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सत्यनारायण पटेल हमारे समय के चर्चित कथाकार हैं जो गहरी नज़र से युगीन विडंबनाओं की पड़ताल करते हुए पाठक से समय में हस्तक्षेप करने की अपील करते हैं। प्रेमचंद-रेणु की परंपरा के सुयोग्य उत्तराधिकारी के रूप में वे ग्रामांचल के दुख-दर्द, सपनों और महत्वाकांक्षाओं के रग-रेशे को भलीभांति पहचानते हैं। भूमंडलीकरण की लहर पर सवार समय ने मूल्यों और प्राथमिकताओं में भरपूर परिवर्तन करते हुए व्यक्ति को जिस अनुपात में स्वार्थांध और असंवेदनशील बनाया है, उसी अनुपात में सत्यनारायण पटेल कथा-ज़मीन पर अधिक से अधिक जुझारु और संघर्षशील होते गए हैं। कहने को 'गांव भीतर गांव' उनका पहला उपन्यास है, लेकिन दलित महिला झब्बू के जरिए जिस गंभीरता और निरासक्त आवेग के साथ उन्होंने व्यक्ति और समाज के पतन और उत्थान की क्रमिक कथा कही है, वह एक साथ राजनीति और व्यवस्था के विघटनशील चरित्र को कठघरे में खींच लाते हैं। : रोहिणी अग्रवाल

विचार विमर्श

पिछले सवा-डेढ़ साल में साहित्य- कला से जुड़े संस्थानों , अकादमियों, कला परिषदों आदि में पदों और नियम-कायदों से लेकर तमाम तरह के बदलाव किए जा रहे हैं.....इन बदलावों से कई बहसें जन्मी और कई प्रश्न भी खड़े हुए हैं....आइए आज इसी विषय पर एक-दूसरे के विचार जानते हैं........आप इन बदलाओं को किस तरह देखते समझते हैं ? खुलकर अपनी बात रखें
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जिस संस्थान का नेतृत्व कला साहित्य संस्कृति के महान हस्तियों ने किया उसपर संदेहास्पद प्रतिभा के व्यक्ति को स्थापित करने के खिलाफ छात्रों का विरोध 100 दिन पूरा करने वाला है और एक छोटे तबके को छोड़ बाकी जगहों पर एक बीभत्स चुप्पी व्याप्त दीखती है।  तीन मूर्ति के निदेशक को परसों त्यागपत्र देने की परिस्थिति बना दी गयी। एक सप्ताह पहले ही उनके काम की तारीफ उसी संस्थान के सर्वोच्च समिति ने की थी। अब वहाँ सत्ता की विचारधारा को मानने वाले किसी कठपुतली को पदासीन करने की तैयारी है। इससे पहले Indian council of historical research के मुखिया के पद से लेकर national book trust के निदेशक के पद पर योग्य लोगो की जगह सांप्रदायिक संगठन से ताल्लुक रखने वाले लोगों को बिठा दिया गया है। उदाहरणों की एक लंबी फेहरिस्त है।

संक्षेप में देश की तमाम विचार, साहित्य, संस्कृति आदि की महत्वपूर्ण संस्थाओँ में संकीर्ण विचार वाले राजनैतिक लोगों को योजनाबद्ध तरीके से स्थापित किया जा रहा है। विरोध के स्वर को समाप्त करने की हिंसक शुरुआत भी इसमें शामिल है। नरेंद्र धबोलकर और  गोविन्द पनसरे के बाद प्रो. कलबुरगि की हत्या किसी भी तार्किक विचार को समाप्त कर देने की खौफनाक प्रवृत्ति का ऐलान है।

क्या यह किसी भी सत्तासीन दल का विशेषाधिकार है या यह देश की मज़बूत जनतांत्रिक प्रक्रिया पर चौतरफा हमला? ऐसे में परिवर्तन कामी और जनतांत्रिक विचार वाले साहित्य, संस्कृति, शिक्षा आदि से जुड़े लोगों का क्या दायित्व है?
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टिप्पणियाँ:-

कीर्ति राणा: सत्तू भाई...आप देख रहे होंगे कि जिस आंदोलन को सौ दिन हो गए हैं....वह न्यूज चैनलों से गायब जैसा है। 
अपने इंदौर में ही सर्वधर्म समभाव नामक संस्था मंदिर में ईद, मस्जिद में दीवाली जैसे आयोजन करती है।
इस संस्था ने गीताभवन में क्रिसमस का आयोजन किया, इस संस्था के प्रमख हैं आनंद मोहन माथुर। 
इस आयोजन को धर्म परिवर्तन का आरोप लगाकर बखेड़ा खड़ा किया गया। 
पुलिस प्रशासन ने भीमएक तरफा कार्रवाई ही की। 
तो अब ऐसी सारी आवाज नक्कारखाने में तूती के समान है।

1 टिप्पणी:

  1. नए लोग एक विचारधारा से सम्बद्ध है और पुराने लोग पुरानी सत्ता के गलियारों की जी हुज़ूरी की बदौलत जहाँ हैं वहाँ पहुँचे है। नए अयोग्य हैं इसका कोई सबूत नहीं और पुराने योग्य हैं इसका भी कोई सबूत नहीं। सबूत मात्र इस बात का है कि पुरानों को स्थान-च्युत होने की बिलबिलाहट बहुत है। नए लोगों को विचारधारा स्थापित करने की जल्दी बहुत है जबकि लोगों ने वोट एक योग्य प्रशासक को दिया था। वह वोट विचारधारा का समर्थन नहीं था यह बात नए स्वीकारने को तैयार नहीं। सत्ता बदल गयी है यह बात पुराने स्वीकार करने को तैयार नहीं। नयों की बजाय पुरानो में दुर्भावना ज्यादा झलक रही है इसलिय सामान्य जन चुप है। यहाँ देश की जनतांत्रिक व्यवस्था पर हमले की कोई बात नहीं है।
    जहाँ तक पूना छात्र आंदोलन का प्रश्न है तो गजेन्द्र चौहान उन्हें काम दिल सकने की क्षमता नहीं रखते इसलिए उनका विरोध जायज है।

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