने ये राज खोला था माँ पर
फिर भी हमेशा की तरह
वो तुम पर ही बरसी

थम जाना चाहिए
तुम्हारी आँखों का
उनकी जुबाँ का
बरसना
ये बहा ले जाते हैं
खुद पर भरोसे को

इस कटाव को रोकना
जरूरी है
भीतर चल रहे
भौतिक परिवर्तन के लिए
इसी के बाद
बदलेगा कोयला
हीरे में
यह चमक अंतस की है
इसे पा लेना
जरूरी नहीं है क्या!!




6...
चौदह की हो
और वो चार दिन
दाखिल हो गए
जीवन में तुम्हारे
तुम्हें उपजाऊ बनाने के लिए
तुमने भी यह सुना है
और महसूस किया है
रिसते गर्म लहू को
और किसी की आँखों में टपकते
पागलपन को

चौदह की हो
बात बड़ों की मानो
चारदीवारी में सिमट जाओ
और जरा समेट के बैठो
अपनी टांगे
समेट लो फैले हुए खिलौने
खिलते हुए सपने
करो उतना ही, जो कहा जाओ
चल दो उसके पीछे, जिसके पीछे भेज दिया जाए
तुम्हारी कोख से उपजेगा अँखुआ
और हो जाएगा तुम्हारा एक और प्रमोशन
अब चौदह की नहीं हो
बहुत सयानी हो तुम

जब पार करोगी उम्र का चौथा दशक
तुम्हारे भरे-पूरे परिवार पर
शायद हो किसी को रश्क
इत्मीनानभरी दोपहरी में कभी
तुम महसूस करोगी
कितनी सुखी हो तुम
और सूखी भी
लहू अब कम रिसता है
कम हुई चेहरे की लुनाई भी
चुगली कर रही हैं चेहरे की दरारें
आईने में इन्हें देखते हुए
क्या कभी दिखी वो दो आँखें
जिनमें देखा था तुमने पागलपन
उस वक्त जब
जब चौदह की थी तुम
और....







7...

बचपन में जितनी आइसक्रीम नहीं खाई होगी
उससे कई ज्यादा बार सुना होगा तुमने
बैड टच के बारे में
चिल्लाई होंगी माँ
जब बिन बताए तुम चली गई
सितौलिए खेलने
शायद बॉल की तरह दनदनाता चांटा पड़ा हो
और ढह गए सितौलिए की तरह सपने
माँ ने कुछ देर बाद तुम्हें पुचकारा भी होगा
और सुनाया होगा कोई किस्सा
इज्जत के लुट जाने का
उसने अपने डर में तुम्हें भी उलझा दिया होगा
तुम्हारे केश सुलझाते सुलझाते

अक्सर ऐसा ही करती हैं माँ
सिर से जुएं निकालते हुए
निकाल देती हैं कच्चे मन से
सेक्स के प्रति आकर्षण
और भर देती हैं घोर वितृष्णा

 माँ संवार देती हैं बाल
और सिखा देती हैं दामन को पाक साफ रखने का हुनर
वो बूँद बूँद टपकाती हैं कानों में सरसों का तेल
और देती जाती हैं हिदायतें
सब संभालें रखना है पति के लिए
सच में संभालें रखा तुमने
और बचा लिया पहला स्पर्श
पति के लिए

पर मां ने बताया नहीं तुम्हें
जब वो ब्याही थी तो 14 की थी
24 की हो गई हो तुम
पढ़ाई पूरी करते करते
क्या सच में तुमने पढ़ाई की!

तुमने पढ़ा है कि नहीं
कि कली के खिलने की एक तय उम्र होती है
उसके बाद तो बिखरना ही होता है
बिखरी हुई हो आज तुम पति की बांहों में
छिटका मन देख रहा है तुम्हें
निर्वस्त्र होते...

छी...तुम्हें घ्रणास्पद लग रहा है सब
रटंत विद्या में माहिर रही हो तुम
रटा है इतने साल कि बुरा होता है स्पर्श
और अब शायद तुम यही रटो
जो उसने माथे पर चुंबन धरते हुए कहा था-
बहुत प्यारी हो तुम सच में...
पर ठंडी हो, एकदम ठंडी...।
००

कवि, कहानीकार और उपन्यासकार उमा जयपुर में रहती है।


कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें