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सत्यनारायण पटेल हमारे समय के चर्चित कथाकार हैं जो गहरी नज़र से युगीन विडंबनाओं की पड़ताल करते हुए पाठक से समय में हस्तक्षेप करने की अपील करते हैं। प्रेमचंद-रेणु की परंपरा के सुयोग्य उत्तराधिकारी के रूप में वे ग्रामांचल के दुख-दर्द, सपनों और महत्वाकांक्षाओं के रग-रेशे को भलीभांति पहचानते हैं। भूमंडलीकरण की लहर पर सवार समय ने मूल्यों और प्राथमिकताओं में भरपूर परिवर्तन करते हुए व्यक्ति को जिस अनुपात में स्वार्थांध और असंवेदनशील बनाया है, उसी अनुपात में सत्यनारायण पटेल कथा-ज़मीन पर अधिक से अधिक जुझारु और संघर्षशील होते गए हैं। कहने को 'गांव भीतर गांव' उनका पहला उपन्यास है, लेकिन दलित महिला झब्बू के जरिए जिस गंभीरता और निरासक्त आवेग के साथ उन्होंने व्यक्ति और समाज के पतन और उत्थान की क्रमिक कथा कही है, वह एक साथ राजनीति और व्यवस्था के विघटनशील चरित्र को कठघरे में खींच लाते हैं। : रोहिणी अग्रवाल

तीन कहानी : अशोक जैन

1. अब हमारे दो नहीं तीन बच्चे हैं

रमेश और सीमा के दो बेटे हैं. एक बेटी की चाह थी पर प्रभु की इच्छा दूसरा भी बेटा ही हुआ. बेटी की चाह मन की मन में ही रह गई.

बड़ा बेटा पढ़ लिख कर नौकरी करने लगा तो शादी के लिए एक बहुत ही अच्छी लड़की पसंद की और शादी की.   नियत दिनांक को, जैसा कि आज कल चलन है, लड़की वाले लड़की और रिश्तेदार के साथ आ गए. रमेश और सीमा ने शादी की तैयारी में कोई कसर नहीं छोड़ी.

शादी का खर्चा लड़की वालों से साझा कर लिया. शादी बहुत ही धूम धाम से सौहार्दपूर्ण वातावरण में हुई. सभी बड़े प्रसन्न थे. ख़ास तौर पर रमेश और सीमा. 

शादी के पश्चात लड़की की बिदाई के पश्चात लड़की वाले वापस जाने की तैयारी कर रहे थे. उस समय रमेश और सीमा लड़की के माता पिता को बिदाई देने के लिए उनके पास पहुँचे और उनसे, अगर कोई अव्यवस्था हुई हो तो उसके लिए क्षमा माँगते हुए कहा कि ---आप अपनी लड़की की बिल्कुल चिंता न करें. वह् अब हमारी बेटी है और अब हमारे दो नहीं तीन बच्चे हैं.

2.  ससुराल की बेटी

रमेश और सीमा बहु की बिदा कराकर घर ले आए. घर में बहु आ गयी और सीमा बहु के स्वागत की अन्य औपचारिकताओ में व्यस्त हो गयी. घर में सभी नजदीकी रिश्तेदार थे.

बहु, रेखा जो कि मायके में स्वच्छंद रहती थी, एक भारी साड़ी में कैद हो गयी. दिन भर कार्यक्रम चलते रहे और घर के सभी लोग रेखा को खुश करने में लगे रहे. रेखा भी ससुराल के स्वागत पर खुश थी पर यह साड़ी.......... सम्हलती ही नहीं. आज तक कभी साड़ी पहनी नहीं थी. रेखा को साड़ी तो सीमा ने पहना दी पर उसे सम्हालना तो स्वयम्  रेखा को.

एक रस्म होती है नई बहु द्वारा मायके से लाये गए कपड़े ससुराल की महिलाये देखती हैं. अब ससुराल में महिलाओं का साड़ी पहनने का चलन और रेखा के सूट केस में साड़ी तो भारी भारी  थी और बाकी सलवार सूट, जींस कुर्ती आदि. महिलाये आपस में दबी जबान में चर्चा करने लगी कि रेखा यह सब क्या उठा लायी. यहाँ तो यह सब नहीं चलता है.

