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सत्यनारायण पटेल हमारे समय के चर्चित कथाकार हैं जो गहरी नज़र से युगीन विडंबनाओं की पड़ताल करते हुए पाठक से समय में हस्तक्षेप करने की अपील करते हैं। प्रेमचंद-रेणु की परंपरा के सुयोग्य उत्तराधिकारी के रूप में वे ग्रामांचल के दुख-दर्द, सपनों और महत्वाकांक्षाओं के रग-रेशे को भलीभांति पहचानते हैं। भूमंडलीकरण की लहर पर सवार समय ने मूल्यों और प्राथमिकताओं में भरपूर परिवर्तन करते हुए व्यक्ति को जिस अनुपात में स्वार्थांध और असंवेदनशील बनाया है, उसी अनुपात में सत्यनारायण पटेल कथा-ज़मीन पर अधिक से अधिक जुझारु और संघर्षशील होते गए हैं। कहने को 'गांव भीतर गांव' उनका पहला उपन्यास है, लेकिन दलित महिला झब्बू के जरिए जिस गंभीरता और निरासक्त आवेग के साथ उन्होंने व्यक्ति और समाज के पतन और उत्थान की क्रमिक कथा कही है, वह एक साथ राजनीति और व्यवस्था के विघटनशील चरित्र को कठघरे में खींच लाते हैं। : रोहिणी अग्रवाल

कविता : मार्टिन कार्टर

इन कविताओं के कवि मार्टिन कार्टर जी का जन्म 7 जून 1927 में जॉर्ज टाउन गुयाना में हुआ ।

वे अंग्रेजी भाषा के कवि थे।
उनके कविता संग्रह में poems of resistance,poems of successtion आदि हैं ।
अनुवाद - सरिता शर्मा

वह चिल्लाई देखो, देखो, कविताओं वाला आदमी
अपनी मासूमियत के कमजोर पुल पर भाग रही थी वह।
किस घर में
वह जाएगी? किस अपराधबोध में ले जाएगा
वह पुल उसको ? मैं
जिसे उसने आवाज दी
और वह बमुश्किल 12 साल की होगी
बीच में मिले, वह जा रही थी
अपने रास्ते; मैं लौट रहा था
बीच में जहाँ हम मिले
वहाँ रुका नहीं जा सकता है।

 

तुम्हारे हाथों को देखते हुए 
मार्टिन कार्टर 

अनुवाद - सरिता शर्मा

नहीं!
मैं खामोश नहीं होऊँगा!
बहुत कुछ
हासिल करना है मुझे
अगर तुम देखते हो मुझे
किताबें को निहारते हुए
या तुम्हारे घर आते हुए
या धूप में घूमते हुए
जान लो आग की तलाश है मुझे !

मैंने सीखा है
किताबों से प्यारे बंधु
स्वप्नदर्शी जिंदा लोगों के बारे में
प्रकाशहीन कमरे में भूखे प्यासे रहते हुए
जो मर नहीं पाए क्योंकि मौत उनसे ज्यादा दीन थी
जो सपना देखने के लिए नहीं सोते थे, बल्कि दुनिया को
बदलने सपने देखा करते थे।

और हाँ
अगर तुम देखते हो मुझे
तुम्हारे हाथों पर नजर डालते हुए
तुम्हारी बात सुनते हुए
तुम्हारे जुलूस में चलते हुए
तुम्हे जान लेना चाहिए
मैं सपना देखने के लिए नहीं सोता, बल्कि दुनिया को
बदलने के सपने देखा करता हूँ।

यह अंधियारा समय है प्रिय 
मार्टिन कार्टर 

अनुवाद - सरिता शर्मा

यह अंधियारा समय है प्रिय
हर जगह धरती पर रेंगते हैं भूरे झींगुर
चमकता सूरज छुप गया है आकाश में कहीं
सूर्ख फूल दुख के बोझ से झुक गए हैं
यह अंधियारा समय है प्रिय
यह उत्पीड़न, डार्क मेटल के संगीत और आँसुओं का मौसम है।
बंदूकों का त्योहार है, मुसीबतों का उत्सव है
लोगों के चेहरे हैरान और परेशान हैं चहुँ ओर
कौन टहलता आता है रात के घुप्प अँधेरे में?
किसके स्टील के बूट रौंद देते हैं नर्म घास को
यह मौत का आदमी है प्रिय, अपरिचित घुसपैठिया
देख रहा है तुम्हें सोते हुए और निशाना साध रहा है तुम्हारे सपने पर।

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