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सत्यनारायण पटेल हमारे समय के चर्चित कथाकार हैं जो गहरी नज़र से युगीन विडंबनाओं की पड़ताल करते हुए पाठक से समय में हस्तक्षेप करने की अपील करते हैं। प्रेमचंद-रेणु की परंपरा के सुयोग्य उत्तराधिकारी के रूप में वे ग्रामांचल के दुख-दर्द, सपनों और महत्वाकांक्षाओं के रग-रेशे को भलीभांति पहचानते हैं। भूमंडलीकरण की लहर पर सवार समय ने मूल्यों और प्राथमिकताओं में भरपूर परिवर्तन करते हुए व्यक्ति को जिस अनुपात में स्वार्थांध और असंवेदनशील बनाया है, उसी अनुपात में सत्यनारायण पटेल कथा-ज़मीन पर अधिक से अधिक जुझारु और संघर्षशील होते गए हैं। कहने को 'गांव भीतर गांव' उनका पहला उपन्यास है, लेकिन दलित महिला झब्बू के जरिए जिस गंभीरता और निरासक्त आवेग के साथ उन्होंने व्यक्ति और समाज के पतन और उत्थान की क्रमिक कथा कही है, वह एक साथ राजनीति और व्यवस्था के विघटनशील चरित्र को कठघरे में खींच लाते हैं। : रोहिणी अग्रवाल

कविता : वक्त के पन्ने : मनीषा जैन

वक्त के पन्ने

रख दिए हैं कुछ
वक्त के गीले पन्ने
सहेज कर मैंने
वो ख़त जो लिखे थे बहुत उदास होकर
सूखे पत्तों में भी कुछ नमी रहती ही है
उनमें अभी बाकी हैं एहसास
जो जिए थे मैंने 
तुमसे जुदा होकर
उसी गीली स्याही से लिखूंगी
वक्त के पन्ने फिर से
मेरी उम्मीदें अभी बाकी है
मेरे सपने अभी मरे नहीं है
जिस दिन मर गए सपने
कुछ बाकी नहीं होगा 
क्यों कि बहुत खतरनाक होता है 
सपनों का मर जाना
खंड-खंड बिखर जाना।

⭕ सच्चाई को स्वीकार क्यों नहीं करते तुम ?

तुम्हारे एक अद्द् चौबारे में
जब जब होती हैं
गंभीर राजनीतिक, सामाजिक गोष्ठियां
उन बेदर्द, बेखौफ संगठनों की
सीरिया या ईरान व ईराक के 
उन मानवता के विरोधी संगठनों की
क्या तुम्हारी छाती में कई विषैले फण उगते है
जब किसी बच्चे के हाथ में रोटी नहीं होती
जब वह अनाथ रोता है
रेगिस्तान में अकेला
अनाज सड़ता है धरती की छाती पर
औरते कोसो दूर पानी भरने चली जाती है
सिर पर इच्छाओं की मटकी उठायें
मुंह अंधेरे जब जाती हैं जंगल
डरी सहमी सी बैठती हैं जंगल
तब तो तुम अलगाव वदियों से सुलह कर रहे होते हो
या देश बांटने की मंत्रणा कर रहे होते हो

उन विषैले सांपों की मंत्रणा धाराशायी होती है
उस वक्त जब किसी जंगली आदिवासी के 
पानी पीने का बर्तन मिलता है रास्ते में
या किसी बच्चे की छोटी सी चप्पल टंगी मिलती है पेड़ पर
उसे अर्से पहले गायब कर दिया गया था

जब शांति वार्ताएं विफल होती है
तब ही अराजकता का बिगुल बजता है
गरीबों का बहता है लहू
रेड कारपेट बिछाया जाता है
तभी राष्ट्राध्यक्ष पानी पीते हैं 
कांच के गिलासों में 
जिसे बनाने में धमन भट्टी के मजदूर की
कितनी रातें स्वाहा हुई होगी
और कितनी रातें वह भूखा सोया होगा
कितने दिन वह अपने परिवार से दूर रहा होगा

एक ही झटके में गिर कर टूटता है गिलास
राष्ट्राध्यक्ष की चौखट पर 
नाक रगड़ते है बिचौलिए
जो इकट्ठा कर लाते हैं बाल मजदूरों को
गायब किए गये बच्चों को लगाते हैं काम पर
कहां पर ठहरता होगा उनका मन
और वे निरीह प्राणी 
मां बाप पत्थर के नीचे दबातेे है 
अपने सपने, अपने मन
जिनके बालक नापैद हो गए
उन बच्चों की मांए पछाड़ खा कर गिरती हैं
और राष्ट्राध्यक्ष के घर खनकते हैं
जाम पर जाम
रात गहरी होने पर वे सोने चले जाते हैं
मखमली बिस्तर में धंस जाते हैं वे

कल कौन से समझौते साइन करने 
कौन से है कपड़े पहनने हैं
और कौन से है सपने खरीदने
इसी लिए तो पैदा हुए हैं वे
बह रहा है समय ज्वालमुखी की नदी सा
पूजा अर्चना हो रहे है विफल
ऐसे में स्त्री का क्रदंन
दब कर रह जा रहा है 
जैसे राख में चूल्हे की 
ईश्वर स्वयं ही बजा रहा है घंटा
उसकी बात को कानों पर से टाल कर 
तुम बन जाते हो खुदा
तुम बन जाते हो साहिब
और नाराज हो जाते हो खुदा से
तुम्हारे नाराज होने से कुछ नहीं होता
क्योंकि खुदा है ही नहीं कहीं पर
इस सच्चाई को स्वीकार क्यों नहीं करते तुम? 

