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सत्यनारायण पटेल हमारे समय के चर्चित कथाकार हैं जो गहरी नज़र से युगीन विडंबनाओं की पड़ताल करते हुए पाठक से समय में हस्तक्षेप करने की अपील करते हैं। प्रेमचंद-रेणु की परंपरा के सुयोग्य उत्तराधिकारी के रूप में वे ग्रामांचल के दुख-दर्द, सपनों और महत्वाकांक्षाओं के रग-रेशे को भलीभांति पहचानते हैं। भूमंडलीकरण की लहर पर सवार समय ने मूल्यों और प्राथमिकताओं में भरपूर परिवर्तन करते हुए व्यक्ति को जिस अनुपात में स्वार्थांध और असंवेदनशील बनाया है, उसी अनुपात में सत्यनारायण पटेल कथा-ज़मीन पर अधिक से अधिक जुझारु और संघर्षशील होते गए हैं। कहने को 'गांव भीतर गांव' उनका पहला उपन्यास है, लेकिन दलित महिला झब्बू के जरिए जिस गंभीरता और निरासक्त आवेग के साथ उन्होंने व्यक्ति और समाज के पतन और उत्थान की क्रमिक कथा कही है, वह एक साथ राजनीति और व्यवस्था के विघटनशील चरित्र को कठघरे में खींच लाते हैं। : रोहिणी अग्रवाल

संस्मरण : सरस्वती का प्रकाशन : राहुल सांकृत्यायन

हिन्दी के युग प्रवर्तक आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी (1864-1938) ने सरस्वती पत्रिका(1903-1920) के माध्यम से हिन्दी साहित्य व हिन्दी भाषा को जन जन तक पहुँचाया। उसी सरस्वती पत्रिका पर राहुल सांस्कृत्यायन जी का संस्मरण पढ़ते हैं।

॥सरस्‍वती का प्रकाशन॥

राहुल सांकृत्यायन

बीसवीं सदी के आरंभ में सरस्‍वती का प्रकाशन हिंदी के लिए एक असाधारण घटना थी, जिसका पता उस समय नहीं लगा, पर समय के साथ स्‍पष्‍ट हो गया। सरस्‍वती का नाम पहिले पहल मैंने आजमगढ़ जिले के निजामाबाद कस्‍बे में सुना। निजामाबाद कस्‍बा वही है, जहाँ पंडित अयोध्‍यासिंह उपाध्‍याय 'हरिऔध' पैदा हुए, और वहाँ के तहसीली (मिडिल) स्‍कूल के प्रधानाध्‍यापक रहे। यह ख्‍याल नहीं कि नाम के साथ सरस्‍वती का वहाँ दर्शन भी मिला। सरस्‍वती का माहात्‍म्‍य स्‍कूल से निकलने के बाद मालूम हुआ। 1910 ई. में बनारस में पढ़ते समय किसी के पास सरस्‍वती देखी और माँगकर उसे पढ़ा भी। मालूम नहीं उसका कितना अंश मुझे समझ में आता था। मैं मूलतः उर्दू का विद्यार्थी था। हिंदी लोगों के कहे अनुसार बिना वर्णमाला सीखे अपने ही आ गई। और मैं गाँव में लोगों की चिट्ठियाँ हिंदी में लिखने लगा था।

हिंदी अँग्रेजी सरकार की दृष्टि में एक उपेक्षित भाषा थी। सरकारी नौकरियों के लिए उर्दू पढ़ना अनिवार्य था। सरकारी कागज पत्र अधिकांश उर्दू में हुआ करते थे। इसी पक्षपात के कारण मुझे उर्दू पढ़ाई गई। बनारस में संस्‍कृत पढ़ने लगा था। उर्दू के साथ अगर संस्‍कृत भी पढ़े, तो हिंदी अपनी भाषा हो जाती है।