बात रेखा के कान में भी गई. वह् बहुत ही मन ही मन व्यथित होने लगी और सोचने लगी कि शादी के समय जब उसके सास और   ससुर देखने आए थे और स्वीकृति दी थी, उस समय सास ने बड़े ही प्यार से कहा था कि वे रेखा को बेटी की तरह रखेंगे. रेखा के पति सुरेश ने भी सभी तरह का आश्वासन दिया था.  इस प्रकार रेखा मन ही मन बहुत ही उदास रहने लगी. यह सब बातें सीमा के कान पर भी आयी पर उसने यह सोच कर कि रिश्तेदार तो चार दिन के लिए आते हैं, अतः उनकी बातों पर ध्यान न देना चाहिये. बाद में जैसी इच्छा होगी रहेंगे. पर रेखा को साड़ी में परेशान देखकर वह् भी थोड़ी दुखी थी. 

शादी के चार पाँच दिन बादे सुरेश और रेखा को हनीमून के लिये जाना तय था. रेखा बड़े असमंजस में तैयारी करने लगी. रेखा की सास सीमा, जो कि शादी की भाग दौड़ और बाकी बचे काम  निपटाने के कारण रेखा की और देख नहीं पा रही थी, ने महसूस किया कि रेखा बहुत उदास है. सीमा ने सोचा शायद मायके की याद आ रही है पर जब देखा कि रेखा हनीमून पर जाने की तैयारी भी ढंग से नहीं कर रही है तो उसे समझते देर नहीं लगी कि रेखा क्यों उदास है?

शाम को सुरेश और रेखा को हनी मून के लिए रवाना होना था. सीमा रेखा के कमरे में गयी और उसका सूट केस लेकर जमाने लगी. सूट केस में रेखा द्वारा लाये गए सलवार सूट, जींस आदि ही उसने रखे और एक जींस और कुर्ती निकाल कर रेखा को देते हुए कहा कि वह् यही कपड़े पहन कर जायेगी. रेखा जो कि थोड़े विस्मय से यह सब देख् रही थी, बड़ी ही खुश हो गयी.

घर में अभी भी बुआ आदि कुछ बहुत ही नजदीकी रिश्तेदार रह गए थे. हनीमून पर जाने के समय रेखा जींस और कुर्ती पहन कर कमरे से बाहर निकली तो सभी ने रेखा की ओर  प्रश्नवाचक नजरों से देखा पर सीमा के खुश चेहरे को देख् कर वे कुछ नहीं बोल पाये. रेखा सुरेश के साथ अब बड़े ही प्रफुल्लित मन से हनीमून के लिए गयी.

हनीमून से लौटने के पश्चात सीमा ने रेखा को बड़े ही प्यार और दुलार से रखा और जो शादी के तुरंत पश्चात देख् भाल नहीं कर पाई थी उसकी पूर्ती कर दी. कुछ दिन पश्चात रेखा के मायके वाले रेखा लेने आ गए. मायके जाते समय रेखा के आंखों से आँसू आ गए. इससे सीमा घबरा गई कि क्या बात हो गई. उसने धीरे से रेखा से  कारण पूछा तो रेखा रोते हुए हल्के मुस्करा कर बोली, "आपने इतने अच्छे से मुझे रखा कि मायके में आप सब लोगों की बहुत याद आयेगी." यह सुनकर सीमा की आंखों में भी आँसू आ गए.  अब वह् रेखा से कैसे कहे कि बेटी भी तो बहुत इंतज़ार के बाद मिली है.  सिर्फ़ वह् इतना कह पाई कि जल्द वापस आना।

3.  मायके से जो मिले उसे सर आंखों पर रख कर स्वीकार करना

मायके से पहली विदाई के पश्चात रेखा ससुराल आई तो बहुत ही दुखी थी क्योंकि माता पिता से बिछड़ कर आने का किसका मन करता है. पर क्या करे जग की रीत यही है कि शादी के पश्चात लड़की को ससुराल जाना ही पड़ता है. साथ ही रेखा के मन में खुशी भी थी कि वह् एक अच्छे घर में ब्याही गई है और उसे शादी के तुरंत बाद ससुराल में बिताये गए दिनों की मधुर स्मृति अभी तक गुदगुदा रही थी.  

