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सत्यनारायण पटेल हमारे समय के चर्चित कथाकार हैं जो गहरी नज़र से युगीन विडंबनाओं की पड़ताल करते हुए पाठक से समय में हस्तक्षेप करने की अपील करते हैं। प्रेमचंद-रेणु की परंपरा के सुयोग्य उत्तराधिकारी के रूप में वे ग्रामांचल के दुख-दर्द, सपनों और महत्वाकांक्षाओं के रग-रेशे को भलीभांति पहचानते हैं। भूमंडलीकरण की लहर पर सवार समय ने मूल्यों और प्राथमिकताओं में भरपूर परिवर्तन करते हुए व्यक्ति को जिस अनुपात में स्वार्थांध और असंवेदनशील बनाया है, उसी अनुपात में सत्यनारायण पटेल कथा-ज़मीन पर अधिक से अधिक जुझारु और संघर्षशील होते गए हैं। कहने को 'गांव भीतर गांव' उनका पहला उपन्यास है, लेकिन दलित महिला झब्बू के जरिए जिस गंभीरता और निरासक्त आवेग के साथ उन्होंने व्यक्ति और समाज के पतन और उत्थान की क्रमिक कथा कही है, वह एक साथ राजनीति और व्यवस्था के विघटनशील चरित्र को कठघरे में खींच लाते हैं। : रोहिणी अग्रवाल

लेख- परधानमंत्री हमरे तिर तउ जुतो नाय है :-शालिनी वाजपेयी

हम लोग बचपन में एक गेम खेलते थे 'जब मेरी मिस.....'। इसमें हम अपनी मिस यानी टीचर की तरह तरह की अवस्थाओं, भावनाओं, भाव-भंगिमाओं को बताते थे। यह गेम हमारी टीचर का हम पर प्रभाव और उनके प्रति हमारे आकर्षण को बताता था। हर टीचर उसके विद्यार्थियों का आदर्श होता है। टीचर शब्द सुनते-पढ़ते ही आज भी मन में वो गाना गूंज उठता है '...हम लाए हैं तूफान से कश्ती निकाल के, इस देश को रखना मेरे बच्चों सम्हाल के....।' अपने निजि जीवन में एक शिक्षक चाहे कैसा भी हो वो अपने विद्योर्थियों को झूठ की शिक्षा नहीं देता। वो तो उन्हे आदर्श गुणों को अपनाने के लिए प्रोत्साहित करता है। हां, अगर कोई राजनीतिज्ञ शिक्षक होने का स्वांग करे तब स्थिति दूसरी हो सकती है।

अपनी भूषा, अपने परिधानों को ले कर अक्सर चर्चा में रहने वाले, सूट-बूट वाले हमारे माननीय प्रधानमंत्री ने शिक्षक दिवस की पूर्व संध्या पर बच्चों के साथ अपने जीवन से जुड़े पहलुओं को साझा किया। इसमें क्या बुरा है...कुछ भी नहीं, इससे बेहतर और क्या होगा कि बच्चे स्वयं माननीय प्रधानमंत्री से उनके जीवन के बारे में जानें। बच्चों को जानना चाहिए कि देश का प्रधानमंत्री दर'असल' कैसा है। और मैं समझती हूं कि आज के नेट-स्मार्ट बच्चे ये जान भी गए होंगे।

