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सत्यनारायण पटेल हमारे समय के चर्चित कथाकार हैं जो गहरी नज़र से युगीन विडंबनाओं की पड़ताल करते हुए पाठक से समय में हस्तक्षेप करने की अपील करते हैं। प्रेमचंद-रेणु की परंपरा के सुयोग्य उत्तराधिकारी के रूप में वे ग्रामांचल के दुख-दर्द, सपनों और महत्वाकांक्षाओं के रग-रेशे को भलीभांति पहचानते हैं। भूमंडलीकरण की लहर पर सवार समय ने मूल्यों और प्राथमिकताओं में भरपूर परिवर्तन करते हुए व्यक्ति को जिस अनुपात में स्वार्थांध और असंवेदनशील बनाया है, उसी अनुपात में सत्यनारायण पटेल कथा-ज़मीन पर अधिक से अधिक जुझारु और संघर्षशील होते गए हैं। कहने को 'गांव भीतर गांव' उनका पहला उपन्यास है, लेकिन दलित महिला झब्बू के जरिए जिस गंभीरता और निरासक्त आवेग के साथ उन्होंने व्यक्ति और समाज के पतन और उत्थान की क्रमिक कथा कही है, वह एक साथ राजनीति और व्यवस्था के विघटनशील चरित्र को कठघरे में खींच लाते हैं। : रोहिणी अग्रवाल

व्यंग्य : अतिथि! तुम कब जाओगे : शरद जोशी

अतिथि! तुम कब जाओगे

तुम्हारे आने के चौथे दिन, बार-बार यह प्रश्न मेरे मन में उमड़ रहा है, तुम कब जाओगे अतिथि! तुम कब घर से निकलोगे मेरे मेहमान!

तुम जिस सोफे पर टाँगें पसारे बैठे हो, उसके ठीक सामने एक कैलेंडर लगा है जिसकी फड़फड़ाती तारीखें मैं तुम्हें रोज दिखा कर बदल रहा हूँ। यह मेहमाननवाजी का चौथा दिन है, मगर तुम्हारे जाने की कोई संभावना नजर नहीं आती। लाखों मील लंबी यात्रा कर एस्ट्रॉनॉट्स भी चाँद पर इतने नहीं रुके जितने तुम रुके। उन्होने भी चाँद की इतनी मिट्टी नहीं खोदी जितनी तुम मेरी खोद चुके हो। क्या तुम्हें अपना घर याद नहीं आता? क्या तुम्हें तुम्हारी मिट्टी नहीं पुकारती?

जिस दिन तुम आए थे, कहीं अंदर ही अंदर मेरा बटुआ काँप उठा था। फिर भी मैं मुस्कराता हुआ उठा और तुम्हारे गले मिला। मेरी पत्नी ने तुम्हें सादर नमस्ते की। तुम्हारी शान में ओ मेहमान, हमने दोपहर के भोजन को लंच में बदला और रात के खाने को डिनर में। हमने तुम्हारे लिए सलाद कटवाया, रायता बनवाया और मिठाइयाँ मँगवाईं। इस उम्मीद में कि दूसरे दिन शानदार मेहमाननवाजी की छाप लिए तुम रेल के डिब्बे में बैठ जाओगे। मगर, आज चौथा दिन है और तुम यहीं हो। कल रात हमने खिचड़ी बनाई, फिर भी तुम यहीं हो। आज हम उपवास करेंगे और तुम यहीं हो। तुम्हारी उपस्थिति यूँ रबर की तरह खिंचेगी, हमने कभी सोचा न था।

सुबह तुम आए और बोले, "लॉन्ड्री को कपड़े देने हैं।" मतलब? मतलब यह कि जब तक कपड़े धुल कर नहीं आएँगे, तुम नहीं जाओगे? यह चोट मार्मिक थी, यह आघात अप्रत्याशित था। मैंने पहली बार जाना कि अतिथि केवल देवता नहीं होता। वह मनुष्य और कई बार राक्षस भी हो सकता है। यह देख मेरी पत्नी की आँखें बड़ी-बड़ी हो गईं। तुम शायद नहीं जानते कि पत्नी की आँखें जब बड़ी-बड़ी होती हैं, मेरा दिल छोटा-छोटा होने लगता है।