ससुराल में आने के पश्चात रेखा ने अपनी सास सीमा को माता पिता द्वारा बिदाई में दिए गए समान, कपड़े आदि दिखाने प्रारंभ कर दिए. वाकई रेखा के माता पिता ने बहुत ही खर्च किया था और सभी वस्तुयें बहुत ही अच्छी और कीमती दी थी. पर रेखा के मन में एक भय भी था कि अगर भेंट सीमा को पसंद न आयी तो?  सीमा ने सभी वस्तुओं को देखा और प्रशंसा की.   इससे रेखा के चेहरे पर एक गर्व मिश्रित खुशी के भाव आ गए. सीमा की अनुभवी नजरों ने इसे ताड़ लिया. उसने रेखा को अपने पास बिठाया और पूछा कि इन सब वस्तुओं को खरीदने में रेखा के माता पिता ने बहुत ही खर्चा किया होगा? रेखा ने मौन स्वीकृति दी तो सीमा ने प्यार से रेखा को समझाया कि,   अब शादी और पहली बिदाई हो गयी है. जो भी रेखा के माता पिता को शादी और बिदाई के लिए अपनी बेटी को देना था, उन्होंने दे दिया है. अब रेखा का घर उसका ससुराल है. मायका भी उसका ही घर है. शादी के पहले बेटियां माता पिता से अपनी जिद पूरी करवाती हैं पर शादी के बाद स्थिति बदल जाती है. अब माता पिता से जिद करना  और वह् भी ससुराल में अपना मान बढ़ाने के लिए, बिल्कुल भी उचित नहीं है.  ससुराल में बहु का मान बहु स्वयम्‌ से है न कि उसके द्वारा मायके से लाये गए सामान से. अतः रेखा को मायके में जो भी    माता पिता प्रेम से दें, उसे बड़े ही आदर से स्वीकार कर ले किन्तु अपनी ओर से कभी भी भूलकर भी कोई माँग न रखे. साथ ही सीमा ने हिदायत दी कि अगर उसे कभी यह मालूम पड़ा कि रेखा ने मायके में कुछ माँग रखी है तो सीमा को बहुत ही बूरा लगेगा.  इतना सब सुनने के बाद रेखा की आंखों से आँसू बहने लगे और वह् सीमा की गोद में सिर रख कर सिर्फ़ इतना बोली कि जी मम्मीजी. सीमा भी प्यार से रेखा के सिर पर हाथ फेरने लगी.

000 अशोक जैन
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टिप्पणियाँ:-

आर्ची:-
कहानी की कथावस्तु अच्छी है पर कथाशिल्प जरा कमजोर लगा.. कहीं कहीं पर तो बिलकुल महिला पत्रिका के किसी सामाजिक आलेख की सी भाषा लगी

प्रज्ञा :-
एक सहज कहानी। बिना किसी तामझाम के विवाह संस्था के एक जनतांत्रिक मानवीय मूल्य को विकसित करना। बधाई।
शिल्प पर कुछ और मेहनत हो सकती है। मसलन पहले अंश के एक वाक्य में दो बार पश्चात शब्द का प्रयोग आदि।

ब्रजेश कानूनगो:-
प्रस्तुत सामग्री कहानी के बीज हैं।इन पर कहानी को अभी लिखा जाना और तराशा जाना शेष है।

नयना (आरती) :-
सरल शब्दों में कही गई सकारात्मक दृष्टिकोण की कहानियाँ। मानव समाज  में देवत्व भले ना हो मानवता जरूर हैं। कथन चाहे कमजोर हो प्रयास उत्तम हैं। लेखक/लेखिका लिखते रहे।बधाई।

अशोक जैन:-
कविताजी ग्रुप में कहानी नहीं अपितु संस्मरण साझा करने के लिये आभार।

अर्चनाजी, रेणुकाजी, archieji, प्रज्ञाजी, अलकाजी, अर्जुनजी, ब्रजेशजी, मनीषाजी, निधिजी, नयनाजी, अन्य समूह के अरुणजी और संजना जी को टिप्पणी करने के लिये धन्यवाद।

मैं कोई मूल कल्पना करने वाला लेखक नहीं हूँ। बैंक से 38 साल की नौकरी और उसमें तीस साल प्रशासनिक पदों पर काम करने के दौरान बहुत सी नोट शीट बनाई और पत्राचार किया। नोट शीट में बात बिना लाग लपेट कर की जाती है। कोई जिज्ञासा या सस्पेंस नहीं। वही बात लेखन में है सीधी सरल।

बात संस्मरणों की कथा वस्तु की है तो जैसा मैंने आस पास के परिवारों और स्वयं के परिवार में अनुभव किया और देखा, उसमें नमक मिर्च लगाने के बजाय सकारात्मक रूप में कलम बद्ध कर दिया। ऐसे परिवार यथार्थ हैं कल्पना नहीं। हाँ कम जरुर हैं। कहीं कुछ अच्छा दिखता है तो इस परिवार को केंद्र बिंदु बना कर लिख लेता हूँ। ऐसे 10-12 संस्मरण हैं।

इसी संदर्भ में भारतीय परिवेश में एक बात और साझा करना चाहूँगा। आज जो सास है वह कभी बहू थी। मतलब आज घर की मालकिन है। आज जो बहू आ रही है वह कल निश्चित ही घर की मालकिन बनेगी। तो घर की मालकिन का स्वागत शादी की धूमधाम के बजाय वास्तविक अर्थों में दिल से करना चाहिए। सभी अपेक्षा करते हैं कि बहु ससुराल के तौर तरीकों के अनुसार चलेगी। यह कहीं नहीं देखा कि ससुराल वाले कहें कि घर बहु के अनुसार चलेगा।

पुन: सभी का शुक्रिया ।

नयना (आरती) :-
बहुत अच्छा कथन अशोक जी बिना किसी लाग लपेट के। स्वान्त:सुखाय लिखते-लिखते ही हम सब लोग कुछ न कुछ सीखते जा रहे है।

कविता वर्मा:-
अशोक जी ये संस्मरण नही कहानी है क्योंकि इसमें पात्रों का लेखक से सीधा कोई संबंध नही है ।संस्मरण मे लेखक स्वंय घटनाओं का सहभागी होता है जैसा कुछ दिन पहले हमने जैनेन्द्र जी और मन्नू भंड़ारी वाला संस्मरण पढ़ा था । ऐसा घटित होते आपने देखा जरूर होगा लेकिन लिखा इसे कहानी रूप में है ।

अशोक जैन:-
आपकी बात बिल्कुल ठीक है। संस्मरण का एक पात्र लेखक होना चाहिए और वह मैं नहीं।

गरिमा श्रीवास्तव:-
संस्मरण की रचना के दौरान एक रचनाकार के सामने स्मृतियां होती हैं।और इन स्मृतियों से उसमे रचना के प्रति सम्बद्धता आती है।संस्मरण में अपने अनुभव अनिवार्यतः आते हैं।न तो इसकी रचना सूचना भाव से की जा सकती है न ही साक्षी भाव से।संस्मरण में स्मृति महत्वपूर्ण है और कल्पना के आधार पर इसे लिखा नहीं जा सकता।बीते जीवन को याद करना और अपने अनुभवों की दृष्टि से यह लिखा जाता है।जहाँ कल्पना आई वहीँ यह संस्मरण नहीं रह जाता,बल्कि कहानी की श्रेणी में आ जाता है।जो आज प्रस्तुत किया गया वह न कहानी है न संस्मरण।इसे गद्य क्षणिका की कोटि में हम रख सकते हैं।जिसमें लेखक साक्षी भाव से, बिना संबंधों के समीकरण की गहराई में गए ,एक स्थिति का बयान करता है।भाषा अच्छी है।शायद कुछ टंकण संबंधी भूलें हैं पर वह तो बस यूँ ही।

संजना तिवारी:-
कहानी सरल और बेहद सीधे तरीके से चली आ रही है जिसके कारण कमजोर हो गयी है । लेखक को आदर्शवाद से हटकर यथार्थ वाद में आना चाहिए । मैं ये नही कह रही की जैसा कहानी में दिखाया गया है हमारे समाज में नही होता है लेकिन उसे लिखने का तरीका उतना रोचक और भावपूर्ण नही आया है ।जल्दी जल्दी भागती गयी कहानी में किसी भी किरदार को ठीक से उल्लेखित नही किया गया है ।सभी मनोभावों को तीव्रता से खत्म कर दिया गया है, किसी भी रिश्ते को बनने और समझने में समय लगता है केवल किसी के रिश्ते के इन्तजार से रिश्ता मधुर नही होता । इसलिए सीमा और रेखा के बीच एक विस्तृत बातचीत का उल्लेख अवश्य आना चाहिए था ।
[10:56, 7/1/2015] सत्यनारायण:-: मैं आपकी राय से इत्तफाक़ रखता हूँ - आलोक जी., गीतिका जी, अलकनंदा जी और संजीव भाई...

