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सत्यनारायण पटेल हमारे समय के चर्चित कथाकार हैं जो गहरी नज़र से युगीन विडंबनाओं की पड़ताल करते हुए पाठक से समय में हस्तक्षेप करने की अपील करते हैं। प्रेमचंद-रेणु की परंपरा के सुयोग्य उत्तराधिकारी के रूप में वे ग्रामांचल के दुख-दर्द, सपनों और महत्वाकांक्षाओं के रग-रेशे को भलीभांति पहचानते हैं। भूमंडलीकरण की लहर पर सवार समय ने मूल्यों और प्राथमिकताओं में भरपूर परिवर्तन करते हुए व्यक्ति को जिस अनुपात में स्वार्थांध और असंवेदनशील बनाया है, उसी अनुपात में सत्यनारायण पटेल कथा-ज़मीन पर अधिक से अधिक जुझारु और संघर्षशील होते गए हैं। कहने को 'गांव भीतर गांव' उनका पहला उपन्यास है, लेकिन दलित महिला झब्बू के जरिए जिस गंभीरता और निरासक्त आवेग के साथ उन्होंने व्यक्ति और समाज के पतन और उत्थान की क्रमिक कथा कही है, वह एक साथ राजनीति और व्यवस्था के विघटनशील चरित्र को कठघरे में खींच लाते हैं। : रोहिणी अग्रवाल

11 जनवरी, 2019

दलित महिलाओं द्वारा छाती ढँकनें के अधिकार का आंदोलन 125 वर्ष चला

        महिलाओं पर 'ब्रेस्ट-टैक्स' के विरोध लगता था 

                              जसबीर चावला

संसार भर में जाति,धर्म,वर्ण व्यवस्था,लिंग,नस्ल,रंग,के नाम क्रूर अमानवीय अत्याचारों का लंबा इतिहास है।भारत में समाजिक वर्ण व्यवस्था में हम जिन्हे अछूत,दलित,अवर्ण,अस्पृश्य,छोटी जाति,एससी या एसटी कहाजाता हैं,उन पर बहुत अत्याचार हुए हैं।यह सिलसिला अभी भी रुका नहीं है।याद करें हरियाणा के झज्जर में मरी गाय की खाल उतारते दलितों की हत्या या गत वर्ष गुजरात के ऊना की लोमहर्षक घटना,जिसमें दलित युवकों को कथित गौकशी के आरोप में सरे आम नंगे बदन चलती कार से बाँधकर लाठियों से पीटा गया।दलितों को घोड़ी पर न चढ़ने देना,कुँए से पानी न भरनें देना,सार्वजनि श्मशान में मृतक को जलानें से रोकना आज भी होता है।


'अछूत' या 'अस्पृश्य' महिलाओं की हालत और भी खराब रही है।दक्षिण भारत में उन्हें 'देवदासी' के नाम पर ईश्वर को समर्पित किया जाता था और पुजारी वर्ग द्वारा उनका निरंतर यौन शोषण होता था।अब यह 'प्रथा' गैर कानूनी है और सजा का प्रावधान है।समाज में महिलाओं को पुरुषों से कम अक़्ल माना जाता था।उनके लिये शिक्षा वर्जित थी।तीन 'आर' अर्थात रीडिंग,रायटिंग और अर्थमेटिक (अंक गणित) पढनें वाली महिला विधवा हो जायेगी,ऐसा विश्वास तात्कालिक समाज में था।

19 वीं शताब्दी के प्रारंभ में त्रावणकोर राज्य में अवर्ण-अछूत महिलाओं पर एक ऐसा कर लगाया गया जिसके बारे में आज भी सोचकर रूह काँप जाती है।यह इतिहास का ऐसा काला अध्याय है जिसे जानकर आँखे आत्मा शर्म और ग्लानि से भर आती हैं।इन अछूत महिलाएँ,जिनमें एजवा,शेनार या शनारस,नाडार,जैसी जाति की महिलाएँ शामिल थी,को सदियों से शरीर के ऊपरी भाग पर कपड़ा पहिनने की इजाज़त नहीं थी।उन्हे छाती को अनावृत यानें की पूरी तरह खुला रखना होता था।अगर कोई महिला ऊपर के कपडे को पहिनना या ओढ़ना चाहे तो उसे राज्य को टैक्स देना होता था।इस प्रथा को मलयालम में 'मुलाक्करम' कहा जाता था।लड़कियों के स्तन विकसित होनें की उम्र का होते ही उन पर इस कर की जवाबदारी आ जाती थी।विधवाओं को कमर में 'मुंडू' नाम का मोटे कपड़े का वस्त्र धारण करना होता था।