दो एक बरस बाद मैं बनारस छोड़कर बिहार के एक मठ में साधु हो गया। उस समय मैंने पहिला काम यह किया कि सरस्‍वती का स्‍थायी ग्राहक बन गया। इसी से मालूम होगा कि हिंदी के विद्यार्थी के लिए सरस्‍वती क्‍या स्‍थान रखती थी। उसके बाद शायद ही कभी सरस्‍वती से मैं वंचित होता रहा - देश हो या विदेश। आरंभ में मुझे यह मालूम नहीं था कि सरस्‍वती के संपादक पंडित महावीर प्रसाद द्विवेदी उसके प्राण हैं। इंडियन प्रेस की कितनी ही पुस्‍तकें पाठ्य पुस्‍तकों में लगी हुई थीं। इसलिए हिंदी के हर एक स्‍कूल का विद्यार्थी इंडियन प्रेस को जानता था। सरस्‍वती इंडियन प्रेस से छपती थी। उसका कागज, उसकी छपाई, उसके चित्र आदि सभी हिंदी के लिए आदर्श थे। उसके लेख भी आदर्श होते थे, यह कुछ दिनों बाद मालूम हुआ। और यह तो बहुत पीछे मालूम हुआ कि गद्य-पद्य लेखों को सँवारने में द्विवेदीजी को काफी मेहनत पड़ती थी। भारत की सबसे अधिक जनता की भाषा की यह मासिक पत्रिका इतनी सुंदर रूप में निकलती थी कि जिसके लिए हिंदीवालों को अभिमान हो सकता था। सरस्‍वती ने अपना जैसा मान स्‍थापित किया था, उसके संपादक ने भी वैसा ही उच्‍च मान स्‍थापित किया था। नहीं तो हिंदी से बँगला और कुछ दूसरी भाषाएँ इस क्षेत्र में जरुर आगे रहतीं।

सरस्‍वती हिंदी साहित्‍य के सारे अंगों का प्रतिनिधित्‍व करती थी। गद्य में कहानियाँ, निबंध, यात्राएँ आदि सभी होते। पद्य में स्‍फुट कविताएँ ही हो सकती थी क्‍योंकि विस्‍तृत काव्‍य को कई अंकों में देने पर वह उतना रुचिकर न होता। मालूम ही है कि हिंदी मातृभाषा तो हम में बहुत थोड़े से लोगों की है। मातृभाषाएँ लोगों की मैथिली, भोजपुरी, मगही, अवधी, कनौजी, ब्रज, बुंदेली, मालवी, राजस्‍थानी आदि भाषाएँ है। इनमें से कौरवी छोड़कर बाकी सभी हिंदी से काफी दूर हैं। इस कारण हिंदी व्‍याकरण शुद्ध लिखना बहुतों के लिए बहुत कठिन है। इन 22 भाषाओं के बोलने वालों को शुद्ध भाषा लिखने, बोलने, पढ़ने का काम सरस्‍वती ने काफी सिखाया और सबमें समानता कायम की। सरस्‍वती का यह काम प्रचार की दृष्टि से ही बड़े महत्‍व का नहीं था, बल्कि इससे व्‍यवहार में बहुत लाभ हुआ।