लेकिन हमारे साथियो के सामने यह भी एक दुविधा है....समूह के साथियो की कमज़ोर रचनाओं को भी चुननी पड़ती है....बहुत ज्यादा कमज़ोर से बचते भी हैं....लेकिन यदि किसी रचनाकार में संभावना नज़र आती है...तो कमज़ोर रचना भी समूह में साझा कर लेते हैं

उसके पीछे इतनी सी बात होती है कि यदि कुछ अच्छे सुझाव रचना पर आते हैं...तो रचनाकार को अपनी रचना को और परिपक्व बनाने में सहयोग मिलता है....

यह कहानी मुझे भी कमज़ोर ही लगी
फिर भी यही सोचकर साझा की है...
कि एक भी मुक्कमल सुझाव मिल गया
तो रचनाकार शायद इसे या अगली रचना को और बेहतर लिख सके...

आलोक बाजपेयी:-
एक किस्सा याद आ गया तो कह ही दू ।
एक बार डेल्ही यूनिवर्सिटी में प्रवताओ का इंटरव्यू चल रहा था इतिहास में।प्रोफ.राम शरण शर्मा जी और बिपन चंद्र साहब इंटरव्यू ले रहे थे।वक अभ्यर्थी आये और मेज पर ढेर साड़ी किताबे रख दी।गर्व से बोले मैंने ये आब किताबे लिखी है। शर्माजी ने किताबे पलट कर देखी और मुस्कुरा के कहा,आपने महोदय लिख तो बहुत लिया,अब कुछ पढ़ भी लीजिये।

गीतिका द्विवेदी:-
बहुत अच्छी बात है।मैं आपके विचार से बिल्कुल सहमत हूँ।कई बार बड़े रचनाकार को भी लगता है कि उनकी रचनाएं अच्छी है किंतु पाठक की कसौटी पर खरा उतरता मुख्य बात है।यदि हम जैसों को सामने आने का मौका मिलेगा नहीं तो आप लोगों की तरह कैसे बन पाऐंगे।

सत्यनारायण:-
हाँ..गीतिका जी...हमारी हार्दिक इच्छा रहती है कि...समूह के साथी की यदि कमज़ोर रचना भी है...तो उस पर बात हो...ताकि कल हमारा साथी
एक बेहतर रचनाकार बनकर सामने आये....

गीतिका द्विवेदी: जी मैं भी अपने आप को अच्छा पाठक मानती हूं किंतु रचनाकार कैसी हूं ये तो आप लोगों की पारखी नज़र ही बता सकती है

सत्यनारायण:-
इसलिए हम बीच बीच स्थापित
रचनाकारों की रचनाएँ भी पोस्ट करते हैं....ताकि हमारे साथी एक अच्छी रचना और कमज़ोर रचना के बीच के फर्क़ को समझ सके....कभी कभी ऐसे लेख भी पोस्ट करते हैं...जो रचनाकार साथियो के लिए उपयोगी होते हैं....समूह में भी अनेक साथी स्थापित रचनाकार है....उनकी रचनाओं से भी नए साथियो को मदद मिलती ही है...

आलोक बाजपेयी:-
मुझे लगता है कि उदीयमान रचनाकारों को क्लासिक साहित्य बहुत गहराई से पढ़ना चाहिए।अगर ही सके तो किए तजुर्बेकार रचनाकार के व्यक्तिगत संपर्क में रहकर उनसे एक साहित्यकार की रचना प्रक्रिया पर बात करनी चाहिए और फिर अपने व्यक्तित्त्व के अनुरूप स्वयं की रचना प्रक्रिया को विकसित करना चाहिए।

सत्यनारायण:-
बिल्कुल आलोक जी पढ़ने का कोई विकल्प नहीं है...गोर्की, ताल्सतोय और कई रचनाकारों ने अपनी रचना प्रक्रिया पर इतना विस्तार से और बारीकी से लिखा है कि ....उन्हें पढ़कर भी अच्छी रचना कहने की कला सीखी जा सकती है.....ख़ुद अपने प्रेमचंद के कहानी कला पर जो लेख हैं..वे ग़ज़ब है...लू शून.....और कई लोगों ने लेखकों के लिए लिखा है...
पढ़ने का कोई विकल्प नहीं है
हाँ...येनान लेक्चर भी है...मंटो का लेख ..मैं क्यों लिखता हूँ....एदुआर्दो का तो अभी लगाया ही था- तो आप क्यों लिखते हैं.....ऐसा बहुत लिखा गया है...जो एक लेखक को पढ़ना बेहद ज़रूरी है....