इस पर त्रावणकोर राज्य के 'चेरथला' गाँव में अछूत 'एजवा' जाति की एक साहसी महिला नंगेली ने सन 1803 में 'मुलाक्करम' (स्तन कर-ब्रेस्ट टैक्स) का डट कर विरोध किया।अपनी छातियों को अनावृत रखनें से इंकार किया।जब राज्य के कर अधिकारी,जिसे 'प्रथवियार' कहा जाता था,ने कर के लिये दबाव बनाया तो उस महिला नें अपनें स्तन काटकर पेड़ के पत्ते पर रख कर उसे सौंप दिये।अधिक खून बह जानें से एजवा जाति की उस महिला की मृत्यु हो गई।

उसका पति चिरुकंदन इस घटना से अत्यंत दुखी हुआ।उसनें भी इस कुप्रथा और पत्नी वियोग में अपनी पत्नी की चिता में कूद कर प्राण त्याग दिये।इस घटना के बाद इस घृणित प्रथा का विरोध शुरु हो गया।कई आंदोलन हुए और स्तन टैक्स को राजा द्वारा समाप्त करना पड़ा।उस महिला के निवास का नाम 'मुलचिमारम्बु' अर्थात मलयालम में मतलब 'छाती वाली महिला' का निवास पडा।प्रसंगवश केरल के इस चेरथला कस्बे से हमारे आज के नेता ए के एंथोनी,व्यालार रवि और क्रिकेटियर प्रसन्ना आते हैं।

राजय द्वारा नंगेली से टैक्स की वसूली के बदले अपनें स्तन काट कर देनें की यह घटना 1803 की है।कुछ इतिहासकार मानते हैं कि जब इस टैक्स का व्यापक विरोध शुरु हुआ तो 1812 में यह टैक्स लेना बंद कर दिया गया,लेकिन स्तन ढकनें पर रोक जारी रही।नंगेली के वियोग में उसकी चिता में जल कर मरनें वाला उसका पति पहला 'सती पुरुष' था।आज नंगेली की स्मृति में चेरथला में उसका कोई स्मारक नहीं है ओर वह जिस जगह पर निवास करती थी वह जमीन टुकड़ों में बँटकर कई लोगों की संपत्ति है।

इस घृणित प्रथा के पीछे सामाजिक वर्ण व्यवस्था का अभिशाप था।निम्न वर्ग की अछूत महिलाओं को तो अन्य सभी वर्णों के सम्मान मे सार्वजनिक रूप से शरीर का ऊपरी भाग अनावृत रखना ही होता था।वर्ण व्यवस्था के अन्तर्गत कुछ अन्य समुदायों जैसे नायर आदि की महिलाएँ अछूतों के सामनें ऊपरी वस्त्र धारण कर सकती थी,लेकिन उन्हें नंबूदरीपाद ब्राह्मण समाज के सामनें धारण की इजाज़त नहीं थी।उच्च नंबूदरीपाद ब्राम्हण केवल केवल भगवान की मूर्ति के समक्ष ऊपरी वस्त्र नहीं पहिनते थे।

महिलाओं के ऊपरी वस्त्रों के धारण के अधिकार को लेकर अछूत समुदाय को 125 सालों की लंबी लड़ाई 1924 तक लड़ना पड़ी।इस कुप्रथा को निरंतर जारी रखनें वाले पक्षों के अपनें तर्क थे।इस घृणित कुप्रथा का अंत हुआ,कैसे एक समाज को मानवीय गरिमा मिली,इसका इतिहास जानना,पढ़ना,समझना हमारे लिये एक अनुभव होगा।

ब्रिटेन से ईस्ट इंडिया कंपनी के भारत में आनें के बाद ईसाई मिशनरियों का आगमन हो चुका था।वर्ण व्यवस्था की क्रूरता से अछूत समाजों की हालत बेहद दयनीय थी।वे मिशनरियों के माध्यम से ईसाई बनने लगे।तब ईसाई धर्म में सामाजिक रूप से बराबरी,सेवा और सामाजिक समरसता थी।
इसे लेकर वहाँ पुरानें रीति-रिवाजों,परंपराओं और नवाचार से तनाव और टकराव बढ गया।नाडार,एजवा आदि महिलाओं के हक़ों के लिये समाज में बेचेनी थी।लोगों की इस बेचेनी को भाँप त्रावणकोर के राजा के दिवान कर्नल जान मुनरो नें,जो अंगेज़ था,1813 में धर्मातरित अछूत ईसाई महिलाओं को छाती के ऊपर कपड़ा पहिनने की इजाज़त दे दी।उच्च वर्ण की महिलाएँ अपनें कँधे और छाती को ढांकती थी।उनके इस आदेश को राजा की परिषद में उच्च वर्ण के लोगों नें चुनोती दी।तर्क दिया गया कि इससे वर्ग-वर्ण भेद की सामाजिक प्रथा,और ताना बाना टूट जायेगा।नीची जातियाँ ऊंची की बराबरी करेंगी।इन महिलाओं को छाती ढँकने की इजाज़त नहीं दी जा सकती।उधर अनुमति मिलने से और भी नाडार,एजवा महिलाओं ने ईसाई धर्म स्वीकार करना शुरु कर दिया,और उन जैसे लंबे कपड़े पहनना शुरु कर दिया।