सरस्‍वती युग से पहिले यह बात विवादास्‍पद चली आती थी कि कविता खड़ी बोली (हिंदी) में की जाए या ब्रजभाषा में। गद्य की बोली खड़ी बोली हो, इसे लोगों ने मान लिया था। लेकिन पद्य के लिए खड़ी बोली को स्‍वीकार कराना सरस्‍वती और उसके संपादक पंडित महावीर प्रसाद द्विवेदी का काम था। बीसवीं सदी की प्रथम दशाब्‍दी में अब भी उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल में लोग ब्रजभाषा में कविता करते थे। उनकी ब्रजभाषा कैसी होती थी, इसे बतलाना कठिन है, क्‍योंकि भोजपुरी भाषाभाषी ब्रजभाषा को 'इतै', 'उतै' जैसे कुछ शब्‍दों को छोड़कर अधिक नहीं जानते थे। बहु-प्रचलित महाकाव्‍य रामचरित मानस था, जो अवधी का था, जिसका ज्ञान कुछ अधिक हो सकता था। ब्रजभाषा की कविताएँ बहुत कम प्रचलित थीं। तो भी आग्रह ब्रजभाषा में ही कवित्त और सवैया कहने का था। सरस्‍वती ने यह भाव मन में बैठा दिया कि यदि खड़ी बोली में गद्य, कहानी, निबंध लिखे जा सकते हैं और खड़ी बोली में उर्दू वाले अपनी शायरी कर सकते हैं, तो कविता भी उसमें हो सकती है। श्री मैथिलीशरण गुप्‍त खड़ी बोली के आदि कवियों में है। उनको दृढ़ता प्रदान करने वाले द्विवेदीजी थे।

प्रायः चार दशकों तक 'सरस्‍वती' का संपादन ही द्विवेदीजी ने नहीं किया, बल्कि इस सारे समय में साहित्यिक भाषा निर्माण के काम में द्विवेदीजी ने चतुर माली का काम किया। आगे आने वाली पीढ़ियाँ 'सरस्‍वती' और द्विवेदीजी के इस निर्माण कार्य को शायद भूल जाएँ। किसी भाषा के बारे में किसी एक व्‍यक्ति और एक पत्रिका ने उतना काम नहीं किया, जितना हिंदी के बारे में इन दोनों ने किया।

प्रस्तुति- मनीषा जैन
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टिप्पणियाँ:-

राजेन्द्र श्रीवास्तव:-
महापंडित राहुल जी का यह संस्मरण हमारी अनमोल विरासत है। यह एक काल की साहित्यिक स्थितियों में विचरण करने जैसा है।
सुखद भी और जानकारीपूर्ण भी।
सुबह की मधुर शुरुआत।
आभार मनीषा जी
आभार बिजूका

आलोक बाजपेयी:-
राहुल जी का आलेख ऐतिहासिक महत्त्व का है।यह परोक्ष रूप से कुछ दीर्घकालिक प्रश्न भी खड़े करता है ।हिंदी में खड़ी बोली भारतेंदु युग में भी लिखी जाने लगी थी।उस हिंदी की बुनावट ,शब्द सम्पदा और शैली बाद में द्विवेदियुग की साहित्यिक हिंदी से अलग प्रतीत होती है।कहने का तात्पर्य यह है कि भारतेंदु काल की हिंदी और द्विवेदी युग की हिंदी में एक सातत्य व् निरंतरता नहीं है।इसके कारणों की पड़ताल एक जरुरी कार्य है जो हमें भाषा की राजनीति की समझने में मदद कर सकता है।
विनम्रता से निवेदन है की मैं इस विषय का विद्यार्थी नहीं हु पर मात्र अपनी शंका को रखने का लोभ संवरण न कर सका।

निधि जैन :-
पहाड़ और खाई सामाजिक परिवेश में अंतर दिखाती है इसे थोड़ी और बढाई जा सकती थी।

एक अराजक दिन कविता अच्छी है, कवि जीने की चाह रखता है, घटने की नही।

वे चाहते हैं कविता बहुत बढ़िया लगी, उच्च पदों पर आसीन लोगों पर प्रहार करती हुई

नही मिलते लोग  कविता ठीक लगी।

निधि जैन :-
बढ़िया संस्मरण

कौरवी भी कोई भाषा होती है आज जाना

द्विवेदी जी की मेहनत रंग लाइ हिंदी को सबने जाना और खड़ी बोली को कविता में सम्मान मिला।
एक बात और नई जानने को मिली कि उन दिनों हर काम में उर्दू का वर्चस्व था।

