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सत्यनारायण पटेल हमारे समय के चर्चित कथाकार हैं जो गहरी नज़र से युगीन विडंबनाओं की पड़ताल करते हुए पाठक से समय में हस्तक्षेप करने की अपील करते हैं। प्रेमचंद-रेणु की परंपरा के सुयोग्य उत्तराधिकारी के रूप में वे ग्रामांचल के दुख-दर्द, सपनों और महत्वाकांक्षाओं के रग-रेशे को भलीभांति पहचानते हैं। भूमंडलीकरण की लहर पर सवार समय ने मूल्यों और प्राथमिकताओं में भरपूर परिवर्तन करते हुए व्यक्ति को जिस अनुपात में स्वार्थांध और असंवेदनशील बनाया है, उसी अनुपात में सत्यनारायण पटेल कथा-ज़मीन पर अधिक से अधिक जुझारु और संघर्षशील होते गए हैं। कहने को 'गांव भीतर गांव' उनका पहला उपन्यास है, लेकिन दलित महिला झब्बू के जरिए जिस गंभीरता और निरासक्त आवेग के साथ उन्होंने व्यक्ति और समाज के पतन और उत्थान की क्रमिक कथा कही है, वह एक साथ राजनीति और व्यवस्था के विघटनशील चरित्र को कठघरे में खींच लाते हैं। : रोहिणी अग्रवाल

लोक कथाएं और खलील जिब्रान की तीन छोटी कहानियाँ

आज पढ़ते हैं पहले छोटी दो लोक कथाएं फिर खलील जिब्रान की तीन छोटी कहानियाँ । और पढ़ कर  अपने मन में उठे भावों से अवगत करायें।

१. गरीब (मालवी लोक कथा)

काली, अंधेरी रात । तेज, मूसलाधर बारिश । ऐसी कि रूकने का नाम ही नहीं ले रही । मानो सारे के सारे बादल आज ही रीत जाने पर तुले हों । पांच झोंपडियों वाले 'फलीए' की, टेकरी के शिखर पर बनी एक झोंपडी । झोंपडी में आदिवासी दम्‍पति । सोना तो दूर रहा, सोने की कोई भी कोशिश कामयाब नहीं हो रही । झोंपडी के तिनके-तिनके से पानी टपक रहा । बचाव का न तो कोई साधन और न ही कोई रास्‍ता । ले-दे कर एक चटाई । अन्‍तत: दोनों ने चटाई ओढ ली । पानी से बचाव हुआ या नहीं लेकिन दोनों को सन्‍तोष हुआ कि उन्‍होंने बचाव का कोई उपाय तो किया ।चटाई ओढे कुछ ही क्षण हुए कि आदिवासी की पत्‍नी असहज हो गई । पति ने कारण जानना चाहा । पत्‍नी बोली तो मानो चिन्‍ताओं का हिमालय शब्‍दों में उतर आया । उसने कहा - 'हमने तो चटाई ओढ कर बरसात से बचाव कर लिया लेकिन बेचारे गरीब लोग क्‍या करेंगे ?'

