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सत्यनारायण पटेल हमारे समय के चर्चित कथाकार हैं जो गहरी नज़र से युगीन विडंबनाओं की पड़ताल करते हुए पाठक से समय में हस्तक्षेप करने की अपील करते हैं। प्रेमचंद-रेणु की परंपरा के सुयोग्य उत्तराधिकारी के रूप में वे ग्रामांचल के दुख-दर्द, सपनों और महत्वाकांक्षाओं के रग-रेशे को भलीभांति पहचानते हैं। भूमंडलीकरण की लहर पर सवार समय ने मूल्यों और प्राथमिकताओं में भरपूर परिवर्तन करते हुए व्यक्ति को जिस अनुपात में स्वार्थांध और असंवेदनशील बनाया है, उसी अनुपात में सत्यनारायण पटेल कथा-ज़मीन पर अधिक से अधिक जुझारु और संघर्षशील होते गए हैं। कहने को 'गांव भीतर गांव' उनका पहला उपन्यास है, लेकिन दलित महिला झब्बू के जरिए जिस गंभीरता और निरासक्त आवेग के साथ उन्होंने व्यक्ति और समाज के पतन और उत्थान की क्रमिक कथा कही है, वह एक साथ राजनीति और व्यवस्था के विघटनशील चरित्र को कठघरे में खींच लाते हैं। : रोहिणी अग्रवाल

लेख : कहानी कहने की कला : वाल्टर बेंजामिन

कहानी कहने की कला
000 वाल्टर बेंजामिन

हर सुबह अपने साथ दुनिया भर की खबरें लेकर आती है। लेकिन फिर भी हमारे पास अच्छी कहानियों का दारिद्र्य बना रहता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि कोई भी घटना स्पष्टीकरण के बारीक छिद्रों से गुजरे बगैर हम तक नहीं पहुंचती। या यूं कहें कि लगभग हर चीज हमारी जानकारी में इजाफा भर करती है, लेकिन कहानी के पक्ष को बढ़ावा देने वाला उसमें कुछ भी नहीं होता। कहानी कहने की आधी कला इसी में है कि सुनाते समय उसे तमाम स्पष्टीकरणों से मुक्त रखा जाए। इस दृष्टि से आदिकाल के लोग, और उनमें भी हेरोटोटस, इस हुनर में माहिर थे। अपनी किताब 'हिस्टरीज' के तीसरे खंड के चौदहवें अध्याय में वे सैमेनिटस की कहानी सुनाते हैं।

युद्ध में हार के बाद मिस्र के बादशाह सैमेनिटस को ईरान के राजा कैंबिसेस ने बंदी बना लिया था। कैंबिसेस अपने बंदी को नीचा दिखाने पर आमादा था। उसने आदेश दिया कि सैमेनिटस को उस सड़क पर लाया जाए जहां से ईरानी विजेताओं का जुलूस निकल रहा था। उसने यह इंतजाम भी किया कि बंदी अपनी बेटी को एक साधारण नौकरानी के रूप में पानी का घड़ा लिए कुंए की ओर जाता देखे। इस नजारे को देख सारे मिस्रवासी जहां बिलखने और विलाप करने लगे, वहीं सैमेनिटस चुपचाप, बिना बोले जमीन पर नजरें गड़ाए खड़ा रहा। फिर इसके बाद जब उसके बेटे को फांसी देने के लिए जुलूस में ले जाया जा रहा था, तब भी वह खामोश रहा। लेकिन जब उसने अपने एक पुराने बूढ़े नौकर को बंदियों की कतार में भिखारियों की तरह जाते देखा, तो उसने अपने सिर को पीटते हुए गहनतम तकलीफ और दु:ख का इजहार किया। इस कहानी में हम किस्सागोई की असली मिसाल देख सकते हैं। सूचना का महत्व सिर्फ उस क्षण में रहता है, जब वह नई होती है। उस एक क्षण से आगे वह जिंदा नहीं रहती। उस एक क्षण के प्रति समर्पित होकर उसे बिना वक्त गंवाए अपने-आपको व्यक्त कर देना होता है। कहानी के साथ ऐसा नहीं है। वह अपने-आपको खर्च न करते हुए अपनी शक्ति को अपने भीतर जुटाए रहने और लंबे समय बाद उसे मुक्त करने की क्षमता रखती है। और इस तरह मोंतेन ने मिस्र के बादशाह की इस कहानी को पढ़ने के बाद अपने-आप से पूछा कि बादशाह ने अपने नौकर को देखने के बाद ही दु:ख का इजहार क्यों किया, और पहले क्यों नहीं? और मोंतेन ने स्वयं ही उत्तर देते हुए कहा, 'चूंकि वह व्यथा में इस कदर सराबोर हो चुका था कि एक छोटा सा झटका और लगते ही उसके भीतर का बांध टूट गया।'

कहानी को इस तरह से समझा जा सकता है, लेकिन इसमें दूसरे स्पष्टीकरणों की भी गुंजाइश है। मोंतेन के इस प्रश्न को अपने दोस्तों के बीच पूछकर कोई भी इन तक पहुंच सकता है। मेरे एक मित्र ने कहा, 'बादशाह शाही खानदान की नियति से विचलित नहीं होता, क्योंकि यह लहू उसका अपना है।' एक अन्य ने कहा, 'मंच पर हमें बहुत सी ऐसी बातें विचलित करती हैं, जिनसे सचमुच की जिंदगी में शायद हम प्रभावित न हों। बादशाह के लिए यह नौकर सिर्फ एक अभिनेता है।' तीसरा बोला, 'गहरी यंत्रणा तब तक जमा होती जाती है, जब तक थोड़ी सी फुरसत न मिल जाए। बादशाह के लिए नौकर का दिखना फुरसत का ऐसा ही क्षण था।' चौथे ने कहा 'अगर यह घटना आज की दुनिया में घटी होती, तो सभी अखबारों ने यह दावा किया होता कि सैमेनिटस अपने नौकरों को अपने बच्चों से भी अधिक चाहता था।' जो भी हो, यह सच है कि हर रिपोर्टर लगे हाथ कोई-न-कोई स्पष्टीकरण जरूर ईजाद कर लेगा। हेराडोटस कोई स्पष्टीकरण नहीं देता। उसका वृत्तांत सबसे शुष्क है। और यही कारण है कि पुरातन मिस्र की यह कहानी आज हजारों वर्षों बाद भी विस्मय और विचार को जागृत करने में सक्षम है। इसमें अन्न के उन दानों के से गुण हैं, जो पिरामिडों के गर्भग्रहों में सुरक्षित बंद रहने के बाद आज भी अपने भीतर अंकुर प्रस्फुटित करने की क्षमता को बचाए हुए हैं।
अनुवाद: जितेंद्र भाटिया
प्रस्तुति:- सत्यनारायण पटेल
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टिप्पणी:-

अरुण यादव:-
कथाकारों  के लिए अत्यंत उपयोगी लेख। शुक्रिया सत्य भाई। रहा कहानी का सवाल तो कहानी के कछ हिस्से बहुत दिलचस्प चुस्त भाषा में रचे गए हैं, जो कहानीपन  का आस्वाद कराते हैं। लेकिन समग्र रूप में देखें तो कहानी अपनी लय और गति को  बनाए रखने में कामयाब नहीं हो सकी। कहानी कहने की कला को यदि नजर अंदाज कर दिया जाय तो व्यक्तिगत रूप से मुझे इस तरह के उत्तेजक विमर्श/बहसें बेहद पसंद हैं।

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