और अब अंग्रेजी का।

सही ही है बाप दादे जाते जाते अपनी पीढियां और विरासत छोड़ ही जाते  हैं

फ़रहत अली खान:-
द्विवेदी जी का हिंदी के लिए किया गया काम वाक़ई उल्लेखनीय है।

ये सही है कि उर्दू काफ़ी समय तक सरकारी काम-काज, आम-बोलचाल और अखबारों की भाषा बनी रही; आज भी अदालती काम-काज और दस्तावेज़ों में उर्दू और फ़ारसी के लफ़्ज़ अक्सर मिलते हैं; ख़ास-तौर से पंजाब में उर्दू काफ़ी दिनों तक सरकारी दफ़्तरों की भाषा रही। लेकिन ये कहना पूरी तरह ग़लत होगा कि ये किन्हीं ख़ास बाप-दादा की विरासत थी जो उसे ईजाद करके छोड़ गए।
ये ज़रूर कहा जा सकता है कि मुग़ल-काल के आस-पास ही उर्दू का जन्म और विकास हुआ; लेकिन न तो मुग़ल अंग्रेज़ों की तरह देश छोड़कर गए और न ही ये सिर्फ़ मुग़लों की विरासत है; बल्कि एक बड़े तबक़े की, जो कि हिंदुस्तान का मूल-निवासी है, ये मातृ-भाषा है।
उर्दू के अपने वजूद को बनाए रख पाने में सफ़ल रहने की कई वजहें हैं; जिनमें से एक बड़ी वजह उसका सहल(यानी आसान) और मिठास-युक्त होना है।
कुछ हद तक अंग्रेज़ी के लिए भी 'आसान होने' वाली बात कही जा सकती है, इसके अलावा सभी इस बात से वाक़िफ़ हैं कि अंग्रेज़ी आज एक वैश्विक भाषा बन चुकी है।

किसी भी भाषा को सबसे बड़ा ख़तरा ख़ुद उसके बोलने वालों की ला-परवाही और बे-एहतियाती से होता है। ऐसे समय में जब खड़ी-बोली हिंदी का बुरा समय चल रहा था, द्विवेदी जी ने उसके उत्थान का काम बा-ख़ूबी किया। ऐसे ही प्रयासों का नतीजा है कि आज विश्व-पटल पर हिंदी की ख़ासी पहचान है।

प्रज्ञा :-
मनीषा जी हृदय से आभार। द्विवेदी जी पर यह संस्मरण साझा करने हेतु। हिंदी भाषा व्याकरण पत्रकारिता साहित्य विचार विजन और साहित्यकारों को तैयार करना ऐसा कौनसा काम है जो द्विवेदी जी ने नहीं किया। नवजागरण के सन्दर्भ में उनका योगदान महत्वपूर्ण है। यूँ तो कई बातें हैं उनके सन्दर्भ में पर मित्रों आज एक और बात ये भी कि राष्ट्रकवि मैथलीशरण गुप्त को सही मॉर्ग प्रशस्त करने वाले भी द्विवेदी जी थे। सरस्वती में मैथिलीशरण गुप्त रसिक नाम से शुरू में श्रृंगारिक कविताएँ भेजने पर द्विवेदीजी ने एक सख्त पत्र के जरिये उन्हें खूब डांटा। ऐसे राजनीतिक उथल पुथल के समय ऐसी समयविरोधी रचनाएँ लिखने के लिये। और फिर गुप्त जी ने रसिक को त्यागा और राष्ट्रकवि का सफर तय किया।
एक नई पीढ़ी की समय के अनुसार तैयार करना मिशनरी ज़ील से पत्रकारिता में उतरना प्रतिबद्धता से भाषा संस्कार पैदा करना और परिश्रम से साहित्य को संवारना। ऐसे भविष्योन्मुखी व्यक्तित्व के प्रति मैं अपना सच्चा आदर व्यक्त करती हूँ।

