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सत्यनारायण पटेल हमारे समय के चर्चित कथाकार हैं जो गहरी नज़र से युगीन विडंबनाओं की पड़ताल करते हुए पाठक से समय में हस्तक्षेप करने की अपील करते हैं। प्रेमचंद-रेणु की परंपरा के सुयोग्य उत्तराधिकारी के रूप में वे ग्रामांचल के दुख-दर्द, सपनों और महत्वाकांक्षाओं के रग-रेशे को भलीभांति पहचानते हैं। भूमंडलीकरण की लहर पर सवार समय ने मूल्यों और प्राथमिकताओं में भरपूर परिवर्तन करते हुए व्यक्ति को जिस अनुपात में स्वार्थांध और असंवेदनशील बनाया है, उसी अनुपात में सत्यनारायण पटेल कथा-ज़मीन पर अधिक से अधिक जुझारु और संघर्षशील होते गए हैं। कहने को 'गांव भीतर गांव' उनका पहला उपन्यास है, लेकिन दलित महिला झब्बू के जरिए जिस गंभीरता और निरासक्त आवेग के साथ उन्होंने व्यक्ति और समाज के पतन और उत्थान की क्रमिक कथा कही है, वह एक साथ राजनीति और व्यवस्था के विघटनशील चरित्र को कठघरे में खींच लाते हैं। : रोहिणी अग्रवाल

कहानी : नाज़िया फातमा

शबीन रात से सोयी नहीं l न जानेक्या-क्या सोचती रही l उसको नींद कहाँ ? उसके लिए सोना है सिर्फ  २-3 घटं की बदं आखाँ जिसमे शायद कोई भी नार्मल इन्सान पागल हो सकता हैl लेकिन शबीन के लिए ये एक आम बात हैपिछले दो सालों से वह इसे ही नींद  कहती है l कभी-कभी खुद से ही पूछती है क्या वह सच में इंसान ही है ? पता नहीं शायद मशीन या शायद कुछ और पता नहीं l लेकिन इनसब केबावजूद उसकी सख्त जान है की पीछा ही नहीं छोड़ती l लेकिन फिर वह सोचती है वह मरेभी तो किस  के लिए, क्यों? क्या कोई उसके दर्द को समझताहै? क्या कोई आता हैउससेपूछने कि क्या वो खशु है? नहीं औरों को उससे क्या मतलब जब उसके अम्मी-अब्बू को ही नहीं हैl सहसा ये सब सोचते सोचतेउसकी आँख लग जातीहैl सपने में उसको उसका प्रेमी संजय  बाहों  मेंलिए हैऔरवो भीबेहद सकुून से उसकी धड़कनों और सासं  की रवानगी को महसूस कर रही हैl बस यही लम्हा  उसका है, कितना  सकुून है इसमें पूरी जिंदगी  वह इसी तरह बिताना चाहती है काश कि ये जिंदगी एक खूबसूरत लम्हा  ही होती ये सब कितना  आनदं देता हैl सहसा,उसे किसी  ने हाथ मारा घबराहट में उसकी आखाँ खुली तो देखा पास में लेटा छ: महीनेका शाहिद दूध पीने के लिए रो रहा था l इतना अच्छा सपना की उसे रोना आता है उसे नफरत होती है खुद  से ये जिम्मेदारियाँ  l अब फिर उसी सोच के दौरान उसने अपना ढूध शाहिद  के मुहं में डाला तो उसका रोना बदं हुआ l काफी देर सोचती रही एक इतना अच्छा सपना था , लेकिन आँख खुली तो फिर वही भयानक सच्चाई उफ़ काश की यह सब झूठ होता काश की सजं य के साथ की दुनिया  ही सच होती l काश ये सपना नहीं हकीकत होता l काश ....काश , लेकिन   इस काश में ही उसे अब यह भयानक जिंदगी बितानी है जहााँ उसका अपना कुछ नहीं उसका वजूद तो कही और ही लेकिन कहनेके लिए ही सही अब उसका शौहर अनवर है, उसका अपना घर हैउसका छ: महीनेका बच्चा हैl लेकिन इन सब मेंवो नहीं है.. हाँ वो  नहीं हैl वो तो कही और रहना चाहती थी लेकिन  वक़्त और उसके अम्मी-अब्बू ने उसके साथ यह क्या किया ?lवो सिर्फ अपने लिए जीना चाहती थी लेकिन दुनिया हाय ये दुनिया  l सोचती है सच बहुत महान होते हैं वो लोग  और उनका प्यार जो पूरी दुनिया सेउसके लिए लड़  जातेहैं लेकिन  वो हिम्मत  उसमेऔर संजय में क्यों नहीं आई...क्यों नहीं ? पता नहीं सजं य नेकहा था उसेअपने साथ चलने के लिएलेकिन वो हिम्मत क्यों नहीं कर पाई ..क्यों नहीं...क्यों नहीं ? आज खुद को कोसतेहुए उसे दो साल  हो गए लेकिन उसकी जिंदगी सिर्फ सजं य के साथ सम्बन्धों पर ही चल ही है l हाँ वह अनवर को अपना पति नहीं मानती,, नहीं मानती वो सिर्फ  सजं य को ही सब कुछ मानती हैl आज भी वो सजं य को ही अपना पति मानती हैl सहसा किसी नेडोर बेल बजाई शबीन ऊं घते हुए दरवाज़े तक जाती है तो देखती है कि सजं य आया हैख़शुी से उसका चेहरा लाल  हो उठता है इशारे से उसे आहिस्ता  से बिना  आहट किये अन्दर वाले कमरे में जाने के लिए इशारा करती  है और दरवाज़ा बदं करती देती  हैl