२.  भोजपुरी लोककथा-  प्रेम न जाने जाति कुजाति

बहुत समय पहले की बात है । एक बार राजा विक्रमादित्य को किसी कारणबस अपना राज्य छोड़ना पड़ा। घूमते-घूमते वे एक दूसरे राज्य हौलापुर में आ गए । विक्रमादित्य को पता चला कि हौलापुर का राजा प्रतिदिन रात को अपने शयनकक्ष के द्वार पर एक नया पहरेदार नियुक्त करता है और सुबह उस पहरेदार को राजदरबार में बुलाकर एक प्रश्न पूछता है । उत्तर न दे पाने के कारण उस पहरेदार को फाँसी की सजा हो जाती है । इसप्रकार शयनकक्ष पर पहरा देनेवाला कोई पहरेदार जीवित नहीं बचता है क्योंकि कोई भी उत्तर नहीं दे पाता है । 
राजा विक्रमादित्य को बड़ा आश्चर्य हुआ । उन्होंने हौलापुर के राजा से अनुनय की कि वह उन्हें अपने शयनकक्ष का पहरेदार नियुक्त कर लें । राजा तैयार हो गया और विक्रमादित्य शयनकक्ष की पहरेदारी करने लगे । आधी रात को विक्रमादित्य ने राजा को अपने शयनकक्ष से निकलते देखा । विक्रमादित्य भी चुपके-चुपके राजा का पीछा करने लगे । राजा छिप-छिपकर श्मशान-घाट पहुँचा जहाँ पहले से ही डोम की पुत्री बेसब्री से राजा की प्रतीक्षा कर रही थी । राजा वहीं रखी एक टूटी खाट पर बैठकर डोम की पुत्री से प्रेम भरी बातें करने लगा । कुछ समय बाद राजा बोला कि भूख लगी है । डोम की पुत्री ने कहा कि अभी खाने के लिए मेरे पास शवों पर चढ़ाए गए मिठाई-बतासे आदि हैं । राजा ने मिठाई-बतासे आदि खाकर उसी टूटी खाट पर सो गया । भिनसारे (लगभग रात के चार बजे) राजा उठा और राजमहल में आ गया । राजा से पहले ही विक्रमादित्य भी राजमहल पहुँचकर शयनकक्ष की पहरेदारी शुरु कर दिए थे।
जब राजदरबार लगा तो राजा ने शयनकक्ष के पहरेदार (विक्रमादित्य) को बुलाया और कहा, "कहो सिपाही रात की बात ।" 
इसपर विक्रमादित्य ने कहा, महाराज संकेत के रूप में कहता हूँ ताकि राजदरबार और आपकी गरिमा बनी रहे । इसके बाद विक्रमादित्य ने कहा,
"भूख न जाने जूठी भात, नींद न जाने टूटी खाट, और प्रेम न जाने, जाति कुजाति ।"
विक्रमादित्य के इस उत्तर से राजा बहुत प्रभावित हुआ और राजपाठ त्यागकर तपस्या करने वन में चला गया । 

⭕खलील जिब्रान
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चतुर कुत्ता
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एक चतुर कुत्ता एक दिन बिल्लियों के एक झुण्ड के पास से गुज़रा.कुछ और निकट जाने पर उसने देखा कि वे कोई योजना बना रही थीं और उसकी ओर से लापरवाह थीं. वह रुक गया.उसने देखा कि झुंड के बीच से एक दीर्घकाय, गंभीर बिल्ला खड़ा हुआ था. उसने उन सब पर नज़र डाली और बोला, “भाइयो! दुआ करो. बार-बार दुआ करो. यक़ीन मानो, दुआ करोगे तो चूहों की बारिश ज़रूर होगी.”यह सुनकर कुत्ता मन-ही-मन हंसा.“अरे अंधे और बेवकूफ़ बिल्लो! शास्त्रों में क्या यह नहीं लिखा है और क्या मैं, और मुझसे भी पहले मेरा बाप, यह नहीं जानता था कि दुआ के, आस्था के और समर्पण के बदले चूहों की नहीं; हड्डियों की बारिश होती है.” यह कहते हुए वह पलट पड़ा.

अंधेर नगरी
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राजमहल में एक रात भोज दिया गया.एक आदमी वहां आया और राजा के आगे दंडवत लेट गया. सब लोग उसे देखने लगे. उन्होंने पाया कि उसकी एक आंख निकली हुई थी और खखोड़ से खून बह रहा था.राजा ने उससे पूछा, “तुम्हारा यह हाल कैसे हुआ?”आदमी ने कहा, “महाराज! पेशे से मैं एक चोर हूं. अमावस्या होने की वजह से आज रात मैं धनी को लूटने उसकी दुकान पर गया. खिड़की के रास्ते अंदर जाते हुए मुझसे ग़लती हो गई और मैं जुलाहे की दुकान में घुस गया. अंधेरे में मैं उसके करघे से टकरा गया और मेरी आंख बाहर आ गई. अब, हे महाराज! उस जुलाहे से मुझे न्याय दिवलाइए.”राजा ने जुलाहे को बुलवाया. वह आया. निर्णय सुनाया गया कि उसकी एक आंख निकाल ली जाए.“महाराज!” जुलाहे ने कहा, “आपने उचित न्याय सुनाया है. वाकई मेरी एक आंख निकाल ली जानी चाहिए. किंतु मुझे दुःख के साथ कहना पड़ रहा है कि कपड़ा बुनते हुए दोनों ओर देखना पड़ता है इसलिए मुझे दोनों ही आंखों की ज़रूरत है. लेकिन मेरे पड़ोस में एक मोची रहता है, उसके भी दो ही आंखें हैं. उसके पेशे में दो आंखों की ज़रूरत नहीं पड़ती है.”राजा ने तब मोची को बुलवालिया. वह आया. उन्होंने उसकी एक आंख निकाल ली.न्याय सम्पन्न हुआ.

