image

सत्यनारायण पटेल हमारे समय के चर्चित कथाकार हैं जो गहरी नज़र से युगीन विडंबनाओं की पड़ताल करते हुए पाठक से समय में हस्तक्षेप करने की अपील करते हैं। प्रेमचंद-रेणु की परंपरा के सुयोग्य उत्तराधिकारी के रूप में वे ग्रामांचल के दुख-दर्द, सपनों और महत्वाकांक्षाओं के रग-रेशे को भलीभांति पहचानते हैं। भूमंडलीकरण की लहर पर सवार समय ने मूल्यों और प्राथमिकताओं में भरपूर परिवर्तन करते हुए व्यक्ति को जिस अनुपात में स्वार्थांध और असंवेदनशील बनाया है, उसी अनुपात में सत्यनारायण पटेल कथा-ज़मीन पर अधिक से अधिक जुझारु और संघर्षशील होते गए हैं। कहने को 'गांव भीतर गांव' उनका पहला उपन्यास है, लेकिन दलित महिला झब्बू के जरिए जिस गंभीरता और निरासक्त आवेग के साथ उन्होंने व्यक्ति और समाज के पतन और उत्थान की क्रमिक कथा कही है, वह एक साथ राजनीति और व्यवस्था के विघटनशील चरित्र को कठघरे में खींच लाते हैं। : रोहिणी अग्रवाल

कविता : खेल : दुन्या मिखाइल

1965 में जन्मी निर्वासित इराकी कवियत्री ‘दुन्या मिखाइल’ 2001 से अमेरिका में रह रही हैं. उनकी कविताओं का मुख्य विषय युद्ध है.

(1)

|| खेल ||

वह एक मामूली प्यादा है.
हमेशा झपट पड़ता है अगले खाने पर.
वह बाएँ या दाएं नहीं मुड़ता
और पीछे पलटकर भी नहीं देखता.
वह एक नासमझ रानी द्वारा संचालित होता है
जो बिसात के एक सिरे से दूसरे सिरे तक चल सकती है
सीधे या तिरछे.
वह नहीं थकती, तमगे ढोते
और ऊँट को कोसते हुए.
वह एक मामूली रानी है
एक लापरवाह राजा द्वारा संचालित होने वाली
जो हर रोज गिनता है खानों को
और दावा करता है कि कम हो रहे हैं वे.
वह सजाता है हाथी और घोड़ों को
और एक सख्त प्रतिद्वंदी की करता है कामना.
वह एक मामूली राजा है
एक तजुर्बेकार खिलाड़ी द्वारा संचालित होने वाला
जो अपना सर घिसता है
और एक अंतहीन खेल में बर्बाद करता है वक़्त अपना.
वह एक मामूली खिलाड़ी है
एक सूनी ज़िंदगी द्वारा संचालित होने वाला
किसी काले या सफ़ेद के बिना.
यह एक मामूली ज़िंदगी है
एक भौचक्के ईश्वर द्वारा संचालित होने वाली
जिसने कोशिश की थी कभी मिट्टी से खेलने की.
वह एक मामूली ईश्वर है.
उसे नहीं पता कि
कैसे छुटकारा पाया जाए
अपनी दुविधा से.

(2)