सुवर्णा :-
बहुत सुन्दर संस्मरण। जी फ़रहत जी आपसे भी सहमत हूँ कि उर्दू की मिठास उसके लोकप्रिय होने का बड़ा कारण है फिर नवाबों के दौर में यह राजभाषा थी फिर अंग्रेज आए तब भी अंग्रेजी के साथ यह कायम थी और आज भी कचहरी के कामो में बहुतायत से प्रयुक्त होती है। हिंदी पर भी बहुत काम हुआ है आज विश्व पटल पर हिंदी छाई हुई है। इसका लचीलापन इसकी शब्दों को ग्रहण करने की उदारता इसे विशेष बनाती है। सरस्वती के समय के बारे में पढ़कर बहुत अच्छा लगा जिन लोगों ने इन किताबो को पढ़ा और रचा होगा वो कितने बड़े लोग हैं समझ सकते हैं हम। प्रज्ञा जी हमेशा की तरह आपकी टिप्पणी।

मनीषा जैन :-
और प्रज्ञा जी आपको भी यह मालूम होगा कि निराला जी ने अपनी कविता जूही की कली सरस्वती में भेजी लेकिन द्विवेदी जी ने इस कविता को अश्लील कह कर वापस कर दी लेकिन निराला जी ने उसे दुबारा भेजी फिर द्विवेदी जी ने सरस्वती में दुरूस्त करके पहली बार छापी और कितनी प्रसिद्ध हुई यह कविता।
द्विवेदी जी अक्सर नये कितने ही कवियों की कविताओं को ठीकठाक करके सरस्वती में छापते थे । क ई बार तो कविता का स्वरूप मूल से एकदम भिन्न हो जाता था लेकिन फिर भी कवि के नाम से ही छापते थे। इससे नये कवियों को बड़ा प्रोतासाहन मिलता था।

अशोक जैन:-
मुस्लिम शासकों के जमाने में उर्दू  की प्रधानता, फिर अंग्रेज़ी और देश में बोली जाने वाली अनेक भाषाओं के मध्य हिंदी के वर्तमान स्वरुप को लाने और कायम रखने में सरस्वती और द्विवेदीजी का हिमालयीन योगदान है। अंग्रेज़ी शासन में हिंदी देवनागरी लिपी के स्थान पर रोमन लिपी में लिखे जाने का भी प्रयास था किंतु इन महापुरुषों ने देवनागरी लिपी को भी बचाये रखा और आज यह वर्तमान स्वरूप में फली फूली।

इतने अच्छे संस्मरण को साझा करने के लिए आभार।

अर्जन राठौर:-
हिंदी की प्रसिद्ध पत्रिका सरस्वती के बारे में पढकर अच्छा लगा मनीषा जी को बधाई । आजकल हिंदी में ऐसे संस्मरण पढ़ने को नही मिलते

कविता वर्मा:-
अभी कुछ दिन पहले महावीर प्रसाद द्विवेदी जी के बारे में पढ़ा था ।वे सच्चे कर्मयोगी थे ।सरस्वती के प्रति उनका अगाध स्नेह और समर्पण था । अच्छा आलेख ।

मनीषा जैन :-
हिन्दी के महान कहानीकारों की पहली कालजयी कहानियाँ सरस्वती पत्रिका में ही प्रकाशित हुई जैसे-
किशोरी लाल गोस्वामी की इंदूमती
माधव प्रसाद मिश्र की मन की चंचलता
भगवानदास की प्लेग की चुडैल
रामचंद्र शुक्ल की ग्यारह वर्ष का समय
बंग महिला की दुलाई वाली
प्रेमचंद जी की सौत
चंद्रधर शर्मा गुलेरी की उसने कहा था।
आदि। है न ये अद्भुत तथ्य।

कविता वर्मा:-
जी गरिमा जी सहमत हूॅ। साहित्य की बारिकियों को खास कर तकनीकि बारिकियों को शब्द नहीं दे पाई आपने विस्तार से समझा दिया ।

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