कपड़े धुल कर आ गए और तुम यहीं हो। पलंग की चादर दो बार बदली जा चुकी और तुम यहीं हो। अब इस कमरे के आकाश में ठहाकों के रंगीन गुब्बारे नहीं उड़ते। शब्दों का लेन-देन मिट गया। अब करने को को चर्चा नहीं रही। परिवार, बच्चे, नौकरी, राजनीति, रिश्तेदारी, पुराने दोस्त, फिल्म, साहित्य। यहाँ तक कि आँख मार-मार कर हमने पुरानी प्रेमिकाओं का भी जिक्र कर लिया। सारे विषय खत्म हो गए। तुम्हारे प्रति मेरी प्रेमभावना गाली में बदल रही है। मैं समझ नहीं पा रहा हूँ कि तुम कौन सा फेविकॉल लगा कर मेरे घर में आए हो?

पत्नी पूछती है, "कब तक रहेंगे ये?" जवाब में मैं कंधे उचका देता हूँ। जब वह प्रश्न पूछती है, मैं उत्तर नहीं दे पाता। जब मैं पूछता हूँ, वो चुप रह जाती है। तुम्हारा बिस्तर कब गोल होगा अतिथि?

मैं जानता हूँ कि तुम्हें मेरे घर में अच्छा लग रहा है। सबको दूसरों के घर में अच्छा लगता है। यदि लोगों का बस चलता तो वे किसी और के घर में रहते। किसी दूसरे की पत्नी से विवाह करते। मगर घर को सुंदर और होम को स्वीट होम इसीलिए कहा गया है कि मेहमान अपने घर वापिस लौट जाएँ।

मेरी रातों को अपने खर्राटों से गुँजाने के बाद अब चले जाओ मेरे दोस्त! देखो, शराफत की भी एक सीमा होती है और गेट आउट भी एक वाक्य है जो बोला जा सकता है।

कल का सूरज तुम्हारे आगमन का चौथा सूरज होगा। और वह मेरी सहनशीलता की अंतिम सुबह होगी। उसके बाद मैं लड़खड़ा जाऊँगा। यह सच है कि अतिथि होने के नाते तुम देवता हो, मगर मैं भी आखिर मनुष्य हूँ। एक मनुष्य ज्यादा दिनों देवता के साथ नहीं रह सकता। देवता का काम है कि वह दर्शन दे और लौट जाए। तुम लौट जाओ अतिथि। इसके पूर्व कि मैं अपनी वाली पर उतरूँ, तुम लौट जाओ।

उफ! तुम कब जाओगे, अतिथि!

000 शरद जोशी
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टिप्पणियाँ:-

फ़रहत अली खान:-
अरे वाह। इतना अच्छे व्यंग्य तो बहुत कम ही पढ़ने को मिलते हैं। इस पर आधारित फ़िल्म तो नहीं देखी लेकिन नाम बहुत सुना था।
ढीठ मेहमान के चिपकू-पन से आजिज़ एक मेज़बान की बे-बसी और ग़ुस्से को ज़ाहिर करने के लिए जो जुमले इस्तेमाल किए गए, वो इस व्यंग्य की ख़ासियत हैं। जोशी जी का जवाब नहीं है।

मेरे लिए व्यंग्य की दुनिया बहुत बड़ी नहीं है; व्यंग्यकार के तौर पर अभी तक इब्न-ए-इंशा(जो कि एक मशहूर शायर भी थे), परसाई, पतरस बुख़ारी, मुश्ताक़ अहमद यूसुफ़ी, शरद जोशी जैसे गिनती के व्यंग्यकारों को ही पढ़ा/सुना(ऑडियो फॉर्मेट में 'मख़्दूम मोहिउद्दीन' की जानदार आवाज़ में) है; और मुझे पता है कि अभी अच्छे व्यंग्यकारों की फ़ेहरिस्त बहुत लंबी है। उम्मीद है कि आगे और भी अच्छे व्यंग्य और व्यंग्यकारों को पढ़ सकूँगा।