1822 में अछूत ईसाई महिलाओं को सार्वजनिक रूप से बुरी तरह प्रताडित किया गया।राजा की कोर्ट में मामला फिर से गया।प्रश्न था की क्या पूरे कपड़े पहिनना ईसाई धर्म का अनिवार्य हिस्सा है ?मिशनरी चार्ल्स मीड ने सिद्ध किया कि यह जरुरी है।कोर्ट नें बात मान ली और इन महिलाओं को ऊपरी वस्त्र पहनने की इजाज़त जारी रही।

1827 में महिलाओं का फिर से सरेआम उत्पीड़न हुआ।उनके वस्त्र उतारे गये।बेइज्जत किया गया।मार-पीटा गया।ईसाई स्कूल-चर्च जलाये गये।मिशनरियों ने त्रावणकोर राजा से न्याय की मांग की।फरवरी 1829  को त्रावणकोर की रानी नें घोषणा की कि इन धर्मातरित नाडार,शेनार,एजवा महिलाओं को भी कोई राहत नहीं दी सकती।अन्य दलित महिलाओं के समान इन्हें भी सामाजिक व्यवस्था में ऊपरी कपड़े पहिनने का कोई अधिकार नहीं है।समाज में जबरदस्त बेचेनी थी,आंदोलन होते रहे।उधर समाज में ऊपरी हिस्सा ढकनें वाले वस्त्रों के पहिनने का चलन भी अछूत महिलाओं में बढ़ता जा रहा था और उन पर आक्रमण भी बढ़ते जा रहे थे।मिशनरियों पर भी हमले बढ़ गये।कुप्रथा ज्यों की त्यों रही।राजा के तात्कालिक दीवान ने दो टूक कह दिया कि 1829 का रानी का आदेश ही लागू माना जायेगा। ऊपरी वस्त्र पहिनने वाली महिलाओं को दंडित किया।

इस आदेश के विरुद्ध लोग पुन:राजा के पास गये।राजा से असंतुष्ट होकर 1859 में (तब देश में अंग्रेज़ों का कई स्थानों पर शासन थ) मद्रास के गवर्नर चार्ल्स ट्रेवेलियन के पास मिशनरी जेम्स रसेल,जॉन एब्स,जॉन कॉक्स और फ्रेडरिक ने अपील की।अंग्रेज़ गवर्नर चार्ल्स ट्रेवेलियन नें इस पर अपना आदेश किया।उस आदेश अनुसार त्रावनकोर राजा के दीवान नें राज्याज्ञा का प्रकाशन 26 जुलाई 1859 को किया।आदेश अनुसार अस्पृश्य नाडार,शेनार,या अन्य अछूत महिलाएँ भी ईसाई नाडार,शेनार महिलाओं की तरह के कपड़े पहिन सकती हैं या तो अन्य नीची जाति की 'मुकावट्टीगल' (मछुआरनों) के समान मोटे कपड़े से ऊपरी भाग ढँक सकती हैं लेकिन फिर भी उन्हें ऊँचे स्वर्ण वर्ण की महिलाओं के समान कपड़े पहिननें का अधिकार नहीं होगा।

नाडार महिलाओं ने इन प्रतिबंधों को अनदेखा किया और वस्त्रों की ऐसी शैली विकसित की जो कि उच्च वर्ग हिंदू महिलाओं की शैली जैसी ही थी।उच्च वर्ण,मिशनरिया और दलित वर्ग सब 26 जुलाई के आदेश से संतुष्ट नहीं थे।और सबनें इसका किया।ईसाई इसे समानता के अधिकारों के विरोध में मानते थे और ब्राहम्ण इसे धर्म में दख़ल मानते थे।मद्रास के तात्कालिक गवर्नर ने उस वक्त सामाजिक सुधार और चेतना पर जो आदेश दिया उसमें लिखा कि इन अछूत महिलाओं के संदर्भ में सतत जारी यह प्रक्रिया अन्यायपूर्ण प्रकृति की है।आने वाली दुनिया हम पर  रोएगी कि हमनें इस अवसर को अपनें हाथों से जानें दिया।आखिर 1865 के आदेश द्वारा सबको ऊपरी वस्त्र पहिनने की आजादी मिली।

