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सत्यनारायण पटेल हमारे समय के चर्चित कथाकार हैं जो गहरी नज़र से युगीन विडंबनाओं की पड़ताल करते हुए पाठक से समय में हस्तक्षेप करने की अपील करते हैं। प्रेमचंद-रेणु की परंपरा के सुयोग्य उत्तराधिकारी के रूप में वे ग्रामांचल के दुख-दर्द, सपनों और महत्वाकांक्षाओं के रग-रेशे को भलीभांति पहचानते हैं। भूमंडलीकरण की लहर पर सवार समय ने मूल्यों और प्राथमिकताओं में भरपूर परिवर्तन करते हुए व्यक्ति को जिस अनुपात में स्वार्थांध और असंवेदनशील बनाया है, उसी अनुपात में सत्यनारायण पटेल कथा-ज़मीन पर अधिक से अधिक जुझारु और संघर्षशील होते गए हैं। कहने को 'गांव भीतर गांव' उनका पहला उपन्यास है, लेकिन दलित महिला झब्बू के जरिए जिस गंभीरता और निरासक्त आवेग के साथ उन्होंने व्यक्ति और समाज के पतन और उत्थान की क्रमिक कथा कही है, वह एक साथ राजनीति और व्यवस्था के विघटनशील चरित्र को कठघरे में खींच लाते हैं। : रोहिणी अग्रवाल

कविता : हम बच्चे बन जाये : दीपक वसन्त

"कविता"-

मैं बनाना चाहू तो वह बिगड़ जाती है।
मैं बुलाना चाहू तो वह खो जाती है।
मैं सजाना चाहू तो वह बिखर जाती है।
मैं जो छूना चाहू तब वह सिमट जाती है।
मै जो जगाना चाहू तब वह सो जाती है।
मै जब सो जाऊ तब वह चली आती है।
मेरी बंद पलकों पर वह छा जाती है।
अन्तरंग में मेरे वह समां जाती है।
मै खो जाता हूँ और वह रह जाती है।
मैं खो जाता हूँ और कविता रह जाती है।।
०००

“हम बच्चे बन जाये।“

जब भी बच्चे सामने आये, हम भी तुरंत बच्चे बन जाये।
उनको उन्मुक्त थिरकता देख, कुछ ठुमके हम भी लगाये।
अपने ज्ञान का अंकुश तज कर, अपने कोरे कागज पर हम, एक नया अध्याय रचाए।
रिश्तो के उद्ब्बोधन से ऊपर उठ, मित्रता का अलख जगाये।
बच्चो की पवित्र तरंगधेर्य से जुड़ कर, हम भी शुद्ध पवित्र हो जाये।
उनके नन्हे कदमो के पीछे चल, जीवन की लम्बी राह हम पाए।
बच्चो को परिपूर्ण जान कर, हम भी पुर्णमदम हो जाये।
जब भी बच्चे सामने आये, हम भी खुद बच्चे बन जाये।
०००

जब कोई लड़की औरत बन जाती है।
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जब कोई लड़की अपने अधिकारों को पा जाती है, वह औरत बन जाती है।
जब कोई लड़की आइना देख थोडा घबराती है, वह औरत बन जाती है।
जब कोई लड़की बिना खुश हुए मुस्कुराती है, वह औरत बन जाती है।
जब कोई लड़की इर्ष्या के भाव जगाती है, वह औरत बन जाती है।
जब कोई लड़की परिपक्व हो जाती है, वह औरत बन जाती है।
जब कोई लड़की  पुरुषो के मध्य खुद को अकेला पाती है, वह औरत बन जाती है।
००० दीपक वसन्त
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टिप्पणियाँ:-

अरुण यादव:-
कविताएं बहुत साधारण हैं। और परिपक्वता की मांग की जाती है।

संदीप कुमार:-
माफ़ी चाहूँगा कवितायें दरअसल कवितायें नहीं लगीं. बस कुछ मनोभावों का प्रकटीकरण है

राजेश्वर वशिष्ट:-
कविताएँ तो नहीं हैं। कुछ कच्चा माल समझ लीजिए।

राजेन्द्र श्रीवास्तव:-
कतई आवश्यक नहीं कि किसी कवि की सभी कविताएं शानदार ही हों। महत्वपूर्ण बात यह है कि कवि कितनी सकारात्मकता से पाठकों की बात को लेता है। इस दृष्टि से दीपक वसंत जी रचनात्मकता और सकारात्मकता उल्लेखनीय है।  साधुवाद।
राजेन्द्र श्रीवास्तव,  पुणे

सुषमा अवधूत :-
Kavita ko achhe se samjhaya hai,bachapan ,sahi hai yadi sab bhul kar fir se bachhe ban jay to jeevan ka Anand pa jaye ,ladki jab aurat banati hai ko achhe se samjhaya hai ,sabhi kavitayen achhi hai