माननीय बच्चों से बतियाते-बतियाते बहक गए और बोले कि उनके कपड़े कोई डिजाइनर नहीं बनाता न ही वे किसी डिजाइनर को जानते है। वो तो बस ऐसे कपड़े पहनना चाहते है जिसमें वो सामान्य और सहज दिखें, बस!! इसके बाद उन्होने ऐसी मार्मिक बात कही कि हाल में बैठे बच्चों के भी आंसू निकल आए। ये माननीय की निर्दयती थी कि उन्होने बच्चों को इतना भावुक कर दिया कि वो रो पड़े। माननीय बोले कि मैं अपने कपड़े खुद धुलता था, पूरी बाजू का कुर्ता धुलने में अधिक समय लगता था इसलिए मैंने कुर्ते की बाजू काट के आधी कर दी। अब कुर्ता जल्दी धुल के सूख भी जल्दी जाता था, गुजरात के मौसम में मुझे ठन्डा भी रखता था और कहीं ले जाने में भी आसान था। ये करुण किस्सागो सुन के बच्चे रो पड़े। वैसे अगर आप को याद हो तो गोलमाल फिल्म में अमोल पालेकर ने भी छोटे साइज का कुर्ता पहनने का स्पष्टीकरण देते हुए उत्पल दत्त से कहा था कि वो देश हित में कपड़ा बचाने के लिए ऐसा कुर्ता पहनते हैं।

आप गोलमाल फिल्म को याद करके हंस सकते हैं। लेकिन मुझे, माननीय का संवाद के नाम पर अपनी दीनता का स्व-यशोगान पसंद आया। चारण तो आपकी कथा गायेंगे ही, आप खुद भी सचेत सहयोग करते हैं तो इससे कथाओं में बज़न बढ़ेगा।

हां, तो मैं कह रही थी कि आज के बच्चे बहुत नेट-स्मार्ट हैं। वे ज़रूर सोच में पड़ गए होंगे कि कुर्ते की बाजू सुविधा के लिए आधी कर ली तो फिर चूड़ीदार पजामा क्यों पहना। चूड़ीदार की तो लम्बाई ही इनकी खुद की लम्बाई से दोगुनी होगी। कुछ ने ज़रूर घर जा कर नेट खड़काया होगा। गूगल ने उन्हे तुरंत बता दिया होगा कि गुजरात में एक चैहान बंधु हैं, जितेन्द्र चैहान और बिपिन चौहान। ये जेड ब्लू क्लोथिंग चेन के मालिक है और '90 के दशक से माननीय प्रधानमंत्री के निजि दर्जी हैं। कभी बटन टांकते थे आज इनका 150 करोड़ का टर्नओवर है। पॉली खादी से चमकीली सिल्क तक का सफर माननीय प्रधानमंत्री ने इनके फीते और मशीन के सहयोग से ही तय किया है। बिपिन का कहना है कि माननीय प्रधानमंत्री, सामान्य और सहज दिखने की चाह वाले प्रधानमंत्री, ने एक बार उनसे कहा था कि वे तीन चीज़ों में कभी समझौता नहीं करते-- उनकी आंखें, आवाज और कपड़े। वे हर सभा में सबसे अलग चमकना चाहते हैं।

बचपन में अपने कैनवास के जूतों को खड़िया से रगड़ के सफेद करने वाले माननीय आज कपड़े का मैटीरियल पसंद करने, उसकी कटिंग, सिलाई और लुक को ले कर अत्यधिक सजग रहते हैं। वो सूट जो माननीय प्रधानमंत्री ने अमरीकी राष्ट्रपति ओबामा के साथ चाय पे चर्चा के दौरान पहना था, जिसकी कीमत को ले कर देश में बहस चल पड़ी थी वो सूट भी इन चौहान बंधुओं ने ही बनाया था।

माननीय, ये माना कि आपको कोई रीना ढाका कोई रितु बेरी तैयार नहीं करती लेकिन कोई तो है जनाब, जो आपको संवारता है। तो फिर ये पर्दादारी क्यों। वो भी बच्चों से और शिक्षक दिवस के मौके पर.....आप दिल्ली के पब्लिक स्कूल के बच्चों से मुखातिब हुए थे माननीय, कहीं गांव की प्राथमिक शाला में कहे होते के मैं जूतों पे खड़िया रगड़ता था तो कोई नाक सुड़कता बच्चा जवाब देता..... परधानमंत्री जी हमरे तिर तउ जुतो नाय हैं......
... शालिनी बाजपेई

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