000 मनीषा जैन
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टिप्पणियाँ:-

विदुषी भरद्वाज:-
सपनों का मर जाना सचमुच बहुत खतरनाक होता है इसलिए बचे रहने चाहिएं  सपने और बनी रहनी चाहिए सपनों को साकार करने की कोशिश  दोनों कविताएं बहुत अच्छी.

फ़रहत अली खान:-
पहली कविता ठीक लगी; लेकिन मुझे लगता था कि इसे थोड़ा और बेहतर किया जा सकता है।
'कुछ बाक़ी नहीं होगा' की जगह 'कुछ बाक़ी नहीं रहेगा' होना चाहिए।

दूसरी कविता के फ़लसफ़े को मैं सिरे से ख़ारिज करता हूँ; एक अच्छे विषय को ग़लत फ़लसफ़े के साथ उठाने से कविता प्रभावहीन हो गयी है। कविता में कही गयी बातें आख़िर किस तरह ख़ुदा का न होना साबित करती हैं?
किसी के मानने-न मानने से ख़ुदा के वजूद पर कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता; वो तो हमेशा से है और हमेशा रहेगा; वो अकेला है और उसके अलावा जो कुछ भी है वो नश्वर है और उसी का बनाया हुआ है।

ख़ैर, बात लंबी है, लेकिन अपनी बात के समर्थन में तीन अशआर ज़रूर कहूँगा:

1.
हर ज़र्रा चमकता है अनवार-ए-इलाही से
हर साँस ये कहती है, 'हम हैं तो ख़ुदा भी है'

(ज़र्रा - कण; अनवार-ए-इलाही - अल्लाह का नूर)

(अकबर इलाहाबादी 1846-1921)

(अर्थात, हर साँस ये कहती है कि ऐ इंसान! अगर तू मेरे वजूद को मानता है तो तुझे अल्लाह के वजूद को भी मानना पड़ेगा जिसने मेरा वजूद बनाया।)

2.
फ़लसफ़ी को बहस के अंदर ख़ुदा मिलता नहीं
डोर को सुलझा रहा है और सिरा मिलता नहीं

(फ़लसफ़ी - दार्शनिक/फ़िलॉस्फ़र)

(अकबर इलाहाबादी 1846-1921)

3.
आगही में इक ख़ला मौजूद है
इसका मतलब है ख़ुदा मौजूद है

(आगही - ज्ञान/जानकारी; ख़ला - ख़ाली क्षेत्र/स्पेस)

(अब्दुल हमीद 'अदम' 1909-1981)

आभा :-
पहली कविता का विचार अच्छा है कविता और अच्छी हो सकती थी। दूसरी बहुत मज़बूत है लेकिन आख़िर तक आते आते फैल जाती है।

अल्का सिगतिया:-
दूसरी कविता  जहाँ तक मुझे समझ आई एक प्रश्न  है। स्त्री का वजूद ।दूसरी। ओर  राष्ट्रीय। अंतर्राष्ट्रीय  राजनीति  ।मुद्दा। अच्छा  है  पर गड्डमड्ड सा हो गया। है

मनीषा जैन :-
आज की कविताएं मनीषा जैन की है। आप अपनी प्रतिक्रिया दे सकते हैं जिन्होंने नहीं दी है उनका स्वागत है। अगर आपको अच्छी नही लगी या कोई बात बुरी लगी हो तो जरूर बताएं मुझे बिलकुल बुरा नहीं लगेगा।

प्रज्ञा :-
मनीषा जी बधाई। आपकी पहली कविता ने हौलेसे मन को छू लिया
दूसरी कविता आधी आबादी के सार्वभौमिक सत्य को सामने लाने का प्रयास है।
फरहत जी धर्म किसी की आस्था अनास्था का निजी मत हो सकता है। पर मुझे अकबर इलाहाबादी की पंक्ति बहुत अच्छी लगी हम हैं तो है खुदा।
मुझे राहत फतेह अली का एक गीत याद आया
तू न जाने आस पास है खुदा। ये मुझे ज़्यादा यथार्थपरक लगता है।  बिलकुल वैसे जैसे कबीर-- मोको कहाँ ढूंढे रे बन्दे मैं तो तेरे पास..।

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