फ़रहत अली खान:-
भाव अच्छे हैं, मगर कविता के रूप में उन्हें ढालने की कोशिश थोड़ी सी कमज़ोर लगी। हालाँकि अच्छे शब्दों और उपमाओं का प्रयोग किया गया है, लेकिन कविताएँ एकरूपता लिए हुए हैं, उनमें कुछ ख़ास नया और रोचक नहीं है।
वर्तनी की ग़लती जगह-जगह हुई है।
दूसरी कविता की पंक्तियों के आख़िर में प्रयुक्त शब्दों 'जाये', 'लगाये', 'रचाए', 'जगाये', 'पाए' आदि की जगह क्रमशः 'जाएँ', 'लगाएँ', 'रचाएँ', 'जगाएँ', 'पाएँ' आदि आना चाहिए था। मैंने पहले भी कुछ मराठी-भाषी लोगों की वर्तनी में ये ग़लती पायी है।

जब पहली कविता की पहली तीन पंक्तियों में 'तो' आया है तो उसके बाद की तीन पंक्तियों में 'तब' का इस्तेमाल करने वाली बात मुझे समझ नहीं आयी।

तीसरी कविता मुझे सबसे बेहतर नज़र आयी।

ब्रजेश कानूनगो:-
जब हम किन्ही अनुभवों और विचार से दो चार होते हैं तब जरूरी  नहीं की उसे कविता में ही अभिव्यक्त करें।उन्हें किसी और कला माध्यम या विधा में भी कहा जा सकता है।प्रस्तुत सामग्री को कविता में ख पाना रचनाकार के लिए सम्भव नहीं हो पाया है।क्षमा करें अब इससे आगे बढ़ना बहुत जरूरी होगा।

धनश्री :-
कवितायेँ अच्छी है, मुझे लगता है कवीता लिखते समय हम सभी तुकबंदी पर ज़्यादा ध्यान देते है इससे कभी कभी कविता की आत्मा मर जाती है, मेरे कविताओं में भी यही ग़लतिया सुनी है मैंने। किन्तु मुझे कविताएँ सहज जान पड़ती है , बेशक नयापन नहीं होगा किन्तु बचपन को खींच लाने के लिए सराहनीय है।

कविता वर्मा:-
आज की तीनों कवितायेँ सामान्य कविताओं से ऊपर नहीं उठ पाई हैं। पहली कविता हर कवि की प्रारंभिक कविताओं जैसी लगी। हम बच्चे बन जायें भी तुकांत होने के बावजूद भी गद्द्य तत्व इसमे ज्यादा हैं इसलिए कोई खास प्रभाव नहीं छोड़ पाई। तीसरी कविता में कई तथ्यागत गलतियाँ हैं क्या लड़की आईना देख नहीं घबराती ,लड़की बिन बात खुश भी होती है और ईर्ष्या भी कर सकती है। लड़की और औरत दोनों पुरुषों के बीच खुद को अकेला ही नहीं भयभीत भी पा  सकती हैं। इसकी पहली पंक्ति तो मुझे समझ ही नहीं आई कवि /कवियित्री क्या ये कहना चाह रहे हैं की हर औरत के पास उसके सारे अधिकार होते हैं ?

मनीषा जैन :-
मुझे दूसरी कविता सबसे अच्छी लगी। तीसरी कविता में समझ नही आया कवि क्या कहना चाहते/ चाहती है। शायद शाम को रचनाकार कुछ स्पष्ट कर सकें। कभी कभी साधारण शब्दो में बहुत गहरी बात कह दी जाती है लेकिन पहली कविता सरल होते हुए कथ्य में कोई संवेदना प्रकट नही कर पाई। फिलहाल रचनाकार को बधाई।

दीपक वसन्त :-
उनका वक्तव्य समूह के लिए-
सर्वप्रथम, समूह में स्थान प्रदान करने के लिए धन्यवाद। और सभी को आभार।
पहली कविता कवि के सहज भाव है।
दूसरी कविता के लिए मैं कह सकता हूँ की यह रचना खून से लिखी गई है। अथार्त् एक शिक्षक होने के नाते मेरे जीवन में पहले उतारी गई और बाद में लिखी गई है।
तीसरी कविता महिलाओ को समझने का एक प्रयास रेखांकित किया है। और प्रायः ऐसे सभी प्रयास असफल होते रहे है। अतः मैं खेद प्रगट करता हूँ।
अंत में पुनः तहे दिल से आभार। आपने मुझे अपना मित्र जान कर, अपना कीमती वक्त और विचार प्रदान किये इस हेतु आभार। त्रुटियों के लिए क्षमा। धन्यवाद।

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