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सत्यनारायण पटेल हमारे समय के चर्चित कथाकार हैं जो गहरी नज़र से युगीन विडंबनाओं की पड़ताल करते हुए पाठक से समय में हस्तक्षेप करने की अपील करते हैं। प्रेमचंद-रेणु की परंपरा के सुयोग्य उत्तराधिकारी के रूप में वे ग्रामांचल के दुख-दर्द, सपनों और महत्वाकांक्षाओं के रग-रेशे को भलीभांति पहचानते हैं। भूमंडलीकरण की लहर पर सवार समय ने मूल्यों और प्राथमिकताओं में भरपूर परिवर्तन करते हुए व्यक्ति को जिस अनुपात में स्वार्थांध और असंवेदनशील बनाया है, उसी अनुपात में सत्यनारायण पटेल कथा-ज़मीन पर अधिक से अधिक जुझारु और संघर्षशील होते गए हैं। कहने को 'गांव भीतर गांव' उनका पहला उपन्यास है, लेकिन दलित महिला झब्बू के जरिए जिस गंभीरता और निरासक्त आवेग के साथ उन्होंने व्यक्ति और समाज के पतन और उत्थान की क्रमिक कथा कही है, वह एक साथ राजनीति और व्यवस्था के विघटनशील चरित्र को कठघरे में खींच लाते हैं। : रोहिणी अग्रवाल

कवितायेँ : अंजनी शर्मा

समूह के साथी की रचना के अन्तर्गत आज पढ़िए अंजनी शर्मा की ये रचनाऐं।
 1
प्रवेश वर्जित

क्यों नहीं होती
ऐसी ताकत
हाथों में
कि
अनचाही नजरों को
निकाला जा सके
सरहदों के पार

सरहदें नहीं होती
केवल देश
और गाँव की
होती हैं अपनी
निजता की भी
सरहदें

अपनी निजता पर
अतिक्रमण के लिए
इस दखलंदाजी के लिए
क्यों नहीं 
बंद करते हैं हाथ
उन दरवाजों को
जहाँ लिखा है
प्रवेश वर्जित
या फिर 
अतिक्रमण करनेवाली 
नजरें ही 
अनदेखा कर देती हैं
लिखा हुआ 
प्रवेश वर्जित

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                       2

                  वो देखो

वो देखो लगाया
फिर किसी ने 
तुलसी को दीया
कि
छितरे किनारों वाले
शाम के सिंदूरी 
रूमाल की तुरपन
किसी ने की है अभी

वो देखो
घोंसलों में
लौटे हैं
परिन्दे अभी
कि
दिनभर की थकान 
टंगी है
दरवाजे के पीछे कहीं

वो देखो
धुंआ उठा है
उस घर की 
खिडकी से अभी
कि
हांडी में चढी है दाल
और फूल रहे हैं
चूल्हे में
फुलके अभी

वो देखो
छिटका है पानी
आंगन में
कि
कहानियों की 
खटिया पे
पसरेंगे ये बच्चे
और आती ही होगी
नन्ही परी अभी

वो देखो
उठ बैठा है कोई
पानी पीने के बहाने से
कि
उसके सपनों में
सेंध लगाकर
भागा है
कोई चोर अभी

वो देखो
नींद की खुमारी से
अलसाई सुबह
कि
आंख मलते -मलते 
सूरज 
जागेगा अभी

       --------------

                     3

                गलियाँ

      एक

गलियाँ हैं तो नुक्कड़ हैं
नुक्कड़ हैं तो 
नुक्कड़ पर
एकाध कोई 
फक्कड भी हैं

गलियाँ हैं तो बतियाँ हैं
बतियाँ ही नहीं 
कनबतियाँ भी हैं
और 
कनबतियों के संग 
मनबतियाँ भी हैं

गलियाँ हैं तो गिल्ली है
गिल्ली संग डंडा है
क्या हुआ जो
गिल्ली डंडे का 
मौसम ठंडा है
     --------
   
      दो

गलियाँ हैं तो
नजारे हैं
नजारे हैं तो
नजरें हैं

नजरें हैं तो
चार तो होंगी ही
और 
जो नजरें चार हैं 
तो
गलियों में किस्से हैं

किस्सों के कुछ हिस्से 
सच्चे हैं
सच्चे -झूठे की बात न करो
बस सुन लो
और कह दो कि
अच्छे हैं

---------
        
       तीन

गलियों के भीतर
भीतर -भीतर 
और भीतर
कई सारी गलियाँ हैं
इन गलियों के फेरों में
न पडना 
ये गलियाँ तो
भूलभुलैया हैं

