image

सत्यनारायण पटेल हमारे समय के चर्चित कथाकार हैं जो गहरी नज़र से युगीन विडंबनाओं की पड़ताल करते हुए पाठक से समय में हस्तक्षेप करने की अपील करते हैं। प्रेमचंद-रेणु की परंपरा के सुयोग्य उत्तराधिकारी के रूप में वे ग्रामांचल के दुख-दर्द, सपनों और महत्वाकांक्षाओं के रग-रेशे को भलीभांति पहचानते हैं। भूमंडलीकरण की लहर पर सवार समय ने मूल्यों और प्राथमिकताओं में भरपूर परिवर्तन करते हुए व्यक्ति को जिस अनुपात में स्वार्थांध और असंवेदनशील बनाया है, उसी अनुपात में सत्यनारायण पटेल कथा-ज़मीन पर अधिक से अधिक जुझारु और संघर्षशील होते गए हैं। कहने को 'गांव भीतर गांव' उनका पहला उपन्यास है, लेकिन दलित महिला झब्बू के जरिए जिस गंभीरता और निरासक्त आवेग के साथ उन्होंने व्यक्ति और समाज के पतन और उत्थान की क्रमिक कथा कही है, वह एक साथ राजनीति और व्यवस्था के विघटनशील चरित्र को कठघरे में खींच लाते हैं। : रोहिणी अग्रवाल

17 जनवरी, 2019

निर्बंध पन्द्रह

पिता भरोसे का स्थायी भाव हैं 

यादवेन्द्र



यादवेन्द्र

हिंदी में निकलने वाली "इंडिया टुडे" की संपादकीय टीम कितना साहित्यिक विवेक रखती है  इसकी जानकारी मुझे नहीं पर एक बड़ा ब्रांड इंडिया टुडे का तो है ही है और उसमें छपने वाली कोई भी चीज बड़े आदर के साथ और बड़ी प्रामाणिकता के साथ देखी जाती है।अभी हाल फिलहाल में में  2018 की 'साहित्य वार्षिकी' को देखता रहा ,समय निकाल के पढ़ता रहा और जब इसके कहानियों के खंड में आया तो सभी कहानियों को पढ़ने के बाद बहुत बहुत गहरी निराशा हुई -- मेरा मन यह मानने को तैयार नहीं हुआ कि साल में एक बार इतने धूमधाम से निकलने वाली यह  वार्षिकी क्या सचमुच हिंदी की प्रतिनिधि कहानी का नमूना लेकर  पाठकों के सामने आई है? लिखने पढ़ने वालों के बीच इसमें उपस्थिति और अनुपस्थिति को लेकर बड़ी उछाड़ पछाड़ रहती है। ऐसा नहीं कि मैं बहुत सारी चीजें पढ़ता हूँ और हिंदी में छपने वाली हर कहानी पढ़ता हूँ लेकिन अच्छा खासा समय देकर पढ़ता तो हूँ और किसी मंच पर यह कहने में मुझे कोई संकोच नहीं कि हिंदी के युवा कथाकार विराट कैनवस और अनुभव संसार निर्मित कर विश्व स्तर की कहानियाँ लिख रहे हैं - बेहद प्रतिभाशाली और ऊर्जावान पीढ़ी हमारे सामने है।में यह  मानने को तैयार नहीं कि हिंदी कहानी की जमीन इतनी संवेदनहीन, रूखी सूखी और अनुर्वर है।जिस बात ने मुझे ज्यादा आहत किया - चकित नहीं कहूँगा आहत ही कहूँगा - वह कि कहानियों के खंड में 6 में से खास तौर पर 3 कहानियाँ ऐसी हैं जो पिता की इतनी नकारात्मक छवि प्रस्तुत करती हैं कि मन ग्लानि से भर जाता है।पिता-पुत्र के रिश्ते, पिता बेटी के रिश्ते में त्रुटियाँ और कमियाँ हो सकती हैं- आए दिन हम अखबारों में पढ़ते भी हैं उसकी जो विकृतियों हैं उनके बारे में जानते सुनते भी हैं, लेकिन क्या यह विकृति  पिता और संतान के बीच के सम्बन्ध का केंद्रीय और स्थाई भाव है? मैं इस सोच से बिलकुल इत्तेफाक नहीं रखता। गौरव सोलंकी का नाम कहानियों में बहुत बढ़ा चढ़ा कर  अक्सर लिया जाता है,युवा कहानीकार  हैं और यह कहकर अक्सर बात की जाती है कि आईआईटी से पढ़ने के बाद भी उन्होंने साहित्य को अपना क्षेत्र बनाया।उनकी कहानी है 'माफ़', जिसमें बेटे को  पिता के बेटा पैदा होने पर अफ़सोस होता है .... वह आमने सामने उन्हें कहता है: हँसो मत, तुम्हारी पत्नी अब तुम्हारी पत्नी नहीं है।  क्या पिता वैसे ही होते हैं जैसे गौरव बताते हैं? हो सकता है कि वैसे पिता भी होते हों लेकिन वैसे ही नहीं होते पिता।दिव्या माथुर की कहानी 'संदेह' में बेटी और पिता का रिश्ता जिस तरह का दिखलाया गया है,वह सिर्फ और सिर्फ अपवाद हो सकता है .... बलात्कारी पिता दुर्लभ सच्चाई है पर ये समाज का स्थायी भाव नहीं है - एक मुश्किल अंतरा जरूर है । मानव कौल शास्त्रीय  अर्थों  में कहानीकार नहीं है पर उन की कहानी यहाँ कई पन्नों में छापी गई है 'पिता और पुत्र'...पिता और पुत्र के बीच यहाँ जो रिश्ता है वह इतना क्रूर और विकृत है ,इतना हृदयहीन है कि उस पर विश्वास नहीं होता - यहाँ बेटा सिर्फ और सिर्फ उस दिन के इन्तजार में है जब अस्पताल में पड़ा पिता अंतिम साँसें लेगा। मुझे लगता है यदि यदा कदा ऐसे उदाहरण मिल भी जायें तो किसी समाज को ऐसे रिश्ते पर विश्वास होना भी नहीं चाहिए। हमारा समाजशास्त्र मानता है कि पिता की भूमिका 100% सकारात्मक न भी हो पर कम से कम 99% तो समाज के लिए परिवार के लिए सकारात्मक और मजबूत होती ही है। मुझे पिता हमेशा एक ऐसे बहुत मजबूत खंभे के रूप में मालूम होते हैं जिन के चारों ओर घूमते हुए आप अपने बचपन में बहुत सुरक्षित महसूस करते हैं और जीवन की बुनियाद में जो सकारात्मकता है उसकी बुनियाद पिता और माँ के साथ ही पड़ती है ,उनके कारणों से बढ़ती है उनकी परवरिश से पड़ती है और उसको इस तरह से एकदम डिलीट कर देना मुझे लगता है कोई अच्छी प्रवृति नहीं। क्या एक बलात्कारी पिता समाज की केंद्रीय भूमिका में आ जाएगा यदि ऐसी खबरें अखबार में छपती रहें? टीवी पर देखें तब भी तब क्या वृहत्तर समाज पिता को उसी रूप में देखने लगेगा? समाज के तौर यह विचार करने की बात है।

इसी जिल्द में बाद में कवि गुलजार ने अपने पिता को याद किया है।उन्होंने कहा है कि मेरे पास जो स्मृतियों का लेखा जोखा है यदि मैं उसको खँगालूँ तो जो इकलौता इंसान सबसे मजबूत भूमिका में सामने आएगा वह  पिता होंगे।उन्होंने एक उदाहरण दिया कि 47 के विभाजन में पाकिस्तान से इधर आना और इधर के माहौल को लुटे पिटे पस्तहाल में स्वीकारना, यह हमारी नियति थी। पिता ने यह सब देखा, मैंने भी देखा लेकिन  आपको यह जानकर खुशी होगी कि यह सब देखकर भी हमारी फैमिली में कोई फंडामेंटलिस्ट नहीं हुआ और इसका पूरा श्रेय  उन्होंने अपने पिता को दिया है। वे कहते हैं कि उनका कद ऐसा था कि उन्होंने कभी भी हम में से किसी को उस दौर में कुछ नसीहत नहीं थी बावजूद इसके कि हमारे जन्म का स्थान भी हमसे छूट गया - वह बड़ी लंबी सांस लेकर पंजाबी में कहते थे : "प्रलय आई है, आंधी आई है,कयामत आई है - एक दिन निकल जाएगी।" पिता की यह  शिक्षा साल दो साल नहीं जीवन भर साथ निभाती है।

गुलजार की अपने पिता के बारे में यह बात पढ़ के मुझे अपने बचपन का एक वाकया याद आया.... एक क्या कई बातें याद हैं लेकिन जैसे गुलजार कहते हैं कि हमारी स्मृति में सबसे मजबूत खंभा यदि कोई है तो मेरे पिता का है वैसे मुझे लगता है यदि पिता को किसी एक घटना से परिभाषित करने को  कहा जाए तो  अपने बचपन की एक घटना याद आती है - हम लोग ( दो भाई , दो बहनें अम्मा पिता जी के साथ) भागलपुर में रहते थे ....  2 कमरों का मकान और  कमरों के बाद एक बरामदा। हम दोनों भाई शुरू के कमरे में ,दोनों बहनें बीच के कमरे में और अम्मा पिताजी बरामदे में सोते  थे।  उस बरामदे के बाद लंबा सा एक आँगन था और उस आँगन को पार करके हमारा देसी किस्म का टॉयलेट था। रात में जब पेशाब लगती थी हम उठते थे  और पेशाब करने के लिए  बीच का कमरा पार करने के  बाद बरामदे पर आना होता था।  अंधेरे में लंबे से आँगन को पार कर के अंत में  पेशाब करने के लिए जाना हमेशा याद आता है - घुप्प अंधेरा होता था, भागलपुर में ऐसे भी उन दिनों बिजली की दिक्कत रहती थी। पिताजी ने कहा हुआ था कि रात में जब भी उठो डरने की कोई बात नहीं है ,एक बार मुझे आवाज दो तो मैं फ़ौरन उठ जाऊँगा। बरामदे में आते ही पिताजी  को आवाज देता और पिताजी की नींद सच में इतनी हल्की थी कि  मेरी एक आवाज पर ,अधिक से अधिक दो आवाज़ पर वे जग कर जवाब दे देते थे -  हाँ ,  "मैं जाग  रहा हूँ।" जवाब में उनका सिर्फ यह यह कह देना कि "हाँ , मैं जगा हुआ हूँ"  इतना आश्वस्तकारी लगता था कि दुनिया की कोई ताकत न तो मुझे डरा सकती है   न हीं डिगा सकती है   क्योंकि मेरे पिताजी मेरी सुरक्षा के लिए जगे हुए हैं। वास्तविकता यह भी है कि कई बार  यह भी होता कि  जब निवृत्त होकर इस भरोसे के साथ मैं उधर से लौटता  कि पिताजी अभी जगे हुए हैं तो देखता पिताजी खर्राटे लेकर सो रहे हैं। दुबारा आवाज़ लगाता और वे उठ कर वैसे ही जवाब देते : "हाँ , मैं जगा हुआ हूँ" अब समझ आता है जब मैंने उनको  आवाज दी वे जागे होंगे और उसके फौरन बाद उनको नींद आ गई होगी और वह सो गए होंगे। लेकिन एक बालक के लिए यह भरोसा कि बच्चे को किसी खतरे से बचाने के लिए पिता  जगे  हुए हैं -" तुम जाओ अपना काम बगैर डर के करो, मेरी निगाह तुम्हारे ऊपर है" बड़ा संबल था जो जीवन भर मेरे साथ चलता रहा है।इन्हीं भावनाओं को मंगलेश डबराल ने दिवंगत पिता के मुँह से ऐसे कहलाया  है :
मैंने जो नए कमरे जोड़े हैं
इस पुराने मकान में उन्हें तुम ले लो
मेरी अच्छाई ले लो उन बुराइयों से जूझने के लिए
जो तुम्हें रास्ते में मिलेंगी
मेरी नींद मत लो मेरे सपने लो
अब पिता 85 वें साल में चला रहे है और  मैं स्वयं 62 साल का हूँ  मुझे न डर लगता है न उन्हें अँधेरा देख कर जगाने की जरुरत है पर उस  भरोसे की जगे रहने की लौ आजीवन मेरे अन्तः पटल पर जलती रहेगी।  मेरे लिए पिता का मायना यह अँधेरे के खिलाफ उजाला बन कर खड़ा हुआ भरोसा ही है - अपने कुछ शब्दों से उन्होंने आत्मविश्वास का जो पौधा मेरे व्यक्तित्व में रोप दिया उसका कोई  मूल्य नहीं। मुझे लगता है कि यह सिर्फ मेरे नाम वाले  इकलौते इंसान के लिए नहीं एक आम इंसान के लिए भी उतना ही ठोस सत्य है। भारतीय समाज के मध्यम वर्ग की बात करें तो पिता की भूमिका अपवादों को छोड़ दें तो मजबूत खंभे की तरह ही है जिसका आपके आसपास कवच बन कर खड़ा रहना आपको सारे तरह के भयों  से और आशंकाओं से बचा ले जाता है - मुझे लगता है कि यही पिता  और उसकी संतान के बीच का स्थायी  भाव है। जब मैं यह कहता हूँ तो चंद्रकांत देवताले की ये पंक्तियाँ दिमाग में कौंध रही हैं :
तुम्हारी निश्चल आँखें
तारों-सी चमकती हैं मेरे अकेलेपन की रात के आकाश में
प्रेम पिता का दिखाई नहीं देता
ईथर की तरह होता है





बड़े परिप्रेक्ष्य में किसी समाज के  किसी रिश्ते को परिभाषित करें तो मुझे लगता है कि स्थायी  भाव की ही बात करनी चाहिए अंतरे की बात करके हम बहुत सारी ऐसी अव्यावहारिक चीजें करते हैं ऐसी गलतियाँ करते हैं जिससे समाज कमजोर होता है जर्जर होता है - यह प्रतिगामी दिशा में ले जाता है। साहित्य तो समाज की एक अभिव्यक्ति मात्र है, हमें  समाज को स्वस्थ सजीव रखने के लिए ऐसा कुछ नहीं करना चाहिए जिससे समाज पर और इंसान पर उल्टा असर पड़ता है, नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।

मैंने बिल्कुल साफ़-साफ़ देखा
उस बस पर बैठे
कहीं जा रहे थे पिता

उनके सफ़ेद गाल, तम्बाकू भरा उनका मुँह
किसी को न पहचानती उनकी आँखें

उस बस को रोको
जो अदृश्य हो जाएगी अभी

उस बस तक
क्या
पहुँच सकती है
मेरी आवाज़ ?
( उदय प्रकाश की कविता "बस में पिता" का एक अंश)
पिता और बच्चों की पीढ़ियाँ अलग होती हैं सो हर बात में उनका मतैक्य होना संभव नहीं है , मतभेद होने और होने का औचित्य भी है।  पर जब पिता की लानत मलानत होने लगे उनकी खिल्ली उड़ाई जाने लगे या सरे आम बेइज्जती की जाने लगे तो मुझ जैसे पिछली पीढ़ी के इंसान को तकलीफ़ होती है ....वही पीड़ा साथियों के साथ साझा करने का मन हुआ - इस मुद्दे पर आपकी बात सुनूँगा तो हो सकता है मन का उबाल थोड़ा शांत हो।
000


निर्बंध की पिछली कड़ी नीचे लिंक पर पढ़िए

https://bizooka2009.blogspot.com/2019/01/39.html?m=1


कोई टिप्पणी नहीं:

टिप्पणी पोस्ट करें