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सत्यनारायण पटेल हमारे समय के चर्चित कथाकार हैं जो गहरी नज़र से युगीन विडंबनाओं की पड़ताल करते हुए पाठक से समय में हस्तक्षेप करने की अपील करते हैं। प्रेमचंद-रेणु की परंपरा के सुयोग्य उत्तराधिकारी के रूप में वे ग्रामांचल के दुख-दर्द, सपनों और महत्वाकांक्षाओं के रग-रेशे को भलीभांति पहचानते हैं। भूमंडलीकरण की लहर पर सवार समय ने मूल्यों और प्राथमिकताओं में भरपूर परिवर्तन करते हुए व्यक्ति को जिस अनुपात में स्वार्थांध और असंवेदनशील बनाया है, उसी अनुपात में सत्यनारायण पटेल कथा-ज़मीन पर अधिक से अधिक जुझारु और संघर्षशील होते गए हैं। कहने को 'गांव भीतर गांव' उनका पहला उपन्यास है, लेकिन दलित महिला झब्बू के जरिए जिस गंभीरता और निरासक्त आवेग के साथ उन्होंने व्यक्ति और समाज के पतन और उत्थान की क्रमिक कथा कही है, वह एक साथ राजनीति और व्यवस्था के विघटनशील चरित्र को कठघरे में खींच लाते हैं। : रोहिणी अग्रवाल

कविता : प्रदीप मिश्र

कल जिन साथी की लम्बी कविता 'ईश्वरीय सत्ता पर शोध पत्र' आपने पढ़ी,  उन्हीं की कुछ अन्य कविताएँ और परिचय आज आपसे साझा कर रहे हैं। आशा है कि आज की कविताओं पर भी आपकी निष्पक्ष टिप्पणियाँ प्राप्त होंगी..

कविता :

1. 'रिश्तों में समाज'

समुन्द्र के एक बून्द में होती है
जितनी नमक की मात्रा
सिर्फ उतनी ही जिज्ञासा
बचा ले जाएगी
ज्ञान को जड़ होने से

पनघट से रसोईघर तक
मटके ढो लेने की क्षमता
जब तक बची रहेगी
प्यास से नहीं मरेगा कोई भी

बिना कम्बल के
माघ-पूस की रात काटने की हिम्मत
जिन लोगों में है
वे कभी नहीं हारेंगे जीवन से

पड़ोसी होने की तमीज़
आँखों में पानी
नाक की सूँघने की आदत
कानों का खड़ा होना
जब तक बाकी है
मरी नहीं है संवेदना

संवेदना रहेगी तो
रिश्ते भी बनेंगे
रिश्तों में बसता है समाज

समाज की हिम्मत और जिज्ञासा
संघर्ष की जलती हुई मशालें हैं
जिनकी रोशनी में काटी जा सकती है
भयानक से भयानक रात भी।

2. 'महान लोग'

इन दिनों महान लोग
नेता नहीं होते
पत्रकार तो हो ही नहीं सकते
कला की दुनिया में
महान होने की परम्परा नहीं होती

महान लोग सिर्फ महान होते हैं
जन्म से ही वे महान होते
जीवनभर चमकते रहते हैं
विभ्रम के सूरज की तरह

इतिहास में एक चमक की तरह
दर्ज कर दिया जाता है उनको।

3.  'तंत्र '

सत्य तभी तक सत्य
जब तक झूठ है
गति तभी तक गति 
जब तक ठहराव है
प्रकाश तभी तक प्रकाश
जबतक अंधकार है
जीवन तभी तक जीवन
जबतक मृत्यु है
हम तभी तक हम
जबतक सामने तुम हो
हमदोनों का होना ही एक लोक है

इस लोक में हम दोनों कितना-कितना हैं
यही इस तंत्र का सुख-दुःख।

4.  'प्रेम की भट्टी'

लोहे से बनती है मशीन
और मनुष्य भी

नसों का जटिल तंत्र
जुड़ता है दिल से
जिसके धड़कने से बहता है
नसों में लोहा
रक्त कर्णिकाओं पर सवार लोहा
मनुष्य के पूरे शरीर में दौड़ता रहता है

जब तक दौड़ता रहता है लोहा
चलता रहता है मनुष्य मशीन की तरह
लेकिन मशीन की तरह
ठोस और कठोर नहीं होता 

मशीन की तरह चलते हुए मनुष्य में
प्रेम की भट्टी जलती रहती है
जो लोहे की ठोस आत्मा को बदलती है द्रव्य में

जिस दिन यह भट्टी बुझ जाती है
मनुष्य मशीन में बदल जाता है
ठोस और कठोर ।

परिचय :
नाम - प्रदीप मिश्र
जन्म - 1 मार्च 1970 (गोरखपुर,  उत्तर प्रदेश)

शिक्षा - विद्युत अभियन्त्रण में उपाधि, हिन्दी तथा ज्योतिर्विज्ञान में स्नात्कोत्तर।