अछूत महिलाओं को उचित वस्त्र न पहिनने के देनें के विरोध में दलित समाज सुधारक अयंकली नें (1863 – 1941) ब्रिटिश शासन के अन्तर्गत त्रावनकोर में खूब काम किया।उन्होने लोगों को संगठित कर सशक्त तरीके से इस कुप्रथा का विरोध किया।समाज में जागृति के लिये स्कूलों की स्थापना पर जोर दिया.1980 में दिवंगत प्रधानमंत्री  श्रीमति इंदिरा गाँधी नें 'कोवदिअार्सक्वेअर' में उनकी मूर्ति का अनावरण किया।

ऐसे ही नारायण गुरु थे। (1854-1928) वे अध्यात्मिक संत थे और वे भी एजवा निम्न समुदाय में पैदा हुए।उन्होने भी केरल समाज के वंचित तबके,महिलाओं की गरिमा बहाल करनें,और उनके उत्थान के लिये खूब काम किया।उन्होंने सुधार आंदोलन का नेतृत्व किया,जातिवाद को खारिज किया,और आध्यात्मिक स्वतंत्रता और सामाजिक समानता के नए मूल्यों को बढ़ावा दिया।नारायण गुरु ने धार्मिक तीर्थयात्रा का लक्ष्य वंचितों में शिक्षा, स्वच्छता, भगवान की भक्ति, सामाजिक संगठन,कृषि,व्यापार,हस्तशिल्प और तकनीकी प्रशिक्षण का प्रचार करना बताया।रवीन्द्रनाथ टैगोर नें नारायण गुरु से 1822 में मिलकर कहा उन्हें ऐसा कोई व्यक्ति नहीं मिला जो नारायणगुरु से अधिक या उनके समकक्ष भी अध्यात्मिक प्रतिभा रखता हो।

ऐसे लोगों के अथक प्रयासों,कानून बनने के बावजूद भी महिलाओं के ऊपरी वस्त्र पहिननें का विरोध १९२४ तक होता रहा।सामाजिक व्यवस्थाओं की बेड़ी में जकड़े एक बीमार समाज में एक आंदोलन 125 सालों तक महिलाओं के ऊपरी पहिनने वस्त्र पहिनने लिये आंदोलित रहा हो क्या यह हमारी अंतरात्मा को झकझोरता है ?


समय के अंतराल से दक्षिण भारत की इन अस्पृश्य जातियों में से कई धर्म परिवर्तन कर ईसाई बनें।कई जाति परिवर्तन कर क्षत्रिय बननें से ऊंची जातियों में आ गये।आर्थिक स्थिति बेहतर होनें,नये काम धँधों,बेहतर नौकरियों आदि के कारण अब नाडार,एजवा जैसी जातियाँ और सारे सरनेम दक्षिण भारत में दलित नहीं माने जाते।ताड़ी के पेड़ों पर चढ़कर ताड़ी निकालनें वाले नाडार समुदाय,ने 1813 -1859 तक अस्पृश्यता का सतत विरोध 'शेनार रिवोल्ट' में किया वे भी कई अन्य जातियों,व्यवसायों में चले गये हैं और पंरपरागत काम छोड़कर बेहतर स्थिति में हैं।

सन 2006-07 से एनसीईआरटी द्वारा अनुमोदित कक्षा 9 के सीबीएसई के पाठ्यक्रम में एक पाठ विद्धार्थियों को पढ़ाया जाता था।पाठ का शीर्षक था 'कास्ट कान्फिल्ट एँड ड्रेस चेंज।पाठ दलित महिलाओं के ऊपरी कपड़े के पहिनने के अधिकार और लंबे संघर्ष के बारे में था।इस पाठ को सीबीएसई के पाठ्यक्रम से अचानक सन 2017 में 19000 स्कूलों से यह कह कर एनसीईआरटी के निदेशक ऋषिकेश सेनापति द्वारा हटा दिया गया कि डीएमके, एआईएडीएमके के कुछ सांसदों नें आपत्ति ली है।दूसरी और पुस्तक की समन्वयक प्रोफेसर किरण देवेंद्र ने नें कहा कि किसी भी छात्र या अभिभावक नें इस पाठ के बारे में कभी कोई शिकायत नहीं की है।जाहिर है कथित भावनाओं के आहत होनें और राजनैतिक तुष्टिकरण का थोथा बहाना किया गयाथा।अतीत में जाकर पुस्तकों से हटानें से इतिहास नहीं मिटाया जा सकता,न बदला जा सकता है।वर्तमान को ठीक किया जा सकता है।

आज भी देश में कई स्थानों पर इन दलित जातियों पर अत्याचार,उत्पीड़न के समाचार आते रहते हैं।इन जातियों के विभिन्न क्षेत्रों में आरक्षण से जहाँ उनकी आर्थिक स्थिति बेहतर हुई हैं,वहीं राजनैतिक कारणों से समाज में गहरा तनाव भी बढ़ा है।

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