000 नाज़िया फातमा
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टिप्पणियाँ:-

फ़रहत अली खान:-
नाज़िया जी,
कहानी मुझे भी कुछ अधूरी सी नज़र आयी; या तो अंत में कुछ छूटा है या  फिर बीच में।
लेकिन अगर ये एक मुकम्मल कहानी है तो ये शबीन नाम की एक बिगड़ी हुई, बे-वक़ूफ़ और स्वार्थी लड़की की कहानी है, जिसे अपनी अच्छी-बुरी इच्छाओं के आगे कुछ भी अच्छा नहीं लगता, जो प्रेम को केवल भौतिक संबंध ही मानती है। इसे 'प्रेम' नहीं, 'आकर्षण' कहते हैं।
नींद वाली बात और उसकी व्याख्या मुझे बहुत पसंद आई। अच्छे लेखकों को पढ़ते-पढ़ते अच्छा लिखना भी आ जाता है और ये एक धीमी प्रक्रिया है।

गरिमा श्रीवास्तव:-
नाज़िया ये कहानी अनगढ़ है जो और मेहनत मांगती है।व्याकरणिक अशुद्धियां भी हैं।आप त्रिकोणात्मक संबंधों का द्वंद्व प्रस्तुत करना चाहती हैं या अनमेल विवाह की व्यथा कथा।कहानी में फंतासी भी है।ऐसा लगता है कहानी आत्मकथात्मक है पर उसे काल्पनिकता का जामा पहनाने की कोशिश की जा रही है ।इस समय स्त्रियों को अपनी बात खुलकर कहनी ज़रूर चाहिए।इसे भूलकर कि कोई क्या सोचेगा।थोड़ा अभ्यास और चाहिए।

रूपा सिंह :-
नाजिया जी सबकी पहली कहानी कमोबेश ऐसी ही होती हैं।आप जरा सी मशक्कत से और अच्छा लिखने लगेंगी।

शिशु पाल सिंह:-
नाज़िया जी ने कहानी का विषय तो अच्छा चुना जो पुरुष प्रधान समाज में नारि की स्वतंत्रता हनन पर आधारित है।अपनी बात को बड़ी शिद्दत से कहने की कोशिश भी की है।धार्मिक बेड़ियों को तोड़ने का साहस भी दिखाया है।कहानी का अंत सामाजिक नैतिकता के अनुरूप नहीं है। प्रयास उत्तम है।

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