नंदकिशोर बर्वे :-
श्रद्धेय शरद जोशी की यही विशेषता उन्हें इस मकाम तक ले जा सकी जहाँ साधारण से साधारण विषय भी रोचक होने के साथ ही मारक हो जाता है। व्यंग्य तो बढिया है ही इससे प्रेरित फिल्म के साथ भी निर्देशक ने पूरा न्याय किया है। उस पर परेश रावल का बेहतरीन अभिनय। क्या टीम है!

गरिमा श्रीवास्तव:-
सच है इस फ़िल्म में कोंकणा सेन शर्मा और अजय देवगन का पति- पत्नी और परेश रावल का अतिथि के रूप में अभिनय मर्मस्पर्शी है।भारतीय निम्न मध्यवर्गीय व्यक्ति मध्यवर्ग और फिर उच्च वर्ग में शामिल होने के सपनों को सच करने के लिए दिलोजान लगा देता है।एक ऐसा कोई भी अतिथि पूरी पारिवारिक अर्थव्यवस्था को चौपट कर देता है।जितना आडम्बर युक्त जीवन हम जीते हैं वैसे वैसे सहज संवेदनाओं का अभाव होने लगता है।गाँव जवार ,कोई पुरानी स्मृति बोझिल लगती है।धीरे धीरे किसी का आना हमारे समय ,धन और स्पेस की बर्बादी में तब्दील हो जाता है।ये पूंजीवाद के प्रभाव हैं जिनसे अब बचना मुमकिन नहीं।व्यंगकार समाज की यथा स्थिति की ओर इशारा करता है ,थोड़ा प्रकाश डालता है जिसके आलोक में हम अपने आप को देख सकें।पुरानी परम्पराएँ सब विस्मृत होती जा रही हैं क्योंकि पूँजी महत्वपूर्ण है सम्बन्ध नहीं।पहले परिवारों में दूर दराज के सम्बन्धियों ,मित्रों के लिए भी जगह बना ली जाती थी।अब कहीं जाने आने से पहले हम कई बार सोचते हैं।सम्बन्धियों से फोन पर ही ज़्यादा बातचीत हो जाये तो अच्छा।ऐसे में अतिथि को पुरानी मान्यताओं के प्रतीक के रूप में देखा जाना चाहिए और छोटे परिवार को आधुनिक सभ्यता के नए चेहरे के रूप में।

प्रज्ञा :-
बहुत खूब गरिमा जी। दोनों को कन्ट्रास्ट में रखकर दर्शक सहजता से वहां पहुंच जाता है जहाँ आज दरअसल वह नहीं है। यही खूबी भी है। यही कन्ट्रास्ट आज के जीवन की रिक्तता को सामने ले आता है।

मनीषा जैन :-
बहुत सही टिप्पणी गरिमा जी की और फरहत जी की।
आज हम जीवन अपने लिए जीते हैं। यदि घर में कोई मेहमान तीन चार दिन के लिए आ जाए तो हमारा सारा रूटीन उलटपुलट हो जाता है। अभी मैने इसका अनुभव किया । अभी मैं तीन दिन के लिए अपनी भाभी के पास गयी। मैंने स्वयं यह महसूस किया कि मेरे कारण उनका सारा रूटीन गडबड़ा गया।
गरिमा जी के शब्ट एकदम ठीक हैं कि अतिथि पुरानी मान्यताओ का प्रतीक हो जायेगा। और बस जब मिलने का मन होगा तो फोन पर बात करने भर के रिश्ते रह जायेंगे।