यहाँ प्रस्तुत कहानी अपने कथानक और शिल्प में तो कमज़ोर है ही...वह लेखक अध्ययन सीमा भी बताती है...और बताती है कि लेखक का किताबों से रिश्ता न के बराबर है....

आशीष मेहता:-
विषय का मंथन अपरिपक्व है। पंचतंत्र की तर्ज़ पर 'जीवन उपयोगी ' रचना की कोशिश है। मानव स्वभाव की जटिलता से दूर सामाजिक विद्रूपता को सतही तौर पर छुआ गया है। चरित्रों को श्वेत (या श्याम) रंग देने से जीवंतता खत्म हो गई है । विवरण में कहानी का पुट कम है और सार 'उपदेशात्मक' है, इस करके 'पाठक - रचना ' कनेक्ट बैठ नहीं पाया है।

आशीष मेहता:-
मैं नितांत (अधुरा सा पाठक) , "पाठक की कसौटी" जैसी चीज़ सूँघकर अतिउत्साही हो गया था। पर उंगली -अंगूठे से परहेजी एडमिन में 'बदलाव' स्वागत योग्य है। सर, की बात मानने के लिए 'गूगली' पोस्ट करने पर विचार करें।

सत्यनारायण:-
निरंजन दादा कोई दिक्कत नहीं है
लूज़ बाल पर ही शॉट मारी जा सकती है....यारकर पर तो बोल्ड हो जाते हैं....लेकिन शॉट बालर को सीख देती है....

कहने का मतलब कि यह
पिटाई भी रचनाकार के हित में है...

वागीश:-
: आशीष जी जैसी टिपण्णी से लेखक समेत हम जैसे अन्य साथियों का भी लाभ होगा। कुछ कमी है तो उसे स्पष्ट करना ज़रूरी है ताकि अपनी बात कोरा judgement न लगे।

राजेन्द्र श्रीवास्तव:-
भावी लेखन के लिए लेखक को शुभकामनाएं । खूब अध्ययन करें, निश्चित ही बेहतर लेखन की ओर अग्रसर होंगो। आमीन !!

अरुण यादव:-
कहानी बहुत कमजोर नहीं है, बस थोडा कच्चापन और अनगढता है। मेरा लेखक के लिए सुझाव है कि आदर्शवाद    को आरोपित करने की बजाय  वे समय और समाज के यथार्थ को पकडने का  प्रयास करें।

संजीव:-
लेखन के लिए समय समाज की समझ और समझ के पीछे गहरी रचनात्मक अंर्तदृषिट होनी आवश्यक है। कहानी और कविता की रचना बहुत अलग तरह से  होती है। लेखक को छपास की भूख  नहीं होनी चाहिए।मैंने पहली कविता 1994 में लिखी थी। मेरी पहली कविता जो छपने भेजी वह लगभग 2006 में उद्भावना में दुख शीर्षक से प्रकाशित हुई। आज तक यही एक मात्र कविता है जिसे मैंने छपने के लिए भेजा है। ऐसा नहीं है कि मैं लिखता नहीं हूँ।यह बात इसलिए कही है कि हम स्वयं में परिपक्वता महसूस जबतक नहीं करते हैं तब छपास पैदा नहीं होनी चाहिए। अजेय कुमार जी और मेरे मित्र मणि ने कई बार कहा कि कविताओं का एक संकलन तो  बनता है।पर मैं स्वयं  अभी इस लिहाज से उतना परिपक्व महसूस नहीं करता हूँ।क्योंकि मैं पढता बहुत हूँ।

