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सत्यनारायण पटेल हमारे समय के चर्चित कथाकार हैं जो गहरी नज़र से युगीन विडंबनाओं की पड़ताल करते हुए पाठक से समय में हस्तक्षेप करने की अपील करते हैं। प्रेमचंद-रेणु की परंपरा के सुयोग्य उत्तराधिकारी के रूप में वे ग्रामांचल के दुख-दर्द, सपनों और महत्वाकांक्षाओं के रग-रेशे को भलीभांति पहचानते हैं। भूमंडलीकरण की लहर पर सवार समय ने मूल्यों और प्राथमिकताओं में भरपूर परिवर्तन करते हुए व्यक्ति को जिस अनुपात में स्वार्थांध और असंवेदनशील बनाया है, उसी अनुपात में सत्यनारायण पटेल कथा-ज़मीन पर अधिक से अधिक जुझारु और संघर्षशील होते गए हैं। कहने को 'गांव भीतर गांव' उनका पहला उपन्यास है, लेकिन दलित महिला झब्बू के जरिए जिस गंभीरता और निरासक्त आवेग के साथ उन्होंने व्यक्ति और समाज के पतन और उत्थान की क्रमिक कथा कही है, वह एक साथ राजनीति और व्यवस्था के विघटनशील चरित्र को कठघरे में खींच लाते हैं। : रोहिणी अग्रवाल

10 अप्रैल, 2020

विदेशी भाषा की कविताएँ : भाग - 1


अनुवाद : पंखुरी सिन्हा 





जान कुलब्रोत  (जर्मन कवि)



पहले और जल्दी

बचपन से ही
यानि बच्चे की प्रैम से लेकर
और सबसे ज्यादा
और सबसे उँची हवाई जहाज की आवाज़
उम्मीद करती हुई
तीव्र गति प्रगति की
क्योंकि चलते रहना ही नहीं
चले जाना ही हमेशा
उद्देश्य रहा
ऐसी गतिविधियां
पहचान ली जाती हैं जल्दी
और जो पहचाना जाता है
तेज़, गतिशील और प्रगतिशील
शिथिलता से दूर
वह होता जाता है
अनुकरणीय
लोग करते हैं उसके जैसा
और जो प्रेरणा और उदहारण बन जाता है
इस तरह
वह भी पहचान लिया जाता है
हमेशा के लिए
अलबत्ता एक पेंच यहाँ भी है
कई बार यह मशीनों
मशीनी उपयोगिताओं के साथ होता है
अक्सर, ट्रैक्टर के साथ…………
आवाज़ कर रही हैं ट्रेनें
दाँत की किटकिट की तरह
लकड़ी और कौंक्रीट की बनी
अपनी राह और उसकी सरहद पर
मज़बूत चुंबक के खामोश आकर्षण में
झलकती है वह ताकत
कि जिसमें खिल सकते हैं बच्चे
पलते हुए
फिर क्या करना चाहिए हमें
अपने रॉकेटस के साथ ?
उनके तैयार होने का आखिरी चरण ही
धधक कर जल उठता है पृथ्वी के पास?!

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जेम्स सदरलैंड स्मिथ  (ब्रिटिश कवि)

प्यार के उस रिश्ते का खात्मा 

 सब कुछ किये को
अनकिया करने की चाहत में
हवा में उछली हुई बिल्ली भी
जैसे वापस मुड़ती है
अपने घुमाव में
सेब के उस पेड़ के नीचे
काली चिड़िया
किसी वीडियो के रीवाइंड
होने की प्रक्रिया की तरह
पंख झटकाती हुई
पीछे की ओर उड़ती चलती है
आखिर कार, उतरती है
ज़मीन के उस टुकड़े पर
अपनी इच्छा भरी आँखें लिये
झुकती है, पंख झाड़ती हुई सोचती है….
पंख फड़फड़ाती आँखे मींचती है
और इसी तरह एक सेब
वापस लौट जाता है
तुम्हारे हाथ से
अपने पेड़ की अपनी शाख तक
अपने पकेपन से
अपने कच्चे यौवन में लौटता है
लाल से हरा होता हुआ
घटाता अपना आकार
फल से फूल होता हुआ
अपनी सारी खिली पंखुरियों को
वापस मोड़कर कली में सिमटता हुआ!..............

और फिर इसी तरह
धक्का देती है गाड़ी
पहिया, टायर और फिर आती है
ब्रेक की चीखती हुई आवाज़
हवा में उड़ती है
तुम्हारे पिता की चलने वाली छड़ी
उनकी पकड़ से दूर
जब हवा में एक हिचकोला खाते हैं
वे खुद
वापस ज़मीन पर अपने पंजों
अपने पैरों के बल आते हुए
इस दृश्य के वीडियो में पीछे चलते हैं
अपने घर की ओर
जाते हैं भीतर
टांगते हैं अपना कोट उसकी नियत हुक पर
बैठते हैं अपनी तय जगह पर
इन सारे बीते हुए सालों की लगाए मसनद
अपने घने और सफ़ेद से वापस
युवा अवस्था वाले रंग के होते
बालों वाले पिता बोल उठते हैं
अचानक वैसी ही गाढ़ी युवा उम्र की आवाज़ में
और ठठा कर हंस पड़ते हैं
तब तक बनी रहती है वह हँसी
जब तक वे पकड़ नहीं लेते
और उछाल नहीं देते
उस उँचाई तक जहाँ मुस्कुरा पड़ते हो तुम!.............


और इसी तरह, तुम्हारी जांघ पर का जख्म
जिसके दाहिने हिस्से को छूना
मैं बेहद पसंद करता हूँ
अपनी उँगली की नोक से
जिसके दवाब में कुछ और खुल जाता है
वह घाव
होता हुआ कुछ नीला जीवंत,गुलाबी
और उभर आते हैं उसमें
कुछ छोटे छोटे दाने जैसे
और जहाँ कहीं से भी आती है
वह लंगड़ाहट तुम्हारी चाल में
गहरे बताती हुई तुम्हारे दर्द का पता
छलकाती हुई कुछ बूंदे पस और शायद
तुम्हारे आँसुओ की
एक दर्दीला बहाव जैसे रक्त स्राव
किसी और के चाकू के आगे
अचानक हो जाता है बन्द
लौट जाता है मांस पेशियों में
भरता हुआ वह पुराना जख्म
और हट जाता है
आँखों के आगे से चाकू भी!.................


और इसी तरह, बन्द होते हैं हमारे ओंठ
एक चुम्बन में
एक दूसरे के ओंठों के ऊपर
और छिटक कर हो जाते हैं अलग!
इसी तरह, बुझ जाती है उन पर
अलग अलग फैली मुस्कुराहट
और इसी तरह, अपरिचय का भाव आता है
हमारी आँखों में अलग अलग
दूर दूर देखते हैं हम
लेते हैं एक कदम पीछे
मुड़ जाते हैं दूसरी ओर!
और इसी तरह, धीमी पड़ जाती है
हमारे दिलों की उत्तेजित धड़कन
ठंढा हो जाता है नसों का उबाल
और इसी तरह, हमने बोले नहीं
एक दूसरे के लिए अप शब्द
विष बुझे चोट पहुँचाते क्रूर शब्द
और इसी तरह, हमने तय किया बेकार है
जोखिम उठाना! कोई भविष्य नहीं हमारा साथ साथ!
और इसी तरह, हम कभी नहीं मिले
कभी नहीं जाना एक दूसरे को हमने!

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