गरिमा श्रीवास्तव:-
शुक्रिया प्रज्ञाजी,मनीषा जी ,रेनुका जी और रूपा जी।हम सब इतने व्यस्त हैं अपने आप में सिमटे हुए कि मन ही मन डरते हैं कि कोई घर न आ जाये।उसे समय और सुविधा दोनों देनी पड़ेगी।घर में दंपत्ति एक दूसरे का मुंह देखते देखते डिप्रेशन का शिकार भले हो जाएँ तीसरी हवा के आते ही बेचैनी शुरू हो जाती है कि अतिथि कब जायेगा।अतिथि की कोई जगह हमारे पास नहीं बची है।नतीजा ये है कि हम गेस्ट हॉउस में रहना ज़्यादा पसंद करते हैं ,यूरोप में मैंने देखा कि किसी से मिलने बात करने के लिए कॉफी हॉउस सबसे माकूल जगह है।जहाँ दोनों  पक्ष  या तीनों पक्ष  अपने बेहतरीन परिधान अपनी बेहतरीन भाषा बेहतरीन मैंनेरिज़्म के साथ कुछ घंटों के लिए मिलते हैं।जहाँ परिवारजनों की कोई भूमिका नहीं , जहाँ भावनाओं और आवेगों के उच्छल आवेगों पर बाहरी परिवेश का अयाचित नियंत्रण है।जहाँ लोग अपनी -अपनी कॉफी का दाम चुकाकर अपनी राह लेते हैं।वहां अतिथि के बिस्तर, भोजन और अन्य सुविधाओं का प्रबंध करने की तवालत नहीं। सोचें ज़रा क्या हम सब उसी ओर नहीं बढ़ रहे।समूह के सम्माननीय सदस्य इस सन्दर्भ में निजी अनुभव रखें तो हम सबको दिशा निर्देश मिलेगा

कीर्ति राणा:-
व्यंग्य के महान हस्ताक्षर शरदजी को सुनना भी यादगार रहा....वे कितनी मासूमियत और सहजता से अपना व्यंग्यमंचों से पढ़ते थे पूरा हॉल हंसते हंसते बेहाल होता रहता और वे उस पल बस कुछ पल मौन रहते और फिर पढ़ने लग जाते.... श्रोता/दर्शक की इसी "हंसी तारीफ" से वे निरलिप्त रहते हुए आगे पढते जाते थे। 
इस व्यंग्य पर बनी फिल्म में जो अतिथि आधे से अधिक फिल्म में बोझ लगता है वही अंत  से कुछ पहले से पूरे घर का प्रिय हो जाता है...ऐसे सारे दृश्य में गणपति की बिदाई जोड़कर खूब अच्छे दृश्य पेश किए है....परेश रावल के साथ ही अजय देवगन का अभिनय बहुत अच्छा है।

फ़रहत अली खान:-
ठीक है रेनुका जी, ज़रूर। कीर्ति जी, बर्वे जी और बाक़ी साथियों ने इतनी तारीफ़ की है फ़िल्म की तो अब देखनी ही पड़ेगी।

बधाई मनीषा जी, आज का व्यंग्य बहुत अच्छा चुनाव साबित हुआ।

गरिमा जी ने कितनी अच्छी व्याख्या की आधुनिक मेहमान-नवाज़ी की। अगर व्यंग्यात्मक लहजे में कहा जाए तो बाल की खाल सफ़लता-पूर्वक निकाल दी। निजी अनुभव क्या बताएँ; कहीं रिश्तेदारियों में ज़्यादा आना-जाना और मेल-जोल बढ़ जाता है तो मन-मुटाव और रुस्वाई का डर पहले सताने लगता है।
उर्दू के महान शायर अमीर मिनाई (1829-1900) का एक उम्दा शेर सारी कहानी कह देता है:

गाहे-गाहे की मुलाक़ात ही अच्छी है 'अमीर'
क़द्र खो देता है हर रोज़ का आना-जाना
(गाहे-गाहे - कभी-कभी)
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