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सत्यनारायण पटेल हमारे समय के चर्चित कथाकार हैं जो गहरी नज़र से युगीन विडंबनाओं की पड़ताल करते हुए पाठक से समय में हस्तक्षेप करने की अपील करते हैं। प्रेमचंद-रेणु की परंपरा के सुयोग्य उत्तराधिकारी के रूप में वे ग्रामांचल के दुख-दर्द, सपनों और महत्वाकांक्षाओं के रग-रेशे को भलीभांति पहचानते हैं। भूमंडलीकरण की लहर पर सवार समय ने मूल्यों और प्राथमिकताओं में भरपूर परिवर्तन करते हुए व्यक्ति को जिस अनुपात में स्वार्थांध और असंवेदनशील बनाया है, उसी अनुपात में सत्यनारायण पटेल कथा-ज़मीन पर अधिक से अधिक जुझारु और संघर्षशील होते गए हैं। कहने को 'गांव भीतर गांव' उनका पहला उपन्यास है, लेकिन दलित महिला झब्बू के जरिए जिस गंभीरता और निरासक्त आवेग के साथ उन्होंने व्यक्ति और समाज के पतन और उत्थान की क्रमिक कथा कही है, वह एक साथ राजनीति और व्यवस्था के विघटनशील चरित्र को कठघरे में खींच लाते हैं। : रोहिणी अग्रवाल

ग़ज़ल : मुहम्मद अल्वी

साहित्य अकादमी पुरुस्कार से सम्मानित सुप्रसिद्ध आधुनिक उर्दू शायर मुहम्मद अल्वी (जन्म-1927, अहमदाबाद) सरल भाषा और एकदम जुदा अंदाज़ में ज़मीनी शायरी करने के लिए जाने जाते हैं। आज इनकी दो ग़ज़लें और दो नज़्में पढ़कर देखें और टिप्पणियाँ दें:

ग़ज़लें:

1.
अच्छे दिन कब आएँगे
क्या यूँ ही मर जाएँगे

अपने आप को ख़्वाबों से
कब तक हम बहलाएँगे

बम्बई में ठहरेंगे कहाँ
दिल्ली में क्या खाएँगे

खिलते हैं तो खिलने दो
फूल अभी मुरझाएँगे

कितनी अच्छी लड़की है
बरसों भूल न पाएँगे

मौत न आई तो 'अल्वी'
छुट्टी में घर जाएँगे

2.
हज़ारों लाखों दिल्ली में मकाँ हैं
मगर पहचानने वाले कहाँ हैं

कहीं पर सिलसिला है कोठियों का
कहीं गिरते खंडहर हैं, नालियाँ हैं

कहीं हँसती चमकती सूरतें हैं
कहीं मिटती हुई परछाइयाँ हैं

कहीं आवाज़ के पर्दे पड़े हैं
कहीं चुप में कई सरग़ोशियाँ हैं
(चुप - चुप्पी; सरग़ोशी - फुसफुसाहट)

क़ुतुब साहिब खड़े हैं सिर झुकाए
क़िले पर गिद्ध बहुत ही शादमाँ हैं
(शादमाँ - ख़ुश)

अरे ये कौन सी सड़कें हैं भाई
यहाँ तो लड़कियाँ ही लड़कियाँ हैं

लिखा मिलता है दीवारों पे अब भी
तो क्या अब भी वही बीमारियाँ हैं

हवालों पर हवाले दे रहे हैं
ये साहिब तो किताबों की दुकाँ हैं
(हवाला - सन्दर्भ; दुकाँ - दुकान)

मेरे आगे मुझी को कोसते हैं
मगर क्या कीजिए अहले-ज़बाँ हैं
(अहल-ए-ज़बाँ - ज़ुबान वाले)

दिखाया एक ही दिल्ली ने क्या-क्या
बुरा हो अब तो दो-दो दिल्लियाँ हैं

यहाँ भी दोस्त मिल जाते हैं 'अल्वी'
यहाँ भी दोस्तों में तल्ख़ियाँ हैं
(तल्ख़ी - कड़वाहट)
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नज़्में:

1. 'तख़्लीक़'

एक ज़ंग-आलूदा
तोप के मुहाने में
नन्ही-मुन्नी चिड़िया ने
घोंसला बनाया है

(तख़्लीक़ - रचना/निर्माण; ज़ंग-आलूदा - जंग से भरी हुई)

2. जन्मदिन (नज़्म)

साल में इक बार आता है
आते ही मुझसे कहता है
"कैसे हो?
अच्छे तो हो?
लाओ, इसी बात पे केक खिलाओ
रात में खाने में क्या है?
और कहो क्या चलता है।"
फिर इधर-उधर की बातें करता रहता है
फिर घड़ी देख के कहता है
"अच्छा तो मैं जाता हूँ
प्यारे अब मैं
एक साल के बाद आऊँगा
केक बना के रखना
साथ में मछली भी खाऊँगा"
और चला जाता है।
उससे मिलकर थोड़ी देर मज़ा आता है।
लेकिन फिर मैं सोचता हूँ
ख़ास मज़ा तो तब आएगा
जब वो आकर
मुझको ढूँढता रह जाएगा।

प्रस्तुति- फरहत खान
बिजूका समूह

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टिप्पणियाँ:-

रेणुका:-
Dono nazme bahut achchi lagi...khaas kar pehli...kisi ke liye top maut ka Karan..vinash ka Karan...to wahi Kisi ke liye jeene ka madhyam.....uske rehne Ki jagah....bahut achchi tulna!

कीर्ति राणा:-
"अच्छे दिन"तो आज के हालात
दर्शाती गजल है ।
नज्म "जन्मदिन" घटते साल और मौत से मिलाती है । जब वो आकर मुझ को ढूंढता रह जाएगा।

मुकेश माली :-
अल्वी सा का अंदाज सचमुच
जुदा है , और कहीं कहीं चौंकाता
भी है. ....कि इस बात पर.. .इस
ख्याल पर. ....
शेर कहा जा सकता है. ..वो भी
पूरी सादगी से.. ....
मसलन. ..." कितनी अच्छी
लड़की है. ..बरसों भूल ना पायेंगे"
...."अरे ये कौनसी सड़कें हैं भाई यहां तो लड़कियॉ ही लडकियां"
और आखिर में से शेर.. .
लिखा मिलता है अब भी ...
तो क्या अब वही बीमारियां है. "....
बढिया शायरी पढवाने के लिये
फरहत भाई. .मनीषा जी. .बधाई. ..

अंजनी शर्मा-
जन्मदिन और अच्छे दिन बेहतरीन रचनाएँ हैं ।
वाकई में जमीनी शायरी ।
निहायत ही मासूम और भोली सी सीधी मन को छू लेने वाली और मन की ही बात कहती हुई रचनाएँ ।   
हर बार की तरह इस बार भी फरहत जी का उम्दा चुनाव ।
                   अंजनी शर्मा

रूपा सिंह :-
अहा..अल्वी साहेब को पहली बार पढ़ा।कितनी सहजता से कितनी बड़ी बातें।बहुत खूब।कितने फनकारों से यहाँ परिचिति होती है।ऐसी गंगा- जमुनी संस्कृति के दर्शन अब दुर्लभ हैं।धन्यवाद मनीषा जी।

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