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सत्यनारायण पटेल हमारे समय के चर्चित कथाकार हैं जो गहरी नज़र से युगीन विडंबनाओं की पड़ताल करते हुए पाठक से समय में हस्तक्षेप करने की अपील करते हैं। प्रेमचंद-रेणु की परंपरा के सुयोग्य उत्तराधिकारी के रूप में वे ग्रामांचल के दुख-दर्द, सपनों और महत्वाकांक्षाओं के रग-रेशे को भलीभांति पहचानते हैं। भूमंडलीकरण की लहर पर सवार समय ने मूल्यों और प्राथमिकताओं में भरपूर परिवर्तन करते हुए व्यक्ति को जिस अनुपात में स्वार्थांध और असंवेदनशील बनाया है, उसी अनुपात में सत्यनारायण पटेल कथा-ज़मीन पर अधिक से अधिक जुझारु और संघर्षशील होते गए हैं। कहने को 'गांव भीतर गांव' उनका पहला उपन्यास है, लेकिन दलित महिला झब्बू के जरिए जिस गंभीरता और निरासक्त आवेग के साथ उन्होंने व्यक्ति और समाज के पतन और उत्थान की क्रमिक कथा कही है, वह एक साथ राजनीति और व्यवस्था के विघटनशील चरित्र को कठघरे में खींच लाते हैं। : रोहिणी अग्रवाल

23 अप्रैल, 2020

अनीता दुबे की कविताएँ



अनीता दुबे


स्त्री होना 

मैंने बीज से उत्पति की
पीली आभा
सूरज सी चमकीली देखी...
मैंने गरिमा का मस्तक
ओज की बिन्दी देखी
पिता के कन्धे पर बैठी
खिलखिलाती बगिया देखी
देखी आँगन की महकती चहकती चिडियाँ भी
घर की चौखट पर अटकी मुस्कान
समंदर सी अथाह मन की लहरें
आकाश में तारों सी लटकी आशाएँ
मैंने देखा माटी से दुर्गा बनते
काली को रक्त में सनते
मैंने ममता करूणा प्यार त्याग बलिदान
सभी एक ही रिश्ते में देखे
वे सभी स्त्री थी ..
अनिता दुबे




माँ की तस्वीर

माँ की तस्वीर
ठीक मेरे पलंग के
सिरहाने लगी है
उनकी खुली आँखे मुझे
देखती रहती है हर पल

हर दिन
जब मैं तैयार होती हूं
रोती हूँ हंसती हूँ या गाती हूँ
आवाज नहीं आती मगर
उनके होठ बोलते से है

मैं हर दिन तस्वीर से कहती हूँ
दुखड़े खुशियाँ उम्मीदे परेशानी
उलझनें उदासी भरी बातें
माँ का मुस्कान भरा चेहरा
सिर्फ देखता रहता मुझे
मानों सब जानती है

बिस्तर पर जब भी
मैं उनींदी होती
सपने में बचपन घूमती
घर आँगन पुराना
माँ का आँचल ओढ़े
और उनकी ऊँगली थामें
मुझे घर की सीढियां चढ़ाकर माँ मुस्काती
हर बार अपने साथ बिठाकर सिखा देती
सजना सवरना
गुड़िया की साड़ी में गोटा लगाना
पहली रोटी आखरी रोटी बेलना
पानी का कलसा भरना
सबकी इच्छाओं में छोटी सी अपनी इच्छा रखना
त्यौहार के मांडणे रंगोली से खुशियाँ भरना

छुपकर कुछ शरारत करना मगर हँसना
पकड़े जाने पर दस बहानो में
एक बहाना सच कहना
मैं निडर होकर विशवास रखती उन पर
हर काम में माँ अपने अंश देती

जब भी बेढंगा कुछ सोचती
मुझे रोकती है सिरहाने लगी तस्वीर
देने लगती है मेरी जिद् पर हिदायतें

कभी मैं डरकर कभी मचलकर
अपनी इच्छाओं को सामने रखती
माँ शेरनी सी मुझे अपने साथ लेकर चलती
दूर खड़े आवाज देती बढ़ो.....
नीदं खुलते ही
मैं भूल जाती सपने परेशानी उलझन उदासी
और बचपन की तरह कदम बढ़ा देती


प्याज़ ज़िन्दगी

कई तहों में रहती है वो
मानों प्याज़ ...
उपरी सतह कुछ चमकीली
सूखे रंगो से रंगीन भी
बड़ी महीन भी होती
थोड़ा खुरेचा तो निकल जाती है
मन की परत जो
दबी होती है तह दर तह भीतर गहरे ..

आर पार झांकती इच्छाएं
जड़ों सी होती है
इधर उधर उतराती रहती है
सूख कर चुभते शूल सी
कभी-कभी करती घाव गहरा
जब भी तहें एक के बाद एक खुलती
रस के दर्द भरे आँसू देती है
ठीक नाकाम प्यार की तरह ....

