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सत्यनारायण पटेल हमारे समय के चर्चित कथाकार हैं जो गहरी नज़र से युगीन विडंबनाओं की पड़ताल करते हुए पाठक से समय में हस्तक्षेप करने की अपील करते हैं। प्रेमचंद-रेणु की परंपरा के सुयोग्य उत्तराधिकारी के रूप में वे ग्रामांचल के दुख-दर्द, सपनों और महत्वाकांक्षाओं के रग-रेशे को भलीभांति पहचानते हैं। भूमंडलीकरण की लहर पर सवार समय ने मूल्यों और प्राथमिकताओं में भरपूर परिवर्तन करते हुए व्यक्ति को जिस अनुपात में स्वार्थांध और असंवेदनशील बनाया है, उसी अनुपात में सत्यनारायण पटेल कथा-ज़मीन पर अधिक से अधिक जुझारु और संघर्षशील होते गए हैं। कहने को 'गांव भीतर गांव' उनका पहला उपन्यास है, लेकिन दलित महिला झब्बू के जरिए जिस गंभीरता और निरासक्त आवेग के साथ उन्होंने व्यक्ति और समाज के पतन और उत्थान की क्रमिक कथा कही है, वह एक साथ राजनीति और व्यवस्था के विघटनशील चरित्र को कठघरे में खींच लाते हैं। : रोहिणी अग्रवाल

ग़ज़ल : कैफ़ी आज़मी

उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ में जन्मे पदमश्री तथा दिल्ली, उत्तर प्रदेश व महाराष्ट्र के उर्दू अकादमी अवार्ड से सम्मानित कैफ़ी आज़मी(1918-2002)  बेहतरीन शायर थे। इन्होंने कई मशहूर फ़िल्मी गीत भी लिखे, सो ज़्यादातर लोग इन्हें जानते ही होंगे। आज पेश हैं इनकी तीन ग़ज़लें और एक नज़्म(पूर्ण/आंशिक)। पढ़कर साथी इन पर कुछ कहें:

1.
इतना तो ज़िन्दगी में किसी के ख़लल पड़े
हँसने से हो सुकून न रोने से कल पड़े
(कल - आराम)

जिस तरह हँस रहा हूँ मैं पी-पी के गर्म अश्क
यूँ दूसरा हँसे तो कलेजा निकल पड़े
(अश्क - आँसू)

इक तुम कि तुम को फ़िक्र-ए-नशेब-ओ-फ़राज़ है
इक हम कि चल पड़े तो बहर-हाल चल पड़े
(फ़िक्र-ए-नशेब-ओ-फ़राज़ - ऊँच-नीच का डर; बहर-हाल - हर हाल में)

मुद्दत के बाद उस ने जो की लुत्फ़ की निगाह
जी ख़ुश तो हो गया मगर आँसू निकल पड़े
(लुत्फ़ - मुहब्बत)

2.
आज सोचा तो आँसू भर आए
मुद्दतें  हो  गयीं  मुस्कुराए

हर क़दम पर उधर मुड़ के देखा
उनकी महफ़िल से हम उठ तो आए

रह गयी ज़िन्दगी दर्द बन के
दर्द दिल में छुपाए छुपाए

दिल की नाज़ुक रगें टूटती हैं
याद इतना भी कोई न आए

3.
क्या जाने किस की प्यास बुझाने किधर गयीं
इस सिर पे झूम के जो घटाएँ गुज़र गयीं

दीवाना पूछता है ये लहरों से बार-बार
कुछ बस्तियाँ यहाँ थीं बताओ किधर गयीं

अब जिस तरफ़ से चाहे गुज़र जाए कारवाँ
वीरानियाँ तो सब मेरे दिल में उतर गयीं
(कारवाँ - लोगों का जत्था)

पाया भी उनको, खो भी दिया, चुप भी हो रहे
इक मुख़्तसर सी रात में सदियाँ गुज़र गयीं
(मुख़्तसर - छोटी)

4. नज़्म: 'औरत'

उठ मेरी जान मेरे साथ ही चलना है तुझे

तू कि बे-जान खिलौनों से बहल जाती है
तपती साँसों की हरारत से पिघल जाती है
पाँव जिस राह में रखती है फिसल जाती है
बन के सीमाब हर इक ज़र्फ़ में ढल जाती है
ज़ीस्त के आहनी साँचे में भी ढलना है तुझे
उठ मेरी जान मेरे साथ ही चलना है तुझे
 
ग़ोशे-ग़ोशे में सुलगती है चिता तेरे लिए
फ़र्ज़ का भेस बदलती है क़ज़ा तेरे लिए
क़हर है तेरी हर इक नर्म अदा तेरे लिए
ज़हर ही ज़हर है दुनिया की हवा तेरे लिए
रुत बदल डाल अगर फूलना-फलना है तुझे
उठ मेरी जान मेरे साथ ही चलना है तुझे

(हरारत - ताप; सीमाब - पारा; ज़र्फ़ - धारिता/साँचा; ज़ीस्त - ज़िन्दगी; आहनी - कठोर; ग़ोशा - कोना; क़ज़ा - मौत)

⭕प्रस्तुति - फरहत खान
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टिप्पणी:-

प्रज्ञा :-
वाह फरहत जी। कैफ़ी को सुबह सुबह पढ़ना आपके सौजन्य से। आभार। एक टीस,एक खलल एक उबाल। पहली तो बहुत ही ज़्यादा पसन्द आई। शेष पढ़ी होकर भी पढ़ी जाने लायक। शुक्रिया मनीषा जी

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