संप्रति - परमाणु ऊर्जा विभाग के राजा रामान्ना प्रगत प्रौद्योगिकी केन्द्र, इन्दौर में वैज्ञानिक अधिकारी के पद पर कार्यरत। 

साहित्यिक उपलब्धि -
* साहित्यिक पत्रिका 'भोर सृजन संवाद' का सह-संपादन।
* कविता संग्रह 'फिर कभी' (1995) तथा 'उम्मीद' (2015), वैज्ञानिक उपन्यास 'अन्तरिक्ष नगर' (2001) तथा बाल उपन्यास 'मुट्ठी में किस्मत' (2009) प्रकाशित।
* साहित्यिक पत्रिकाओं, सामाचार पत्रों, आकाशवाणी, ज्ञानवाणी और दूरदर्शन से रचनाओं का प्रसारण एवं प्रकाशन । कुछ कविताओं का दूसरी भाषा में अनुवाद।
* म.प्र साहित्य अकादमी का जहूर बक्स पुरस्कार, श्यामव्यास सम्मान, हिन्दी गरिमा सम्मान तथा कुछ अन्य सम्मान।
* अखबारों में पत्रकारिता।

संपर्क -  प्रदीप मिश्र, दिव्याँश ७२ए, सुदर्शन नगर, अन्नपूर्णा रोड, डाक : सुदामानगर,  इन्दौर - ४५२००९, म.प्र.।
मो.न. : +९१९४२५३१४१२६, दूरभाष : ०९१-७३१-२४८५३२७,
ईमेल – misra508@gmail.com

(प्रस्तुति-बिजूका)
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टिप्पणियां:-

आशीष मेहता:-
सुन्दर रचनाएँ प्रदीपजी, हार्दिक बधाई।
आभार बिजूका एवं रचनाजी।
'रिश्तों में समाज' एवं 'तंत्र' मानो एक दूसरे के पूरक हैं, दोनों मिल कर जीवन की 'अनवरतता' और 'जीवटता' (अभिन्न अंग) को सरल एवं सशक्त रूप में चितर रहें हैं ।

देवेन्द्र रिनावा:-
तंत्र और प्रेम की भट्टी में संवेदना और गहरा सामाजिक यथार्थ परिलक्षित होता है,ईश्वरीय सत्ता...प्रदीप मिश्र की  सामाजिक ढकोसलों की पड़ताल करती कविता  है।बहुत बधाई। ......राजेश्वर वशिष्ठ को भी बधाई ।

प्रदीप मिश्रा:-
पूनम जी आपका स्वागत है। नीलिमा जी क्षमा मेरे मोबाइल में नंबर ही आ रहा था।असहमति हमेशा  ही स्वागत योग्य है।

दीपक मिश्रा:-
प्रदीप जी की कविताएँ अपने कहन में और लोकेल में पूरी तरह से सुस्पष्ट हैं। पहली कविता भारतीय /हिन्दू बालक/बालिका के अवचेतन की निवृत्ति को उत्कृष्ट ढंग से दिखती है। पूरी प्रक्रिया स्पष्ट हो जाती है। हालाँकि कहन में कविताई कहीं कमतर लगती है।

आशा पाण्डेय:-
प्रदीप जी की सारी कविताएं बहुत अच्छी लगीं.सब में धार है.ईश्वर की सत्ता  कविता तो धर्म के नाम पर शोषण और अपनी सत्ता स्थापित करने वालों पर सीधा प्रहार है.बधाई उन्हें.

नितीश मिश्रा:-
प्रदीप मिश्र अपनी शुरू की कविताओं में कपास की तरह खुलते है और एक जादू की तरह उम्मीद बुनते हुए चलते है।लेकिन इधर बीच उनकी जो भी कविताएं पढ़ा हूँ उससे बहुत ही निराशा हुई है।कभी कभी कवि भी कविता लिखना छोड़ चूका होता है उसे अन्वेषण ही कविता लगने लगती है ।शायद प्रदीप जी की अपने अन्वेषण के क्षण को ही कविता का कथ्य बनाते हुए चल रहे है।अन्वेषण तब कविता का शक्ल अख्तियार करती है जब वह पूरा हो जाए।कुल मिलाकर प्रदीप मिश्र की कविताएं निराश कर दी। मैं उस प्रदीप मिश्र को जानता हूँ जिसने  कभी कबूतर जैसी कविता लिखी थी।

प्रज्ञा :-
प्रदीप भाई की कविताएँ सहजता में बड़ी बात रचने के हुनर को जानती हैं। बधाई उन्हें।

राजवंती मान:-
प्रदीप जी की सभी कविताएँ बहुत अच्छी हैं विद्युतीय वेग लिए हुए।आपको बहुत बधाई और शुभकामनाएँ

रेणुका:-
ईश्वरीय सत्ता पर .......एकदम सटीक और प्रत्येक मानव की वर्तमान मनोस्थिति बयान करती कविता ।

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