लगातार खाली होती तहें
नरम गीली वेदनाओं के साथ
एक एहसास लिए होती है
जैसे अथाह ह्रदय के कोने में
पड़ी रहती है सिसकती संवेदनाएं....
मगर ..
भागती ज़िन्दगी
बना कर चलती है स्वाद सभी का
जबकि दबी होती है खुरेचने वाले की
स्वयं की आंखो के तट पर
एक बैचेन घुमड़ती आंसुओं की नमकीन लहर .....


मुझसे  बोला

तुम कमाल करती हो
तुम अद्भुत  हो
तुम अनोखी हो
तुम शानदार हो !

मैं सोच में पड़ गई
क्या यह सब मैं हूँ ?
जबकि मैं बस
बादलों में बनती
कल्पना के पीछे
दौड़ती जा रही थी
यह सोचे बगैर  की मैं  तो स्त्री हूँ

  
गीली उम्मीद

मैंने पत्थरों पर लिखा नाम
कुछ काले सफेद
कुछ नारंगी पीले रंगो से

कई बार गली रास्ते
नदी समन्दर
बनते घरों की रेत से
बीन कर ले आई थी
तरह तरह के रंगीन पत्थर भी

कुछ गोल चौकोर
जाने कितने आकार के
हर बार झोली भर भर
उन्हें लाती रही
अपने चुने सच्चे झूठे रंगों से
उन पर लिखती रही नाम तुम्हारा

तमाम उम्र ख़्वाहिशें रही
उन्हें अपना कहने की
अपनाती रही उनका खुरदरा स्वरूप
वो शुष्क और कठोर एहसास देते रहे ,

हर बार सुनती संगीत
गुनगुनाती गीत
लिखती नाम पत्थरों से
मैंने देखा !!
एक तस्वीर बनने लगी है उनसे
ठीक तुमसी मजबूत कठोर
शीतल एहसास लिए ,

गीली उम्मीद ज़िन्दा है
तुम्हें अपना कहने की ....
मुझसे पूछा

तुम कैसे बनाती हो ?
इन बेजान
कठोर
मृत और असंवेदनशील पत्थरों से
मोहक लय
गति चित्र
जीवन्त दृश्य तस्वीरें
बोलते लोग
जीवन की झलकी
मृतकों की आत्मा
हर मौसम की महक
सम्पूर्ण सृष्टि का
झूमता स्वरूप ....
...........
मैंनें कहा ...
बस
प्यार से ..
 

उसने माना

मैं खूबसूरत हूँ
मुझे डरना चाहिए
भीड़ को नहीं पहचानती
अन्जान हूँ रात दिन से
उसने माना कि
बस मुस्कान काफी नहीं
दुनिया में खुश रहने के लिए..
शायद मैं
समझ आती हूँ उसे नादान ...

कुछ लोगों के दिये उपहार
मेरे पास देख समझा
कि वो मेरी पसंद है ...

मगर
थोड़े रस के साथ
पान खाने की तरह रची
मेरी लाल झूठी मुस्कान को
पहचान ना सका कि
अक्सर दिल रखना होता है
अपने आसपास भटकते
खिलखिलाते चेहरों के बीते हर मौसम का
थोडी मुस्कान काफी है
लोगों के खिलखिलाते
चेहरे के पीछे छुपे मन को
कुरेदने के लिए

उसने पूछा 

कब सोती हो
कब जागती हो
कब करती हो ?
कैसे भरती हो?
पत्थरों में आत्मा
रंगों से जीवन
और सब काम घर के.....
.......
यह सब कुछ
देखना है मुझे ...!

मैंने कहा ...
रंगों का जीवन
पत्थरों की आत्मा
मुझे जगाये रखती है
अपनाने पर उन्हें ...
घर के काम मुझे रास्ता देते हैं

पत्थर की आत्मा मुझे
चैन की ठोस नींद सुलाती है
और रंग ... मेरे बनकर
जीवन में रंग भरते है


उसने समझा 

मैं आसक्त हूँ
शायद ग़मगीन भी
या
कुछ चाहती हूँ
अपना मतलब ...

समझा कमज़ोर
समझा अकेला
कुछ लोगों से कम
कुछ भीड़ में अन्जान सा

रूखा और बेकाम का
ठीक उस पत्ते के समान
जो उम्मीदों के भार से गिर जाता है जल्दी
जो सब जैसा मजबूत नहीं
जो चमकीला नहीं
जो शोर नहीं ..यहाँ वो सही था

मैं शायद एक पत्ता जरूर हूँ
जिसे विज्ञान की भाषा में पत्थरचटा कहते है
मगर अक्सर
मेरे ही गिरने से
बाहों के आसरे में
कुछ पौध नये अंकुरित होते है

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