लोमड़ी
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सूर्योदय के समय अपनी परछाईं देखकर लोमड़ी ने कहा, “आज लंच में मैं ऊंट को खाऊंगी.”सुबह का सारा समय उसने ऊंट की तलाश में गुजार दिया.फिर दोपहर को अपनी परछाईं देखकर उसने कहा,“एक चूहा ही काफी होगा.
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टिप्पणियाँ:-

निधि जैन :-
आदिवासी दंपत्ति सुपर्ब और आदर्श लघुकथा
भोजपुरी दन्त कथा ही रही
चतुर कुत्ता समझ नही आई
अंधेर नगरी में अंधेर ही मचा हुआ है
लोमड़ी आज के परिप्रेक्ष्य में बढ़िया रही जितना मिल सके उतना ही समेट लिया जाए बेहतर है

लघुकथाओं को पढने का आनंद ही कुछ और है

फिर उस पर राइटर भी जबरदस्त हो

अल्का सिगतिया:-
मालवी लोक कथा दिल को छू गई।सच हमारे  लोक साहित्य  और क्षेत्रीय  भाषाओं  के साहित्य। की। क्या। बात है।मुंबई में। Lit Fest में। गुलज़ार साब ने कहा  कि हमारा  क्षेत्रीय  साहित्य बहुत समृद्ध है,उनके। अधिक से अधिक अनुवाद पर ध्यान देना चाहिए।

सुवर्णा :-
अलका जी ने बिलकुल ठीक कहा लोककथाएँ हमारे क्षेत्रीय साहित्य की समृद्धता दर्शा रही हैं। खलील ज़िब्रान की लघुकथाएँ भी बढ़िया हैं। मनीषा जी बेहतरीन चयन के लिए बधाई।

प्रज्ञा :-
आज की शानदार प्रस्तुतियों के मनीषा जी का शुक्रिया। खलील जिब्रान की कथाएँ और मालवी भोजपुरी कथा। आज की बात निराली। बुद्धिमत्ता हास्य व्यंग्य उपदेश सभी सामायिक रंगों में निखरी सी मन को प्रभावित कर गयीं। लोक कथाएं तो मन के हिस्से में अपनी सुरक्षित जगह बना लेती हैं ।मनीषा जी आप बहुत मेहनती हैं झिझकते हुए एक अनुरोध है यदि माह में एक बार ये खाद पानी नसीब हो तो मन की पौध जीवित रहेगी।

रेणुका:-
Pehli Katha bahut achchi lagi...ek positive thinking darshaati hai.....yadi Hum humesha humse bhi buri paristhitiyon ka vichaar karein...to Hume apni paristhiti behtar lagegi..aur hum santushth rahenge..bahut badhiya !

शिशु पाल सिंह:-
सभी लघु कथाएं हमसे कुछ कहना चाहती हैं।वर्तमान परिस्तिथियों में कुछ रास्ता दिखाती हैं ।हम क्या सबक ले सकते है यह हम पर निर्भर है।

फ़रहत अली खान:-
मालवी लोक कथा दिल को छू गयी। लेने वाले(यानी अक़्लमंद लोग) इससे एक बहुत अहम सबक़ ले सकते हैं और वो ये कि दुनिया के मामले में हमेशा अपने से नीचे वाले को देखो और दीन के मामले में हमेशा अपने से ऊपर वाले को; ये संतुष्टि पाने का सबसे आसान और तर्क-संगत तरीक़ा है।
भोजपुरी लोक-कथा ठीक-ठाक से कुछ बेहतर लगी।
ख़लील जिब्रान की लघु-कथाएँ हमेशा ही गहरायी लिए हुए होती हैं और साथ ही रोचक भी। तीनों ही लघुकथाएँ बहुत उम्दा हैं, ख़ासतौर पर 'अंधेर नगरी'।
मनीषा जी को इतने अच्छे चयन के लिए बधाई।
प्रज्ञा जी ने जो अनुरोध किया है उसी की एक छाया प्रतिलिपि मेरी ओर से भी स्वीकार करें।

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