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       चार

गलियों में
घर हैं
घर के संग आँगन हैं
आँगनों के बीच हैं गलियाँ
या गलियों की 
बगल में आँगन है
उफ्फ
सब गड्ड-मड्ड है
क्योंकि मोड 
बहुत है गलियों में
पर इन गलियों के 
न कोई ओर हैं
न छोर हैं

---------

       पाँच

गलियों में 
कुछ खिडकियाँ हैं
साथ में दरवाजे भी हैं
जो खुलते हैं
दिलों में

कभी -कभी
नजर आते हैं
अजनबी भी 
इन गलियों में
जो इन खिडकी -दरवाजों 
के जरिये
हो जाते हैं बस
इन गलियों के

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        छ:

गलियाँ मुड जाती हैं
एक मोड पर आकर 
जैसे उम्र गुजर जाती है
एक छोर पर आकर
गलियों के मोड पर
बाकी हैं निशान 
उम्र के
जीती हैं अपनी जिंदगी
ये गलियाँ 
कई सदियाँ

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टिप्पणियाँ:-

संजना तिवारी:-
कविताएं अच्छी है ।वो देखो मुझे बहुत पसन्द आई  ।बड़ी शांत, परिचय देती कविता । गलियाँ अपने आप में एक वर्णन है जो की रोचक लग रही है । प्रवेश वर्जित में बहुत कुछ कहा जा सकता था सरहदों के लिए , जिसकी मुझे कमी लगी ।

अलकनंदा साने:-
छोटी लेकिन पूर्ण कविताएं हैं। जिस तरह किसी वाहन को कम गति में चलाना ज्यादा चुनौती पूर्ण होता है वैसे ही कम शब्दों में बात रखना मुश्किल होता है । वो देखो कविता में कुछ बिम्ब नए हैं और शब्द प्रवाह को गति देते हैं । गलियां श्रृंखला भी बेहतर है पर मुझे सबसे अच्छी कविता प्रवेश वर्जित लगी । शुभकामना।

राजेन्द्र गुप्ता:-
वाह। बनारस की गालियां याद आ गयीं।साथ ही शिव प्रसाद सिंह का "गली आगे मुड़ती है"।
इन गलियों की तरह ही न ज़िन्दग़ी का ओर है न छोर। वाह।

निरंजन श्रोत्रिय:-
प्रवेश वर्जित' वाकई अच्छी कविता है।अलकनंदा जी से सहमत कि कवि ने कम शब्दों में सार्थक बात की हैं। गलियां श्रृंखला की कविताएँ भी अच्छी हैं।

राजेन्द्र श्रीवास्तव:-
कविताएं अभी देख  सका।
मधुर  कविताएं।  स्वाद भरी। " वो देखो " पढ़कर तो मन मिठास से भर गया।
इस मिठास के बीच शिद्दत के साथ अपनी बात रखने का साहस। साधुवाद।
डॉ राजेन्द्र श्रीवास्तव, पुणे

अरुण यादव:-
शब्दों की मितव्ययिता पाठकों की सोच को स्पेस देती है। काव्य की यही कला शब्दों की असल ताकत को प्रकट करती है और हम कविता के जादू में घिर जाते है। साधारण से विशिष्ट का रचाव करतीं  ये कविताएं  प्रभावित करती हैं। रचनाकार  को बधाई शुभकामनाएं।ं

बलविंदर:-
इन उम्दा कविताओं के लिए अंजनी जी को दाद-ओ-मुबारकबाद पेश है.
"गली" वाली कविताओं को देख कर "गली" पर बशीर बद्र साहब का एक शेर् याद आ गया..फ़रमाते हैं..

हम दिल्ली भी हो आये, लाहौर भी घूम
ऐ यार मगर तेरी गली, तेरी गली है।

प्रज्ञा :-
प्रवेश वर्जित और वो देखो दोनों बहुत अर्थवान कविताएँ। आकर्षण की एक लय मे गुंधी। और शब्दों की कसीदाकारी से बनी गलियाँ। कथ्य सा ही शिल्प। गलियों में अनेक गलियाँ उसी तरह शब्दों से निकले अनेक शब्द उनसे बने मुहावरे और शब्द बिम्ब।
एक आध जगह गलियों के अंश कुछ सपाट हुए पर समग्रता में देखें तो खुद लौट गए हम भी उन्ही गलियों में।
कवि को बधाई
मनीषा जी का शुक्रिया

गरिमा श्रीवास्तव:-
सुन्दर और अर्थवान कवितायेँ प्रकाशित करने के लिए धन्यवाद।ये भी कि गलियों की संस्कृति धीरे धीरे छूटती जा रही है ऊंची अट्टालिकाओं के डब्बेनुमा कमरों में कैद लोगों की आनेवाली सन्ततियां पूछेंगी गलियां और चौक क्या होते थे।अमृतलाल नागर के उपन्यास' बूँद और समुद्र' की गलियां याद आ गयीं जो चौक की ऒर खुलती हैं।गलियांश्रृंखला की कवितायेँ हमारे भीतर और बाहर की गलियां हैं।देश से बाहर होने की वजह से बिजूका नियमित देख नहीं पा रही हूँ।कल की बोध कथा पढ़ी ,अच्छी थी पर सुधीजनों से एक जिज्ञासा है पुरुषार्थ क्या है-क्या इसका स्त्रीलिंग 'है?यदि नहीं तो क्या स्त्रीलिंग चुहिया,पत्नी के सन्दर्भ में 'पुरुषार्थ 'का प्रयोग उचित है।कल की पोस्ट आज पढ़ी इसलिए ये जिज्ञासा आज।यदि हस्तक्षेप हो तो अग्रिम क्षमा।

पदमा शर्मा :-
"शाम के सिंदूरी रूमाल की तूरपन" बहुत सुन्दर रूपक। "दिन भर की थकान टंगी है दरवाजे के पीछे" ... कहानियो की खटिया.... अच्छे उपमान। गलियों कइ विविध रूपों के साथ उपरोक्त कवितायेँ सुन्दर भाव और अर्थ लिए हैं। कवि/ कवयित्री को बधाई

कविता वर्मा:-
प्रवेश वर्जित एक गंभीर प्रश्न उठाती है ।वो देखो अपने आसपास होने वाली हलचलों को सुंदर बिंबो के द्वारा प्रकट करती है । ' सिंदूरी रुमाल की तुरपन ' 'दरवाजे के पीछे टंगी थकान ' ' कहानियों की खटिया' मन मोह लेते हैं । गलियाों को हर कोण से देख कर उनकी विस्तृत  व्याख्या है । बधाई ।

मनीषा जैन :-
छोटे शब्दों में अर्थपूर्ण बात कही गयी है। कविताओ में चित्रमयता है। सभी कविताऐ अपने कथ्य व शिल्प में पूर्ण हैं। तीसरी कविता गलियाँ में गली को विभिन्न तरह से प्रस्तुत किया गया है। कवि को बधाई

मिनाक्षी स्वामी:-
प्रवेश वर्जित कविता में गहराई लिए गंभीर विषय की सहज अभिव्यक्ति है। 'निजता की सरहदे' बहुत गहरी बात कही गई है वह भी बहुत सरलता से।
'गलियां' बहुत सी यादों की गलियों में आत्मीयता से घुमाती है और पढते हुए गुम भी हो जाते हैं।
'वो देखो' में सुंदर  शब्दों के चयन के साथ दिल में उतरती कविता।
अद्भुत बिम्ब हैं शाम के सिंदूरी रूमाल की तुरपन। थकान दरवाजे के पीछे टंगा होना। सपनों में सेंघ लगाकर चोर का भागना। कहानियों की खटिया पे....बहुत सुंदर रूपक।
सभी कविताएं परिपक्व लगती हैं। दिल से लिखी सो सीधे दिल में उतरती हैं।
रचयिता को ढेर सारी बधाई और शुभकामनाएं।
बिजूका का आभार।

किसलय पांचोली:-
सभी कविताएँ अच्छी लगीं। विशेष कर प्रवेश वर्जित और वो देखो। गलियों की भूलभुलैया और उनमें रचता बस्ता जीवन अब कविताओं में ही संरक्षित बचेगा। और सम्भवतः यह भी होगा कि मल्टी /फ्लेट/पार्किंग स्पेस/लिफ्ट/चढ़ाव भी धीरे  से कविता में प्रवेश कर जाएंगे। जहां जीवन वहाँ कविता।

फ़रहत अली खान:-
अभी अभी तसल्ली से कविताएँ पढ़ पाया। छोटी-छोटी पंक्तियों में कही गयी बातें मन मोह लेती हैं।
प्रवेश वर्जित और गलियाँ-2,3,4 ख़ासतौर पर पसंद आयीं।
अंजनी जी का धन्यवाद जो हमें इतनी उम्दा कविताओं से वाबस्ता कराया।

अंजनी शर्मा:-
प्रज्ञा जी ,ब्रजेश जी , सुषमा जी , अर्जुन जी ,गरिमा जी , पदमा जी, संजय जी ,कविता जी , मनीषा जी ,मीनाक्षी जी , किसलय जी
आप सभी की सकारात्मक टिप्पणियों के लिए  तथा उत्साहवर्धन के लिए हृदय से धन्यवाद ।
इस अनूठे साहित्यिक सेतु  "बिजूका " की आभारी हूँ।

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