|| कलाकार बच्चा ||

-मैं आसमान की तस्वीर बनाना चाहता हूँ.
- बनाओ, मेरे बच्चे
.- मैनें बना लिया.
- और तुमने इस तरह
रंगों को फैला क्यूं दिया ?
- क्यूंकि आसमान का
कोई छोर ही नहीं है.
...
- मैं पृथ्वी की तस्वीर बनाना चाहता हूँ.
- बनाओ, मेरे बच्चे.
- मैनें बना लिया.
- और यह कौन है ?
- वह मेरी दोस्त है.
- और पृथ्वी कहाँ है ?
- उसके हैण्डबैग में.
...
- मैं चंद्रमा की तस्वीर बनाना चाहता हूँ.
- बनाओ, मेरे बच्चे.
- नहीं बना पा रहा हूँ मैं.
- क्यों ?
- लहरें चूर-चूर कर दे रही हैं इसे
बार-बार.
...
- मैं स्वर्ग की तस्वीर बनाना चाहता हूँ.
- बनाओ, मेरे बच्चे.
- मैनें बना लिया.
- लेकिन इसमें तो कोई रंग ही नहीं दिख रहा मुझे.
- रंगहीन है यह.
...
- मैं युद्ध की तस्वीर बनाना चाहता हूँ.
- बनाओ, मेरे बच्चे.
- मैनें बना लिया.
- और यह गोल-गोल क्या है ?
- अंदाजा लगाओ.
- खून की बूँद ?
- नहीं.
- कोई गोली ?
- नहीं.
- फिर क्या ?
- बटन
जिससे बत्ती बुझाई जाती है.

(3)

|| सांता क्लाज़ ||

अपनी युद्ध जैसी लम्बी दाढ़ी
और इतिहास जैसा लाल लबादा पहने
सांता, मुस्कराते हुए ठिठके
और मुझसे कुछ पसंद करने के लिए कहा.
तुम एक अच्छी बच्ची हो, उन्होंने कहा,
इसलिए एक खिलौने के लायक हो तुम.
फिर उन्होंने मुझे कविता की तरह का कुछ दिया,
और क्यूंकि हिचकिचा रही थी मैं,
आश्वस्त किया उन्होंने मुझे : डरो मत, छुटकी
मैं सांता क्लाज हूँ.
बच्चों को अच्छे-अच्छे खिलौने बांटता हूँ.
क्या तुमने मुझे पहले कभी नहीं देखा ?
मैनें जवाब दिया : लेकिन जिस सांता क्लाज को मैं जानती हूँ
फ़ौजी वर्दी पहने होता है वह तो,
और हर साल वह बांटता है
लाल तलवारें,
यतीमों के लिए गुड़िया,
कृत्रिम अंग,
और दीवारों पर लटकाने के लिए
गुमशुदा लोगों की तस्वीरें.

000 दुन्या मिखाइल
अनुवाद- मनोज पटेल
----------------------------------
टिप्पणियाँ:-

बसंत त्रिपाठी:-
बहुत ही अच्छी कविताएं..यहां भाषा का कोई छद्म नहीं है और कविताएं उस सहज मानवीयता को संबोधित है जो अपने मूल स्वर में युद्ध विरोधी होती है. खासकर दूसरी कविता.

आशीष मेहता:-
अच्छी कविताएँ। "खेल" की तह में  "दुनिया बनाने वाले, क्या तेरे मन में समाई..." है। अजीब संयोग है कि जब हसरत जयपुरी साहब ने यह गीत लिखा  (या फिर जिस वक्त इस गीत को इस्तेमाल किया), लगभग उसी दौरान "खेल" की कवियत्री 'दुन्या' जन्मी ।

प्रदीप मिश्र:-
अच्छी कवितायेँ।बच्चेवाली कविता के शिल्प में लघुकथा का आभास मिलता है।अनुवादक को प्रणाम।मूल रचना जैसा अस्वाद अर्जित करने में सफल हैं। मनीषा जी आपके लिए आभार।

कविता वर्मा:-
आज की कविताओं में युद्ध की विभीषिका को मार्मिक स्वर दिया गया है । पहली कविता बताती है कि युद्ध की रणनीति में कितने मोहरे होते हैं यह सिर्फ दो देशों या दो समाजों के बीच की लड़ाई नही है ।वहीं दूसरी और तीसरी कविता युद्ध के माहौल में पलने बढ़ने वाले बच्चों की मासूमियत पर होने वाले प्रभाव को अभिव्यक्त करती हैं । सभी कविताऐं सीधे दिल में उतरती हैं । आभार मनीषाजी ।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें