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सत्यनारायण पटेल हमारे समय के चर्चित कथाकार हैं जो गहरी नज़र से युगीन विडंबनाओं की पड़ताल करते हुए पाठक से समय में हस्तक्षेप करने की अपील करते हैं। प्रेमचंद-रेणु की परंपरा के सुयोग्य उत्तराधिकारी के रूप में वे ग्रामांचल के दुख-दर्द, सपनों और महत्वाकांक्षाओं के रग-रेशे को भलीभांति पहचानते हैं। भूमंडलीकरण की लहर पर सवार समय ने मूल्यों और प्राथमिकताओं में भरपूर परिवर्तन करते हुए व्यक्ति को जिस अनुपात में स्वार्थांध और असंवेदनशील बनाया है, उसी अनुपात में सत्यनारायण पटेल कथा-ज़मीन पर अधिक से अधिक जुझारु और संघर्षशील होते गए हैं। कहने को 'गांव भीतर गांव' उनका पहला उपन्यास है, लेकिन दलित महिला झब्बू के जरिए जिस गंभीरता और निरासक्त आवेग के साथ उन्होंने व्यक्ति और समाज के पतन और उत्थान की क्रमिक कथा कही है, वह एक साथ राजनीति और व्यवस्था के विघटनशील चरित्र को कठघरे में खींच लाते हैं। : रोहिणी अग्रवाल

13 अप्रैल, 2018

नीरज नीर की कविताएं


नीरज नीर 

कविताएँ

सूरज के पीठ पर बैठी औरत 

वर्जनाओं के जंगल में
राह चुनी नहीं जाती
बनानी पड़ती है
अपने सामर्थ्य व गति
चपलता व जरूरत के हिसाब से...
वहां खुला होता है बस
सांस भर आकाश
और खड़े होने के लिए
पांव भर जमीन
हाथ उठाने में भी चुभते हैं
बन्धनों के नागफनी
उनींदी आँखों में भरा होता है अँधेरा
रौशनी की चमकीली वरक के साथ
हर कदम दर्ज होता है इतिहास में जैसे
कोई पुरातत्ववेत्ता करता हो उद्वाचन
किसी शिलालेख का.
इन राहों के राही
खो सकते हैं इनकी निविड़ता में
थोड़ी देर के लिए
पर जंगल कर देता है आत्मसमर्पण
आखिरकार
इनकी जिद के आगे
दे देता है रास्ता
कर लेता है स्वीकार
एक नया संशोधन
जंगल के कानून में 
सूरज की पीठ पर बैठी औरत
रास्ते भर बोती आती है
चमकीले सितारे  …..



 जनी शिकार 

एक आदिवासी औरत
पीठ पर बाँधती है सृष्टि
माथे पर ढोती है गृहस्थी
और पुरुषों के कर्तव्यहीन होने पर
हो जाती है शेर पर सवार
देती है तीर को धार
उठाती है हौसले का धनुष
करती है जनी शिकार
बचाती है अपने जंगल और भात
सम्हालती है
अपनी परम्पराओं को ...
एक आदिवासी औरत
शक्ति का प्रकटीकरण है



औरतें कवि होती हैं

औरत जब करती है श्रृंगार
उसमे होती  है एक लय
होती है गति
दरअसल स्त्री जब करती हैं श्रृंगार
तो सौन्दर्य के पन्ने पर
वह रचती है एक अद्भुत कविता

औरत जब जलाती है चूल्हा
बेलती है रोटियां
मिलाती है खाने में नमक
भूनती है मसाले
तो दरअसल प्रेम के पन्नों पर
वह लिखती है एक रुचिकर कविता

औरत एक एक चीज को
सहेजती, सम्हालती
जब मकान को बनाती है घर
तो घर की दरो दीवार पर
उभर आती है एक जीवंत कविता

औरत जब करती है प्रेम
तो कई रंगों वाली स्याही से
वह नीले जीवन पृष्ठ पर
दरअसल उकेरती है
एक अभिनव कविता
जिसे पढ़कर सृष्टि
बढ़ा देती है एक कदम
आगे .........

औरतें कवि होती है
आदि से अंत तक
करती रहती है कविता





 मुट्ठी में परछाइयाँ 

परछाइयाँ जरूरी है
जिंदगी की
आसानी के लिए
मुश्किलों का तपता सूरज
परछाइयाँ बनने नहीं देता है
मैं अपनी मुट्ठी में
कैद करके रखता हूँ
अपनी परछाइयां
मुश्किल हालात में
ढीली कर देता हूँ
अपनी मुट्ठियां
और सूरज बढ़ जाता है
धीरे धीरे
पश्चिम की ओर



अदृश्य दीवार

उसने पूछा मेरा धर्म
और गले से लगाया
फिर उसने पूछी
मेरी जाति
और वह भर गया नफरतों से
जैसे बरसात की पहली बारिश में
शहर की सड़कें भर जाती है
नालियों के कीचड़ से

उसने पूछा मेरा प्रान्त
और उसके चेहरे पर दौड़ गयी
भ्रातृत्व की ख़ुशी
फिर उसने अपनी भाषा में पूछा
मेरा हाल चाल
मैंने अपनी भाषा में  बताया
और वह भर गया नफरतों से
जैसे बंद कमरे में भर जाता है
सिगरेट का धुआँ

उसने पूछा मेरा देश
और उसके चेहरे पर
चमक आई
देश प्रेम से लबरेज एक बड़ी मुस्कान
फिर उसने पूछा मेरा धर्म
और भर गया नफरतों से
जैसे किसी लाश पर
कुलबुलाते है लाल सफ़ेद कीड़े

वह वही था, मैं वही था
वही रूह, वही हाड, मांस, रक्त प्रवाह
वही थी दोनों के बीच की
भौतिक क्षैतिज दूरी भी
पर उसका प्रेम
भाषा, जाति और धर्म के आधार पर
बदल गया घृणा में

आदमियों के बीच
बिना जमीन के उग आई
इस अदृश्य दीवार को
मिटाना होगा स्याही की धार से




दर्द का रंग हरा होता है

दर्द का रंग हरा होता है
वर्षा ऋतु में धरा गुजरती है
प्रसव पीड़ा से
डूबती है दर्द में
हो जाती है अंतर्मुखी
आसमान का नीलापन
प्रतिबिंबित नहीं होता
उसकी देह पर
पीड़ा की अधिकता में
पृथ्वी रंग जाती है हरे रंग में
जिसकी निष्पत्ति होती है
सृजन में
जब वृक्ष उखड़ता है
तो थोड़ी पृथ्वी भी उखड़ जाती है
उसके साथ
पृथ्वी वृक्ष को छोड़ना नहीं चाहती है
वृक्ष पृथ्वी के दर्द का प्रतिरूपण है
बिना दर्द से गुजरे
दर्द को कहना
हरा को लाल कहने जैसा है
कवि तुम्हें दर्द भोगना होगा
पृथ्वी बनकर
ताकि तुम कर सको
सृजन
हरे रंग की पहचान मुश्किल है
वर्णांधों के लिए
अक्सर हरा गडमगड हो जाता है
लाल के साथ








बुधुआ मर जाएगा

जंगल की ताजा हवा और
निर्झर के ठंढे जल के मानिंद रहने वाले
बुधुआ उरांव ने पहली बार जाना है
धर्म में अनुशासन जरूरी है
और जरूरी है
बिना कुछ सोचे समझे
भीड़ के साथ
सुर में सुर मिलाना
वह चाहता था अपनी बेटी को पढ़ाना
पत्थरों वाले बड़े स्कूल में
जिसमे कभी कभी आती हैं
पढ़ाने गोरी मेम भी
जिसके लिए उसे बनना पड़ा क्रिस्तान
लेकिन उसके लिए क्या सरना,  क्या क्रिस्तान ......
उसने सोचा
बेटी तो बनफूल से गुलाब बनेगी
पर अब वह बंधन महसूस कर रहा है
उसे सिखाया जा रहा है आदमी होने का अर्थ
हाथ मिलाने के तरीके
प्रार्थना में खड़े होने का सलीका
उसका धर्म तो उसे आज़ादी देता था
हिरण की तरह जंगल में भीतर तक
कुलांचे मारने की
पंछियों की तरह सुदूर आकाश में मनचाहे
उड़ान भरने की
बेटी तो गुलाब बन जाएगी
पर बुधुआ मर जाएगा
उसकी जड़ सूखने लगी है
उसकी छाती से रिसता रहता है खून
वह महसूस करता है स्वयं को
सलीब पर लटका हुआ .........




गड्ढे में फंसा हाथी 

पुरखों की जमीन और घर
बलात हर लिए जाने के बाद
वह भयभीत है
और विमूढ़ भी
गड्ढे में फँसे हाथी की तरह ।
वह निकलना चाहता है बाहर
वह नहीं जानता है भविष्य
छूकर देखता है अपनी देह
आश्वस्त होना चाहता है
अपने शरीर पर अपने स्वत्वाधिकार के बारे में
और उसकी आत्मा ?
वह तो उस सखुआ के पेड़ के साथ ही मर गयी
जिसके नीचे वह पूजता था सिंग बोंगा को
आत्मा की अमरता के प्रश्न पर वह उत्तरहीन है
वह विस्मित है अपनी समझ पर .
वह एक किसान है
और किसान ही बने रहना चाहता है
अपने खेतों में उगाना चाहता है
धान, मकई और आलू
पर व्यवस्था उसे बनाना चाहती है
मजदूर
उसे बताया गया है कि कोई और ही है
सभी ज़मीनों का मालिक
पर जो जमीन उसके बाप दादाओं की है
वह किसी और की कैसे है ?
उसका यह प्रश्न भी
समाने लगता है
संशय के गहरे दलदल में
आत्मा के अस्तित्व के प्रश्न की तरह .
उसे दे दी जाती है एक अदद नौकरी
अब बुधुआ उरांव अपने ही खेत
से निकालता है कोयला
उसे पता ही नहीं था
उसकी जमीन भीतर भीतर थी इतनी काली
साहबों के मन की तरह .
और एक दिन वह समा जाएगा
कोयले के उसी खदान में
वैज्ञानिक कहते हैं
उसकी हड्डियां और उसका सखुआ
कालांतर में बदल जायेंगे कोयले में




कविता और भात 

कविता लिखना भी भात पकाने जैसा है
मैं कविता लिखता हूँ
ठीक वैसे ही
जैसे तुम पकाती हो भात
मैं कविता लिख कर रख देता हूँ
समय की आंच पर पकने के लिए
जैसे तुम डालती हो
तसला में चावल
और छोड़ देती हो
डभकने के लिए
समय समय पर पलटता हूँ
पन्नो को
जैसे तुम देखती हो
चावल का एक दाना निकालकर
और जब पक जाती है कविता तो
उसे निकाल लेता हूँ
डायरी के पन्नों से बाहर
जैसे  जब सीझ जाता है चावल
तो तुम परोसती हो
थाली में गरमागरम
कविता लिखना भी भात पकाने जैसा है






उदासी 

क्या तुम सचमुच उदास थी
या अँधेरों ने आकाश की आँखों पर
लगा दिया था काजल
जिससे घिर आई थी संध्या  ......

क्या तुम सचमुच उदास थी
या मैंने देख लिया था
उस बूढ़े पिता की आँखों में
जिसके बच्चे
अब उसके पास लौट कर नहीं आते
पर जिनकी मोतियाबिंदी आँखों में
अब भी भुकभुकाता है
उम्मीद का दीया

क्या तुम सचमुच उदास थी
या मैं महसूस कर रहा था
उस स्त्री के दिल की बेचैनी को
जिसके हाथों में मेंहदी थी
पैरों में महावर  थे
और जो अभी अभी लौटी थी
विदा करके
युद्ध पर जाते अपने सैनिक पति को

क्या तुम सचमुच उदास थी
या शाम को लौटे  परिंदों ने
जब  देखा कटा हुआ  शजर
जिसपर  था उनका घोसला
तो उनके वेदनामयी  कलरव ने
माहौल बना दिया  था कारुणिक

क्या तुम सचमुच उदास थी
या कबाड़ चुनता वह बच्चा
जो सुबह में खिलखिला रहा था
रोने लगा था भूख के मारे
अचानक
पेट पकड़ कर
क्या तुम सचमुच उदास थी प्रिय ?
मुस्कुराओ ,
देखो !
कि आसमान में निकल आया है फिर से सूरज
गाओ कि उस बूढ़े आदमी को मिल गयी है मुक्ति
नृत्य करो  कि युद्ध अभी टल गया है
और स्त्री रचा रही है
अपने हाथों में पुनः मेंहदी
मुस्कुराओ कि पंछियों ने ढूंढ लिया है
अपना नया बसेरा और गा रहे हैं नव गीत
हँसो कि बच्चा फिर से खिलखिला रहा है
हँसो प्रिय हँसो




हॉर्स ट्रेडिंग 

घोड़े
अब वहाँ नहीं बिकते.....
बंद हो गया है
गाँव की सीमाने पर लगने वाला
घोड़ो का बाजार ..
अब वहाँ लगती है
बोली
रोटी के बदले
आदमी की
वहाँ घूमते हैं
लड़कियों के दलाल
घोड़े अब बिकते है
संसद मार्ग पर




बूढ़ा पहाड़ 

आओ साथी
एक पेड़ रोपते है
उस बूढ़े पहाड़ की तलहटी में .....
बूढ़ा पहाड़,
जिसकी जड़ में लगे हैं
तरह तरह के चूहे
गिर न पड़े भरभरा कर.
आओ एक कटोरे में भर लें
बूढ़े पहाड़ की चोटी पर
उगी हुई रोशनी
डाल दें उसे पेड़ की जड़ में
और बांध दें
एक धागा
उस छोटे झरने पर
जिससे अब रिसता है बूंद बूंद पानी
आओ हम गीत गायें और
प्रार्थना करें
पेड़ के जल्दी बड़े होने की,
झरना के पानी के जमा होने की
उस पेड़ से हम बनाएँगे  कलम और
झरने के पानी से स्याही
फिर हम लिखेंगे
नए नए नारे
बहुत सारे नारे
जमा होंगे बहुत सारे लोग
उस बूढ़े पहाड़ को बचाने के लिए...







सत्य गोल होता है  

झूठ के होते हैं
हजारों  कोण
हर कोण से यह दिखता है
अलग अलग ।
अलग अलग व्यक्ति के लिए
हो सकते हैं
इसके अलग अलग मायने भी
जरा सी चूक होते ही
इसके नुकीले कोण
कर देते हैं लहूलुहान


सत्य की एक ही स्थिति होती है
सत्य नहीं बनाता है कभी कोई कोण
हर तरफ से
दिखता है एक सा
हर दृष्टि से निकलता है
एक ही अर्थ
सत्य गोल होता है



 युद्धोन्माद 

युद्ध का अर्थ
मत पूछो
राजा से
और न ही सेनापति या सिपाही से
युद्ध का अर्थ पूछो
उस आदमी से
जो रहता है
सरहद पर बसे गांव में

तोप के गोले का वजन
मत पूछो तोपची से
और न तोप बनाने वाले से
गोले का वजन पूछो
उस आदमी से
जिसके घर पर गिरा है
तोप का गोला

बेबसी क्या होती है
मत पूछो
विरह में जलते प्रेमी युगल से
बेबसी का अर्थ पूछो
उस किसान से
जो नहीं जा सकता है अपने खेतों पर
तैयार पकी फसल को काटने के लिए
क्योंकि सरहद पर चल रही हैं गोलियां

मृत्यु का भय क्या होता है
मत पूछो
अस्पताल में मृत्यु शय्या पर पड़े मरीज से
पूछो उस व्यक्ति से
जो अपनों की लाशों के बीच से
भागा  है युद्ध क्षेत्र से दूर
अपनी जान  बचाने के लिए

युद्धोन्माद क्या होता है
देखने की कोशिश मत करो
किसी सैनिक की आँखों में
युद्धोन्माद सबसे ज्यादा होता है
सरहद से दूर
सुरक्षित इलाकों में रहने वाले लोगों में
जिनके पेट भरे होते हैं .




 अपना अपना बसंत 

ठेले और खोमचे से लगी दीवार के उस पार
कहते हैं
आया है बसंत
ठेले के नीचे
नाली के स्लैब पर
खेलती लड़की
देखना चाहती है बसंत
बर्तन मांजने वहां जाती उसकी माँ को
है सख्त ताकीद
बच्ची को अन्दर नहीं लाने की
वहाँ लॉन में खिले हैं
कई तरह के गुलाब
गेंदा, डालिहा, बेली और जूही के फूल
वहां  रेशमी फ्रॉक पहने
चाईनीज डॉल सी लड़की
पकड़ती है फूलों पर से तितलियाँ ........

नाली के स्लैब पर खेलती लड़की की  माँ
लाल रिबन से बना देती है
उसके लिए एक फूल
और खोंस देती है उसके बाल में
लड़की के चेहरे पर
आ जाती है मुस्कान
ठेले के नीचे
आ जाता है बसंत
माँ के गोद में सो रही लड़की
सपने में पकडती है तितलियाँ
==========



.परिचय : 
नीरज नीर 
जन्म तिथि : 14.02.1973 

Email – neerajcex@gmail.com
आशीर्वाद 
शुभ गौरी एन्क्लेव के पीछे 
बुद्ध विहार,  पो ऑ – अशोक नगर 
राँची   834 002
झारखण्ड 
कविताओं   एवं कहानियों का नियमति लेखन.
 सभी प्रतिष्ठित पत्र पत्रिकाओं में नियमित रचनाएं प्रकाशित 
आकशवाणी एवं दूरदर्शन से कवितायें एवं कहानियों का प्रसारण. 
आदिवासी एवं नारी चेतना मेरी कविताओं के  मूल स्वर हैं  
काव्य संकलन : “जंगल में पागल हाथी और ढोल प्रकाशित” 
कई अन्य काव्य संकलनो में कवितायेँ संकलित 
पुरस्कार : “महेंद्र प्रताप स्वर्ण साहित्य सम्मान” 
सम्प्रति : केन्द्रीय माल व सेवाकर में अधीक्षक 

5 टिप्‍पणियां:

  1. नीरज नीर जी की कविताएं बहुत अच्छी लगी

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  2. आप कविताएँ पढ़ीं ,रचनाओं में ठहराव के साथ विचारों की सघनता भी है ।पाठक को रोकने की पुरजोर कोशिश करतीं मिलीं आपकी रचनाएँ ।अनेक बधाइयाँ

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  3. आप सभी मित्रों का हार्दिक शुक्रिया

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