प्रदीप मिश्र:-
अशोक जैन जी को बधाई। एक बधाई इसलिए की उन्होंने कहानी लिखने की कोशिश की। मैं मित्रों से सहमत हूँ। यह कहानी बनने की एक प्रक्रिया भर है। इसमें अभी बहुत सारी कलात्मक वैचारिक और भाषागत सुधार की गुंजाईश है। हर लेखक इसी तरह से शुरू करता है।तो इस शुरुआत के लिए पहली बधाई। दूसरी बधाई इसलिए की उनकी रचना के कारण कहानी पर इतनी अच्छी बातचीत हुयी। अगर यह पकी पकाई कहानी होती तो हम अच्छा कह कर छूटी पा लेते। यूँ भी मैं इस मंच को मित्रों की चौपाल मनाता हूँ। इसलिए यहां पर हमारी कच्ची पक्की दोनों तरह की रचनाओं का स्वागत है। छापना दीगर बात है। अशोक भाई दो बातें कहना चाहता हूँ। आज की कहानियों का खूब पथ करें और हो सके तो बोल बोल कर पढ़ें तो आज की कहानी की भाषा का मुहावरा आपको जल्दी पकड़ में आएगा । यह मैं करता हूँ। दूसरी बात साहित्य के सरोकार और जिम्मेदारियों पर भी गहन चिंतन करें। मुझे आपकी दूसरी कहानियों का इंतजार रहेगा।

वसंत सकरगे:-
अशोक जी लेखन का पूर्णकालिकता अथवा साहित्यिक परिवेश से होना,जरुरी नहीं है।राजेश जोशी एमएससी हैं और आप की ही तरह बैंक में नौकरी थे।डाॅ. ज्ञान चतुर्वेदी पेशे से चिकित्सक हैं।हमारे एडमिन महोदय सत्यनारायण पटेल पुलिस महकमें में हैं।यानि साहित्य से बाबस्त बहुतेरे ऐसे लोग हैं जो कामधंधे की मूलप्रवृतियों के इतर अपनी संवेदनाएं साझा करते हैं।इसलिए आपकी बात का तहेदिल से स्वागत है।नजरिया भी अच्छा है।

अरुणेश शुक्ल :-
yah kahani kiski hai bhai.chayan krte hue dhyan rkha jaye yah madhurima ka page nahi hai.sry

सत्यनारायण:-
मैं आपकी राय से इत्तफाक़ रखता हूँ - आलोक जी., गीतिका जी, अलकनंदा जी और संजीव भाई...

लेकिन हमारे साथियो के सामने यह भी एक दुविधा है....समूह के साथियो की कमज़ोर रचनाओं को भी चुननी पड़ती है....बहुत ज्यादा कमज़ोर से बचते भी हैं....लेकिन यदि किसी रचनाकार में संभावना नज़र आती है...तो कमज़ोर रचना भी समूह में साझा कर लेते हैं

उसके पीछे इतनी सी बात होती है कि यदि कुछ अच्छे सुझाव रचना पर आते हैं...तो रचनाकार को अपनी रचना को और परिपक्व बनाने में सहयोग मिलता है....

यह कहानी मुझे भी कमज़ोर ही लगी
फिर भी यही सोचकर साझा की है...
कि एक भी मुक्कमल सुझाव मिल गया
तो रचनाकार शायद इसे या अगली रचना को और बेहतर लिख सके...
हाँ..गीतिका जी...हमारी हार्दिक इच्छा रहती है कि...समूह के साथी की यदि कमज़ोर रचना भी है...तो उस पर बात हो...ताकि कल हमारा साथी
एक बेहतर रचनाकार बनकर सामने आये....
इसलिए हम बीच बीच स्थापित
रचनाकारों की रचनाएँ भी पोस्ट करते हैं....ताकि हमारे साथी एक अच्छी रचना और कमज़ोर रचना के बीच के फर्क़ को समझ सके....कभी कभी ऐसे लेख भी पोस्ट करते हैं...जो रचनाकार साथियो के लिए उपयोगी होते हैं....समूह में भी अनेक साथी स्थापित रचनाकार है....उनकी रचनाओं से भी नए साथियो को मदद मिलती ही है...
अरुणेश जी
कहानी कमज़ोर है...इस बात से सहमत हूँ...बिजूका एक.समूह के कुछ साथियो ने भी कहानी को कमज़ोर कहा है....मैंने उनसे जो
बात कही है....वही आपसे भी साझा की ऊपर

रही बात कहानी किसकी है...रचनाकार का नाम शाम को बाताएँगे...तब तक समूह के साथियो से यही आग्रह है कि...वे चाहे इसे खारिज करे...कोई दिक्कत नहीं...लेकिन...वे अच्छे सुझाव से रचनाकार साथी की मदद भी कर सकते हैं....समूह में सभी तरह के साथी है...
कुछ बहुत स्थापित हैं...चर्चित हैं..मँझे हुए रचनाकार है...कुछ नए साथी है...काम करने की कोशिश कर रहे हैं....एडमिन को सभी साथियो को साथ
लेकर चलना है.....

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