image

सत्यनारायण पटेल हमारे समय के चर्चित कथाकार हैं जो गहरी नज़र से युगीन विडंबनाओं की पड़ताल करते हुए पाठक से समय में हस्तक्षेप करने की अपील करते हैं। प्रेमचंद-रेणु की परंपरा के सुयोग्य उत्तराधिकारी के रूप में वे ग्रामांचल के दुख-दर्द, सपनों और महत्वाकांक्षाओं के रग-रेशे को भलीभांति पहचानते हैं। भूमंडलीकरण की लहर पर सवार समय ने मूल्यों और प्राथमिकताओं में भरपूर परिवर्तन करते हुए व्यक्ति को जिस अनुपात में स्वार्थांध और असंवेदनशील बनाया है, उसी अनुपात में सत्यनारायण पटेल कथा-ज़मीन पर अधिक से अधिक जुझारु और संघर्षशील होते गए हैं। कहने को 'गांव भीतर गांव' उनका पहला उपन्यास है, लेकिन दलित महिला झब्बू के जरिए जिस गंभीरता और निरासक्त आवेग के साथ उन्होंने व्यक्ति और समाज के पतन और उत्थान की क्रमिक कथा कही है, वह एक साथ राजनीति और व्यवस्था के विघटनशील चरित्र को कठघरे में खींच लाते हैं। : रोहिणी अग्रवाल

अलेक्सांद्र ब्लोक की कविताएँ

रूस के कवि अलेक्सांद्र ब्लोक की दो कविताएं दे रहे हैं अनुवाद किया है वरयाम सिंह जी ने।

1
घटित हो चुका है सब कुछ

घटित हो चुका है सब कुछ, सब कुछ
पूरा हो चुका है कालचक्र।
कौन-सी ताकत, कौन-सा झूठ
लौटाएगा तुम्‍हें, ओ मेरे अतीत ?

सुबह के स्‍वच्‍छ स्‍फटकीय क्षणों में
मास्‍को क्रेमलिन की दीवारों के पास
हृदय के आदि आह्लाद को
लौटा सकेगा क्‍या मुझे यह देश ?

या ईस्‍टर की रात में नेवा नदी के ऊपर
हवा, कुहरे और बर्फ में
अपनी बैसाखियों से कोई कंगाल बुढ़िया
हिलाने लगेगी मेरी लाश ?

या मेरे किसी बुग्‍याल में
बूढ़े पतझर की फड़फड़ाहट के नीचे
बरसात की धुंध में एक दिन
मेरा शरीर कोंचने लगेगी कोई युवा चील?

या यों ही चार दीवारों के बीच
दुख के आलोकहीन क्षणों में
किसी लोह अपरिहार्यता में
सो जाऊँगा मैं सफेद चादर पर ?

या उस नए अ‍परिचित जीवन में
भूल जाऊँगा अपने पहले के सपने
मुझे याद रहेगी यह बरसात
जिस तरह हमें याद है कालीता*।

निर्धन जीवन की यह थरथराहट
सारी की सारी यह अबूझ उमंग
और जो कुछ मुझे प्रिय रहा
छोड़ जाएगा अपनी छाप अमिट।

(कालीता : मास्को सम्राट इवानदानिलेविच - 1328-1341 - का उपनाम)
2
बर्फीली धुंध में काला कव्वा

बर्फीली धुंध में काला कव्‍वा
साँवले कंधों पर काली मखमल
एक थकी कोमल आवाज
दक्षिण की रातों के सुना रही है गीत।

मौज-मस्‍ती है तनावमुक्‍त हृदय में
समुद्र से जैसे कोई संकेत मिला हो
अथाह गह्वर के ऊपर से उड़ता
अनंत की ओर चल दिया घोड़ा एक।

बर्फीली हवा, तुम्‍हारी साँस,
मदोन्‍मत मेरे होठ...
वालेंतीना, वह तारा, वह सपना !
कितना अच्‍छा गाती है तुम्‍हारी कोयल।

डरावनी यह दुनिया तंग पड़ रही है तुम्‍हारे हृदय के लिए,
तुम्‍हारे चुंबनों का सन्निपात है उसमें,
जिप्‍सी गीतों का काला अंधकार है
और है पुच्‍छलतारों की तेज उड़ान।
��
परिचय

जन्म : 1880, पीटर्सबर्ग

भाषा : रूसी
विधाएँ : कविता
मुख्य कृतियाँ
कविता संग्रह : स्तिखी ओ प्रेक्रास्नोय, जेम्लया व स्नेगु, नोच्नीये चिसी,

----------------------------------
टिप्पणी:-
फ़रहत अली खान:-
सोचता हूँ कि अगर मैं एक रूसी होता तो क्या मैं ये कविताएँ समझ पाता? क्या कविताओं का अबूझ पहेली सा होना ज़रूरी है?
लगभग सब कुछ फ़िलहाल समझ से परे है।
बस पहली कविता का पहला स्टेन्ज़ा कुछ ग़नीमत नज़र आता है।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें